Chapter 15 of 28
फिर वही सर्दी
बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi
पहले बोसे के तुरंत बाद अगस्त्य महिका से उसकी माँ का नाम जानने का सच छुपा कर, 'तुम्हारी फ़ाइल में पढ़ा' कह कर टाल देता है और फिर से बर्फ़ बन जाता है, जिससे टूट कर महिका उससे दूरी बना लेती है। उधर बारह साल में पहली बार उस काली रात की तरफ़ पलटते हुए अगस्त्य वीर को अपना अनिच्छुक साथी बना कर पुराने अस्पताल के काग़ज़ मँगवाता है, और आधी रात उसे पता चलता है कि नर्स निर्मला पर लगा लापरवाही का केस एक ही दिन में दबा दिया गया था, और उस ट्रस्ट कमेटी को उस साल सबसे बड़ा चंदा देने वाला आदमी दिग्विजय राणा था।
काँच के उस कमरे में महिका का सवाल अभी भी हवा में जमा था। "आपको उनका नाम कैसे पता?" अभी-अभी जो बोसा बारह साल की बर्फ़ पिघला गया था, उसकी गरमाहट अभी होंठों पर बाक़ी थी। पर अगस्त्य के सीने में उसी पल वो पूरा सच जाग चुका था जो अब तक सिर्फ़ हम जानते थे। कि जिस माँ का नाम उसने अभी लिया, वो वही नर्स निर्मला वर्मा थी जिसने उस काली रात उसे बचाया था, और वही औरत जिसे उसके अपने घर की तबाही ने कुचल डाला था। और ये सच वो महिका को, इस पल, कभी नहीं बता सकता था।
"तुम्हारी फ़ाइल।" "तुम मेरी मुलाज़िम हो, महिका। तुम्हारा पूरा रिकॉर्ड कंपनी के पास है, जॉइनिंग फ़ॉर्म में माँ-बाप का नाम भी होता है। ... वहीं कहीं पढ़ा होगा।"
और वो एक लफ़्ज़, "फ़ाइल", कमरे की सारी गरमाहट पर पाला बन कर गिरा। महिका का वो हाथ, जो पल भर पहले उसके चेहरे को छू रहा था, हवा में ही ठहर गया। एक साँस पहले वो उसकी "अकेली गरमाहट" थी। और अब वो एक फ़ाइल थी, किसी कॉलम में लिखा एक नाम।
"फ़ाइल...।" "आपने मेरी माँ का नाम मेरी फ़ाइल में पढ़ा। तो अभी, जब आप मुझे थाम कर वो सब कह रहे थे, तब भी आपके दिमाग़ में मेरी वो फ़ाइल चल रही थी?" "मैं समझी थी आप मुझे देख रहे हैं, साहब। पता नहीं था कि आप मेरा रिकॉर्ड पढ़ रहे थे।"
और महिका का सिर घूमने लगा। एक ही पल में उस पर बहुत कुछ टूट कर गिरा था, वो बोसा, और फिर उसकी माँ का नाम इस अजनबी अमीर आदमी की ज़ुबान पर। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि इस आदमी से डरे, या भरोसा करे, या भाग जाए।
"जो समझना था, समझ लिया।" "अब बहुत देर हो चुकी है, महिका। घर जाओ।" "और आज इस कमरे में जो हुआ, उसे भूल जाओ। यही दोनों के लिए बेहतर है।"
और महिका ने अपनी आँखों के सामने वो बर्फ़ दोबारा जमते देखी। वही आदमी जो पल भर पहले जल रहा था, अब फिर पत्थर हो चुका था। कल जिसने उसके लिए राणा से नाता तोड़ा, अभी जिसने उसे अपनी "अकेली गरमाहट" कहा, वो अब पीठ किए काँच के पार दिल्ली को घूर रहा था।
"भूल जाऊँ।" "आप कहते हैं भूल जाओ, जैसे कुछ हुआ ही न हो। बर्फ़ का बादशाह हैं ना आप। जो चीज़ काम की, रख ली, बाक़ी सब एक हुक्म से बर्फ़ में दबा दी।" "मैं भी बस उतनी ही देर की गरमाहट थी, है ना?"
