अध्याय 3 / 28
भूखा तानाशाह
बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi
महिका पहली बार अगस्त्य के निजी फ़्लोर पर क़दम रखती है और वो देखती है जो किसी ने नहीं देखा, कि ये आदमी कुछ नहीं खाता, हर पाँच सितारा थाली ठुकरा देता है, बस काली कॉफ़ी और ग़ुस्से पर ज़िंदा है, और सिर्फ़ उसके हाथ का खाना ही उसके होंठों से लगता है। वो एक ग़लत, कोमल नतीजे पर पहुँचती है, कि ये बर्फ़ का बादशाह ख़ुद को भूखा मार रहा है, और उसे खिलाना अब उसका फ़र्ज़ है, तभी बंसी उसे चेताता है और एक ठंडी, तराशी हुई औरत फ़्लोर पर आ कर पूछती है कि ये कैंटीन वाली उसके दफ़्तर में क्या कर रही है।
अगली सुबह, हिमराज के बीसवें माले पर लिफ़्ट का दरवाज़ा खुला, और महिका ने एक गहरी साँस भर कर उस बर्फ़ीले पिंजरे में अपना पहला क़दम रखा।
शीशे की दीवारें, संगमरमर का ठंडा फ़र्श, और हवा में वो चुप्पी जो सिर्फ़ बहुत अमीर या बहुत डरे हुए घरों में होती है। कैंटीन का शोर, बर्तनों की खटपट, बंसी काका की डाँट, सब पीछे किसी और ही दुनिया में छूट गया था।
"डर मत, महिका। ... वो भी आदमी है, तू भी इंसान है। बस उसके पास पैसा है और तेरे पास... तेरी नानी की दुआएँ। ... दोनों बराबर।"
उसके हाथ में वही स्टील का टिफ़िन था। आज उसमें गरम दाल थी, चावल, और माँ के हाथ के नुस्ख़े का वो अचार, जो अब पूरी दुनिया में सिर्फ़ महिका के हाथों में ज़िंदा था।
और वहाँ, शीशे की उस बड़ी मेज़ के पीछे, वो बैठा था। बर्फ़ का बादशाह। सूट बेदाग़, चेहरा पत्थर, आँखें किसी फ़ाइल पर गड़ी हुईं, जैसे पूरी दुनिया एक आँकड़ा हो जिसे वो नापसंद करता हो।
"देर कर दी।"
"साहब, अभी तो नौ भी नहीं बजे। ... और मैं तो सुबह छह बजे से जाग कर ये दाल बना रही थी, ताकि आपको ताज़ा मिले।"
"वहाँ। कोने में एक पैंट्री है। तुम्हारा काम वहाँ है, मेरी नज़रों के सामने नहीं। ... और बेवजह बात मत करना।"
पैंट्री की तरफ़ जाते हुए महिका की नज़र मेज़ के किनारे पर पड़ी, और वो ठिठक गई। एक चाँदी की ट्रे पर किसी पाँच सितारा होटल का नाश्ता रखा था, ठंडा, बेछुआ। एक भी कौर नहीं टूटा था।
और मेज़ पर काली कॉफ़ी के तीन ख़ाली कप। एक कोने में कल का लंच, वैसे का वैसा, प्लास्टिक में बंद। किसी महँगे शेफ़ का बनाया खाना, जिसे किसी ने छुआ तक नहीं था।
"ये क्या माजरा है? ... इतना खाना, और सब फेंकने के लिए? ... इस आदमी ने आज कुछ खाया भी है, या बस कॉफ़ी पी-पी कर काम किए जा रहा है?"
