अध्याय 4 / 28
कैंटीन वाली
बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi
बादशाह की मंगेतर संजना खुल कर सामने आती है, कैंटीन वाली को एक दाग़ की तरह परखती है और चुपके से रिश्वत देकर हटाना चाहती है, पर महिका झुकती नहीं। उधर त्रिलोकपुरी के तंग घर में महिका की असली दुनिया खुलती है, छोटा भाई चिंटू, बीमार नानी और सिर पर क़र्ज़, और जैसे ही महिका 'मल्होत्रा' नाम लेती है, नानी का चेहरा फ़क़ पड़ जाता है और वो बेटी को उस घर से दूर रहने की चेतावनी देती है, और अगले दिन लॉबी में ख़ुद दिग्विजय राणा सगाई पक्की करने आ कर बेख़बर महिका के पास से गुज़र जाता है।
बीसवें माले की वो बर्फ़ीली हवा एक पल को और जम गई। संजना राणा का सवाल अभी भी हवा में लटका था, और महिका के हाथ में प्याज़ का थैला यूँ ठहरा था जैसे वक़्त ख़ुद रुक गया हो।
एक तरफ़ बेदाग़ सफ़ेद फ़र्श पर खड़ी बादशाह की मंगेतर, हीरे जैसी ठंडी और तराशी हुई। दूसरी तरफ़ सस्ती वर्दी में एक कैंटीन की लड़की, बालों में छौंक की ख़ुशबू लिए। और उन दोनों के बीच, अपनी शीशे की मेज़ के पीछे, बर्फ़ का बादशाह, जिसने अभी तक नज़र भी नहीं उठाई थी।
"क्वालिटी टेस्टर है। कंपनी का मामला है। ... मेरे फ़ैसलों की सफ़ाई मैं किसी को देना ज़रूरी नहीं समझता। ... तुम्हें भी नहीं।"
"क्वालिटी टेस्टर... बीसवें माले पर? ... जहाँ बोर्ड के चंद लोगों के सिवा किसी को आने की इजाज़त नहीं, वहाँ एक कैंटीन की लड़की तुम्हारी मेज़ के सामने खाना परोस रही है। ... दिलचस्प है, अगस्त्य। बहुत दिलचस्प।"
और यहीं संजना की तेज़ नज़र ने कुछ भाँप लिया। वो नहीं जानती थी कि माजरा क्या है, पर इतना समझ गई कि ये पत्थर का आदमी, जो अपनी सगी मंगेतर को महीनों टालता आया था, इस मामूली लड़की के लिए अपने फ़ौलादी नियम तोड़ रहा था। और यही बात उसे अंदर तक चुभ गई।
"मेरे फ़्लोर पर कौन आएगा और कौन जाएगा, ये मैं तय करता हूँ, संजना। ... सिर्फ़ मैं।"
संजना ने अगस्त्य से बहस नहीं की। वो इससे कहीं ज़्यादा शातिर थी। उसने बस अपनी ऊँची एड़ियों को महिका की तरफ़ मोड़ा, और उस लड़की के इर्द-गिर्द यूँ घूमी जैसे कोई पारखी किसी सस्ती चीज़ को परख रहा हो।
"तो तुम हो वो... कैंटीन वाली। ... जिसके हाथ के खाने के चर्चे बीसवें माले तक पहुँच गए। ... खाना अच्छा बनाती होगी तुम। बड़े लोगों को अपनी थाली से बाँध लेना, ये हुनर हर किसी को नहीं आता।"
"मैं बस अपना काम करती हूँ, जी। ... साहब भूखे रहते हैं, मैं खिला देती हूँ। इसमें न कोई हुनर है, न कोई चालाकी। ... बस दो वक़्त की रोटी है।"
"रोटी... अच्छा लफ़्ज़ है। पर एक सलाह है, कान खोल कर सुन लो। ... हर नौकर की एक हद होती है, और तुम्हारी हद वो पैंट्री है। ... जिस दिन किसी कैंटीन वाली ने ये समझ लिया कि इस मेज़ पर उसकी भी कोई जगह है, ... उस दिन उसे यहाँ से जाते देर नहीं लगती। समझ गई?"