"जो सोचना है सोच लो।" "पर आज के बाद ये बातें इस कमरे में दोबारा नहीं होंगी। तुम्हारा काम कैंटीन का है, मेरा इस टावर का। इससे आगे कुछ नहीं।"
और यही उस कहानी की सबसे गहरी सज़ा थी। हम जानते थे कि ये बर्फ़ नफ़रत की नहीं थी। बादशाह उसे इसलिए दूर धकेल रहा था क्योंकि जिस लड़की को वो चाहने लगा था, वो उसी औरत की बेटी थी जिसकी बर्बादी में उसके अपने घर का हाथ था। पर महिका को बस इतना दिखा कि गरमाहट झूठी थी और बर्फ़ ही सच।
"ठीक है, साहब।" "मैं भूल जाऊँगी। आप जैसा कहें।" "कल से आपकी थाली वक़्त पर ऊपर आ जाएगी। बस इतना ही मेरा काम है ना। ... वही करूँगी।"
और वो चली गई। उस कमरे में सिर्फ़ बादशाह रह गया, हाथ में एक नाम लिए जो उसे कभी दिया ही नहीं गया था। निर्मला वर्मा। बारह साल उसने उस रात की तरफ़ पलट कर नहीं देखा था। पर आज उस बेस्वाद दुनिया में उसके भीतर एक और भूख जाग गई थी, उस रात का सच जानने की भूख।
अगली सुबह हिमराज का शीशे का टावर हमेशा की तरह ठंडा और चमकदार खड़ा था। बादशाह के निजी फ़्लोर पर उसकी थाली ठीक वक़्त पर पहुँची, उन्हीं हाथों से जो कल तक उसकी अकेली गरमाहट थे। पर आज उन हाथों और उस आदमी के बीच बारह साल की नहीं, एक ही रात की नई बर्फ़ जमी थी।
"आपका खाना।" "आज दाल में घी थोड़ा ज़्यादा है। नानी कहती हैं, कमज़ोरी में घी ताक़त देता है।" "... वैसे आपको इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। रख कर जा रही हूँ।"
"रख दो।" "और अब से थाली दरवाज़े पर रख देना काफ़ी है। अंदर आने की ज़रूरत नहीं।"
और महिका ठिठक गई। ये वही आदमी था जो कल इसी लड़की के लिए बोर्ड से भिड़ गया था। और आज वो उसकी तरफ़ एक नज़र उठाने को तैयार नहीं था। महिका के भीतर कुछ बहुत चुपचाप टूट गया, और उसने वो हिसाब लगा लिया जिससे वो कल रात से भाग रही थी।
"समझ गई।" "कल जो हुआ, वो एक पल का बुख़ार था। रात बीती, आप फिर ठीक हो गए। बर्फ़ का बादशाह फिर से बर्फ़ हो गया।" "मैं आपके लिए एक थाली हूँ, साहब। कल भी थी, आज भी हूँ। मैं ही बेवक़ूफ़ थी जो एक पल कुछ और समझ बैठी।"
"महिका...।" "थाली दरवाज़े पर। यही ठीक रहेगा। तुम्हारे लिए भी, मेरे लिए भी।"
और यही उसकी सबसे सर्द सज़ा थी, कि अब हर गरम लफ़्ज़ एक झूठ होता। इसलिए बादशाह ने फिर बर्फ़ चुनी, उसे उसी सच से बचाने के लिए जो कहने की हिम्मत वो अभी नहीं रखता था।
"एक गुज़ारिश है, साहब।" "कल से आपकी थाली कोई और ऊपर ले आया करेगा, बंसी काका का कोई लड़का।" "आपकी ज़ुबान को जो पसंद है, वो शायद मैं फिर भी बना दूँ। पर उसे इस कमरे तक लाने का काम किसी और के हाथ रहेगा। आपकी दवाई मिलती रहेगी, बस अब मेरे हाथ से नहीं।"
उस शाम वीर ओबेरॉय की कैबिन में कॉफ़ी के दो कप ठंडे पड़े थे। वीर बारह साल से अगस्त्य का अकेला दोस्त था, वो अकेला जो बादशाह की ख़ामोशियों को पढ़ना जानता था। और आज उसने अपने दोस्त के चेहरे पर वो चीज़ देखी जो बारह साल में कभी नहीं देखी थी, एक ज़िद, किसी बात की तह तक जाने की भूख।
"तो।" "कल तूने भरे बोर्ड रूम में राणा को झूठा साबित किया, सगाई को अख़बार का रद्दी बताया, और अपने बाप जैसे गार्जियन से नाता तोड़ लिया।" "जिस आदमी की छाँव में तूने बारह साल कंपनी चलाई, कल उसे खुला दुश्मन बना लिया। और आज तेरे चेहरे पर पछतावा नहीं, कुछ और है। बता, अंदर चल क्या रहा है?"
