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Chapter 18 of 28

पास आते सच

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

उस रात के बाद महिका बाहर से वही रही, पर भीतर सब बदल चुका था। दिग्विजय राणा, वो नाम अब उसकी हर साँस में बसा था, माँ की डायरी के पन्ने से सीधे उसके सीने में उतरा हुआ। और फिर भी अगली शाम वो उसी आदमी के टावर में रोटियाँ सेंक रही थी, जिसने उसकी माँ को मिटाया था।

रात के ग्यारह बज चुके थे, टावर की सारी बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, और नीचे कैंटीन में सिर्फ़ एक चूल्हा जल रहा था। बंसी काका बरतन समेटते-समेटते ठिठक गए, क्योंकि आज महिका के हाथ तो काम कर रहे थे, पर आँखें कहीं और अटकी थीं।

"बिटिया, तीन बार वही दाल में नमक डाल चुकी है तू आज। तेरा शरीर यहाँ है और दिमाग़ पता नहीं कहाँ घूम रहा है।" "क्या बात है? घर पे सब ठीक तो है? नानी की तबीयत?"

"नानी ठीक हैं, काका... बस ये ज़िंदगी थोड़ा थका देती है।" "काका, आपने बरसों पहले शहर के बड़े अस्पतालों में भी कैंटीन चलाई थी ना? उन अस्पतालों में बारह-बारह साल पुराने काग़ज़, पुराने रिकॉर्ड, कहाँ रखे जाते हैं?"

"अरे, ये अचानक पुराने रिकॉर्ड का क्या करेगी तू? नीचे तहख़ाने में, रिकॉर्ड रूम में सड़ते रहते हैं, दीमक और धूल के हवाले। कोई नहीं झाँकता वहाँ।" "पर तू पूछ क्यों रही है? किस अस्पताल की बात है, बिटिया?"

"बस एक पुरानी बात का पता करना है, माँ से जुड़ी।" "जहाँ मेरी माँ नर्स थीं, उसी अस्पताल की। मुझे उनके कुछ पुराने काग़ज़ चाहिए, और कुछ नहीं।"

जो उसने नहीं कहा वो ये कि माँ की डायरी अधूरी थी, आधे पन्ने बरसों के आँसुओं में बह चुके थे। उसे एक ऐसा काग़ज़ चाहिए था जो किसी अदालत के सामने ठहर सके और साबित कर दे कि निर्मला वर्मा बेगुनाह थी। अकेली डायरी काफ़ी नहीं थी।

"देख महिका, मैं तेरे बाप की उमर का हूँ। जिस डाल पे बैठी है, उसी को काटने की बात मत सोच। इन ऊपर वालों के पुराने काग़ज़ों में हाथ डालना अपनी क़ब्र ख़ुद खोदना है।" "तेरे कंधों पे पहले से एक घर टिका है, ये बोझ मत उठा।"

"काका, कुछ बोझ उतारे नहीं जाते, उठाने ही पड़ते हैं।" "मेरी माँ बारह साल एक झूठे दाग़ के साथ जीं और उसी के साथ मर गईं। उसे धोने का एक भी मौक़ा है, तो मैं पीछे नहीं हटूँगी।" "आप बस साहब का टिफ़िन आज भी छोटू के हाथ ऊपर भिजवा दीजिए। मैं देर से घर जाऊँगी।"

और बंसी काका ने एक लंबी साँस भर कर वही किया जो रोज़ होता आया था। महिका का बनाया खाना छोटू के हाथ बादशाह के फ़्लोर पर चला गया, पर आज वो ख़ुद उस दरवाज़े तक नहीं गई। आज वो टावर के पिछले रास्ते से रात की बारिश में उतर गई, एक पुराने अस्पताल की तरफ़।

शहर के एक कोने में वो पुराना अस्पताल खड़ा था, पलस्तर झड़ा हुआ, बोर्ड की आधी बत्तियाँ बुझी हुईं। यही वो जगह थी जहाँ बारह साल पहले उस रात के सारे ज़ख़्मी लाए गए थे, और इन्हीं गलियारों में निर्मला वर्मा ने अपनी आख़िरी ड्यूटियाँ की थीं। महिका दबे क़दमों से भीतर दाख़िल हुई, भीगी, दिल किसी चोर की तरह धड़कता हुआ।