महिका ने सिर हिला दिया, पर उसकी रीढ़ सीधी रही। और हम, जो सब जानते हैं, हम एक अजीब मंज़र देख रहे थे। दिग्विजय राणा की बेटी, उस आदमी की बेटी जिसने बारह साल पहले महिका का पूरा घर उजाड़ा था, आज उसी बेख़बर लड़की को किसी दाग़ की तरह पोंछ देना चाहती थी। और दोनों को इसका ज़रा भी इल्म नहीं था।
"ख़ैर। ... मैं ये बताने आई थी, अगस्त्य। पापा कल आ रहे हैं, ख़ुद। हमारी सगाई की तारीख़ पक्की करने। ... बारह साल हो गए इस रिश्ते को टलते हुए। इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा।"
और वो चली गई, अपने पीछे एक महँगी ख़ुशबू और एक अनकही धमकी छोड़ कर। महिका ने एक लंबी साँस छोड़ी, पर उसके सीने में एक बोझ आ बैठा था, जिसका नाम उसे अभी नहीं पता था। ऊपर, बर्फ़ के इस महल में, अब दो औरतें आमने-सामने थीं। और नीचे, एक और दुनिया, महिका की अपनी दुनिया, उसका इंतज़ार कर रही थी।
उसी शाम। शीशे के टॉवरों से मीलों दूर, त्रिलोकपुरी की एक तंग गली, जहाँ नालियों के ऊपर बिजली के तारों का जाल था और हर छत पर किसी न किसी का सपना सूख रहा था। यहीं, एक कमरे के उस छोटे से घर में, बर्फ़ के बादशाह की क्वालिटी टेस्टर अपनी असली दुनिया में लौटती थी।
एक कमरा, एक रसोई का कोना, एक खटिया। यही महिका की पूरी कायनात थी। एक बूढ़ी नानी, एक ग्यारह साल का शैतान भाई, और दीवार पर टँगा वो पुराना कैलेंडर, जिस पर क़र्ज़ की क़िस्तों की तारीख़ें लाल पेन से घिरी हुई थीं।
"दीदी आ गई! दीदी आ गई! ... आज क्या लाई? ... वहाँ बड़े लोगों की कैंटीन है ना, वहाँ से कुछ बढ़िया-बढ़िया लाई क्या? ... कोई पेस्ट्री-वेस्ट्री?"
"पहले बस्ता खोल, चिंटू। ... पेस्ट्री बाद में, पहले पहाड़े सुना। ... और हाँ, तेरे लिए एक चीज़ छुपा कर लाई हूँ, पर होमवर्क के बाद, एक मिनट पहले नहीं।"
"उफ़ दीदी! ... हमेशा होमवर्क, हमेशा पहाड़े! ... मैं ना, बड़ा आदमी बनूँगा, तेरे उस बादशाह से भी बड़ा, और सबसे पहले पूरी दुनिया का होमवर्क बंद करवाऊँगा।"
"बन, ज़रूर बन। ... तू बड़ा आदमी बन, फिर देखना दीदी क्या-क्या बंद करवाती है। ... बस तू पढ़ता रह, चिंटू। बाक़ी सब दीदी सँभाल लेगी।"
पर उस हँसी के पीछे एक हिसाब चलता रहता था, जो कभी नहीं रुकता था। चिंटू की स्कूल फ़ीस, नानी की दवाई, राशन, किराया, और सिर पर चढ़ा वो क़र्ज़ जो बरसों पहले पिता की बीमारी में लिया गया था और आज तक नहीं उतरा। ये नौकरी महिका की नहीं, इस पूरे घर की साँस थी। एक साँस टूटती, तो सब बिखर जाता।
"इतनी देर कर दी आज? ... थक गई होगी मेरी बच्ची। हाथ-मुँह धो ले, मैं खाना गरम किए देती हूँ।"
"नानी, आप लेटी रहिए। ... आपका ये उठना-बैठना ठीक नहीं। ... दवाई का वक़्त हो गया, पहले वो लीजिए। खाना मैं ख़ुद गरम कर लूँगी।"
नानी की वो दवाई, जो हर महीने महिका की आधी तनख़्वाह निगल जाती थी। पर आज महिका के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। आज उसके पास एक ख़ुशख़बरी थी, और वो उसे सुनाने के लिए बेताब थी।
"नानी, एक बात बताऊँ? ... अब मैं नीचे कैंटीन में नहीं, ऊपर मालिक के अपने फ़्लोर पर काम करती हूँ। सीधे उन्हीं के लिए खाना बनाती हूँ। ... और तनख़्वाह... तनख़्वाह तीन गुना कर दी है उन्होंने!"
"तीन गुना? ... हे भगवान, तेरा भला हो, मेरी बच्ची। ... कौन है ये मालिक, बेटी, इतना बड़ा दिल किसका है?"
"बड़ा दिल? ... नानी, वो तो दुनिया का सबसे अकड़ू, सबसे ठंडा आदमी है। पूरा शहर उसे 'बर्फ़ का बादशाह' कहता है। ... नाम है... अगस्त्य मल्होत्रा। हिमराज वाले मल्होत्रा।"
और उस एक नाम पर, कमरे की हवा बदल गई। नानी का हाथ, जो दवाई की शीशी की तरफ़ बढ़ रहा था, हवा में ही ठहर गया। उनके झुर्रियों भरे चेहरे से सारा रंग यूँ उतर गया, जैसे किसी ने बारह साल पुरानी कोई क़ब्र अचानक खोल दी हो।
"मल्होत्रा? ... हिमराज वाले... मल्होत्रा? ... अविनाश मल्होत्रा का... घर?"
