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अध्याय 16 / 28

झूठा इल्ज़ाम

बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi

बारह साल तक बर्फ़ के बादशाह ने उस काली रात की तरफ़ पलट कर नहीं देखा था। पर अब पूरे हफ़्ते से उसकी नज़र उसके सिवा कहीं और थी ही नहीं। मेज़ पर वही पीली फ़ाइल पड़ी थी, जिसे वो सौ बार पढ़ चुका था। सुबह की पहली रौशनी से पहले वीर एक और पतली फ़ाइल लिए अंदर आया, और उसका चेहरा कह रहा था कि जो वो लाया है, उसे सुनना आसान नहीं।

"मैं उस अस्पताल के एक रिटायर्ड बड़े बाबू से मिला, अगस्त्य। बारह साल पहले वही वार्ड का रजिस्टर सँभालता था।" "उसने डरते-डरते बस इतना कहा। उस नर्स के ख़िलाफ़ कभी कोई सच्ची जाँच हुई ही नहीं। न गवाह, न सुनवाई।" "और उस पूरे वार्ड में सबसे भरोसे का नाम उसी निर्मला वर्मा का था। जिसे लापरवाह कह कर मिटा दिया, वो उस रात की सबसे ईमानदार नर्स थी।"

"बेगुनाह।" "वो औरत बेगुनाह थी, वीर। उन्होंने एक बेगुनाह को मेरे पूरे परिवार की मौत का क़ातिल बना दिया।" "और उसका जुर्म बस इतना था कि वो उस रात उस अस्पताल में थी।"

"और ये देख। आधे काग़ज़ ग़ायब हैं। जो जाँच महीनों चलती, एक दिन में निपटा दी गई।" "किसी ने बहुत जल्दी, बहुत सफ़ाई से इस औरत को इल्ज़ाम पहनाया और केस बंद करवा दिया। जैसे असली बात कुछ और थी, और उसे इसी नाम के नीचे दबाना था।"

और यहीं वो सज़ा थी जो अब बादशाह भी जानता था। जिस औरत ने उस काली रात एक काँपते, अकेले लड़के के हाथ में अपना टिफ़िन थमाया, वो उस रात की उसकी अकेली रहमत थी। और उसी लड़के के घराने की तबाही ने उस रहमत को कुचल कर मिट्टी में मिला दिया। और आज उसी हाथ का ज़ायका उसे ज़िंदा रखे हुए था।

"बारह साल, वीर।" "बारह साल मैंने जिसे बाप कहा, जिसकी छाँव में पला, उसी के पैसे ने इस औरत का केस एक दिन में दफ़ना दिया।" "किसी का गुनाह छुपाने को इसे बलि का बकरा बनाया गया। किसी और का जुर्म, और सज़ा इस औरत को मिली।" "और मैं उसी आदमी को अपना मसीहा समझता रहा।"

"अगस्त्य, मैं तेरे साथ हूँ, ये तू जानता है। पर एक बात साफ़ कर।" "तूने कुछ हफ़्ते पहले कहा था, पता करो वो कैंटीन वाली लड़की कौन है। और आज तू बारह साल पुरानी एक नर्स की क़ब्र खोद रहा है।" "ये दो अलग रास्ते हैं, या एक ही? क्योंकि जिस तरह तेरी आँखें इस नाम पर रुकती हैं, मुझे लगता नहीं ये दो अलग बातें हैं।"

और अगस्त्य एक पल को ठिठक गया। वीर उसका अकेला दोस्त था, फिर भी ये सच वो अभी उसे भी नहीं दे सकता था। कि वो नर्स और वो कैंटीन वाली एक ही धागे के दो सिरे थे, माँ और बेटी, और उस धागे का दूसरा नाम उसका अपना गुनाह था।

"अभी मत पूछ, वीर। वक़्त आने पर सब बता दूँगा।" "बस इतना जान। इस औरत का एक परिवार था, जिसे मेरे लोगों ने उजाड़ कर भुला दिया।" "मुझे उस परिवार तक जाना है। ख़ुद। किसी को बताए बिना।"

"ख़ुद? अगस्त्य, तू बर्फ़ का बादशाह है। किसी तंग गली में क़दम रखेगा, तो शहर को ख़बर हो जाएगी।"