तभी एक वेटर काँच का दरवाज़ा खोल कर एक और सजी-धजी थाली ले आया। किसी बड़े रेस्तराँ का खाना, महकता हुआ, तस्वीर जैसा। अगस्त्य ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं।
"ले जाओ।"
वेटर बिना कुछ कहे थाली वापस ले गया, जैसे ये रोज़ का दस्तूर हो। महिका ने ये सब देखा, और उसके माथे पर एक बल पड़ गया, जो अगले कई दिनों में गहरा ही होता गया।
महिका ने पैंट्री सँभाली। छोटी सी जगह थी, पर उसने उसे अपना बना लिया। दोपहर तक उस बर्फ़ीले फ़्लोर की हवा में एक नई ख़ुशबू तैरने लगी, गरम दाल में छौंक की, घी में जलते ज़ीरे की।
उसने एक सादी थाली सजाई। दाल, चावल, थोड़ा अचार, और साथ में एक कटोरी में सूजी का हलवा। और वो सीधे बादशाह की मेज़ पर जा कर रख आई।
"मैंने कहा था, मेरी नज़रों के सामने नहीं।"
"आपने ये भी कहा था कि मैं आपकी क्वालिटी-टेस्टर हूँ। तो लीजिए, क्वालिटी टेस्ट कीजिए। ... खा कर बताइए दाल में नमक ठीक है या नहीं।"
अगस्त्य ने मना करने के लिए मुँह खोला। पर उस थाली की भाप उसके चेहरे तक पहुँची, और बारह साल से सोई हुई कोई चीज़ उसके अंदर करवट ले गई।
और फिर, जिस खाने को वो पाँच सितारा शेफ़ों से ठुकरा रहा था, उसी मेज़ पर उसने एक कैंटीन की लड़की की सादी दाल का पहला कौर उठाया। ... और खा लिया।
और फिर वही हुआ जो हर बार होता था। नमक, घी, माँ के हाथ की वो गर्माहट, और उसके पीछे-पीछे एक धुँधली याद, एक बरसाती रात, एक ठंडा गलियारा, एक अजनबी का हाथ। वो झटके से रुका, पर कौर हलक़ से नीचे उतर चुका था।
और हम वो जानते हैं जो अगस्त्य नहीं जानता। इस दाल में, इस हलवे में, वही हाथ बसा है जो उस रात उसके काँपते हाथों में टिफ़िन थमा गया था। निर्मला वर्मा का हाथ। महिका की माँ का। बादशाह अपनी सबसे काली रात का ज़ायका, रोज़, बिना जाने, निगल रहा था।
"देखा? ... हलवा भी चट कर दिया। ... और सुनिए, बुरा मत मानिएगा साहब, पर पूरे मुल्क को कुल्फ़ी बेचने वाला आदमी, और मीठे के नाम पर एक ग़रीब की सूजी का हलवा चाट रहा है। ... भगवान की भी लीला निराली है।"
"बको मत। ... थाली उठाओ और अपनी जगह जाओ।"
पर महिका देख चुकी थी। थाली ख़ाली थी। उस आदमी ने, जिसने सुबह से पाँच सितारा नाश्ता ठुकराया था, उसकी पूरी दाल, पूरा चावल, पूरा हलवा, चट कर दिया था। एक ऐसा आदमी जो दुनिया का सबसे महँगा खाना बिना चखे लौटा देता है, वो एक कैंटीन वाली की सादी दाल इतने चाव से क्यों खा रहा था? और यहीं से महिका के दिमाग़ में एक पहेली बननी शुरू हुई।
अगले कुछ दिनों में महिका ने वो देखा जो उस पूरी इमारत में किसी ने नहीं देखा था। बीसवें माले का बादशाह कुछ नहीं खाता था। न बोर्ड की दावतों का खाना, न महँगे होटलों की थाली, न अपनी ही कंपनी की मिठाई, कुछ नहीं। रोज़ सुबह वो चाँदी की ट्रेयाँ आतीं, महकती हुई, सजी हुई, और रोज़ शाम वैसी की वैसी वापस चली जातीं, बेछुआ। शेफ़ बदलते, मेन्यू बदलते, पर उस मेज़ का जवाब नहीं बदलता था, ले जाओ। बस काली कॉफ़ी, और दिन में एक बार, उसके हाथ का खाना।
और महिका ने अपने हिसाब से इसका मतलब निकाला। उसके लिए तो साफ़ था, ये आदमी अंदर से बीमार है। कोई अमीरों वाली बीमारी, जहाँ इंसान ख़ुद को सज़ा देता है, ख़ुद को भूखा मारता है। ये अकड़ू बादशाह, चुपके-चुपके, ख़ुद को ख़त्म कर रहा था।
"बेचारा। ... इतना पैसा, इतनी ताक़त, और ढंग से दो कौर खाना नसीब नहीं। ... कोई नहीं है इसका, जो पीछे पड़ कर कहे कि खा ले। ... ठीक है। ये काम अब मेरा।"
और उस दिन से हिमराज के बीसवें माले पर एक अजीब जंग छिड़ गई। एक तरफ़ बर्फ़ का बादशाह, जिसके एक इशारे पर सौ लोग काँपते थे। दूसरी तरफ़ एक चौबीस साल की कैंटीन वाली, जो हाथ धो कर उसके पीछे पड़ी थी कि पूरा खाना खाओ।
"फिर आधा छोड़ दिया? ... साहब, ये कोई फ़ाइल नहीं है जिसे रिजेक्ट कर दें। ... दो चम्मच और। ... मैं यहीं खड़ी रहूँगी, जब तक कटोरी ख़ाली नहीं होती।"
"तुम्हें अंदाज़ा है तुम किससे बात कर रही हो?"