पर उस सुनसान रिसेप्शन की मद्धम रौशनी में वो अकेली नहीं थी। काउंटर के पार दो साये खड़े थे, और उनमें से एक को पहचानते ही महिका के क़दम पत्थर हो गए। लंबा क़द, काला कोट, वही बर्फ़ जैसा चेहरा, अगस्त्य मल्होत्रा।

"अगस्त्य... वो देख, दरवाज़े पे। ये तुम्हारी वही कैंटीन वाली है ना, महिका?" "यहाँ, इस अस्पताल में, आधी रात को? ये आख़िर क्या माजरा है?"

एक पल के लिए तीनों वहीं जम गए। अगस्त्य यहाँ उस रात का असली रिकॉर्ड ढूँढने आया था, क्योंकि वीर के लाए काग़ज़ आधे दीमक खा चुके थे और आधे किसी ने हटवा दिए थे। और अब वो लड़की ठीक उसी जगह खड़ी थी जहाँ से उसका अपना सारा दुख शुरू हुआ था।

"साहब, आप यहाँ?" "बर्फ़ के बादशाह का इस पुराने सरकारी अस्पताल में क्या काम? यहाँ तो कोई पाँच सितारा कमरा भी नहीं जो आपकी शान के लायक़ हो।"

"वो सवाल मैं तुमसे पूछूँ, महिका। इस वक़्त तुम्हें अपनी नानी के पास होना चाहिए था। इस अँधेरे में तुम्हारा क्या काम है?" "और अपने आने-जाने का हिसाब मैं तुम्हें कब से देने लगा?"

"हाँ, आप तो बादशाह हैं। न आने का हिसाब, न जाने का, न किसी को थाम कर अगली सुबह फिर बर्फ़ बन जाने का।" "मैं एक निजी काम से आई हूँ, जिससे आपका कोई लेना-देना नहीं। आप अपना रास्ता देखिए, मैं अपना।"

उसका वो ताना अगस्त्य के भीतर सीधे उस रात पर जा कर लगा जब उसने उसे चूमा और फिर सच छुपाने के लिए ख़ुद पर बर्फ़ ओढ़ ली थी। और वो उसे बता नहीं सकता था कि वो बर्फ़ नफ़रत नहीं, एक राज़ थी।

"अच्छा, ठीक है, ठीक है। दो लोग आधी रात एक भुतहे अस्पताल में खड़े एक-दूसरे को घूर रहे हैं, वाह, क्या नज़ारा है।" "पर बेटा महिका, सच बता, तू यहाँ किसलिए आई है? ये जगह इस वक़्त एक अकेली लड़की के लिए ठीक नहीं।"

"मेरी माँ इसी अस्पताल में नर्स थीं, बहुत साल पहले।" "मुझे उनके कुछ पुराने काग़ज़ चाहिए, और मैं जानती हूँ कि रिकॉर्ड रूम नीचे तहख़ाने में है।" "किसी से इजाज़त नहीं माँगूँगी, ये मेरी माँ की निशानी है, मेरा हक़ है।"

नर्स, इसी अस्पताल में। और अगस्त्य के भीतर सब थम गया, क्योंकि वो जानता था कि वो नर्स कौन थी। दोनों एक ही रात के काग़ज़ ढूँढने आए थे, अपने-अपने आधे सच के साथ, पर कोई अपना आधा दूसरे को दिखाने को तैयार नहीं था।

"रिकॉर्ड रूम खुल जाएगा, मेरा नाम काफ़ी है। मेरे हिमराज के एक पुराने मामले का काग़ज़ भी यहीं दबा है, इसलिए मैं भी नीचे चल रहा हूँ।" "और तुम्हें इस तहख़ाने में अकेले नहीं जाने दूँगा।"

