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अध्याय 2 / 28

पहला निवाला

बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi

सर्विस कॉरिडोर में वक़्त जैसे रुक गया था। बर्फ़ का बादशाह, हाथ में एक कैंटीन की स्टील की प्लेट थामे, ऐसे खड़ा था जैसे किसी ने उसे सीधे सीने पर वार किया हो।

बारह साल। चार हज़ार से ज़्यादा दिन। और अभी-अभी, दाल-चावल के एक कौर ने वो कर दिखाया था जो दुनिया का कोई शेफ़, कोई डॉक्टर, कोई दवा नहीं कर पाई थी।

"रुको।"

"जी? ... देखिए साहब, अब आप ठीक लग रहे हैं, और मुझे नीचे भागना है। कैंटीन में ढेर सारे बर्तन पड़े हैं।"

"ये खाना... तुमने बनाया है?"

"हाँ जी, घर पर, सुबह-सुबह। कोई शिकायत है क्या इसमें? ज़्यादा तीखा तो नहीं था?"

वो कैसे कहता? कि बारह साल से उसकी ज़ुबान एक क़ब्रिस्तान थी, और इस लड़की के आधे खाए टिफ़िन ने उसमें अचानक साँसें भर दी थीं। ये कहता तो पागल लगता। और बादशाह पागल नहीं लगते।

"नहीं। ... नमक ज़्यादा था। बस।"

"ज़्यादा? ... अभी दो मिनट पहले तो ऐसे खा रहे थे जैसे बरसों से भूखे हों। और अब अचानक नमक ज़्यादा हो गया?"

उसे पता ही नहीं था कि उसने कितनी सच्ची बात कह दी है। बरसों से भूखे। ठीक बरसों से।

"तुम्हारा काम खाना बनाना है, बहस करना नहीं। जाओ।"

"जा रही हूँ, जा रही हूँ। मुफ़्त में जान बचाओ, ऊपर से डाँट खाओ। बहुत ख़ूब, साहब।"

और वो चली गई, अपनी सस्ती वर्दी में, अपने आधे खाए टिफ़िन के साथ, ये जाने बिना कि उस टिफ़िन में हिमराज के मालिक की बारह साल पुरानी जान अटकी रह गई थी।

अगस्त्य अकेला रह गया। उसने उँगली पर बची दाल की एक बूँद देखी, और फिर, किसी चोर की तरह, उसे चख लिया। ... और वही बिजली फिर कौंधी। वही गलियारा। वही बारिश। वो झटके से पीछे हटा, जैसे प्लेट ने उसका हाथ जला दिया हो।

और हम वो राज़ जानते हैं जो अगस्त्य नहीं जानता। ये ज़ायका नया नहीं था। ये वही था जो एक बरसाती रात, एक नर्स के हाथ से, उसकी ज़ुबान पर जम गया था। निर्मला वर्मा। महिका की माँ। पर अगस्त्य के लिए ये बस एक नामुमकिन पहेली थी, जिसे हल किए बिना उसे चैन नहीं था।

शाम तक बीसवीं मंज़िल का बादशाह एक अजीब बीमारी में जकड़ा हुआ था। नाम था... बेचैनी।

वीर ओबेरॉय जब फ़ाइलें लेकर अंदर आया, तो उसने वो देखा जो पिछले दस साल में कभी नहीं देखा था। अगस्त्य मल्होत्रा, खिड़की के पास, काम भूल कर, कहीं खोया हुआ।

"केसर-मलाई बैच के फ़ाइनल नंबर आ गए हैं... अगस्त्य? ... भाई, तुम सुन भी रहे हो?"

"वीर। कैंटीन में एक नई लड़की आई है।"

"एक मिनट। मुझे लगा मैंने ग़लत सुना। तुमने अभी 'कैंटीन' कहा? तुम, जिसे ये तक नहीं पता कि कंपनी की कैंटीन किस माले पर है?"

