DesiHub

अध्याय 28 / 28

पिघला बादशाह

बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi

बर्फ़ के बादशाह की कहानी ने एक उठे हुए क़दम पर अपनी साँस रोक रखी थी। और फिर वो क़दम गिरा... पीछे नहीं, आगे। महिका का क़दम हिमराज के उस लोहे के गेट के अंदर पड़ा, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और एक कंगाल कैंटीन वाली उस काँच के साम्राज्य में यूँ दाख़िल हुई जैसे वो हमेशा से उसी की रही हो।

और गेट के उस पार वो खड़ा था, किसी तख़्त पर नहीं, किसी बर्फ़ के पीछे नहीं, बस एक आदमी की तरह। जैसे कल रात जब से वो गई थी, वो वहीं, उसी जगह, उसी उम्मीद में जमा खड़ा रहा हो, इस आख़िरी सुबह का इंतज़ार करते हुए।

तुम आ गईं। मैंने कहा था मैं यहाँ रहूँगा, तुम आओ या न आओ। पर सच कहूँ, महिका, मुझे लगा था ये सड़क ख़ाली ही रहेगी। बारह साल से मेरे हिस्से में यही आया है, ख़ाली सड़कें, ख़ाली कमरे। और आज, पहली बार, कोई आया है।

उसके दोनों हाथों में वो दो चीज़ें थीं जो उसे इस गेट से बाहर रोक सकती थीं। एक हाथ में वो ट्रस्ट का काग़ज़, परिवार का महफ़ूज़ कल, और दूसरे में माँ की वो डायरी, बारह साल का ग़म, वो परछाईं जो उसे मोड़ सकती थी। और दोनों को थामे, फिर भी, वो अंदर आई थी।

मैं ये काग़ज़ लेकर नहीं आई, अगस्त्य। ट्रस्ट, फ़ंड, मेरे परिवार का महफ़ूज़ कल... उसके लिए शुक्रिया, पर मैं उसके लिए यहाँ नहीं हूँ। और मैं ये डायरी लेकर भी नहीं आई। मेरी माँ की परछाईं मुझे रोक सकती थी, पर मैंने उसे रोकने नहीं दिया।

मैं इसलिए आई क्योंकि कल रात तुमने मुझे आज़ाद कर दिया था। ज़िंदगी में पहली बार किसी ने मुझसे कुछ माँगा नहीं, कुछ थोपा नहीं। और जब मेरे सामने कोई मजबूरी नहीं बची, न पैसा, न एहसान, न डर, तो जो बचा वो सिर्फ़ तुम थे। मैंने तुम्हें चुना, अगस्त्य। किसी दवाई की तरह नहीं, किसी ज़ायके की तरह नहीं। बराबरी से, अपनी पूरी मर्ज़ी से।

मेरे पास तुम्हें देने को कुछ नहीं है, महिका, जो पहले से तुम्हारा न हो। ये टावर, ये दौलत, ये नाम... तुमने कभी इनमें से कुछ नहीं माँगा। मेरे पास सिर्फ़ मैं हूँ, एक आदमी जो बारह साल कुछ महसूस नहीं कर पाया, और जो अब, तुम्हारी वजह से, फिर से महसूस करना सीख रहा है। अगर तुम्हें यही चाहिए, तो ये तुम्हारा है, आज से हमेशा के लिए।

उसने वो आख़िरी साँस पार कर ली, जो वो न बोर्ड रूम में पार कर पाया था, न छत की सीढ़ियों पर। उसने महिका का चेहरा थामा, और बारह साल की सारी जमी बर्फ़ एक ही बोसे में पानी बन कर बह गई, बिना किसी डर, बिना किसी राज़ के। चौकीदार ने मुस्कुरा कर नज़रें फेर लीं, और हिमराज के उस बर्फ़ीले साम्राज्य में बारह साल बाद पहली बार कुछ गरम था।


