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अध्याय 5 / 28

बोर्ड की चाल

बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi

उसी दोपहर, हिमराज के बीसवें माले पर, बोर्ड रूम। शीशे की एक लंबी मेज़, जिसके ऊपर छत से उतरती ठंडी रौशनी बर्फ़ की तरह जमी थी। और मेज़ के सिरे पर, किसी तख़्त की तरह, बैठा था दिग्विजय राणा।

दोनों तरफ़ बोर्ड के सदस्य, सफ़ेद बालों और महँगी घड़ियों वाले, एक क़तार में यूँ जमे हुए जैसे हर एक राणा का इशारा समझता हो। सिर्फ़ एक आदमी अगस्त्य के साथ बैठा था, वीर ओबेरॉय। और तभी मेज़ पर एक मोटी फ़ाइल सरकी, सीधे बादशाह के सामने।

"बेटा, बस एक आख़िरी रस्म बाक़ी है। ... ये कागज़ात, और तेरी और संजना की सगाई की तारीख़। ... बारह साल से मैं ये बोझ अकेला उठा रहा हूँ, अगस्त्य। अब वक़्त आ गया है कि ये घर, ये कारोबार, अपने असली परिवार के हाथ में आ जाए।"

पर उस फ़ाइल के भीतर, मीठे लफ़्ज़ों की तह में, एक चाल दबी थी। ट्रस्ट के कुछ नए क़ायदे, बोर्ड में राणा के दो और आदमी, और हिमराज के फ़ैसलों की असली चाबी, चुपके से, राणा की जेब में। बादशाह के अपने ही महल में, उसी की नाक के नीचे।

"तेरे पापा की आख़िरी ख़्वाहिश यही थी, बेटा, कि तू सँभल जाए, घर बस जाए। ... दस्तख़त कर दे। और इसी हफ़्ते सगाई की तारीख़ पक्की कर देते हैं। ... मेरे लिए नहीं, तो अविनाश की रूह के लिए।"

और बारह साल से यही होता आया था। राणा कागज़ सरकाता, और अगस्त्य, सुन्न, बेज़ायका, आधा मुर्दा, बिना पढ़े दस्तख़त कर देता। जिस आदमी को किसी चीज़ का स्वाद ही नहीं था, उसे कागज़ों के स्वाद से क्या मतलब। ... पर आज कुछ बदला हुआ था।

"रुकिए। ... इस क्लॉज़ में लिखा है कि ट्रस्ट के फ़ैसले अब बोर्ड की एक 'नई कमेटी' करेगी। ... और उस कमेटी में आपके तीन आदमी हैं, राणा अंकल, और मेरा सिर्फ़ एक। ... ये सगाई का कागज़ नहीं है। ये हिमराज की चाबी है, जो आप बड़ी सफ़ाई से मुझसे माँग रहे हैं।"

"अगस्त्य! ... तू मुझ पर शक कर रहा है? ... मैंने तुझे बेटा माना, अपने ख़ून से बढ़ कर। जिस दिन तेरा बाप गया, उसी दिन से मैंने तेरा हाथ थामा है, और आज तू..."

और पूरा बोर्ड रूम एक पल को जम गया। बारह साल में पहली बार, इस पत्थर के लड़के ने राणा के सामने सिर उठाया था। मेज़ के नीचे, वीर ओबेरॉय ने अपनी मुस्कान बड़ी मुश्किल से रोकी।

"शक नहीं, अंकल। सिर्फ़ पढ़ रहा हूँ। ... बारह साल से आप कागज़ सरकाते रहे, और मैं दस्तख़त करता रहा। आज मैं जाग गया हूँ। ... ये फ़ाइल मैं ख़ुद पढ़ूँगा, एक-एक लफ़्ज़। और सगाई की तारीख़... वो भी मैं तय करूँगा। आज नहीं।"

"ठीक है, बेटा। ... पढ़ ले, आराम से। ... मुझे तो ख़ुशी है कि तू अब कारोबार में दिलचस्पी लेने लगा है। ... पर याद रखना, कुछ दरवाज़े ज़्यादा देर खुले रहें, तो उनसे सर्द हवाएँ भी अंदर आ जाती हैं।"

