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अध्याय 9 / 28

छत पर शाम

बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi

उस रात दिल्ली पर सावन की पहली झड़ी टूट पड़ी। हिमराज का शीशे का महल ऊपर से नीचे तक अँधेरे में डूबा था, बस चंद खिड़कियों में रौशनी काँप रही थी। और उन्हीं में से एक बर्फ़ के बादशाह की थी। कल रात अँधेरे में उसने जो फ़ैसला किया था, वो आज भी उसकी रगों में जल रहा था। ... महिका असल में है कौन, ये वो जान कर रहेगा।

सुबह वीर की सलाह मान कर उसने चुपके से महिका की फ़ाइल मँगवाई थी। पर उस काग़ज़ में कुछ था ही नहीं। त्रिलोकपुरी की एक तंग गली, एक बीमार नानी, एक छोटा भाई, और एक माँ जो बारह-तेरह साल पहले गुज़र गई। बाप का कहीं कोई नाम नहीं। जैसे कोई लड़की नहीं, एक परछाईं हो, जिसे वो काग़ज़ पकड़ ही नहीं पा रहा था।

तूफ़ान ने ऊपर की मंज़िलों की बिजली उड़ा दी थी, केटरिंग की गाड़ी बारिश में कहीं फँसी थी, और बर्फ़ का बादशाह भूखा था। पर उसकी भूख अब सिर्फ़ एक ही हाथ के खाने से मिटती थी। ... इसलिए आज वो अपने केबिन से उतर कर, किसी जासूस की तरह, तीसरी मंज़िल की उसी भाप उगलती कैंटीन की तरफ़ चल पड़ा, उस परछाईं को क़रीब से पढ़ने।

"अरे बाप रे... स-साहब! आप? यहाँ, इस कैंटीन में?" "ये... ये तो हमारी कोई औकात नहीं कि बादशाह ख़ुद चल कर नीचे आएँ... रुकिए, मैं अभी ऊपर से बढ़िया थाली मँगवाता हूँ, फ़ाइव-स्टार वाली..."

"नहीं।" "ऊपर से कुछ नहीं आएगा, बंसी। न फ़ाइव-स्टार, न कुछ और।" "जो इस कैंटीन में बनता है... वही चाहिए।"

बंसी की आँखें फैल गईं। बारह साल से पूरा हिमराज जानता था कि बादशाह पाँच सितारा थाली भी बिना छुए लौटा देता है। और आज वही बादशाह उसकी टूटी-फूटी कैंटीन के खाने की माँग कर रहा था।

"बंसी काका, किससे बात कर रहे... अरे।" "साहब, आप? इस बारिश में, इतनी रात को, नीचे? लगता है ऊपर वालों ने आज भूखा ही मार दिया अपने बादशाह को। चलिए, अच्छा हुआ जो ख़ुद चल कर आ गए।"

"महिका! ज़ुबान सँभाल। ये बर्फ़ के बादशाह हैं, कोई गली का लड़का नहीं जो तू यूँ... साहब, माफ़ कर दीजिए इसे, मुँह की कच्ची है, पर दिल की साफ़ है..."

"काका, आप बस ये बताइए, चूल्हे में गैस है कि नहीं? और आप घर जाइए। घुटनों का दर्द, ऊपर से ये बारिश, और काकी दरवाज़े पर आपकी राह देख रही होंगी। बादशाह को मैं खिला दूँगी। ... भूखा नहीं जाने दूँगी, वादा।"

बंसी हज़ार हिचकों के साथ, बार-बार मुड़ कर देखता हुआ, बारिश में चला गया। और उस ख़ाली कैंटीन में सिर्फ़ दो लोग रह गए। एक बादशाह, जो उसे किसी फ़ाइल की तरह पढ़ने आया था। और एक लड़की, जिसे नहीं पता था कि वो ख़ुद किसी की सबसे गहरी क़ैद की चाबी है।