"वीर, मुझे एक चीज़ चाहिए।" "बारह साल पहले, जिस रात मेरे माँ-बाप और नित्या का एक्सीडेंट हुआ था... उस रात के अस्पताल के सारे पुराने काग़ज़। एडमिशन के रिकॉर्ड, उस रात का ड्यूटी रजिस्टर, और वो केस जो उस रात बना।" "जो भी बचा हो। सब कुछ।"
"रुक। रुक ज़रा।" "बारह साल, अगस्त्य। बारह साल से तूने उस रात का नाम तक ज़ुबान पर नहीं लिया। मैं वो अकेला हूँ जिसने तुझे उस हादसे के बाद टूटते, फिर पत्थर होते देखा।" "और आज तू अचानक उसी रात की फ़ाइलें माँग रहा है? इतने साल बाद, क्यों?"
"और मुझे बेवक़ूफ़ मत समझ।" "तेरा ये सब बदलना, तेरा बारह साल बाद जागना, तेरा राणा से भिड़ना, ये सब ठीक उन्हीं दिनों से शुरू हुआ जब से वो कैंटीन वाली लड़की तेरी ज़िंदगी में आई है। जिस दिन से तू उसके हाथ का खाना खा रहा है।" "ये सब उसी से जुड़ा है ना?"
"मैं तुझे सब नहीं बता सकता, वीर। अभी नहीं।" "बस इतना जान ले। बारह साल पहले जिस रात मैंने सब कुछ खोया, उसी रात एक अजनबी ने मुझ पर रहम किया था। और अब मुझे यक़ीन होने लगा है कि उस रात हमें जो कहानी सुनाई गई, वो पूरी सच नहीं थी।" "मुझे उस झूठ की तह तक जाना है। और उसके लिए वो काग़ज़ चाहिए।"
वीर एक लंबे पल तक अपने दोस्त को देखता रहा। उसके अंदर का हिसाबी आदमी कह रहा था कि ये आग से खेलना है, कि राणा से जंग पहले ही छिड़ चुकी है और अब पुरानी क़ब्रें खोदना और ख़तरनाक होगा। पर उसके अंदर का दोस्त, जो बारह साल से इस पत्थर आदमी में एक इंसान ढूँढता आया था, हार गया।
"तू जानता है मैं तुझे कभी मना नहीं कर पाता।" "बारह साल में तूने मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा, न छुट्टी, न सहारा, न एक कप कॉफ़ी। और आज जो माँगा, वो सीधे शमशान से माँगा।" "ठीक है, लाऊँगा। पर गाँठ बाँध ले, अगर हमने इस रात को खोदा, तो जो निकलेगा उसे वापस दफ़नाया नहीं जा सकेगा।"
"मैं उसे वापस दफ़नाना ही नहीं चाहता, वीर।" "बारह साल मैंने ख़ुद को उस रात के नीचे दफ़नाए रखा। अब बारी उस सच की है जो किसी ने मुझसे छुपाया।"
और इस तरह वो दोनों उस रात की तरफ़ मुड़ गए जिसकी तरफ़ अगस्त्य ने बारह साल पीठ किए रखी थी। कुछ दिन वीर ने चुपचाप, बादशाह का नाम कहीं आने दिए बिना, पुराने अस्पताल की धूल फाँकी, बारह साल की भूली हुई कागज़ी क़ब्रें। और एक रात, जब पूरा टावर सो चुका था, वो एक पुराना, धूल भरा डिब्बा बादशाह की कैबिन में उठा लाया।
"ये आसानी से नहीं मिला, अगस्त्य। बारह साल पुराना रिकॉर्ड, आधा दीमक खा गया, आधा किसी ने जान-बूझ कर अलग करवा दिया लगता है।" "पर जो तूने माँगा था, वो इसमें है।" "अगस्त्य... एक बार और सोच ले। इसे पढ़ने के बाद तू पहले जैसा नहीं रह पाएगा।"
