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अध्याय 6 / 28

दो अधूरे लोग

बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi

और महिका की उँगलियों ने अभी चाँदी का वो नक़्क़ाशीदार डिब्बा उठाया ही था कि एग्ज़ीक्यूटिव किचन का दरवाज़ा एक झटके से खुला। दो सिक्योरिटी वाले अंदर लपके, और उनकी कड़कती आवाज़ ने सोने-चाँदी वाली उस रसोई की ठंडी हवा को चीर दिया। ... 'हाथ वहीं रोक! डिब्बा नीचे रख, अभी!'

"मैं? ... मैंने कुछ नहीं किया! ... ये तो मैं बस केसर लेने आई थी, साहब की खीर के लिए। ... मालकिन ने ख़ुद मुझे भेजा था, सच्ची!"

पर तभी वही हुआ जो संजना चाहती थी। डिब्बे का ढक्कन खुला, और केसर के साथ लुढ़क कर बाहर आ गिरी हीरों से जड़ी एक अँगूठी, जिसकी क़ीमत महिका जैसी दस लड़कियों की सालभर की कमाई थी। महिका की साँस हलक़ में अटक गई। ये उसने नहीं रखी थी। पर अब वो उसके अपने हाथ में थी।

"हे भगवान... ये क्या? ... मेरी अँगूठी? ... महिका, बेटा, मैंने तुझ पर भरोसा किया, और तूने... छि। ... मैं सोच भी नहीं सकती थी कि कैंटीन की एक लड़की इतनी नीचे गिर सकती है।"

देखते ही देखते गलियारे में भीड़ जुट गई। अफ़सर, बाबू, नौकर, सब। और हर आँख में वही एक फ़ैसला पहले से लिखा था। ग़रीब की बेटी, अमीर की अलमारी, हीरे की अँगूठी। ... इस बर्फ़ के महल में ऐसी कहानी हमेशा यहीं ख़त्म हो जाती है।

"नहीं... मैंने नहीं चुराई! ... मैडम, आपने ही तो कहा था केसर ले आओ! ... मेरी नानी ने मुझे भूखा रहना सिखाया है, चोरी करना नहीं। ... कोई तो मेरी बात सुनो, प्लीज़!"

और तभी भीड़ अपने आप दो हिस्सों में बँट गई। गलियारे के सिरे पर, बर्फ़ का बादशाह खड़ा था। अगस्त्य मल्होत्रा। उसकी नज़र पहले उस काँपती लड़की पर पड़ी, फिर उसके हाथ में पकड़े उस डिब्बे पर, और फिर... धीरे से, संजना पर।

"अगस्त्य, अच्छा हुआ तुम आ गए। ... इस लड़की को रंगे हाथों पकड़ा गया है, तुम्हारी ही अलमारी से चोरी करते हुए। ... मैंने कहा था ना, ये कैंटीन वाली यहाँ के लायक़ नहीं। सबूत सामने है। इसे अभी पुलिस के हवाले कर देते हैं।"

"रुको।" ... "तुमसे किसने कहा था ऊपर जाकर वो केसर लाने को?"

"संजना मैडम ने, साहब। ... इन्होंने ही कहा कि आज आपकी खीर में असली कश्मीरी केसर डालना है, ऊपर की अलमारी से ले आओ। ... मैंने बस वही किया, और कुछ नहीं।"

और अगस्त्य की ठंडी नज़र धीरे-धीरे घूम कर संजना पर आ टिकी। पूरा गलियारा साँस रोके खड़ा था। बर्फ़ के बादशाह ने बारह साल में कभी किसी नौकर के लिए एक क़दम नहीं उठाया था। और आज वो एक कैंटीन वाली और अपनी मंगेतर के ठीक बीच में खड़ा था।

"दिलचस्प है। ... एक चोर वही चीज़ चुराने जाती है जिसे लाने का हुक्म ख़ुद मालकिन ने दिया हो? ... और चुराने के बाद भागने के बजाय, उसी रसोई में खड़ी रहती है, इंतज़ार करती है कि सिक्योरिटी आकर उसे पकड़ ले? ... संजना, चोर बेवक़ूफ़ होते हैं। पर इतने भी नहीं।"

"अगस्त्य! ... तुम एक नौकरानी के लिए मुझ पर, अपनी होने वाली बीवी पर शक कर रहे हो? ... इसके हाथ में हीरे की अँगूठी मिली है!"