"नीचे इस उमस में दम घुटता है, साहब। ऊपर छत पर काका का पुराना चूल्हा रखा है, वहीं बनाती हूँ। बारिश थोड़ी थम गई है। आइए... ऊपर हवा अच्छी है, और आसमान भी खुला।"

और बर्फ़ का बादशाह, हिमराज का मालिक, चुपचाप उस लड़की के पीछे-पीछे टूटी सीढ़ियाँ चढ़ कर कैंटीन की छत पर आ गया। नीचे बारिश में धुली दिल्ली की रौशनियाँ काँप रही थीं। एक कोने में पुराना चूल्हा, और उस पर चढ़ता एक भगोना। ... बारह साल में पहली बार बादशाह किसी महल में नहीं, एक टूटी सी छत पर खड़ा था।

"बैठ जाइए ना वहीं, उस टूटी कुर्सी पर। डरिए मत, गिरेगी नहीं, आपका पूरा वज़न सँभाल लेगी। आज कुछ फ़ैंसी नहीं है साहब। बस दाल, चावल, और थोड़ा सा घी। ... गरीब का खाना है, पर पेट भी भरता है और जान भी।"

"तुम्हें डर नहीं लगता।" "पूरा हिमराज मेरे सामने आँख नहीं उठाता। और तुम... मुझे एक टूटी कुर्सी पर बैठा कर दाल चढ़ा रही हो, जैसे मैं कोई... आम आदमी होऊँ।"

"क्योंकि आप हैं ही आम आदमी, साहब। बस बहुत महँगे कपड़ों में छुपे हुए। बाक़ी सब आपकी तिजोरी से डरते हैं। मैं आपकी भूख देखती हूँ। ... और भूखा इंसान बादशाह हो या भिखारी, अंदर से एक जैसा होता है।"

और अगस्त्य चुप रह गया। वो यहाँ इस लड़की को पढ़ने आया था, उसका हर राज़ खोलने। पर हुआ इसका उल्टा। वो लड़की उसे पढ़ रही थी, और वो ख़ुद किसी खुली किताब की तरह उसके सामने बैठा था। जासूस आया था, और थाली के सामने पिघलने लगा था।

"पता है साहब, ये जो हाथ आपको खिला रहा है ना, इसने बहुत छोटी उम्र से खिलाना सीख लिया था। माँ चली गईं तो घर में मैं ही सबसे बड़ी थी। एक छोटा भाई है, चिंटू, ग्यारह साल का, शैतान की ख़ाला। और नानी, जो अब चारपाई पकड़ चुकी हैं। इन दो पेटों के लिए ही तो मैं रोज़ इस टावर तक आती हूँ।"

"तुम्हारी माँ..." "तुमने कहा था वो रात-रात भर काम करती थीं। लोगों की सेवा में। ... कैसी थीं वो?"

"बहुत थकी हुई, पर बहुत नरम, साहब। रात भर दूसरों की सेवा करतीं, और सुबह हमारे लिए खाना बना कर ही सोतीं। कहती थीं, किसी भूखे को खिला देना, यही सबसे बड़ी दुआ है। उनके हाथ में जो ज़ायका था ना... वो सीखा नहीं जाता। वो बस माँ के दूध की तरह उतरता है। ... मैं बारह की थी जब वो हमें छोड़ गईं।"

और फिर वही अनजानी सर्द लहर उसकी रीढ़ को छू गई। रात की सेवा, बारह साल पहले एक मौत, और वही एक ज़ायका। हर लफ़्ज़ किसी दूर की घंटी सा बजा। कल रात उसने इस परछाईं का पीछा करने की क़सम खाई थी। पर आज, इस चूल्हे की आँच में, वो उस परछाईं को नहीं, इस जीती-जागती लड़की को देखना चाहता था। ... और सिर्फ़ हम जानते थे कि वो घंटी उसी गलियारे की है।

