DesiHub

अध्याय 11 / 28

माँ का नाम

बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi

सुबह हिमराज के शीशे के महल में रौशनी हमेशा की तरह उतरी, पर कुछ अपनी जगह पर नहीं था। बादशाह के केबिन में हर सुबह साढ़े नौ बजे एक थाली पहुँचती थी, गरम, ढकी हुई, एक जानी-पहचानी ख़ुशबू के साथ। आज भी थाली आई, ठीक वक़्त पर, पर किसी अजनबी हाथ से। और बारह साल से बर्फ़ में जमा अगस्त्य मल्होत्रा उसे यूँ देखता रहा, जैसे सामने राख की तश्तरी रखी हो।

"ये किसने बनाया?" "...ये महिका ने नहीं बनाया। इसमें वो नहीं है, न वो नमक, न वो गरमाहट। सिर्फ़ राख।" "कहाँ है वो? आज नीचे कैंटीन में क्यों नहीं है?"

"बॉस... एक बात किसी और से पहले मुझसे सुन लो।" "वो कैंटीन वाली, महिका... उसने कल इस्तीफ़ा दे दिया। बंसी काका के हाथ में इस्तीफ़ा थमा कर, इस टावर से निकल गई। ... कल सुबह की बात है।"

"इस्तीफ़ा?" "किसने मंज़ूर किया? किसकी इजाज़त से? ... वो यूँ नहीं जा सकती, वीर। वो जा ही नहीं सकती।"

"अगस्त्य, वो एक कुक है। संजना मैडम की बेइज़्ज़ती और उन छपे हुए सगाई के कार्डों के बाद, उस लड़की का यहाँ एक पल और रुकना ही बड़ी बात थी।" "पर एक कुक के जाने से बर्फ़ के बादशाह की साँस क्यों उखड़ रही है? ... ये सिर्फ़ खाने की बात नहीं है, है ना?"

"तुम नहीं समझोगे।" "बारह साल से मैं हर थाली राख की तरह निगलता आया हूँ, वीर। हर मिठाई, हर दावत, अपनी ही कुल्फ़ी... सब बेस्वाद।" "और फिर एक दिन उस लड़की का दिया एक कौर दाल-चावल, और बारह मुर्दा सालों बाद मुझे कुछ चखने में आया। सिर्फ़ उसके हाथ का। और अब वो जा रही है।"

"रुको ज़रा... तुम्हें उसके खाने का स्वाद आता है? सच में?" "इसीलिए तुमने उसे टेस्टर बनाया, इसीलिए निजी फ़्लोर पर बिठाया, इसीलिए संजना के सामने अपनी सगाई तक झुठला दी..." "अगस्त्य, ये कोई सनक नहीं थी। ये लड़की तुम्हारे लिए कोई शौक़ नहीं, ज़िंदगी है।"

"तुमने ही तो कहा था, वीर। पता करो ये लड़की आख़िर है कौन।" "मैंने आज तक नहीं किया, इस डर से कि राज़ खुला तो कहीं ये जादू टूट न जाए। पर अब वो जा रही है, और मैं उसे यूँ जाने नहीं दूँगा, बिना ये जाने कि उसके हाथ में ऐसा क्या है जो बारह साल की बर्फ़ पिघला देता है।"

"और अगर जवाब वो न निकला जो तुम चाहते हो?" "अगस्त्य, सत्रह तारीख़ सिर पर खड़ी है, राणा साहब के छपवाए कार्ड पूरे शहर में हैं। एक तरफ़ एक थोपी हुई सगाई से लड़ रहे हो, दूसरी तरफ़ एक कुक का पीछा कर रहे हो... दोनों हाथ आग में हैं, बॉस।"

"तो मैं आग से खेलूँगा।" "उसकी हर फ़ाइल निकालो, उसका पता, उसका घर, उसका पूरा ख़ानदान। ... और वीर, एक फ़ाइल और चाहिए।" "उस रात की। जिस रात मेरे माँ, बाप और नित्या... उस अस्पताल के सारे पुराने काग़ज़। बारह साल पुराने। जितने भी बचे हों, सब।"

उसी शाम, अपने दफ़्तर से मीलों दूर, एक पुरानी तंग गली में डॉक्टर सेठी के छोटे से क्लिनिक में बर्फ़ का बादशाह दोबारा आ बैठा। पिछली बार वो इलाज ढूँढने आया था। इस बार उसके पास एक सवाल था, जो बारह साल से उसके सीने में दबा था।

"डॉक्टर, आपने कहा था मेरा ज़ायका किसी बंद याद के पीछे क़ैद है, किसी एक इंसान, किसी एक रहम की याद, उसी रात से।" "अगर वो याद कोई इंसान है, तो क्या उसे ढूँढा जा सकता है? क्या वो सचमुच कोई थी, उस रात, उस अस्पताल में?"