और राणा उठ खड़ा हुआ, चेहरे पर वही मख़मली मुस्कान। पर अंदर, कहीं बहुत गहरे, एक बर्फ़ जम रही थी। जो लड़का बारह साल से बिना पूछे उसकी हर बात मानता आया था, वो आज सवाल कर रहा था। और राणा अच्छी तरह जानता था कि सवाल करने वाले लड़के ख़तरनाक होते हैं।

बोर्ड रूम ख़ाली हुआ, तो एक ही आदमी अपनी कुर्सी पर टिका रहा। वीर ओबेरॉय, जो अगस्त्य की ख़ामोशियों का तर्जुमा करना जानता था, आज बड़ी दिलचस्पी से अपने दोस्त को घूर रहा था।

"बारह साल। ... बारह साल से मैं तुम्हें उस कुर्सी पर आँखें खोल कर सोते देख रहा हूँ। राणा कागज़ सरकाता था, तुम दस्तख़त कर देते थे। ... आज तुमने पहली बार वो फ़ाइल पढ़ी, अगस्त्य। आज तुम... सच में जाग गए।"

"मैं हमेशा जागा हुआ था।"

"झूठ। ... तुम बारह साल से आधे सोए हुए थे। सिर्फ़ ब्लैक कॉफ़ी, ग़ुस्सा और बर्फ़ पर। ... पर पिछले कुछ दिनों से कुछ बदल गया है। तुम्हारा रंग लौट रहा है, तुम खाना खा रहे हो, तुम... जी रहे हो। ये सब कब से शुरू हुआ, ज़रा बता?"

और वीर हिसाब लगा रहा था। वो अकेला इंसान जो अगस्त्य को पढ़ सकता था, उसने चुपचाप ये नोट किया था कि ये बदलाव ठीक उन्हीं दिनों शुरू हुआ, जिन दिनों नीचे कैंटीन की वो लड़की ऊपर आ कर उसके लिए खाना बनाने लगी थी।

"मुझे तो शक उस कैंटीन वाली के खाने पर है। ... उसमें ज़रूर कुछ है, यार। जिस दिन से वो लड़की तुम्हें खिला रही है, बर्फ़ का बादशाह पिघलने सा लगा है। ... कहीं उसने तुझ पर कोई जादू तो नहीं कर दिया?"

"बकवास मत करो, वीर। ... वो सिर्फ़ खाना बनाती है। ... और मैं ठीक हूँ। मैं हमेशा ठीक ही था।"

और वीर हँस कर बात टाल गया, ये जाने बिना कि वो मज़ाक़ में सच के कितने क़रीब से गुज़र गया था। जादू ही तो था। एक मरी हुई माँ के हाथ का जादू, जो उसकी बेटी की उँगलियों में उतर आया था। पर ये सिर्फ़ हम जानते थे। न अगस्त्य, न वीर, और न वो लड़की, जो उसी वक़्त नीचे रसोई में बादशाह के लिए राजमा दम पर चढ़ा रही थी।

राणा ने इतनी आसानी से हार नहीं मानी थी। दोपहर ढले वो दो-चार भरोसे के बोर्ड सदस्यों को लेकर फिर अगस्त्य के केबिन में आ बैठा, वही फ़ाइल, वही क़लम, वही मीठा दबाव। इस बार तारीख़ पक्की किए बिना जाने का उसका कोई इरादा नहीं था।

"देख बेटा, ज़्यादा सोचना भी अच्छा नहीं होता। ... बस एक दस्तख़त, और सारी उलझनें ख़त्म। ... तेरा बाप फ़ैसले टालने वाला आदमी नहीं था। उसी की तरह बन। आज ही, अभी..."

और ठीक उसी पल, केबिन का दरवाज़ा खुला, और उस शीशे के ठंडे कमरे में वो आख़िरी शख़्स दाख़िल हुआ जिसकी वहाँ किसी को उम्मीद नहीं थी। हाथ में एक स्टील का टिफ़िन थामे, इस बात से बिल्कुल बेख़बर कि वो किस तूफ़ान के बीचों-बीच आ खड़ी हुई है, महिका।

"साहब! ... दो बज गए, और आपने सुबह से एक कौर नहीं खाया। ... आज राजमा बनाया है, बिल्कुल आपके मन का, दम वाला। ... पहले खाना, बाक़ी मीटिंग-वीटिंग बाद में। लीजिए, ठंडा हुआ जा रहा है।"

और पूरा कमरा जम गया। बोर्ड के वो रईस बुज़ुर्ग यूँ देख रहे थे जैसे किसी ने बर्फ़ के महल में अचानक आग जला दी हो। एक कैंटीन की लड़की, इस सबसे ऊँचे कमरे में, बर्फ़ के बादशाह को हुक्म दे रही थी कि पहले खाना खाओ। और राणा की सारी सधी हुई चाल, एक ही पल में बिखर गई।

"ये... कौन है? ... बोर्ड की बात हो रही है, और यहाँ नौकर बेधड़क अंदर चले आ रहे हैं? ... अगस्त्य, ये क्या तमाशा है?"