"जो अँगूठी उसने डिब्बे में रखी ही नहीं, वो उसने चुराई कैसे? ... ये लड़की मेरे लिए खाना बनाती है, संजना। मैं इसके हाथ को इस पूरे हिमराज से बेहतर जानता हूँ। ... इसे छोड़ दो। अभी।"

और सिक्योरिटी वालों ने महिका की कलाई छोड़ दी। पूरा गलियारा सन्न रह गया। बर्फ़ के बादशाह ने, सबके सामने, एक कैंटीन वाली के लिए अपनी मंगेतर को झुठला दिया था। संजना का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, पर उसने अपनी मुस्कान को गिरने नहीं दिया।

"ठीक है, अगस्त्य। ... आज तुमने इसे बचा लिया। ... पर याद रखना, हर बार तुम वहाँ नहीं होगे। ... और मैं, कभी भूलती नहीं हूँ।"

भीड़ छँट गई, संजना अपने पीछे एक ठंडी परछाईं छोड़ कर चली गई, और उस सोने-चाँदी वाली रसोई में सिर्फ़ दो लोग रह गए। एक बर्फ़ का बादशाह, जिसे किसी को बचाना कभी आया ही नहीं था। और एक कैंटीन की लड़की, जिसके हाथ अभी भी काँप रहे थे।

"आपने... आपने क्यों बचाया मुझे? ... आप तो सबके सामने कहते हैं कि मैं बस एक नौकर हूँ। ... फिर आज, अपनी मंगेतर के ख़िलाफ़, इतने लोगों के सामने..." "...कोई मेरे लिए ऐसे खड़ा नहीं होता, साहब। कोई नहीं।"

"रोना बंद करो। ... मैं झूठ बर्दाश्त नहीं करता, बस इतनी सी बात है। ... और वैसे भी, अगर तुम जेल चली जातीं, तो मेरा खाना कौन बनाता?"

उसने ये मज़ाक़ में कहा, अपने आप को ढाँपने के लिए। पर बात में सच था, इतना सच कि कहते ही उसने ख़ुद उससे नज़रें चुरा लीं।

"खाना? ... आपको सच में बस अपने खाने की पड़ी है? ... लोग जान बचाते हैं, और आप बचा रहे हैं अपना रसोइया।" "पर एक बात है, साहब। आज आपने जो किया, मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगी।"

"एक बात पूछूँ? ... इतना सब है आपके पास। दुनिया भर का खाना, बड़े-बड़े बावर्ची। ... फिर आप हर थाली यूँ ठुकरा क्यों देते हैं? ... ख़ुद को यूँ भूखा क्यों मारते हैं?"

और अगस्त्य एक पल को रुक गया। वो चाहता तो हमेशा की तरह डाँट कर बात टाल सकता था। पर आज, उस काँपती लड़की के सामने, बारह साल में पहली बार, उस मोटी बर्फ़ में एक बारीक सी दरार पड़ गई।

"भूखा नहीं मारता। ... मुझे स्वाद नहीं आता, महिका। ... बारह साल हो गए। ... इस दुनिया का हर खाना मेरे लिए राख है। मिठाई, नमक, आग, कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता। ... मैं बर्फ़ और मिठाइयों का बादशाह हूँ, और अपनी ही बनाई एक कुल्फ़ी तक नहीं चख सकता।" "...सिवाय एक चीज़ के।"