"मिस्टर मल्होत्रा, दिमाग़ किसी वहम पर बारह साल पहरा नहीं देता।" "जो अकेला ज़ायका आपकी क़ैद तोड़ता है, वो किसी सच्ची याद से बँधा है। कोई था उस रात, जिसका रहम आपके सबसे बुरे पल में आप तक पहुँचा।" "जानना है तो वहीं जाइए जहाँ वो रात दफ़्न है, उस अस्पताल के काग़ज़ों में। ... देखिए, उस रात वहाँ कौन-कौन था।"

"बारह साल मैंने उस रात की तरफ़ पलट कर नहीं देखा, डॉक्टर। उसे याद करने से मैं उम्र भर भागता रहा।" "और अब आप कह रहे हैं कि मेरी ज़िंदगी की चाबी उसी रात के मलबे में पड़ी है।"

"ज़ख़्म और मरहम अक्सर एक ही जगह मिलते हैं, मिस्टर मल्होत्रा।" "जो रात आपसे सब कुछ ले गई, हो सकता है उसी रात किसी ने आपको वो दिया हो, जो आज तक आपको ज़िंदा रखे है। ... उस रात में जाइए, पर सँभल कर। बंद दरवाज़े के पीछे हमेशा सिर्फ़ मरहम नहीं होता।"

उधर त्रिलोकपुरी के उस एक कमरे के घर में महिका बिना नौकरी की पहली रात काट रही थी। कोने में चिंटू सो चुका था। और महिका चारपाई के पास ज़मीन पर बैठी, अपनी माँ की एक पुरानी, फीकी पड़ चुकी तस्वीर हाथ में लिए, चुपचाप उसे देख रही थी।

"देख माँ, तेरी बेटी ने आज वो कर दिखाया जो शायद तूने भी न किया होता। नौकरी छोड़ आई।" "तू ही तो कहती थी, महिका, जिस थाली में इज़्ज़त न परोसी जाए उसे हँस के ठुकरा देना। ... तो ठुकरा आई मैं। अब देखते हैं ये घर कैसे चलता है, चिंटू की फ़ीस कहाँ से आती है।"

"फिर उसी तस्वीर से बातें कर रही है मेरी बच्ची?" "तूने अच्छा किया, उस अकड़ू के घर से जितनी दूर रहे उतना अच्छा। ... पर तेरी आँखें कह रही हैं कि ये सिर्फ़ नौकरी छूटने का ग़म नहीं है। किसी ने मेरी बच्ची का दिल तोड़ा है।"

"दिल?" "नानी, मैंने बेवक़ूफ़ी की। एक अमीर, अकड़ू आदमी को खिलाते-खिलाते भूल ही गई कि मैं कौन हूँ और वो कौन।" "एक रात उसने मेरा हल्दी लगा हाथ थाम लिया था, और मैं पगली सोच बैठी कि शायद बर्फ़ भी पिघलती है। ... पर उसके लिए मैं एक चम्मच थी, जिससे वो अपनी कोई पुरानी दवाई खाता है।"

"दवाई...?" "तूने अभी क्या कहा, महिका? कि उस आदमी से सिर्फ़ तेरे हाथ का खाया जाता है? सिर्फ़ तेरे हाथ का?"

"हाँ नानी, यही तो सबसे अजीब बात थी उस पूरे टावर में। दुनिया भर की दावतें, बड़े शेफ़, सब ठुकरा कर वो बस मेरे हाथ का दाल-चावल खाता था।" "...नानी? आप ठीक हैं? आपका चेहरा फिर बिल्कुल वैसा ही सफ़ेद पड़ गया, जैसे उस दिन।"

और उस पल बूढ़ी शांति देवी के सीने में बारह साल से बंद एक दरवाज़ा चरमरा उठा। सामने बैठी उसकी नातिन, ठीक अपनी माँ की तरह, एक अजनबी अमीर को अपने हाथ से जिला कर, अपना दिल तुड़वा बैठी थी। वही ज़ख़्म, एक पीढ़ी आगे। और नानी और चुप न रह सकी।