"मैं पहले जैसा रहना ही नहीं चाहता, वीर।" "ये... ये वो केस है। उस रात की 'लापरवाही' का। जिसमें उस नाइट-शिफ़्ट की नर्स को मेरे परिवार की मौत का ज़िम्मेदार ठहराया गया।" "नर्स का नाम...। निर्मला वर्मा।"
और वो नाम पढ़ते ही अगस्त्य का हाथ रुक गया। निर्मला वर्मा। वही नाम जो उसने रात महिका की फ़ाइल के ठीक बग़ल में रखा था। वही हाथ जिसने उस काली रात उसे टिफ़िन थमाया, वही ज़ायका जो आज उसे ज़िंदा कर रहा था, और वही औरत जिसे उसी के परिवार की मौत का क़ातिल बना दिया गया। उसने साँस रोक कर आगे पढ़ना शुरू किया।
"वीर... ये देख।" "केस उस हादसे की सुबह दर्ज हुआ। और बंद भी हो गया... उसी शाम। एक ही दिन में।" "तीन जानें गईं, एक पूरा ख़ानदान ख़त्म हुआ, एक औरत को क़ातिल क़रार दिया गया... और ये सारा 'इंसाफ़' एक ही दिन में निपटा दिया गया। एक दिन में, वीर।"
"एक दिन में?" "ये मुमकिन ही नहीं, अगस्त्य। तीन मौतों का लापरवाही का केस महीनों चलता है, जाँच होती है, कमेटियाँ बैठती हैं।" "किसी ने इसे रातों-रात दबा दिया। जैसे किसी को डर था कि केस एक दिन भी ज़्यादा खुला रहा, तो कुछ और ही निकल आएगा।"
"किसने बंद किया, बस वही ढूँढ रहा हूँ।" "केस को रफ़ा-दफ़ा किया अस्पताल की ट्रस्ट कमेटी ने। एक ही बैठक में, एक ही दस्तख़त से। और इस कमेटी को चलाता किसका पैसा था...।" "उस साल इस ट्रस्ट को सबसे बड़ा चंदा देने वाला...।"
और अगस्त्य की उँगली उस पीले काग़ज़ की आख़िरी लाइन पर आ कर रुक गई। ट्रस्ट के सबसे बड़े दानदाता का नाम, जिसकी एक चुप्पी उस केस को एक दिन में दफ़ना सकती थी। वो नाम पढ़ते ही बादशाह की रगों की पुरानी बर्फ़ एक बार फिर जम गई, पर इस बार उसमें एक धार थी।
"दिग्विजय राणा।" "उस साल इस ट्रस्ट को सबसे बड़ा चंदा दिग्विजय राणा ने दिया था, वीर।" "जिस कमेटी ने उस नर्स को एक दिन में क़ातिल बना कर मेरे परिवार का केस बंद किया... उसे चलाने वाला पैसा उसी आदमी का था। उसी आदमी का, जिसे मैं बारह साल से अपना बाप मानता आया हूँ।"
जिस धागे को अगस्त्य ने ये जानने के लिए खींचा कि महिका आख़िर कौन है, वो अब सीधे उस आदमी तक जा पहुँचा जिसे उसने बारह साल अपना पिता समान माना था। बारह साल जिस कहानी को वो सच मान कर ढोता रहा, वो अब झूठ बन कर उसकी मेज़ पर पड़ी थी, और उस झूठ को पैसे के दम पर एक ही दिन में दफ़नाने वाले हाथ पर अब एक नाम था। बर्फ़ का बादशाह उस काग़ज़ को घूरता रहा, और उसके भीतर बारह साल से जमी बर्फ़ पहली बार दरक कर कुछ और बनने लगी। इसी आधी रात, इस टावर में, एक नई जंग की बुनियाद पड़ चुकी थी।
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