अध्याय 17 / 28
माँ की डायरी
बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi
नानी की बिगड़ती सेहत और मौत से पहले राज़ न ले जाने का डर उन्हें वो चीज़ महिका को सौंपने पर मजबूर कर देता है जो उन्होंने बारह साल छुपाई थी, निर्मला के आख़िरी महीनों की डायरी, जिसमें महिका अपनी माँ के अपने हाथ से पढ़ती है कि उसका घर शर्म से नहीं, एक झूठ से टूटा था। और डायरी का आख़िरी पढ़ा जा सकने वाला पन्ना उस रात दूसरी गाड़ी से बेदाग़, नशे में निकाले गए आदमी का नाम खोलता है, दिग्विजय राणा, और ठीक उसी पल कोने में चलता टीवी वही नाम पूरे कमरे में भर देता है।
गली के मुँह से वो बड़ी काली गाड़ी जितनी ख़ामोशी से आई थी, उतनी ही ख़ामोशी से लौट गई। और एक कमरे के उस घर में शांति देवी अकेली रह गईं, हाथ में वही स्टील का गिलास थामे जिससे थोड़ी देर पहले मल्होत्रा घराने का वो लड़का पानी पी कर गया था। बारह साल जिस राज़ को उन्होंने पत्थर के नीचे दबा रखा था, आज वो पत्थर हिल गया था।
जो अजनबी अभी उनकी देहरी पर सिर झुकाए बैठा था, वो कह कर गया था कि वो निर्मला का नाम फिर से साफ़ करेगा। और शांति देवी ने तय कर लिया था कि ये बात, कि वो कौन था और क्यों आया था, वो महिका को कभी नहीं बताएँगी। डर, जिसने बारह साल से उनकी ज़ुबान पर ताला लगा रखा था, अब भी उतना ही सख़्त था। पर आज उस डर के नीचे एक और चीज़ जाग गई थी, वक़्त के ख़त्म होने का एहसास।
रात गहरा रही थी जब गली में वो जानी-पहचानी आहट हुई। महिका अपनी हिमराज की शिफ़्ट से लौटी थी, थकी हुई, कंधे पर वही पुराना बैग, और उसके पीछे-पीछे चिंटू, जो शाम भर बग़ल वाले के घर टीवी देखता रहा था।
"दीदी, भूख लगी है, बहुत ज़ोर की।" "और नानी को देखो, पूरी शाम से ऐसे बैठी हैं जैसे किसी ने डाँट दिया हो। न टीवी चलने दिया, न बात की।" "अच्छा बता, आज भी अपने उस अमीर गुस्सैल साहब को खाना खिला कर आई? वो जो न हँसता है, न बोलता है?"
"खिला कर नहीं आई, बदतमीज़। अब मैं उनका खाना ख़ुद ले कर नहीं जाती।" "बना कर बंसी काका के छोटू के हाथ भिजवा देती हूँ, बस। मेरा काम रसोई में है, उनके दरवाज़े पर खड़े रहना नहीं।" "... चल, हाथ-मुँह धो, मैं अभी गरम रोटी सेंकती हूँ।"
और चूल्हे के पास बैठी शांति देवी अपनी नातिन को यूँ देख रही थीं जैसे पहली बार देख रही हों। वही हाथ, आटा गूँधने का वही अंदाज़, वही ज़ायका, जो कभी उनकी अपनी बेटी निर्मला के हाथ में था। और सिर्फ़ वही जानती थीं कि इन्हीं हाथों का बनाया खाना आज एक टूटे हुए अमीर आदमी को बारह साल बाद ज़िंदा रखे हुए है, उसी अजनबी को जो अभी-अभी इसी दहलीज़ से हो कर गया था।
महिका ने तवा चढ़ाया ही था कि शांति देवी को खाँसी का दौरा पड़ा। पहले हल्की, फिर एक के बाद एक, ऐसी कि बूढ़ा जिस्म काँप उठा और साँस जैसे गले में ही अटक गई।
"नानी! नानी, धीरे साँस लो... मैं पानी लाती हूँ।" "चिंटू, वो दवाई वाला डिब्बा ला, जल्दी!" "इतनी तेज़ खाँसी कब से हो रही है? तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?"