कुछ हफ़्ते बाद, उसी अस्पताल में जहाँ से बारह साल पहले ये कहानी शुरू हुई थी, एक तख़्ती पर से पर्दा हटा। सफ़ेद संगमरमर पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था... 'निर्मला वर्मा मेमोरियल नर्सिंग विंग। उस हाथ के नाम, जिसने एक अजनबी को बिना नाम पूछे खाना खिलाया।' और उस तख़्ती के नीचे खड़ा था वो पूरा परिवार जो कभी उस नाम को इज़्ज़त से नहीं ले पाता था, बारह साल की बदनामी अब सोने में बदल चुकी थी।

दीदी, दीदी, देखो! माँ का नाम अब पत्थर पर लिखा है, सुनहरे अक्षरों में! अब तो हमेशा-हमेशा के लिए लिखा रहेगा, कोई मिटा नहीं सकता! अगस्त्य भैया, आपने कहा था इस विंग में जो नर्सें पढ़ेंगी, वो सब माँ का नाम जानेंगी... सच में सब जानेंगी?

सच में, चिंटू। इस विंग से जो भी नर्स निकलेगी, वो तुम्हारी माँ का नाम पढ़ कर निकलेगी। और उसे पता होगा कि एक हाथ ऐसा भी था जिसने आधी रात एक अजनबी को खाना खिलाया, बिना ये पूछे कि वो अपना है या पराया। वही इस अस्पताल की सबसे बड़ी नर्स थी। कोई इसे कभी नहीं मिटा सकता, मैं वादा करता हूँ।

देख लिया, माँ? जिस लड़के के लिए तुम मरते दम तक रोती रहीं, वो आज तुम्हारा नाम सोने में लिख कर लाया है। और जो इल्ज़ाम तुम्हें बारह साल ढोना पड़ा, वो आज राख हो गया। अब आराम से सोना, माँ। तुम्हारी बदनामी ख़त्म हुई, और तुम्हारी बच्ची ठीक है।

एक कोने में बैठी नानी ने वो तख़्ती देखी, और बारह साल में पहली बार उनके चेहरे से वो डर पूरी तरह उतर गया। और उनके बगल में बंसी काका, जिसने महिका को बेटी की तरह अपनाया था, अपने मैले तौलिए में आँखें छुपाए रो रहा था, बार-बार कहते हुए कि उसे पहले दिन से पता था, इस लड़की के हाथ में जादू है।


उसी शाम, हिमराज के उस ऊँचे फ़्लोर पर, जब भीड़ छँट चुकी थी, लिफ़्ट का दरवाज़ा खुला और एक आख़िरी बार वो औरत बाहर निकली जो कभी महिका को किसी दाग़ की तरह देखती थी। पर आज संजना राणा के क़दमों में वो अकड़ नहीं थी, वो एलिगेंट ज़हर नहीं था, बस हाथ में एक छोटा सूटकेस और आँखों में एक ऐसी थकान जो कोई अमीरी छुपा नहीं सकती।

मैं जा रही हूँ, अगस्त्य। दिल्ली से, हिमराज से, इस पूरे नाम से। मेरा बाप एक क़ातिल निकला। जिस औरत को उसने बर्बाद किया, जिस परिवार को उसने मार डाला... और मैं बारह साल उसी की बेटी बन कर, उसी की दौलत पहन कर घूमती रही। मैं तुमसे माफ़ी नहीं माँगूँगी, महिका। कुछ चीज़ें माफ़ी से नहीं धुलतीं।

तुमने वो फटा पन्ना बोर्ड में लाकर मेरी माँ को बेगुनाह साबित करने में मदद की, संजना। मैं उसे नहीं भूलूँगी। तुम्हारे बाप का गुनाह तुम्हारा गुनाह नहीं है, जब तक तुम उसे अपना न बना लो। उस बर्फ़ के चैम्बर के आगे तुमने सही चुना था। बस अब उसी को पकड़े रहना।