"और याद रख। तूने भरे बोर्ड रूम में राणा की बेटी से सगाई तोड़ी, वो सत्रह तारीख़ अख़बार की रद्दी बना दी। राणा वो अपमान नहीं भूलेगा।" "वो अभी चुप है, पर ये तूफ़ान से पहले वाली चुप्पी है। और तू ठीक उसी वक़्त उसकी सबसे गहरी क़ब्र खोद रहा है।"

"राणा जो करना है कर ले, वीर।" "जिसने एक बेगुनाह को मेरे परिवार की मौत का इल्ज़ाम पहना कर एक दिन में दफ़ना दिया, अब उससे मेरा कोई रिश्ता नहीं। न बाप का, न सगाई का, कुछ नहीं।" "पर भिड़ने से पहले मुझे पूरा सच चाहिए। और उसका एक टुकड़ा उस औरत के परिवार के पास है।"

उसी सुबह उसकी थाली फिर वक़्त पर आई, पर अब उन हाथों से नहीं। अब बंसी का कोई लड़का उसे दरवाज़े पर रख जाता था। महिका आज भी वही खाना अपने हाथ से बनाती थी, पर उसे इस कमरे तक लाने का काम अब किसी और के हवाले था। और बादशाह ने ठंडे स्टील का डिब्बा खोला, एक कौर मुँह में रखा, और वही हुआ, उसे ज़ायका आया।

"दुनिया की हर थाली मेरे लिए राख है।" "और सिर्फ़ तुम्हारे हाथ का खाना मुझे ज़िंदा रखता है, ये जाने बिना कि मैं कौन हूँ।" "तुम्हारी माँ ने उस रात मुझ पर रहम किया, महिका। और उसी रहम का बदला मेरे घराने ने उसकी बर्बादी से चुकाया। ... आज मैं उस घर जाऊँगा। तुम्हें बताए बिना।"

उस शाम बर्फ़ का बादशाह पहली बार त्रिलोकपुरी की तंग गलियों में उतरा, अपनी बड़ी गाड़ी गली के मुँह पर छोड़ कर। उसके काँच के टावरों से चंद किलोमीटर दूर ये दूसरी दिल्ली थी, खुली नालियाँ, एक पर एक चढ़े मकान, और एक कमरे का वो घर जहाँ महिका अपने पूरे परिवार को ज़िंदा रखती थी।

महिका अभी हिमराज में थी, कैंटीन की उसी दुनिया में जिसे उसने वापस चुन लिया था। इस वक़्त उस घर में सिर्फ़ एक बूढ़ी औरत थी, शांति देवी, महिका की नानी, वही औरत जो बारह साल से एक सच अपने सीने में दबाए बैठी थी।

"शांति देवी?" "माफ़ कीजिए। मैं महिका के दफ़्तर से आया हूँ। हिमराज से।" "मेरा नाम अगस्त्य है। अगस्त्य मल्होत्रा।"

और वो नाम उस छोटे कमरे में किसी पत्थर की तरह गिरा। शांति देवी के काँपते हाथ चादर पर रुक गए। मल्होत्रा। वही नाम, जिसे सुन कर बारह साल पहले उनका ख़ून सर्द हो गया था, जिसे सुन कर उन्होंने महिका को उस टावर से दूर रहने की मिन्नत की थी। और आज वो नाम, ख़ुद चल कर, उनके एक कमरे के घर की देहरी पर आ खड़ा हुआ था।

"मल्होत्रा।" "इतना बड़ा आदमी, इस गली में, मेरी दहलीज़ पर। ... मेरी महिका यहाँ नहीं है, साहब। वो तो आपके ही टावर में है।" "आप जैसे लोग यहाँ नहीं आते। सच बताइए, किस काम से आए हैं?"