"कुछ नहीं... कुछ नहीं, बस बुढ़ापा है, बेटा।" "मशीन पुरानी हो गई है, कभी भी बंद हो सकती है।" "बस... जाने से पहले एक-दो हिसाब बाक़ी हैं मेरे, वो निपटाने हैं।"
"ऐसी बातें मत करो, नानी। तुम्हें कुछ नहीं होगा।" "कल सुबह हम बड़े अस्पताल चलेंगे, अच्छे डॉक्टर को दिखाएँगे।" "पैसे की चिंता मत करो, मैं संभाल लूँगी। थोड़ा और काम कर लूँगी, कुछ न कुछ हो जाएगा।"
और उस एक कमरे में वही पुराना हिसाब फिर तैर गया, दवाई, क़र्ज़, चिंटू की फ़ीस, और एक अकेली लड़की के दो कंधे। चिंटू दवाई का डिब्बा थामे दरवाज़े पर खड़ा था, ग्यारह साल का, और उसकी आँखों में वो डर था जो बच्चों को अचानक बड़ा कर देता है।
"दीदी... नानी को कुछ नहीं होगा ना?" "हमारे पास तो बस नानी हैं, और तुम। माँ तो हमें छोड़ कर बहुत पहले चली गईं।" "मुझे माँ ठीक से याद भी नहीं। बस इतना याद है कि वो भी आख़िर में ऐसे ही खाँसती थीं।"
और चिंटू की उस मासूम बात ने शांति देवी के भीतर बची-खुची हर झिझक काट दी। निर्मला भी ऐसे ही खाँसती थी, और एक दिन चुपचाप चली गई थी, अपना पूरा सच अपने सीने में दबाए। और शांति देवी ने उसी पल तय कर लिया, वो ये ग़लती दोबारा नहीं करेंगी। वो अपना राज़ अपने साथ क़ब्र में नहीं ले जाएँगी।
रात और गहरा गई। चिंटू खा-पी कर, नानी से लिपट कर सो गया, और कोने में रखा पुराना टीवी धीमी आवाज़ में यूँ ही चलता रहा, जिसे बंद करने का किसी को ध्यान न रहा। महिका बर्तन समेट कर, चूल्हे की आँच बुझा कर नानी के पास आ बैठी। पर शांति देवी की आँखों में नींद नहीं थी। कुछ देर वो अँधेरे में छत को घूरती रहीं, फिर धीरे से उठीं।
"नानी, इस वक़्त कहाँ उठ रही हो? लेट जाओ ना।" "कुछ चाहिए तो मुझे बताओ, मैं ले आती हूँ। तुम्हें इस हालत में यूँ हिलना नहीं चाहिए।"
पर शांति देवी नहीं रुकीं। वो कोने में रखे उस पुराने लोहे के संदूक़ तक गईं, जिसे बरसों से किसी ने नहीं खोला था। काँपते हाथों से उन्होंने ताला खोला, कपड़ों की तह के नीचे कुछ टटोला, और एक चीज़ निकाली, जो कपड़े की एक पुरानी थैली में लिपटी हुई थी।
उन्होंने वो थैली एक पल सीने से लगाई, जैसे कोई अपने बच्चे को आख़िरी बार गले लगाता है। फिर धीरे से महिका की गोद में रख दी। थैली के अंदर एक पुरानी, पीली पड़ चुकी डायरी थी।
"ये... ये क्या है, नानी?" "किसकी डायरी है? इतने सालों से संदूक़ में यूँ छुपा कर क्यों रखी थी?"
"तेरी माँ की, बेटा। ... निर्मला की।" "उसके आख़िरी महीनों की। जब वो बिस्तर पर पड़ी घुल रही थी, तब रात-रात भर इसी में कुछ न कुछ लिखती रहती थी।" "मैं बारह साल से इसे तुझसे छुपाती रही, सिर्फ़ डर से। पर अब मेरे पास वक़्त नहीं बचा।"
"माँ की...?" "नानी, तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? इतने साल मेरे पास माँ की एक धुँधली तस्वीर के सिवा कुछ नहीं था, और तुमने उनके अपने हाथ से लिखे लफ़्ज़ छुपाए रखे?"