एक आख़िरी बात, अगस्त्य, और फिर मैं कभी नहीं लौटूँगी। जेल जाते हुए मेरे बाप ने कहा था कि उस रात से फ़ायदा उठाने वाला वो अकेला नहीं था। मैंने उसके पुराने काग़ज़ों में एक और नाम देखा है, बहुत ऊँचा, बहुत ताक़तवर, आज भी। मैं वो नाम नहीं लूँगी, मैं थक चुकी हूँ। पर तुम बादशाह हो, अगस्त्य। एक दिन वो परछाईं तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक देगी। तब तैयार रहना।

लिफ़्ट का दरवाज़ा बंद हुआ, और वो एलिगेंट ख़तरा जो सालभर महिका के पीछे लगा रहा था, बस... चला गया। वो दूसरा नाम एक ठंडे धागे की तरह लटका रह गया, पर अगस्त्य ने उसे जाने दिया और महिका का हाथ थाम लिया। आज की रात परछाइयों के नाम नहीं थी।


कुछ दिन बाद, हिमराज के उस सबसे ऊँचे फ़्लोर पर, जहाँ कभी सिर्फ़ काली कॉफ़ी और ठंडा ग़ुस्सा रहता था, अब खाने की महक तैरती थी। और दरवाज़े पर टिका खड़ा था वीर ओबेरॉय, अपने पत्थर-दिल दोस्त को एक थाली के सामने चुपचाप खाते देखते हुए।

बारह साल। बारह साल मैंने इस आदमी को हर शेफ़ की थाली 'राख' कहते सुना है। और आज देखो, हिमराज का बादशाह एक कैंटीन की थाली के सामने ऐसे बैठा है जैसे कोई भूखा बच्चा। तेरे बोर्ड मेम्बर तुझसे तब डरते थे जब तू पत्थर था, अब तुझे मुस्कुराते देख कर और ज़्यादा डरने लगे हैं।

तू बारह साल से मेरी हर ख़ामोशी का तर्जुमा करता आया है, वीर। ज़िंदगी में एक बार तो सही तर्जुमा कर। जब पूरा शहर मुझे बर्फ़ का बादशाह कहता था, तब भी तू मुझे इंसान समझता था, और जब मैंने ये पूरा साम्राज्य एक कंगाल लड़की के लिए दाँव पर लगाया, तब भी तू साथ खड़ा था। शुक्रिया, वीर, बारह साल की देरी से।

रहने दे, रहने दे, इतनी इज़्ज़त से तो मैं और डर जाता हूँ। पर एक बात, अगस्त्य। राणा जेल में है, पर तूने कहा था वो दूसरा नाम खोजना है, वो जो उस रात राणा के साथ फ़ायदे में था। मैंने थोड़ा टटोला, कुछ धागे बहुत ऊपर तक जाते हैं। ये फ़ाइल खोलूँ?

नहीं, वीर। आज नहीं। वो परछाईं कहीं नहीं जा रही, और मैं अब जल्दी में नहीं हूँ। बारह साल मैं एक मुर्दा रात के पीछे भागता रहा, और उस भागते-भागते जीना भूल गया। उस नाम के लिए एक और दिन ज़रूर आएगा। पर आज मेरे पास एक ज़िंदा दिन है, और नीचे कैंटीन में कोई मेरा इंतज़ार कर रहा है।


और यूँ ये कहानी घूम कर वहीं आ पहुँची जहाँ से शुरू हुई थी... टावरों के नीचे वो गुनगुनाती कैंटीन, जहाँ बंसी काका की कड़ाही अब भी छनछनाती थी और महिका का चूल्हा अब भी जलता था। पर इन हफ़्तों में, चुपके-चुपके, अगस्त्य की ज़ुबान पर कुछ बदल रहा था।