"तेरी माँ भी ऐसी ही थी, बच्ची, बिल्कुल तेरे जैसी।" "मेरी निर्मला। निर्मला वर्मा। यही नाम था उसका।" "नर्स थी वो, सरकारी अस्पताल में। रात-रात भर अजनबियों की सेवा करती, अपने हाथ का टिफ़िन ग़रीब मरीज़ों को खिला देती। कहती थी, भूखे को अपने हाथ से खिलाना सबसे बड़ी दुआ है। ... और उसी हाथ ने मेरी बच्ची को मार डाला।"

"मार डाला...? नानी, माँ तो बीमार रहती थीं। आपने तो हमेशा कहा उनका दिल कमज़ोर था..." "क्या हुआ था मेरी माँ के साथ, नानी? आज पूरा सच बता दीजिए।"

"उन्होंने उसे बदनाम किया, महिका। बड़े, ताक़तवर लोगों ने।" "एक रात उस अस्पताल में कोई बड़ा हादसा हुआ, कोई अमीर ख़ानदान, एक पूरा परिवार उजड़ गया। और जिनकी असल ग़लती थी, उन्होंने अपना गुनाह मेरी बेटी के माथे पर मढ़ दिया, लापरवाही का इल्ज़ाम। ... मेरी निर्मला को उस रात का क़ातिल ठहरा दिया गया।"

"नौकरी छिन गई, अख़बारों में नाम उछला, और मेरी हँसती-खिलती बेटी अंदर ही अंदर राख की तरह घुलने लगी। कुछ ही बरस में हमें छोड़ गई, बीमारी से नहीं, उस झूठे दाग़ से। ... बेगुनाह गई मेरी बच्ची, बिल्कुल बेगुनाह।"

"बेगुनाह... मेरी माँ बेगुनाह थीं..." "और ये आप बारह साल से जानती थीं, नानी? ये सब अपने सीने में दबाए बैठी थीं, और मुझसे छुपाती रहीं? क्यों?"

"मैं डरती थी, बच्ची। जिन लोगों ने उसे कुचला, वो आज भी उतने ही ताक़तवर हैं। मैं तुझे और चिंटू को उस आग से दूर रखना चाहती थी।" "पर एक बात आज बता दूँ। आख़िरी दिनों में तेरी माँ सबसे ज़्यादा किसके लिए रोती थी? अपने लिए नहीं। ... एक लड़के के लिए।"

"एक लड़के के लिए? ... कौन लड़का, नानी?"

"पता नहीं कौन था वो, बच्ची, कोई अजनबी। तेरी माँ कहती थी, उस हादसे वाली रात एक बच्चा था गलियारे में, बीस-बाईस साल का, अकेला, काँपता हुआ, जिसका उसी रात सब कुछ उजड़ गया था।" "कहती थी, मैंने उसे अपने हाथ से पानी पिलाया, अपना टिफ़िन उसके हाथों में थमाया... पर बचा न सकी। और मरते दम तक उसी अनजान लड़के के लिए तड़पती रही, जिसका नाम तक वो नहीं जानती थी।"

और महिका माँ की तस्वीर सीने से लगाए, आँसुओं में डूबी, अपनी माँ का दर्द तो सुन रही थी, पर उस गलियारे के अजनबी लड़के का चेहरा नहीं देख पा रही थी। सिर्फ़ हम जानते थे कि जिस बच्चे के लिए निर्मला मरते दम तक रोई, वो आज बर्फ़ का बादशाह अगस्त्य मल्होत्रा है, और जिस 'अमीर ख़ानदान' का नाम नानी डर के मारे अधूरा छोड़ गई, उसे और वर्मा को एक ही काली रात बाँधती थी। ... आज महिका को माँ का नाम और बेगुनाही तो मिल गई, पर उस नाम की सबसे गहरी चोट अब भी उससे छुपी रही।

और उसी रात, शहर के दूसरे छोर पर, हिमराज का पूरा टावर सो चुका था, सिर्फ़ बादशाह के केबिन में एक अकेली रौशनी जल रही थी। मेज़ पर दो फ़ाइलें रखी थीं, जो वीर घंटों की मशक़्क़त के बाद लाया था। एक नई, पतली। दूसरी पुरानी, पीली, बारह साल की धूल से भारी।