"बारह साल? ... आपको कुछ भी स्वाद नहीं आता? ..." "तभी... तभी आप ऐसे हैं। ... मैं तो समझती थी आप घमंड में खाना ठुकराते हैं। पर आप तो सच में अंदर से भूखे हैं, साहब। ... किसी और ही तरह के भूखे।"

और महिका को उस एक पल में सब समझ आ गया। ये अकड़ नहीं थी, ये ज़ख़्म था। जिस आदमी को वो अब तक एक ज़ालिम तानाशाह समझती आई थी, वो असल में एक भूखा, टूटा हुआ इंसान था। और वो 'सिवाय एक चीज़ के' क्या था, ये न वो पूछ सकी, न वो बता सका। पर हम जानते थे। वो एक चीज़ ख़ुद महिका थी, उसकी अपनी माँ के हाथ का ज़ायका, जो उसकी उँगलियों में साँस ले रहा था।

उस रसोई में एक अजीब सी गरमाहट तैर गई। अगस्त्य की नज़र उसके चेहरे पर टिकी थी, और महिका को लगा जैसे कमरे की सारी हवा किसी ने खींच ली हो। दोनों के बीच बस एक क़दम का फ़ासला था, और वो फ़ासला अचानक बहुत कम, बहुत ख़तरनाक लगने लगा।

"तो... तो अब से मैं आपके लिए ऐसा खाना बनाऊँगी कि आपको हर एक कौर का स्वाद आए। ... देखिएगा, साहब, मैं आपकी ये बारह साल की भूख मिटा कर रहूँगी। ... मेरी माँ कहती थीं, भूख कोई भी हो, प्यार से बना खाना उसे मिटा ही देता है।"

"तुम्हारी माँ?"

"हाँ, साहब। ... मैंने खाना बनाना अपनी माँ से सीखा। ... वो अब इस दुनिया में नहीं रहीं। ... रात-रात भर काम करती थीं, थकी-हारी लौटती थीं, फिर भी मेरे लिए खाना बनाना नहीं भूलती थीं। ... कहती थीं, हाथ का ज़ायका माँ से बेटी में उतरता है, जैसे कोई दुआ। ... मेरे हाथ में जो कुछ है, सब उन्हीं का दिया है।"

और जैसे ही महिका ने ये कहा, अगस्त्य की रीढ़ में एक सर्द लहर दौड़ गई। कोई माँ, जो रात-रात भर काम करती थी। कोई हाथ, जिसका ज़ायका बेटी में उतर आया, जैसे कोई दुआ। ... उसे समझ नहीं आया क्यों, पर उसे लगा जैसे किसी बहुत पुरानी, बहुत गहरी बर्फ़ के नीचे कुछ करवट ले रहा हो। उसने झटक कर उस ख़याल को परे कर दिया। पर हम जानते थे कि वो सर्द लहर बेवजह नहीं थी।

शाम ढले, वीर ओबेरॉय अगस्त्य के केबिन में घुसा, और उसने अपने दोस्त को खिड़की के पास खड़े, शहर की रौशनियों को घूरते हुए, कहीं खोया-खोया सा पाया।

"तो... आज पूरे हिमराज में एक ही ख़बर है। ... बर्फ़ के बादशाह ने, सबके सामने, अपनी मंगेतर संजना राणा को झुठला दिया। ... एक कैंटीन वाली के लिए। ... अगस्त्य, बारह साल में तुमने किसी बोर्ड मेंबर के लिए कुर्सी नहीं खिसकाई, और आज एक रसोइए के लिए तुम पूरी जंग लड़ गए।"

"वो एक झूठे इल्ज़ाम की बात थी, वीर। ... मैं झूठ बर्दाश्त नहीं करता। बस इतनी सी बात है।"