"मुझे आपकी हिफ़ाज़त की ज़रूरत नहीं, साहब।" "पर अगर दरवाज़ा आपके नाम से खुलता है, तो खुलने दीजिए। मेरे पास वक़्त कम है और इंकार करने की सहूलियत नहीं।"

एक तंग लोहे की सीढ़ी उन्हें उस तहख़ाने में ले गई, जहाँ नमी और पुराने काग़ज़ की गंध भरी थी। कतार-दर-कतार जंग खाई आलमारियाँ, फ़ाइलों के ढेर, हर काग़ज़ पर धूल की मोटी चादर। अगस्त्य ने फ़ोन की रौशनी जलाई, और दो अजनबी, दो दुश्मन, दो चाहने वाले, एक ही रात को ढूँढने लगे।

"साल के हिसाब से लगा है सब... बारह साल पीछे। यहाँ, इसी साल का, इसी महीने का।" "इसी महीने में मेरी माँ की पूरी दुनिया उजड़ी थी, साहब। एक रात, एक हादसा, और सब ख़त्म।"

"कैसा हादसा? तुम्हारी माँ के साथ उस रात आख़िर हुआ क्या था?"

"एक गाड़ी बारिश में फ़्लाईओवर से नीचे गिरी थी, एक पूरा परिवार उसमें था।" "माँ ड्यूटी पर थीं, उन्हें बचाने में उन्होंने अपनी जान लगा दी, पर बचा न सकीं।" "और उन्हीं पर इल्ज़ाम मढ़ दिया गया कि उनकी लापरवाही से वो मरे। मेरी माँ को क़ातिल बना दिया गया, जबकि असली क़ातिल कोई और था।"

अगस्त्य का हाथ फ़ाइलों पर वहीं रुक गया। वो परिवार जो उस गाड़ी में था, वो उसका अपना था, उसके माँ-बाप, नन्ही नित्या। और जिस नर्स की वो बात कर रही थी, उसी की बेटी उसके सामने खड़ी थी। एक वाक्य में वो पूरा फ़ासला मिटा सकता था, और एक भी नहीं बोल सकता था।

"आप ऐसे अचानक चुप क्यों हो गए? क्या हुआ, बादशाह को एक कैंटीन वाली की दुख भरी कहानी बोर कर रही है?" "या फिर... आपकी आँखों में ये क्या है? आप तो कभी नहीं पिघलते।"

"मैंने भी उस तरह की एक रात देखी है, महिका। बरसों पहले, एक हादसा, एक बारिश की रात।" "उसके बाद से मुझे कोई ज़ायका नहीं आता, कोई मिठास नहीं, सिर्फ़ राख।" "इसलिए जब तुम अपनी माँ की उस रात की बात करती हो, तो कोई बहुत पुराना ज़ख़्म फिर रिसने लगता है।"

और अगस्त्य के भीतर डॉक्टर सेठी की बात गूँजी, कि उसका ज़ायका उसी रात की किसी याद का क़ैदी है। उसी रात, इसी के किसी गलियारे में एक नर्स ने एक अजनबी लड़के के हाथ में अपना टिफ़िन थमाया था। और उसी नर्स की बेटी आज उसके सामने खड़ी थी, ये जाने बिना कि वो लड़का यही आदमी है।

"आप ऐसे मत देखिए मुझे, साहब। मैं भूली नहीं हूँ कि आप कौन हैं। जिस टावर के आप मालिक हैं, उसी टावर के सबसे बड़े आदमी ने..." "...छोड़िए। मुझे बस अपना काग़ज़ ढूँढने दीजिए।"

"उसी टावर के सबसे बड़े आदमी ने क्या, महिका? तुम कहते-कहते रुक क्यों गईं, तुम क्या जानती हो?" "अगर किसी ने तुम्हारे परिवार के साथ ग़लत किया है, तो मुझे बताओ।"

"कुछ नहीं, मैं थक गई हूँ, बस बहक गई।" "ये बड़े लोगों के ख़िलाफ़ की लड़ाई है, साहब। मैं आप पर भरोसा करके अपनी माँ की आख़िरी निशानी दाँव पर नहीं लगा सकती।" "जो मेरा है, वो मेरे सीने में ही ठीक है।"