"ये रहीं। ये महिका वर्मा की फ़ाइल, कंपनी के अपने रिकॉर्ड से। और ये उस रात के अस्पताल के काग़ज़, पुराने रिकॉर्ड रूम से बड़ी मुश्किल से निकलवाई है।" "बॉस, आख़िरी बार कह रहा हूँ। आज इस रात को देखोगे, और जो दिखेगा उसे फिर कभी अनदेखा नहीं कर पाओगे। ... एक बार और सोच लो।"

"मैं बारह साल से आधा ज़िंदा हूँ, वीर। अब इस अँधेरे में और नहीं रह सकता।" "जो भी है, अच्छा या बुरा, आज उसका सामना कर लेता हूँ। ... तुम जाओ। ये रात मुझे अकेले काटनी है।"

और वीर चला गया, और बादशाह अकेला रह गया। उसने काँपते हाथों से वो पीली फ़ाइल खोली, जिसे छूने से उसने पूरी ज़िंदगी इनकार किया था। हादसे की रिपोर्ट। फ़्लाईओवर की वो गीली रात। उसके पिता अविनाश, माँ सुधा, और नन्ही नित्या के नाम, काली स्याही में। ... और फिर एक और काग़ज़, एक जाँच की रिपोर्ट, लापरवाही की।

"उस रात की ड्यूटी नर्स... जिस पर लापरवाही का इल्ज़ाम लगा... जिसे नौकरी से बर्ख़ास्त किया गया..." "...निर्मला। निर्मला वर्मा।" "ये वही रात है। वो गलियारा, वो सफ़ेद रौशनी। किसी ने मेरे काँपते हाथ में एक स्टील का टिफ़िन थमाया था, पानी पिलाया था। ... क्या वो यही थी? निर्मला वर्मा?"

और बादशाह के भीतर बारह साल का जमा बर्फ़ चटख़ने लगा। जिस नर्स को उसके परिवार के हादसे में 'क़ातिल' कहा गया, और जिस अजनबी हाथ ने उसी रात उसे जीने की एक वजह थमाई थी, दोनों का एक ही नाम था, निर्मला वर्मा। उसने दराज़ से वो स्टील के टिफ़िन का ढक्कन निकाला, जो बारह साल से उसकी क़ैद में पड़ा था, और उस पर उँगली फेरी। और तभी, किसी बेख़याली में, उसका हाथ दूसरी, नई फ़ाइल की तरफ़ बढ़ गया। महिका की फ़ाइल।

"महिका वर्मा..." "पता, त्रिलोकपुरी। घर में एक छोटा भाई, एक बूढ़ी नानी..." "...और माता का नाम..." "...माता: निर्मला वर्मा। स्वर्गीय।"

और वक़्त थम गया। एक तरफ़ बारह साल पुरानी अस्पताल की फ़ाइल, जिस पर लिखा था, निर्मला वर्मा, ड्यूटी नर्स, बदनाम, बर्ख़ास्त। और ठीक बग़ल में महिका की नई फ़ाइल, जिस पर लिखा था, माता, निर्मला वर्मा, स्वर्गीय। ... दो अलग काग़ज़, दो अलग दुनियाएँ, एक ही नाम पर मिलती थीं।

"निर्मला वर्मा... महिका की माँ।" "जिस हाथ ने उस रात मुझे बचाया, जिस ज़ायके ने मुझे बारह साल बाद जिलाया... वो उसी औरत का है, जिसे मेरे अपने परिवार की उस मौत का ज़िम्मेदार ठहराया गया, जिसकी दुनिया ठीक उसी रात उजड़ी जिस रात मेरी।" "और महिका... वो उसी की बेटी है। ... मेरे ज़ख़्म और मेरे मरहम का एक ही नाम है।"

और उस आधी रात, दो फ़ाइलों के बीच खड़ा बर्फ़ का बादशाह, बारह साल में पहली बार पूरी तरह पिघल कर टूट गया। जिस औरत के एक रहम ने उसे आज तक ज़िंदा रखा, उसी की पूरी दुनिया उसके अपने ख़ानदान की उस काली रात ने उजाड़ दी थी, और जो अकेला ज़ायका उसे मौत से खींच लाया, वो उसी बेगुनाह के ख़ून से बँधा निकला। ... महिका वर्मा। निर्मला की बेटी। ... बादशाह के हाथ में अब वो नाम था जो दो उजड़े घरों को एक ही रात से बाँधता था, और जिसे जान लेने के बाद वो कभी पहले जैसा नहीं रह सकता था।

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।