"महिका। ... बारह साल से मुझे कोई स्वाद नहीं आता। हर मिठास मेरे लिए राख है।" "सिर्फ़ तुम्हारे हाथ का खाना... वो अकेली चीज़ है जो मुझे आज भी चखने में आती है। मैं नहीं जानता क्यों। ... पर जब तुम खिलाती हो, तो लगता है बारह साल बाद मैं फिर से ज़िंदा हूँ।"

"साहब..." "आप जानते हैं मैं इसमें क्या सुनती हूँ? कि एक आदमी बारह साल से भूखा है। पेट से नहीं, कहीं और से। तो खाइए। जितना खा सकते हैं खाइए। ... आज कोई थाली नहीं लौटेगी।"

बारिश फिर हौले से छत के टीन पर बजने लगी। चूल्हे की आँच दोनों चेहरों पर काँप रही थी। बर्फ़ का बादशाह खा रहा था, और वो लड़की उसे यूँ देख रही थी जैसे किसी ने बरसों बाद एक बुझते दिये में तेल डाल दिया हो। ... और दोनों के बीच पहली बार कुछ पिघल कर बहने लगा।

"तुम्हारे हाथ पर हल्दी लगी है।" "...बारह साल से मैंने किसी गरम चीज़ को छुआ तक नहीं। मेरे इर्द-गिर्द सब कुछ बर्फ़ था। ... और तुम्हारा ये हाथ, इतना गरम..."

"स-साहब... हाथ... छोड़िए, दाल जल जाएगी।" "...और आप ऐसे मत देखिए मुझे। मैं बस कैंटीन वाली हूँ। ... और आप बर्फ़ के बादशाह हैं।"

दोनों के बीच बस एक साँस की दूरी रह गई थी। चूल्हे की आँच, छत पर गिरती बारिश, और बारह बरस की भूख, सब एक ही पल में सिमट आए। बर्फ़ पिघलने को थी। ... पर ठीक उसी पल अगस्त्य ने ख़ुद को रोक लिया, और धीरे से उसका हाथ छोड़ दिया। सच जानने से पहले वो इस लड़की का दिल नहीं तोड़ना चाहता था।

"माफ़ करना। ... मुझे नहीं आता ये सब। बारह साल से मैंने किसी को इतना पास आने ही नहीं दिया।" "पर तुम्हारा एक एहसान है मुझ पर, महिका। ... एक दिन तुम्हें ज़रूर बताऊँगा कि तुमने मुझे क्या लौटाया है।"

उधर, दिल्ली के दूसरे छोर पर, एक आलीशान कोठी के अँधेरे स्टडी में एक और ही तरह की सर्दी बैठी थी। दिग्विजय राणा अपने गिलास में बर्फ़ के टुकड़े घुमा रहा था, और उसके सामने खड़ी थी उसकी बेटी संजना, ग़ुस्से में तमतमाई हुई।

"बेटा, इतना बेचैन होने की क्या बात है। अगस्त्य ने अभी तक शादी की तारीख़ नहीं दी, तो क्या हुआ? ... वो लड़का शुरू से यूँ ही अकड़ू रहा है। पर राणा लोग किसी की इजाज़त का इंतज़ार नहीं करते। ... तारीख़ हम ख़ुद दे देंगे।"

"तारीख़ की बात नहीं है, पापा।" "बात उस कैंटीन वाली की है। मैंने आपसे कहा था ना, वो लड़की अगस्त्य के इर्द-गिर्द किसी दाग़ की तरह चिपकी है। और वो पत्थर का आदमी... उसके सामने पिघलने लगता है। ... ये मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।"

"तो इसका इलाज आँसू नहीं, अख़बार है, बेटी। ये देख। कल सुबह की हर बड़ी अख़बार में यही छपेगा। मल्होत्रा और राणा ख़ानदान की सगाई, तारीख़ के साथ, तस्वीर के साथ। जब पूरी दिल्ली को पता चल जाएगा, तो वो लड़का अपनी ही सगाई कैसे तोड़ेगा? ... इस ख़ानदान में कुछ मसले चुपचाप, साफ़-सुथरे तरीक़े से हल किए जाते हैं।"