"मैं महिका के लिए नहीं आया।" "मैं आपसे मिलने आया हूँ। एक बहुत पुरानी बात के बारे में।" "बारह साल पहले की एक रात के बारे में।"

और उस एक लाइन पर पूरा कमरा जम गया। शांति देवी की आँखों में एक पल डर कौंधा, फिर वो सँभल गईं, एक बूढ़ी औरत जो बारह साल से इसी एक सवाल से बचती आई थी। उन्होंने एक गहरी साँस ली, बस थोड़ा वक़्त ख़रीदने को।

"बारह साल पुरानी कौन सी बात, साहब? मैं बूढ़ी औरत हूँ, मुझे तो कल की बात याद नहीं रहती।" "आप बड़े आदमी हैं, आपका वक़्त क़ीमती है। जो कहना है साफ़ कह कर अपनी दुनिया लौट जाइए। हम ग़रीबों की पुरानी बातों में आपके मतलब का कुछ नहीं।"

"आपकी बेटी। निर्मला वर्मा। वो एक अस्पताल में नाइट-शिफ़्ट की नर्स थीं। बारह साल पहले।" "मैं जानता हूँ, उन पर लापरवाही का एक इल्ज़ाम लगा था। और मैं अब ये भी जानता हूँ, कि वो इल्ज़ाम झूठा था। पूरी तरह झूठा।"

और बारह साल में पहली बार किसी बाहरी ने उस घर में निर्मला का नाम लिया था, और वो भी उसी ख़ानदान के आदमी ने। शांति देवी की सूखी आँखें भर आईं, पर उनमें आँसू से बड़ा एक सवाल था। जिसके घराने ने उनकी बेटी को कुचला, वो आज ख़ुद चल कर उसकी बेगुनाही की बात क्यों कर रहा था।

"झूठा।" "आज, बारह साल बाद, आप मुझे बताने आए हैं कि इल्ज़ाम झूठा था?" "मेरी बेटी घुल-घुल कर मरी, साहब। लोगों ने उसे क़ातिल कहा, उस पर थूका। नौकरी गई, इज़्ज़त गई, आख़िर में जान भी।" "मुझे मत बताइए कि वो बेगुनाह थी। मैं उसकी माँ हूँ। मैं जानती हूँ।"

"आप ठीक कह रही हैं। मेरे जैसे लोग तमाशा देखते रहे, और मेरा अपना घराना उस झूठ में शामिल था।" "मैं यहाँ सफ़ाई देने नहीं आया, शांति देवी। मैं ये जानने आया हूँ कि उस रात असल में हुआ क्या था।"

"क्यों? अब क्यों?" "आप अमीरों के लिए पछतावा एक कोट है, साहब। मन किया पहन लिया, मन किया उतार दिया।" "आपकी माफ़ी मेरी निर्मला को वापस नहीं लाएगी। जाइए, अपना बोझ अपने पास रखिए।"

"मैं अपना जी हल्का करने नहीं आया।" "मैं इसलिए आया क्योंकि आपकी बेटी के साथ जो हुआ वो एक झूठ था, और उस झूठ पर मेरे घराने की मुहर है। मैं वो झूठ तोड़ूँगा। निर्मला वर्मा का नाम फिर साफ़ होगा, चाहे इसमें मेरा सब कुछ चला जाए।" "ये माफ़ी नहीं, एक क़र्ज़ है, जो मुझे उतारना है।"

और शांति देवी एक पल रुक गईं। सामने खड़ा आदमी उसी घराने का था जिससे वो नफ़रत करती थीं, पर वो सिर झुकाए, टूटा-सा खड़ा था, किसी घमंडी अमीर की तरह नहीं, किसी सज़ायाफ़्ता की तरह। और पुरानी दिल्ली की उस बूढ़ी औरत के भीतर की माँ जाग गई, जो अपनी देहरी पर आए दुश्मन को भी प्यासा नहीं लौटा सकती थी।

"बैठ जाइए। इतने बड़े आदमी हैं, पर कब से खड़े हैं। ये पानी पीजिए।" "मेरी निर्मला भी यही कहती थी। घर आया आदमी दुश्मन ही क्यों न हो, प्यासा नहीं जाना चाहिए। ... सारी उम्र दूसरों का पेट भरती रही, और आख़िर में ख़ुद भूखी मर गई।"