"इसलिए छुपाया, क्योंकि इसमें जो लिखा है वो सिर्फ़ दर्द नहीं, एक ख़तरा भी है।" "बेटा, तूने आज तक यही सुना कि तेरी माँ लापरवाह थी, कि उसकी ग़लती से लोग मरे, कि वो बदनाम हो कर मरी।" "पर ये झूठ है। तेरी माँ बिल्कुल बेगुनाह थी। उसे किसी ने जान-बूझ कर बलि का बकरा बनाया। हमारा घर शर्म से नहीं टूटा, एक झूठ से टूटा था।"
और वो एक लफ़्ज़, झूठ, महिका के भीतर बरसों की एक गिरह पर आ कर लगा। जिस शर्म को वो बचपन से ढो रही थी, कि उसकी माँ की वजह से किसी की जान गई, वो शर्म ही झूठी थी। पर नानी की आवाज़ में इस वक़्त जो डर था, वो महिका ने पहले कभी नहीं सुना था।
"पढ़ ले, बेटा। तुझे हक़ है अपनी माँ का सच जानने का।" "पर मैं तुझसे हाथ जोड़ती हूँ, इसमें जिन लोगों का ज़िक्र है, वो बहुत बड़े, बहुत ताक़तवर लोग हैं। इतने बड़े कि उन्होंने एक बेगुनाह नर्स को एक दिन में मिटा दिया।" "सच जान ले, पर उससे लड़ने मत जाना। मैं अपनी निर्मला के बाद अब तुझे भी नहीं खो सकती।"
महिका ने काँपते हाथों से डायरी खोली। और पहले ही पन्ने पर उसकी माँ की लिखावट थी, वही गोल-गोल अक्षर, जो उसे अपनी माँ की सिर्फ़ धुँधली-सी याद से याद थे। और जैसे-जैसे उसकी उँगली उन लफ़्ज़ों पर फिरती गई, वो लफ़्ज़ किसी दबी हुई आवाज़ की तरह उस कमरे में उठने लगे, जैसे निर्मला ख़ुद उसके पास बैठी बोल रही हो।
"आज फिर वही रात आँखों के आगे घूमती रही। मूसलाधार बारिश, और फ़्लाईओवर से नीचे गिरी वो गाड़ी।" "एक पूरा परिवार, मेरे सामने, मेरे हाथों में। मैंने पूरी जान लगा दी, भगवान गवाह है मैंने कुछ नहीं छोड़ा। पर मैं उन्हें बचा न सकी।"
महिका की आँखें भर आईं। बरसों बाद वो अपनी माँ से मिल रही थी, इन्हीं टेढ़े-मेढ़े लफ़्ज़ों में। ये वो औरत नहीं थी जिसे दुनिया ने लापरवाह कहा था। ये एक ऐसी नर्स थी जिसने अजनबियों के एक परिवार के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक दी थी।
"पर जिस बात ने मेरी नींद हमेशा के लिए छीन ली, वो ये थी। उस हादसे में एक और गाड़ी थी। एक दूसरी गाड़ी।" "और उस दूसरी गाड़ी से जिस आदमी को निकाला गया, उस पर एक ख़रोंच तक नहीं थी। शराब में धुत, अपने पैरों पर खड़ा, बिल्कुल सही-सलामत।" "एक परिवार ख़त्म हो गया, और जिस आदमी की वजह से ये सब हुआ, उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ।"
महिका का दिल तेज़-तेज़ धड़कने लगा। तो ये थी असली कहानी। कोई लापरवाही नहीं थी, कोई ग़लती नहीं। एक शराबी आदमी, एक दूसरी गाड़ी, और एक परिवार जो उसकी वजह से मिट गया, और सज़ा मिली उस नर्स को जिसने उन्हें बचाने की जान लगा दी थी।
"मैंने वो सब अपनी आँखों से देखा। और शायद यही मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी, कि मैंने देख लिया।" "कुछ ही दिनों में सारा इल्ज़ाम मेरे सिर आ गया। कहा गया, मेरी लापरवाही से वो परिवार मरा। न कोई सुनवाई, न कोई गवाह। रातों-रात मेरी नौकरी, मेरी इज़्ज़त, सब छिन गई।" "क्योंकि उस आदमी के पास पैसा था, ताक़त थी। और मेरे पास सिर्फ़ सच था, जिसे कोई सुनने को तैयार नहीं था।"
"इन्होंने तुम्हें फँसाया, माँ।" "तुमने उस परिवार को बचाने की कोशिश की, और उन्होंने तुम्हीं को क़ातिल बना दिया, सिर्फ़ अपना गुनाह छुपाने के लिए।" "और तुम ये सारा ज़हर सीने में लिए, अकेले, घुट-घुट कर मर गईं। किसी को बता भी न सकीं।"
पास बैठी शांति देवी चुपचाप रो रही थीं। बारह साल का बोझ आज उनकी नातिन के हाथों में उतर रहा था। एक तरफ़ राहत थी कि सच आख़िर बाहर आ रहा था, और दूसरी तरफ़ वही पुराना डर, कि ये सच अब किस आग की तरफ़ ले जाएगा।
"मैं ये सब यहाँ इसलिए लिख रही हूँ, ताकि अगर मैं न रहूँ, तो कम से कम ये काग़ज़ गवाही देते रहें। उस रात दूसरी गाड़ी से जो आदमी उतरा था, मैं उसका नाम जानती हूँ।" "वो कोई मामूली आदमी नहीं। बहुत ऊँचा, बहुत बड़ा नाम है। जिस दिन दुनिया ये नाम सच के साथ जानेगी..."