"मीटिंग तो रोज़ होती है, साहब जी। पेट रोज़ नहीं भरता। ... और मेरी नानी कहती हैं, भूखे पेट किए फ़ैसले हमेशा ग़लत होते हैं। ... लीजिए साहब, दो कौर खा लीजिए, फिर चाहे जितनी मीटिंग कर लीजिएगा।"

और यहीं वो हुआ जो कोई सोच भी नहीं सकता था। बर्फ़ का बादशाह, जिसने बारह साल में कभी किसी की बनाई चीज़ को छुआ तक नहीं था, उस भरे बोर्ड के सामने, चुपचाप उस टिफ़िन की तरफ़ हाथ बढ़ा बैठा। दुनिया की वो इकलौती चीज़ जो उसे चखने में आती थी। राणा हैरान सा उसे देखता रह गया।

"बोर्ड बाद में, राणा अंकल। ... फ़ाइल मैं पढ़ कर बताऊँगा, आज नहीं। ... आप लोग तशरीफ़ ले जाइए। ... मेरा खाना ठंडा हो रहा है।"

और बात वहीं ख़त्म हो गई। एक स्टील के टिफ़िन ने वो कर दिखाया जो हिमराज का पूरा बोर्ड नहीं कर सका था, बादशाह को राणा के जाल से बाहर खींच लिया। राणा को मुस्कुरा कर उठना पड़ा, अंदर ही अंदर जलते हुए। और वो लड़की, जिसने अभी-अभी इस साम्राज्य को एक चाल से बचाया था, उसे इसकी कोई ख़बर तक नहीं थी।

"ठीक है बेटा, तू खा ले, आराम से। ... पर ये लड़की... सीधे तेरी रसोई से बोर्ड रूम तक पहुँच गई? ... बड़ी दिलचस्प नौकरानी पाल रखी है तूने।"

और जाते-जाते राणा की नज़र, पहली बार, ठीक से महिका के चेहरे पर ठहरी। एक पल को उसके भीतर कुछ बहुत पुराना, बहुत गहरा हिला, जैसे कोई भूली हुई परछाईं करवट ले रही हो। पर उसने उसे पहचाना नहीं। उसके लिए वो बस एक और नौकर थी। और हम काँप उठे, क्योंकि हम जानते थे कि जिस घर को इस आदमी ने बारह साल पहले उजाड़ा था, उसी घर की बच्ची अभी उसकी आँखों के ठीक सामने खड़ी थी।

राणा चला गया, और केबिन में एक अजीब सी ख़ामोशी उतर आई। अगस्त्य ने पहला कौर मुँह में रखा, और बारह साल पुरानी बर्फ़ एक डिग्री और पिघल गई। उसकी नज़र, अपने आप, उस लड़की के चेहरे पर उठ गई।

"तुम्हें अंदाज़ा भी है तुमने अभी क्या किया? ... इस कमरे में लोग एक-एक लफ़्ज़ महीनों तोल कर बोलते हैं। और तुम... राजमा का टिफ़िन लेकर घुस आईं।"

"मैं... मैं तो बस आपका खाना देने आई थी, साहब। ... अगर कोई ग़लती हो गई हो तो माफ़ कर दीजिए, पर आपका यूँ भूखा रहना मुझसे देखा नहीं जाता। ... और आप ऐसे क्यों देख रहे हैं मुझे? ... खाना खाइए ना।"

पर अगस्त्य ने नज़र नहीं हटाई। एक पल को, बस एक पल को, बर्फ़ के बादशाह की आँखों में वो चीज़ तैर गई जिसे वो ख़ुद पहचान नहीं पाया। महिका का दिल, बेवजह, ज़ोर से धड़का। उसने झट से नज़रें फेर लीं और बर्तन समेटने लगी, गालों पर एक हल्की सी लाली लिए।