और अजनबी के हाथ में पानी थमाते-थमाते शांति देवी की गीली आँखें उसके चेहरे पर ठहर गईं। उस बड़े आदमी के चेहरे पर आज अकड़ नहीं थी, एक गहरा, पुराना दर्द था, जो अजीब तरह जाना-पहचाना लगा। जैसे ये दर्द उन्होंने बहुत साल पहले अपनी ही बेटी की आँखों में देखा हो, जब वो एक रात रो कर घर लौटी थी।

"आपकी उम्र क्या होगी, साहब? ... बत्तीस, तैंतीस?" "तो बारह साल पहले आप बीस-इक्कीस के जवान लड़के रहे होंगे।" "और अभी आपने कहा, आपके अपने घराने ने... आपने भी उस रात कुछ खोया था, है ना? आपकी आँखें झूठ नहीं बोलतीं।"

"उस रात मैंने सब कुछ खोया था, शांति देवी।" "मेरी माँ, मेरे पिता, मेरी छोटी बहन नित्या। एक ही रात, एक ही हादसे में, तीनों।" "और मैं उस अस्पताल के गलियारे में अकेला खड़ा था, जब मुझे ये ख़बर मिली। बीस साल का। पूरी दुनिया में बिल्कुल अकेला।"

और जैसे ही उसके मुँह से वो लफ़्ज़ निकला, गलियारा, बारह साल पहले की वो बरसाती रात, उस बूढ़ी औरत के भीतर कोई चीज़ ज़ोर से हिल गई। क्योंकि उनकी बेटी निर्मला उन्हें एक कहानी सुनाया करती थी, अपने आख़िरी हफ़्तों में, बार-बार, एक कहानी जो उसे मरते दम तक चैन नहीं लेने देती थी।

"गलियारे में... अकेले...।" "बीस साल का एक लड़का, जिसका उस रात कोई नहीं था।" "साहब... आप उस रात उस अस्पताल में थे? उसी गलियारे में?"

"हाँ। मैं वहीं था।" "उस रात की मुझे बहुत कम याद है। बस इतना, कि मेरी दुनिया एक पल में ख़त्म हो गई थी।" "और एक अजनबी हाथ। किसी नर्स ने उस गलियारे में मेरे काँपते हाथों में अपना खाना और पानी थमाया था। उस पूरी रात की वो अकेली रहमत। उस वक़्त वो मेरे लिए बस एक अजनबी थी, मैंने उसका चेहरा भी ठीक से नहीं देखा।"

और वो एक बात, वो अजनबी हाथ, वो खाना, वो पानी, उस छोटे कमरे में किसी बिजली की तरह गिरी। क्योंकि शांति देवी ये कहानी दूसरी तरफ़ से जानती थीं। उनकी बेटी ने उन्हें एक काँपते, अकेले अमीर लड़के की यही कहानी सुनाई थी, जिसे उसने उस रात खिलाया और बचा नहीं पाई। वो लड़का, जिसके लिए निर्मला रोती रही।

"हे भगवान।" "वो लड़का... वो लड़का तुम थे।" "मेरी बेटी उस आख़िरी हफ़्ते रोज़ रात रोती थी, एक अमीर घर के लड़के के लिए, जिसे उसने अस्पताल में अपने हाथों थामा था। कहती थी, उस बच्चे का उस रात कोई नहीं था, बिल्कुल अकेला था वो।" "मरते दम तक वो उसी अजनबी लड़के के लिए दुआ करती रही, बेटा। जिसके लिए मेरी निर्मला रोई, वो लड़का... तुम थे।"

और बर्फ़ का बादशाह उस एक कमरे के घर में, उस बूढ़ी औरत के सामने, पत्थर बन कर रह गया। जिस हाथ ने उस रात उसे बचाया, वो उसी के अपने घराने के झूठ में मारा गया। और वही औरत आख़िरी साँस तक इसी लड़के के लिए दुआ करती रही, जो आज उसकी बूढ़ी माँ के सामने सिर झुकाए बैठा था।

बारह साल जिस गलियारे से वो भागता रहा था, वो गलियारा आज इस टूटे से घर में आ कर उसे मिल गया। और बर्फ़ के बादशाह के पास, उस बूढ़ी माँ की भीगी आँखों के सामने, अब छुपने के लिए एक भी परत बाक़ी नहीं बची थी।

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