"उसका खाना। ... उसके हाथ के खाने में कुछ है।"

"अच्छा? बर्फ़ के बादशाह को किसी के खाने में 'कुछ' महसूस हुआ? ... रुको, तुमने चखा भी? तुम तो पानी भी नाप-तोल कर पीते हो।"

अगस्त्य ने जवाब नहीं दिया। वो वीर को नहीं बता सकता था कि आज बारह साल में पहली बार उसकी ज़ुबान जागी थी। ये कहने के लिए पहले उसे ख़ुद पर यक़ीन करना पड़ता, और यक़ीन उसके पास नहीं था।

"क्वालिटी का सवाल है। हिमराज हर साल करोड़ों की मिठाई बेचता है, और मेरे पास एक भी भरोसे का ज़ायका नहीं। ... मैं चाहता हूँ वो लड़की हमारे प्रोडक्ट परखे। एक क्वालिटी-टेस्टर के तौर पर।"

"टेस्टर? ... अगस्त्य, हमारे पास पूरा सेंसरी पैनल है। बीस लोग, डिग्रियों वाले, जो जीभ पर मिठास के नंबर लगाते हैं। और तुम एक कैंटीन की लड़की को..."

"उसी पैनल ने केसर-मलाई पास किया था, जो कूड़ा थी। ... मुझे वो लड़की चाहिए, वीर। बात ख़त्म।"

"ठीक है, ठीक है।" ... "दस साल में पहली बार तुम्हें कोई इंसान 'चाहिए'। ... बड़ी दिलचस्प।"

वीर ओबेरॉय बेवक़ूफ़ नहीं था। उसने अपने दोस्त को बर्फ़ में जमते देखा था, अंदर ही अंदर टूटते देखा था, पर किसी में 'दिलचस्पी' लेते... ये बिल्कुल नया था। कुछ तो था इस कैंटीन वाली में। और वीर ने ठान लिया कि वो पता लगा कर रहेगा।

"और हाँ, राणा साहब का फ़ोन आया था। तीसरी बार। संजना के साथ सगाई की तारीख़ पूछ रहे थे। अगले महीने चाहते हैं वो।"

"बाद में, वीर।"

"तुम 'बाद में' बारह साल से कह रहे हो। एक दिन राणा साहब ख़ुद तारीख़ तय कर देंगे, और तुम्हें बस दूल्हे की कुर्सी पर बिठा देंगे।"

और ये कोई ख़ाली बात नहीं थी। दिग्विजय राणा, हिमराज का चेयरमैन, अगस्त्य का 'सरपरस्त', बारह साल से इस साम्राज्य को धीरे-धीरे अपनी मुट्ठी में भींच रहा था। उसका आख़िरी मोहरा थी उसकी बेटी संजना। पर वो चालें अभी बर्फ़ के नीचे दबी थीं।

नीचे कैंटीन में, हाथ धोते हुए, महिका अब भी बड़बड़ा रही थी। पहला ही दिन, और एक अकड़ू सूट वाले से पंगा ले लिया। पर उसे अफ़सोस रत्ती भर नहीं था। नानी कहती थीं, भूखे को खिलाना कभी ग़लत नहीं होता, चाहे वो बादशाह ही क्यों न हो।

तभी एक चपरासी हाँफता हुआ आया। महिका वर्मा? ऊपर, बीसवीं मंज़िल पर। साहब ने बुलाया है। अभी।

"बीसवीं? ... वहाँ तो बड़े-बड़े लोग बैठते हैं। कौन-से साहब?"

और जब उसे नाम बताया गया, तो महिका के हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा। अगस्त्य मल्होत्रा। मालिक। 'बर्फ़ का बादशाह' ख़ुद। वही आदमी जिसे उसने कॉरिडोर में डाँटा था, टिफ़िन ठूँसा था, और 'साहब' कह कर टाल दिया था।

"हे राम। ... मैंने मालिक को डाँटा। पहले ही दिन। ... नानी सही कहती थीं, ये ज़ुबान एक दिन मुझे ज़रूर डुबोएगी।"

बीसवीं मंज़िल किसी और ही दुनिया की थी। शीशा, ठंडक, और मेज़ के पीछे बैठा वो आदमी, जो अब बीमार नहीं, बल्कि तराशे हुए पत्थर जैसा लग रहा था।

"साहब... कॉरिडोर वाली बात के लिए... मुझे सच में नहीं पता था कि आप मालिक हैं।"

"...पर सच कहूँ, तो अगर पता भी होता, तो भी मैं वही करती। आप गिरने वाले थे, भूखे थे। और मेरी नानी कहती हैं, भूखे के सामने ओहदा नहीं, बस थाली देखी जाती है।"

अगस्त्य ने उसे ग़ौर से देखा। बारह साल से लोग उसके सामने काँपते थे, गिड़गिड़ाते थे। ये लड़की माफ़ी माँगते-माँगते भी तनी हुई खड़ी थी।

"तुम्हें अपनी नौकरी की परवाह नहीं?"