एक ही अँधेरे में, एक ही रात का सच ढूँढते हुए, दोनों पूरी तस्वीर से बस एक फ़ासले पर खड़े थे। अगर अगस्त्य अपना आधा बोल देता, अगर महिका डायरी खोल देती, तो पूरा राज़ उसी पल खुल जाता, पर दोनों ने अपना-अपना ज़ख़्म छुपाए रखा।

"इसी में होना चाहिए, इसी साल इसी महीने का रजिस्टर, एडमिशन का रिकॉर्ड, उस रात की केस फ़ाइल, सब।" "अगर उस रात का असली काग़ज़ मिल गया, तो मैं साबित कर दूँगी कि मेरी माँ बेगुनाह थीं।" "बस यही एक फ़ाइल, साहब, बस यही एक..."

पर जैसे ही महिका का हाथ उस ख़ाने के भीतर पहुँचा, वहीं ठहर गया। जहाँ उस महीने की फ़ाइल होनी चाहिए थी, वहाँ सिर्फ़ एक ख़ाली जगह थी, और उस जगह पर बरसों की धूल की चादर टूटी हुई थी, जैसे किसी ने अभी-अभी वहाँ से वो फ़ाइल खींच ली हो।

"रुको, हाथ मत लगाओ। ये धूल देखो, बाक़ी हर फ़ाइल पर बरसों की धूल जमी है, पर ठीक इसी एक जगह पर नहीं।" "यहाँ से कोई फ़ाइल अभी-अभी उठाई गई है, हमसे बस कुछ मिनट पहले।"

"नहीं... ऐसा नहीं हो सकता। कहीं किसी और ख़ाने में रखी होगी।" "इतने साल बाद मेरी माँ का सच कोई और मुझसे पहले क्यों ले जाएगा?"

और ठीक उसी पल, तहख़ाने के दूसरे सिरे से, उस अँधेरे गलियारे में एक आवाज़ उभरी। तेज़, जल्दबाज़ क़दमों की आहट, किसी लोहे के दरवाज़े के चरमरा कर भिड़ने की आवाज़, और फिर ऊपर कहीं, बारिश में, एक गाड़ी के स्टार्ट होने की गड़गड़ाहट।

"अगस्त्य, जल्दी ऊपर आओ! अभी-अभी कोई पिछले दरवाज़े से निकला है, हाथ में एक फ़ाइल दबाए। मैंने रोकना चाहा, पर वो गाड़ी में बैठ कर निकल गया।" "मैंने उसका चेहरा नहीं देखा, पर वो ठीक जानता था कि वो क्या लेने आया था।"

"कोई हमसे पहले यहाँ आया था, महिका, कोई जो ठीक जानता था कि उसे यहाँ से क्या ले जाना है।" "ये कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं। जिस रात का सच तुम ढूँढ रही हो, उसे कोई और भी दफ़्न रखना चाहता है।"

जो अगस्त्य ने ज़ोर से नहीं कहा वो ये कि वो जानता था, वो 'कोई और' कौन था। दिग्विजय राणा, जिसकी ताक़त ने बारह साल पहले इस सच को दबाया था, अब उसी सच को मिटाने अपना आदमी उनसे पहले भेज चुका था। और वो ये आधा सच भी महिका को नहीं बता सकता था, क्योंकि उस धागे को खींचते ही खुल जाता कि वो ख़ुद इस कहानी का हिस्सा है।

और वो दोनों उस तहख़ाने में खड़े रह गए, एक टूटी धूल की चादर और एक ख़ाली ख़ाने के सामने, जबकि बाहर वो गाड़ी की आवाज़ बारिश में घुलती हुई दूर होती चली गई। पूरी तस्वीर के इतने पास आ कर भी, दोनों उसे एक साँस की दूरी से हाथ से निकलते देखते रह गए। बारह साल से जो सच इस अँधेरे में दफ़्न पड़ा था, कोई उसे उनसे ठीक पहले उठा ले जा चुका था।

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