पर उस शीशे की दीवार के उस पार, कोई और भी ये सब देख रहा था। संजना। उसने सब कुछ देख लिया, बोर्ड रूम से बेख़ौफ़ निकलती वो कैंटीन वाली, बादशाह की उठती हुई नज़रें, और वो एक पल की लाली। और संजना के अंदर की बर्फ़, पत्थर बन गई।

"लफ़्ज़ों से ये लड़की नहीं मानी। ... तो अब लफ़्ज़ों से बात नहीं होगी। ... अमीर लोग ग़रीबों को हमेशा एक ही तरीक़े से तोड़ते हैं। चोरी का इल्ज़ाम। ... और इस बार, कैंटीन वाली, तेरे अपने हाथ ही तेरे ख़िलाफ़ गवाही देंगे।"

हिमराज की एग्ज़ीक्यूटिव किचन। बादशाह की अपनी रसोई, जहाँ सोने के किनारों वाले बर्तन थे, और एक ताले वाली अलमारी, जिसमें विदेश से आया केसर, चाँदी के चम्मच, और एक नक़्क़ाशीदार पुराना चाँदी का डिब्बा रखा था, जिसकी क़ीमत महिका की महीने भर की तनख़्वाह से कहीं ज़्यादा थी। संजना की चाल सीधी थी, और बेरहम।

"महिका... सुनो, बेटा। ... साहब के लिए आज कुछ ख़ास बनाना है ना? ... ऊपर एग्ज़ीक्यूटिव किचन की अलमारी में असली कश्मीरी केसर रखा है, उस चाँदी के डिब्बे में। जाओ, ले आओ। आज उनकी खीर में वही डालना। ... जा, जल्दी।"

भोली महिका को इसमें कोई खोट नज़र नहीं आई। ख़ुद मालकिन ने कहा था, साहब के लिए। पर संजना पहले ही अपनी असली चाल चल चुकी थी। उसने सिक्योरिटी को इत्तला दे दी थी कि उस अलमारी से एक बेशक़ीमती चीज़ ग़ायब है, और जो भी वहाँ मिले, उसे फ़ौरन पकड़ लिया जाए। जाल बिछ चुका था, और चारा ख़ुद अपने पैरों पर चल कर उसमें जा रहा था।

"जी मैडम, अभी लेकर आती हूँ। ... और शुक्रिया, आपने साहब की खीर का इतना ध्यान रखा।"

और महिका, साहब की खीर के ख़यालों में गुनगुनाती हुई, एग्ज़ीक्यूटिव किचन की तरफ़ बढ़ गई। ताले वाली वो अलमारी खुली पड़ी थी। और उसमें, चाँदी के उसी नक़्क़ाशीदार डिब्बे में, वही केसर रखा था, जिसे लाने को संजना ने कहा था। महिका का हाथ, बिल्कुल बेख़बर, उसी डिब्बे की तरफ़ बढ़ा।

पर महिका को वो नहीं दिख रहा था जो हमें दिख रहा था। संजना ने उस डिब्बे में केसर के साथ कुछ और भी सरका दिया था, कुछ ऐसा जो पल भर में 'चोरी' का सबूत बन जाता। और गलियारे के दूसरे छोर से, दो सिक्योरिटी वाले, अपने वॉकी-टॉकी पर 'चोरी' का पैग़ाम सुनते हुए, सीधे उसी किचन की तरफ़ बढ़ रहे थे।

"बस एक क़दम और, कैंटीन वाली। ... एक हाथ बढ़ा, उस डिब्बे को उठा, ... और तेरी कहानी हमेशा के लिए ख़त्म। ... इस बर्फ़ के महल में चोरों की कोई जगह नहीं होती।"

और महिका की उँगलियाँ उस चाँदी के डिब्बे पर जा टिकीं। दरवाज़े पर क़दमों की आहट क़रीब, और क़रीब आती जा रही थी। जाल बस एक साँस की दूरी पर बंद होने को था। और वो लड़की, अपने साहब की खीर के लिए मुस्कुराती हुई, उस डिब्बे को उठाने ही वाली थी, इस बात से पूरी तरह बेख़बर कि उसका अगला एक क़दम उसे उसी घर में चोर बना देगा, जिस घर की बरबादी के नीचे उसकी अपनी माँ का उजड़ा हुआ नाम दफ़न पड़ा था।

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