"बहुत परवाह है, साहब। घर में बूढ़ी नानी है, छोटा भाई है, उसकी स्कूल फ़ीस है, सिर पर क़र्ज़ है। ये नौकरी मेरी नहीं, मेरे पूरे घर की साँस है। ... इसलिए अगर निकालना ही है, तो जल्दी निकाल दीजिए, ताकि मैं दूसरी ढूँढ सकूँ।"

"बैठो। ... तुम्हें निकाला नहीं जा रहा। तुम्हें एक नई ज़िम्मेदारी दी जा रही है।"

"आज से तुम कैंटीन की कुक नहीं, हिमराज की क्वालिटी-टेस्टर हो। तुम्हारा काम... मेरे लिए खाना बनाना। रोज़। एक वक़्त।"

"आपके लिए? ... खाना? ... साहब, आपके पास तो पाँच सितारा शेफ़ होंगे। और आप मुझसे, कैंटीन की महिका से, दाल-चावल बनवाएँगे?"

"मेरी वजहें मेरी हैं। तनख़्वाह तीन गुना मिलेगी। मंज़ूर?"

तीन गुना। महिका के कानों में वो लफ़्ज़ किसी घंटी की तरह बजा। चिंटू की फ़ीस, नानी की दवाई, क़र्ज़ की क़िस्त... पर उसकी नानी की एक और सीख थी। जो सौदा समझ में न आए, उसमें कहीं न कहीं फँसाना छुपा होता है।

"रुकिए ज़रा। ... तीन गुना तनख़्वाह, सिर्फ़ दाल-चावल के लिए? ... साहब, बुरा मत मानिए, पर इतनी मेहरबानी बेवजह नहीं होती। आप जैसे लोग गरीब की थाली में यूँ ही सोना नहीं रखते। ... आप मुझसे असल में चाहते क्या हैं?"

"मैं तुमसे खाने के सिवा कुछ नहीं चाहता। और अगर तीन गुना तनख़्वाह में भी तुम्हें शक़ है, तो..."

"शक़ नहीं, साहब। डर है। ... आप एक इशारे से मेरे पूरे घर को सड़क पर ला सकते हैं। और जिसके हाथ में इतनी ताक़त हो, उस पर यूँ ही यक़ीन नहीं होता।"

और यहीं थी वो दीवार जिसे अगस्त्य गिरा नहीं सकता था। वो उसे सच नहीं बता सकता था, कि ये मेहरबानी नहीं, उसकी मजबूरी थी। कि इस लड़की के हाथ में उसकी मरी हुई ज़ुबान की इकलौती चाबी थी। सच कहता तो कमज़ोर पड़ता, और बादशाह कमज़ोर नहीं पड़ते।

"चलिए, एक शर्त पर मानूँगी। ... पहले आप मुझे दिखाइए कि आप खा भी सकते हैं। मुझे नहीं लगता आपने सुबह से एक कौर भी खाया है। ... मेरे बैग में एक पराठा है, घर का, अचार के साथ। खा कर दिखाइए। फिर मानूँगी कि आपको सचमुच खाना-बनवाने वाली चाहिए, कोई और खेल नहीं।"

उसने बैग से अख़बार में लिपटा एक पराठा निकाल कर मेज़ पर रख दिया। ठंडा, तह किया हुआ, माँ के हाथ के अचार के साथ। और अगस्त्य का दिल, उसकी अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, ज़ोर से धड़का।

"तुम... मुझे हुक्म दे रही हो?"