और यहीं, ठीक यहीं, पन्ने पर लफ़्ज़ धुँधले पड़ने लगे। आगे के कई पन्ने आपस में चिपक गए थे, स्याही बरसों की नमी में फैल कर बह गई थी, जैसे किसी के आँसू उन पर गिरते रहे हों। बस एक आख़िरी पन्ना था जो अब भी पढ़ा जा सकता था, और उसी पर, सबसे ऊपर, एक नाम साफ़ लिखा था।
"यहाँ... यहाँ माँ ने उसका नाम लिखा है।" "उस रात की दूसरी गाड़ी वाला आदमी। जिसने ये सब किया, जिसने माँ को फँसाया।" "दिग्विजय... राणा।"
और वो नाम पढ़ते ही महिका का ख़ून जम गया। राणा। ये कोई अनजान नाम नहीं था। ये वही नाम था जो वो हिमराज के हर गलियारे में सुनती आई थी। दिग्विजय राणा, हिमराज का चेयरमैन, वही आदमी जिसे उसने एक बार लॉबी में देखा था, और जिसके गुज़रते ही नानी की एक पुरानी चेतावनी उसके कानों में गूँजी थी।
"ये... ये तो वही आदमी है, नानी।" "जिस हिमराज में मैं रोज़ रोटियाँ सेंकती हूँ, उसी का सबसे बड़ा मालिक। संजना का बाप, वही संजना जो मुझे किसी कीड़े की तरह देखती है।" "जिस आदमी ने मेरी माँ को बर्बाद किया, मैं बारह साल बाद जा कर उसी के टावर में, उसी के लोगों के लिए खाना बना रही हूँ?"
"इसीलिए... इसीलिए मैं तुझे बार-बार उस जगह से दूर भागने को कहती थी, बेटा।" "अब समझी? वो लोग कितने बड़े हैं, कितने ख़तरनाक। जिसने एक नर्स को मसल कर रख दिया, वो तुझे मसलते हुए एक पल नहीं सोचेगा।" "इसे यहीं बंद कर दे, महिका। भूल जा सब। हमें बस अपनी जान बचानी है, और कुछ नहीं।"
"कैसे भूल जाऊँ, नानी?" "बारह साल से जिस शर्म को मैं ढो रही थी, वो झूठ थी। मेरी माँ बेगुनाह थी, और इस आदमी ने उसे बर्बाद किया।" "और मैं आज तक इसी आदमी के घर की रोटी पका रही थी, और मुझे कानोंकान ख़बर नहीं थी।"
और ठीक उसी पल, जब वो नाम महिका की ज़ुबान पर और उसकी मरहूम माँ के काग़ज़ पर एक साथ ठहरा हुआ था, कोने में चलते उस पुराने टीवी से एक आवाज़ पूरे कमरे में भर गई। रात की ख़बरों में कोई एंकर हिमराज फ़ूड्स और उसके चेयरमैन का ज़िक्र कर रहा था, और वो बड़ा नाम कमरे की हवा में बिल्कुल साफ़ गूँज उठा। "दिग्विजय राणा।"
बारह साल पुरानी एक मरती हुई नर्स की काँपती लिखावट, और आज की रात के चमकते टीवी की तेज़ आवाज़, दोनों ने एक ही पल में एक ही नाम पुकारा। और महिका, अपनी माँ की वो डायरी सीने से चिपकाए, उस टीवी की तरफ़ पत्थर बनी देखती रह गई, जैसे वक़्त ने ख़ुद उस एक नाम को दो तरफ़ से एक साथ बोल कर उसका फ़ैसला सुना दिया हो।
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