"एक भूखे आदमी से। ... बाक़ी बादशाह-वादशाह बाहर वालों के लिए रखिए, साहब। मेरी रसोई में तो बस दो तरह के लोग होते हैं, जो चुपचाप खा लेते हैं, और जो ज़िद करते हैं। ... और आप दूसरे वाले हैं।"
और अजीब बात ये थी कि बादशाह खा लेता था। डाँटता, तेवर दिखाता, पर आख़िर में कटोरी ख़ाली कर देता। बारह साल की जमी बर्फ़ में, दिन में एक बार, कोई उससे यूँ लड़ता था जैसे उसके ज़िंदा रहने से किसी को सच में फ़र्क़ पड़ता हो। और उसे, ख़ुद पता नहीं क्यों, बुरा नहीं लगता था। बल्कि दोपहर के उस एक पल का, जब वो लड़की अपनी थाली लेकर उसकी मेज़ पर आ खड़ी होती थी, वो कहीं गहरे इंतज़ार करने लगा था, ऐसा इंतज़ार जिसे वो अपने आप से भी नहीं मानता था।
"एक बात पूछूँ, साहब? ... आप खाते क्यों नहीं? ... सच में कोई तकलीफ़ है, या बस... पूरी दुनिया पर ग़ुस्सा है?"
एक पल को अगस्त्य के होंठ खुले, जैसे बारह साल का कोई बोझ बाहर आना चाहता हो। वो चाहता तो कह देता, कि उसकी ज़ुबान बरसों पहले मर चुकी है, और सिर्फ़ उसके हाथ का खाना उसे फिर से ज़िंदा कर देता है। पर ये मानना कमज़ोरी थी। और बादशाह कमज़ोर नहीं पड़ते। बर्फ़ वापस जम गई।
"मेरी भूख का हिसाब तुम्हें नहीं देना है। ... बस खाना बनाती रहो। ... वही तुम्हारा काम है।"
और महिका ने इसे अपनी बात का सबूत समझ लिया। हाँ, कोई गहरा ज़ख़्म है, तभी तो बात टाल गया। पर वो ग़लत थी। ये भूख का सवाल नहीं था। ये उस एक ज़ायके का सवाल था, जो पूरी दुनिया में सिर्फ़ उसके हाथ में था। पर ये बात न वो जानती थी, न अभी जान सकती थी।
उसी शाम, रसोई का राशन लेने महिका नीचे कैंटीन में उतरी, और बंसी काका को देखते ही उसकी जान में जान आई। पचास साल का वो बड़ी तोंद और उससे भी बड़े दिल वाला आदमी, जो पहले ही दिन से उसका रखवाला बन बैठा था।
"अरे आ गई ऊपर वाली मेम साहब! ... सुन बेटा, दो दिन से तेरे बारे में पूरी बिल्डिंग में खुसुर-पुसुर है। ऊपर वाले फ़्लोर पर... तू और मालिक... अकेले? ... ये अच्छी बात नहीं है, बिल्कुल अच्छी बात नहीं।"
"काका, आप भी! ... मैं वहाँ बस खाना बनाती हूँ। वो आदमी ढंग से खाता नहीं, तो मैं खिलाती हूँ। बस इतनी सी बात है।"
"इतनी सी बात नहीं है, महिका। ... ये ऊपर वालों की दुनिया है। यहाँ जो चम्मच भी ग़लत जगह रख दे, वो अगली सुबह ग़ायब हो जाता है। ... तीस साल में मैंने कितने लोग यहाँ आते और चुपचाप ग़ायब होते देखे हैं, तुझे अंदाज़ा भी नहीं।"