"जी हाँ। खाने के मामले में मैं किसी की नहीं सुनती, बादशाह हों या भिखारी। ... लीजिए। एक टुकड़ा। बस एक।"

उसने एक टुकड़ा तोड़ा, अचार लगाया, और मुँह में रखा। ... और फिर वही चमत्कार। नमक, घी, हरी मिर्च की वो तीखी गर्माहट। बर्फ़ एक बार फिर पिघली। ये कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं था। ये सच था। इस लड़की के हाथ में सचमुच कुछ था, कुछ जो सिर्फ़ उसकी बंद ज़ुबान खोल सकता था।

"देखा? ... ऐसे खाते हैं। और पूरा खाइए, आधा छोड़ने की आदत अच्छी नहीं। ... अब वो पत्थर वाला चेहरा ज़रा हटा लीजिए, आपसे संभल नहीं रहा।"

बारह साल से हिमराज का हर आदमी उसके इशारे पर चलता था। और आज एक कैंटीन की लड़की उसे हुक्म दे रही थी, पूरा खाओ। और सबसे अजीब बात... वो खा रहा था। चुपचाप। पूरा।

महिका के जाने के बाद अगस्त्य देर तक उस ख़ाली अख़बार को घूरता रहा जिसमें पराठा लिपटा था। बारह साल की जमी बर्फ़ में, ये लड़की एक नन्ही सी आग थी। और अब उसे एक ही डर था... कहीं ये आग बुझ न जाए।

दिन में एक बार का खाना काफ़ी नहीं था। जो चीज़ उसे बारह साल बाद जीना सिखा रही थी, उसे वो नीचे की भीड़ में नहीं छोड़ सकता था। बादशाह जो चाहता था, उसे अपने पास रखता था।

"अगस्त्य... ये क्या है? तुमने कैंटीन की एक कुक का ट्रांसफ़र ऑर्डर साइन किया है? ... सीधे अपने निजी फ़्लोर पर? ... यहाँ तो आज तक सफ़ाई वाले को भी अकेले आने की इजाज़त नहीं थी।"

"अब है। वो कल से ऊपर, इसी फ़्लोर पर रिपोर्ट करेगी। सीधे मेरे नीचे।"

"अगस्त्य, तुम्हें अंदाज़ा है ये कैसा दिखेगा? बोर्ड, राणा साहब, संजना... एक जवान कुक को उठा कर सीधे अपने निजी फ़्लोर पर बिठा लेना? ... तुम अपने ही घर में तूफ़ान की दावत दे रहे हो।"

"आने दो तूफ़ान। ... ऑर्डर जारी कर दो, वीर।"

और अगली सुबह, कैंटीन में, बर्तनों की खटपट के बीच, महिका के हाथ में एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा थमाया गया। हिमराज का आधिकारिक हुक्मनामा, अगस्त्य मल्होत्रा के दस्तख़त के साथ।

"'महिका वर्मा को, तत्काल प्रभाव से, कैंटीन से हटाया जाता है...' " ... "...हटाया जाता है।"

उसने बस पहली लाइन पढ़ी, और उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। हटा दिया। सच में हटा दिया। कल उसने मालिक से बहस की थी, शर्त रखी थी। और आज उसका सबसे बड़ा डर काग़ज़ पर छपा, उसके सामने खड़ा था।

"...रुको, आगे और भी लिखा है।" ... "'...और अगस्त्य मल्होत्रा के निजी फ़्लोर पर, उनकी सीधी निगरानी में, तैनात किया जाता है।'"

निजी फ़्लोर। सीधी निगरानी। अकेले। उस पत्थर जैसे आदमी के साथ, बिना बंसी के, बिना कैंटीन के शोर के, बिना किसी और के। जिस बात को वीर तूफ़ान कह रहा था, महिका उसे कोई और ही नाम दे रही थी।

"ये तरक़्क़ी नहीं है। ... ये पिंजरा है। ... वो मुझे सबसे दूर, अपने पास, अकेला ले जाना चाहता है। ... हे भगवान, ये आदमी आख़िर मुझसे चाहता क्या है?"

एक ही सफ़ेद काग़ज़। एक तरफ़ बर्फ़ का बादशाह, जिसके लिए ये अपनी डूबती ज़ुबान बचाने का इकलौता रास्ता था। दूसरी तरफ़ महिका, जिसके लिए वो काग़ज़ किसी तोहफ़े का नहीं, एक धमकी का पैग़ाम था। और कल सुबह, उसी बादशाह के बर्फ़ीले पिंजरे में, अकेली, उसे क़दम रखना था।

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