"अरे हाँ, वही! ... अविनाश मल्होत्रा उन्हीं के पिताजी थे, बहुत साल पहले गुज़र गए। अब बेटा अगस्त्य सब सँभालता है। ... क्यों नानी, आप जानती हैं क्या उन्हें?"
और यहीं, इस तंग कमरे में, वो राज़ करवट लेने लगा जो नानी ने बारह साल अपने सीने में दबा रखा था। महिका को नहीं पता था कि उसकी नानी उस नाम को अपने ख़ून से पहचानती थीं। कि एक बरसाती रात, एक अस्पताल, एक बेटी, और एक ऐसा झूठ जिसने इस घर को उजाड़ दिया था, सब इन्हीं मल्होत्राओं की तक़दीर से बँधा था। पर नानी ने वो सारा तूफ़ान अपने अंदर ही निगल लिया।
"नहीं... नहीं बेटी। बस नाम सुना है, अख़बारों में। बड़े लोग हैं, बहुत बड़े। ... महिका, मेरी एक बात बहुत ध्यान से सुन।"
"उन बड़े लोगों से बस अपने काम भर का नाता रखना, बेटी। ... न ज़्यादा पास जाना, न दिल लगाना। उनकी दुनिया और हमारी दुनिया में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। ... उनके पास जाने वाले हम जैसे लोग... पिस जाते हैं। दूर रहना उनसे, महिका। जितना हो सके, उतना दूर।"
"आप भी नानी! ... बिल्कुल बंसी काका जैसी बातें करने लगीं। ... अरे मैं वहाँ न सगाई करने जाती हूँ, न जायदाद बाँटने। ... बस दो वक़्त की दाल-रोटी बनाती हूँ। इसमें डरने की क्या बात?"
और महिका खिलखिला कर बात हवा में उड़ा गई। पर हमने वो देखा जो उसने नहीं देखा, नानी के काँपते हाथ, वो सूखे होंठ, और आँखों में तैरती बारह साल पुरानी दहशत। नानी जानती थीं। वो अकेली इंसान जो जानती थीं कि 'मल्होत्रा' और 'वर्मा', ये दो नाम एक ही काली रात पर एक साथ लिखे गए थे। और अब उन्हीं की बेटी की बच्ची, बिल्कुल बेख़बर, रोज़ उसी घर का खाना पका रही थी।
अगली सुबह, फिर वही शीशे का टॉवर, वही बर्फ़ीला बीसवाँ माला। पर आज हवा में एक अलग ही तनाव था। आज बोर्ड के चेयरमैन, ख़ुद दिग्विजय राणा आने वाले थे, और उनके आने से पहले पूरी इमारत यूँ सज-सँवर रही थी जैसे किसी बादशाह के दरबार की तैयारी हो।
महिका पैंट्री में अकेली बर्तन धो रही थी, जब उसे लगा कि कोई पीछे आ खड़ा हुआ है। मुड़ी, तो संजना थी। पर आज उसके चेहरे पर वो नुमाइशी मुस्कान नहीं थी। आज सिर्फ़ बर्फ़ थी।
"जल्दी आ जाती हो काम पर। ... मेहनती हो तुम। ये मुझे पसंद है। ... और मेहनती लड़कियाँ अक्सर समझदार भी होती हैं। अपनी भलाई पहचान लेती हैं। ... तुम समझदार हो ना, महिका?"
"कहिए, मैडम। ... क्या बात है?"