डॉक्टर सेठी का बताया वो दरवाज़ा, जिसे सिर्फ़ रहम खोल सकता था, अब चरमरा कर खुल रहा था, क्योंकि उस आदमी को अब महसूस करने के लिए किसी ज़ख़्म की ज़रूरत नहीं रही। एक हफ़्ते पहले हिमराज के एक लॉन्च पर, वही आदमी जो अपनी ही कुल्फ़ी को बारह साल से राख कहता था, एक चम्मच मुँह में रख कर ठहर गया, क्योंकि बारह साल में पहली बार महिका के हाथ की नहीं, किसी और चीज़ की एक हल्की सच्ची मिठास उसकी ज़ुबान छू गई।

सुना है साहब ने कल लॉन्च पर अपनी ही कुल्फ़ी चख ली? पूरी कंपनी में यही चर्चा है। तो अब जब तुम्हें दुनिया भर के ज़ायके चखने में आने लगेंगे, तो मेरी इस दाल-चावल की क्या अहमियत रह जाएगी, हँ? अब तो तुम्हें कोई भी थाली अच्छी लगेगी।

बैठो, महिका। बारह साल मुझे लगता रहा कि तुम्हारा खाना मेरी दवाई है, एक चाबी, एक इलाज। कि तुम्हारे हाथ का ज़ायका ही अकेला है जो मुझ तक पहुँचता है। पर आज मेरी ज़ुबान पर कुल्फ़ी का ज़ायका भी है, और कल शायद और भी होंगे।

और फिर भी, महिका, मुझे तुम्हारी ये मामूली दाल-चावल दुनिया के हर ज़ायके से ज़्यादा चाहिए। क्योंकि वो कभी दवाई थी ही नहीं, वो हमेशा से मोहब्बत थी। पहले भी, जब मैं उसे इलाज समझता था, और आज भी, जब मुझे उसका कोई इलाज नहीं चाहिए। मैं तुम्हें एक ज़ायके की तरह नहीं, बस तुम्हारी तरह चाहता हूँ।

बारह साल पहले मेरी माँ ने एक भूखे लड़के को खाना दिया था, बिना जाने कि वो कौन है। और आज उसी लड़के ने मुझे वो बात सिखा दी जो मेरी माँ हमेशा कहती थी... कि खाना पेट के लिए नहीं, दिल के लिए बनता है। खा लो, अगस्त्य। ठंडा हो रहा है।

अगस्त्य ने एक कौर उठाया, और इस बार मेज़ पर कोई पुराना ढक्कन नहीं था, गले में कोई राज़ नहीं था, बस गरमाहट थी और वो औरत जिसने उसे अपनी मर्ज़ी से चुना था। और बर्फ़ का वो बादशाह, जिससे पूरा शहर काँपता था, उसके हाथ की एक मामूली थाली पर मुस्कुरा दिया।

लोग मुझे बर्फ़ का बादशाह कहते थे, महिका। उन्हें लगता था वो बर्फ़ मेरा तख़्त थी, मेरी ताक़त। पर वो तख़्त कभी था ही नहीं। वो एक पिंजरा था, एक ठंडी क़ैद, जिसमें मैं बारह साल अकेला जमा पड़ा रहा। और तुमने... तुमने बस अपने हाथ की एक थाली से उस पूरे पिंजरे को पिघला दिया।

कहीं दूर, अँधेरे में, वो दूसरा नाम अब भी करवट ले रहा था, पर वो किसी और रात की, किसी और कहानी की बात थी। आज की रात बर्फ़ पिघल कर पानी हो चुकी थी, और बादशाह बारह साल बाद घर आ चुका था।

टावरों के नीचे उस छोटी सी कैंटीन में, एक कंगाल लड़की और एक टूटे बादशाह के बीच, बारह साल की जमी एक पूरी सर्दी आख़िरकार ख़त्म हो गई थी, और जो बचा, वो सिर्फ़ गरम था। बर्फ़ का बादशाह पिघल चुका था... हमेशा के लिए।

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।