तभी संजना का फ़ोन बजा। दूसरी तरफ़ हिमराज का एक चौकीदार था। उसने जो बताया, उसे सुन कर संजना का चेहरा पहले सफ़ेद पड़ा, फिर आग की तरह लाल हो गया। बादशाह अब भी टावर में था, इतनी रात, इस तूफ़ान में। ... नीचे, स्टाफ़ की कैंटीन में। उसी कैंटीन वाली के साथ।

"वो अभी उसके साथ है। ... उस गंदी कैंटीन में।" "ये कार्ड मुझे दीजिए, पापा। सत्रह तारीख़ वाले। आज रात मैं ख़ुद जा कर बादशाह को उसका मुस्तक़बिल दिखा कर आती हूँ। ... और उस लड़की को उसकी औकात।"

और संजना राणा, छपे हुए सगाई कार्डों का पुलिंदा थामे, बारिश चीरती अपनी गाड़ी हिमराज की तरफ़ दौड़ा ले गई। उन कार्डों पर एक तारीख़ छपी थी, सत्रह, एक ऐसी तारीख़ जो अगस्त्य ने कभी दी ही नहीं थी। ... एक कैंटीन वाली की उलटी गिनती अब काग़ज़ पर छप कर, ख़ुद उसकी तरफ़ चल पड़ी थी।

उधर छत पर, बारिश अब बूँदा-बाँदी में बदल चुकी थी। थाली ख़ाली हो चुकी थी, और बारह साल में पहली बार बर्फ़ के बादशाह का सिर्फ़ पेट नहीं, कुछ और भी भर गया था। महिका बर्तन समेट रही थी, और अगस्त्य उसे यूँ देख रहा था जैसे कोई डूबता आदमी किनारे को देखता है।

"अब वो पिघली हुई बर्फ़ वाली नज़रों से देखना बंद कीजिए, साहब। वरना कल काका आ कर देख लेंगे तो पूरे हिमराज में मशहूर कर देंगे कि बादशाह छत पर दाल-चावल खा रहे थे। सोचिए ज़रा, कल की हेडलाइन।"

"मशहूर हो जाने दो।" "बारह साल से मैं एक ठंडे महल का बादशाह था, महिका। ... आज पहली बार, एक टूटी छत मुझे उस पूरे महल से ज़्यादा अपनी लगी।"

और ठीक उसी पल, जैसे किसी ने आसमान से एक स्विच दबा दिया हो, छत की सारी बुझी बत्तियाँ एक साथ भक से जल उठीं। उस बर्फ़ जैसी सफ़ेद रौशनी ने उस गरम, नरम पल को एक ही झटके में चीर डाला। दोनों चौंक कर सीढ़ियों के दरवाज़े की तरफ़ मुड़े।

"वाह। ... क्या मंज़र है। बर्फ़ का बादशाह, एक कैंटीन की छत पर, एक नौकरानी के हाथ का खाना।" "ये लीजिए, दोनों देख लीजिए। छप गया। हर अख़बार में, हर चैनल पर। मल्होत्रा और राणा की सगाई। ... तारीख़, सत्रह।" "आपने तारीख़ नहीं दी थी ना, अगस्त्य? कोई बात नहीं। ... मैंने दे दी।"

और उस बरसती रात, बादशाह के क़दमों में सगाई के छपे हुए कार्ड बिखर गए। हर कार्ड पर एक तारीख़ थी जो उसने कभी नहीं दी, एक फ़ैसला जो उसका था ही नहीं। महिका पत्थर बन कर उन काग़ज़ों को देखती रह गई, और अगस्त्य समझ गया कि उसकी अपनी ख़ामोशी को संजना ने एक छपे हुए सच में बदल दिया है। ... जिस लड़की का राज़ खोलने वो निकला था, आज उसी लड़की की ज़िंदगी की उलटी गिनती, उसकी इजाज़त के बिना, अख़बार के पहले पन्ने पर छप चुकी थी।

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