और बंसी मज़ाक़ नहीं कर रहा था। ये वो दुनिया थी जहाँ बड़े लोगों की एक नाराज़गी ग़रीब की रोटी छीन लेती थी। जहाँ एक फ़ोन कॉल किसी का पूरा घर उजाड़ सकती थी। बंसी ने अपनी तीस साल की नौकरी में यही सीखा था, कि इन शीशे के टॉवरों में ग़रीब की जगह बस रसोई तक थी, उससे एक क़दम ऊपर नहीं।
"और एक बात कान खोल कर सुन ले। ... उस आदमी की सगाई तय है। बड़े लोगों की बेटी से, राणा साहब की संजना से। ... उस घर में तेरे जैसी लड़की की जगह बस पोछा लगाने की है, बेटी। कुछ दिल में मत बैठा लेना।"
"काका, आप बेकार परेशान हो रहे हैं। ... मुझे न उसके पैसे से मतलब है, न उसकी सगाई से। ... मुझे बस इतना दिखता है कि एक आदमी भूखा है, और मेरी नानी कहती हैं, भूखे को खिलाना कभी ग़लत नहीं होता। ... चाहे वो बादशाह ही क्यों न हो।"
बंसी ने एक लंबी साँस ली। उसे इस लड़की की मासूमियत से ही डर लगता था। उसे नहीं पता था कि जिस सगाई की वो बात कर रहा था, उसकी घड़ी पहले ही चल पड़ी थी। और उस घड़ी की सुई, उसी वक़्त, बीसवें माले की तरफ़ बढ़ रही थी।
राशन लेकर महिका वापस ऊपर पहुँची और चुपचाप पैंट्री सँभालने लगी, बंसी की बातों को हवा में उड़ाते हुए। तभी लिफ़्ट का दरवाज़ा खुला।
और फ़्लोर की हवा बदल गई। एक ख़ुशबू, महँगी और ठंडी, पूरे माले पर फैल गई। ऊँची एड़ियों की आवाज़ संगमरमर पर यूँ पड़ी जैसे कोई मालिक अपनी जायदाद पर क़दम रख रहा हो। एक औरत, बेदाग़, तराशी हुई, बर्फ़ से भी ज़्यादा ठंडी।
संजना राणा। दिग्विजय राणा की बेटी, और काग़ज़ों पर, बर्फ़ के बादशाह की होने वाली दुल्हन।
उसकी नज़र पूरे फ़्लोर पर फिरी और महिका पर आ कर रुक गई। सस्ती वर्दी, हाथ में प्याज़ का थैला, बालों में छौंक की ख़ुशबू। संजना ने उसे ऊपर से नीचे तक ऐसे देखा जैसे किसी बेदाग़ सफ़ेद फ़र्श पर अचानक कोई दाग़ नज़र आ गया हो।
"अगस्त्य..." ... "...ये कैंटीन वाली तुम्हारे निजी दफ़्तर में क्या कर रही है?"
और महिका के हाथ से प्याज़ का थैला छूटते-छूटते बचा। पैंट्री का दरवाज़ा, कैंटीन का शोर, बंसी की चेतावनी, सब अचानक बहुत दूर लगने लगे। बीसवें माले की उस बर्फ़ में, बादशाह की मंगेतर खड़ी थी, और उसकी बर्फ़ीली नज़र ने महिका को एक ही पल में बता दिया... कि इस पिंजरे में अब एक और शिकारी दाख़िल हो चुका था।
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