"हाँ, हाँ। तुम झूठ बर्दाश्त नहीं करते। ... इसीलिए बर्फ़ का बादशाह आजकल शीशे के पास खड़े होकर, आधी मुस्कान लिए, शहर की बत्तियाँ गिनता है। ... अगस्त्य, मैं तुम्हें बीस साल से जानता हूँ। ... ये जो तुम्हारे चेहरे पर है ना, इसका नाम ग़ुस्सा नहीं होता।"

और वीर ने आगे कुछ नहीं कहा। वो अपने दोस्त को उसकी उलझन के साथ अकेला छोड़ गया, ये जानते हुए कि कुछ बर्फ़ धूप से नहीं, वक़्त से पिघलती है। पर जाते-जाते उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी। बारह साल में पहली बार, उसका दोस्त किसी बात को लेकर परेशान था। और परेशान होना, ज़िंदा होने की पहली निशानी है।

उस रात, लुटियन के उस सुनसान फ़ार्महाउस में, अगस्त्य अकेला था। दिन भर वो सर्द लहर उसका पीछा करती रही थी। कोई माँ, रात-रात भर काम करती एक औरत, एक हाथ का ज़ायका जो बेटी में उतर आया। ... वो लफ़्ज़ बार-बार उसके ज़हन में गूँज रहे थे, और वो समझ नहीं पा रहा था क्यों।

और फिर, जैसे किसी अनजानी डोर के खिंचे, वो अपने कमरे की सबसे निचली दराज़ के पास गया, वो ताला जो बारह साल से उसने कभी नहीं खोला था। अंदर, एक काले मख़मल के डिब्बे में, वो एक चीज़ रखी थी जो उसने उस अस्पताल की रात से सँभाल कर रखी थी। स्टील का एक पुराना टिफ़िन का ढक्कन। एक अजनबी नर्स के हाथ की आख़िरी निशानी।

"बारह साल। ... इस एक ढक्कन में आज भी उस रात की महक बसी है। ... वो दाल, वो चावल, किसी अजनबी हाथ का वो ज़ायका। ... उस पूरी काली रात में सिर्फ़ एक गरम कौर, और सिर्फ़ यही एक स्वाद, जो मेरे ज़हन में आज तक ज़िंदा है।"

और तभी, उस मख़मली अँधेरे में, अगस्त्य ने वो ढक्कन अपने चेहरे के पास उठाया और एक गहरी साँस ली। बारह साल पुरानी उस महक ने उसके भीतर वही तस्वीर जगा दी, वही गलियारा, वही काँपते हाथ। ... और उसी पल, उसके ज़हन में एक और तस्वीर उभर आई। आज दोपहर का वो राजमा। वो दाल-चावल जो महिका उसे रोज़ खिलाती थी। और बर्फ़ के बादशाह की साँस हलक़ में अटक गई।

"ये... ये तो वही ज़ायका है। ..." "जिस अजनबी हाथ ने उस रात मुझे बचाया था... और जो हाथ आज मुझे खिला रहा है... दोनों का स्वाद बिल्कुल एक ही है। ... ये मुमकिन कैसे है? ... बारह साल बाद, एक ही हाथ का ज़ायका, दो बार?"

बर्फ़ के बादशाह के हाथ में बारह साल पुराना वो ढक्कन काँप रहा था। उसने आख़िरकार वो डोर पकड़ ली थी जिसे हम शुरू से थामे बैठे थे। जिस अजनबी नर्स के हाथ के ज़ायके ने उसे उस मरती हुई रात में ज़िंदा रखा था, और जिस लड़की का खाना आज उसे बारह साल बाद जीना सिखा रहा था, वो एक ही ज़ायका था, एक ही हाथ की दुआ। ... उसे अभी नहीं पता था कि वो नर्स कौन थी, या कि ये एक सवाल उसे सीधे उसी काली रात तक खींच ले जाएगा जिसने उसका सब कुछ छीना था। पर आज, इस एक स्टील के ढक्कन के साथ, बारह साल से बंद पड़ा एक दरवाज़ा... चरमरा कर खुलने लगा था।

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