"ये लो। ... एक दूसरी कंपनी में, इससे कहीं बेहतर नौकरी। दुगनी तनख़्वाह, साफ़-सुथरा काम, कोई अकड़ू मालिक नहीं। ... बस एक छोटी सी शर्त। आज शाम तक हिमराज छोड़ दो, और इस फ़्लोर पर दोबारा क़दम मत रखना। ... तुम्हारे लिए भी अच्छा है, और उस छोटे भाई के लिए भी, जिसकी तुम फ़ीस भरती हो।"
और जैसे ही संजना ने उसके छोटे भाई का ज़िक्र किया, महिका के अंदर कुछ सख़्त हो गया। ये रिश्वत नहीं थी। ये एक धमकी थी, रेशम में लिपटी हुई।
"माफ़ कीजिए मैडम, पर ये मुझसे नहीं होगा। ... मुझे ख़ैरात नहीं चाहिए, मेरी नौकरी चाहिए, जो मैं ईमानदारी से कर रही हूँ। ... और रही बात जाने की, तो जिस दिन साहब कहेंगे कि महिका, अब तेरे हाथ के खाने की ज़रूरत नहीं, उस दिन बिना एक पैसा लिए चली जाऊँगी। ... पर आपके कहने पर नहीं।"
संजना का हाथ, जो लिफ़ाफ़ा बढ़ा रहा था, हवा में जम गया। बचपन से आज तक, इस औरत को किसी 'नौकर' ने कभी 'ना' नहीं कहा था। और इस मामूली कैंटीन वाली की ये हिम्मत, उसके ग़ुरूर पर किसी थप्पड़ की तरह पड़ी।
"तुम्हें अंदाज़ा नहीं कि तुम किससे टकरा रही हो। ... मैं इस घर की होने वाली मालकिन हूँ, कैंटीन वाली। और इस घर में जिसे मैं नहीं चाहती... वो ज़्यादा दिन नहीं टिकता। ... ये मेरी दरख़्वास्त नहीं थी। ये आख़िरी मेहरबानी थी। अब जो होगा, उसकी ज़िम्मेदार तुम ख़ुद होगी।"
और उस लिफ़ाफ़े को वापस अपने बैग में डालते हुए संजना के चेहरे पर एक फ़ैसला उतर आया। इस पल से महिका उसके लिए सिर्फ़ एक कैंटीन वाली नहीं रह गई थी। वो एक दाग़ बन गई थी, जिसे इस बर्फ़ के महल से पोंछ देना अब उसका इकलौता मक़सद था। शिकार शुरू हो चुका था।
उसी दोपहर, नीचे लॉबी में। महिका बंसी काका के साथ राशन के कुछ डिब्बे उठाए खड़ी थी, जब पूरी लॉबी में एक अजीब हलचल मच गई। गार्ड सीधे तन कर खड़े हो गए, रिसेप्शन की लड़कियाँ सँभल गईं, और हवा में वो सन्नाटा उतर आया जो किसी बहुत ताक़तवर आदमी के आने से पहले आता है।
"बेटा, इधर आ, ज़रा किनारे हो जा। ... आज ख़ुद राणा साहब आ रहे हैं, बोर्ड के चेयरमैन, इस पूरे हिमराज के असली मालिक। ... इनके रास्ते में मत आना, नज़रें नीची रखना। ऐसे बड़े लोगों की नज़र में आना भी मनहूसियत है, बेटी।"
"काका, मैं तो बस ये डिब्बे रसोई तक पहुँचाने आई थी। ... मुझे किसी राणा-वाणा से क्या लेना-देना। ... मैं तो इन बड़े लोगों को देख कर वैसे ही किनारे हो जाती हूँ।"
और तभी लॉबी के काँच के बड़े दरवाज़े खुले। काले सूट में, चाँदी जैसे बालों और मख़मली मुस्कान के साथ, एक आदमी अंदर आया, जिसके पीछे लोगों का एक पूरा हुजूम था। दिग्विजय राणा। हिमराज के चेयरमैन। अगस्त्य के 'सरपरस्त'। ... और हम जानते थे कि इस मख़मली मुस्कान के पीछे क्या दफ़न था, एक बरसाती रात, एक टूटी हुई रेलिंग, और एक बेगुनाह नर्स का उजड़ा हुआ घर।
"आज का दिन बहुत ख़ास है, भई। ... आज मेरे बेटे अगस्त्य और मेरी बेटी संजना का रिश्ता पक्का होगा। ... बारह साल हो गए मुझे इस घर को अपने बच्चों की तरह सँभालते हुए। ... आज वो सपना पूरा होगा, जो मैंने अविनाश के जाने के बाद देखा था।"
और फिर वो हुआ जो होना था। दिग्विजय राणा, अपने हुजूम के साथ, उस लॉबी से गुज़रा, ठीक महिका के पास से। एक पल को, बस एक पल को, वो आदमी जिसने बारह साल पहले उसका पूरा घर उजाड़ा था, और उस बरबादी की सबसे बड़ी गवाह की बेटी, एक-दूसरे से बस एक हाथ की दूरी पर खड़े थे। राणा ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं। उसके लिए वो बस एक और नौकर थी, दीवार का एक बेजान हिस्सा।
पर महिका को, बिना किसी वजह के, एक अजीब सी सिहरन हो गई, जैसे वो अनजाने में किसी क़ब्र के ऊपर से गुज़र गई हो। और उसके कानों में, कहीं बहुत गहरे, नानी की सुबह वाली बात गूँज उठी... 'दूर रहना उनसे, बेटी। जितना हो सके, उतना दूर।' महिका को नहीं पता था कि वो चेतावनी किसके लिए थी। पर हमें पता था। बर्फ़ के इस महल का सबसे ठंडा आदमी अभी-अभी उस दरवाज़े से अंदर दाख़िल हुआ था, और अपने साथ वो बारह साल पुरानी सर्दी ले आया था, जो अब सीधे इस बेख़बर, हँसती हुई लड़की की तरफ़ बढ़ रही थी।
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