अध्याय 25 / 28
बर्फ़ की क़ैद
बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi
घिरा हुआ राणा अपनी सबसे ख़तरनाक चाल चलता है और नानी की जान को उसी बर्फ़ के जाल में क़ीमत बना देता है, फ़ोन पर अगस्त्य से माँगता है कि दरवाज़े का कोड चाहिए तो निर्मला के सारे सबूत, मर्जर और सगाई उसके हवाले कर दे, और यूँ एक ही घड़ी में एक ज़िंदगी और एक इंसाफ़, दोनों उसकी मुट्ठी में आ जाते हैं। महिका सबूत छोड़ने को तड़प उठती है पर अगस्त्य झुकने के बजाय बर्फ़ का बादशाह होते हुए ख़ुद उस जमे हुए चैम्बर में नानी को बचाने उतर जाता है, जबकि उधर हवेली में संजना फटा पन्ना छुपाए, अपना फ़ैसला टाल कर निकल जाती है और राणा फ़ाइलें ख़त्म करने का हुक्म दे देता है। आख़िर में इंजीनियरों के ज़ोर पर जमा हुआ दरवाज़ा
दिग्विजय राणा की मेज़ के उस पार खड़ी संजना की मुट्ठी हवा में अधर में रुकी थी, और उसके भीतर वो फटा पन्ना, एक तरफ़ इंसाफ़, दूसरी तरफ़ अपने ही बाप की बर्बादी। सुबह की पहली किरन परदों को चीरती अंदर आ रही थी, और राणा अख़बार पर से नज़र उठाए इत्मीनान से अपनी बेटी को देख रहा था।
"बोल ना, बेटा। इस तरह मुँह अँधेरे मेरे कमरे में आई है, तो ज़रूर कोई बात होगी। तेरी सगाई की तैयारियों को लेकर परेशान है क्या?"
"पापा, मैं... मुझे आपसे एक बात..."
और ठीक उसी पल, मेज़ पर पड़ा राणा का फ़ोन काँप उठा, और उसकी स्क्रीन की रौशनी उस धुँधलके में एक ठंडी लपट की तरह जल उठी। संजना की रुकी हुई साँस छूट गई, और उसकी भिंची मुट्ठी धीरे से नीचे उतर आई।
"एक मिनट रुक, बेटा। हाँ, बोलो। ... क्या? मल्होत्रा आधी रात से कोल्ड स्टोरेज पर खड़ा है? उसने शहर के आधे इंजीनियर जगा दिए हैं उस एक दरवाज़े के लिए?"
अपनी बेटी की मौजूदगी पल भर को भूल कर राणा फ़ोन पर बरस पड़ा, और संजना ने पहली बार अपने पिता की आवाज़ में वो पत्थर सुना जो अब तक मीठे लफ़्ज़ों के नीचे दबा रहता था।
"लॉकडाउन का कोड किसी हाल में बाहर नहीं जाना चाहिए, समझे? वो दरवाज़ा तब तक बंद रहेगा जब तक मैं ख़ुद न कहूँ। बुढ़िया अंदर है, तो अंदर ही रहेगी। और मल्होत्रा से कहो, दरवाज़ा खुलवाना है तो उसकी क़ीमत मुझसे आ कर पूछे।"
और वहीं, एक बाप के उस कारोबारी लहज़े में, संजना ने एक ज़िंदा साँस पर लगी क़ीमत सुन ली। उसने वो पन्ना और गहरे अपने आँचल में दबा लिया, और तय किया कि ये पत्ता वो अभी नहीं खोलेगी, इस मेज़ पर तो हरगिज़ नहीं।
"कोई ख़ास बात नहीं थी, पापा। आप अपना ज़रूरी काम देखिए। मैं चलती हूँ।"
संजना उस स्टडी से निकल गई, और उसके सीने से लगा वो पन्ना अब भी दोनों तरफ़ की नज़रों से छुपा था। पर पिता के मुँह से निकली वो 'क़ीमत' अब शहर के दूसरे छोर पर, एक जमे हुए दरवाज़े के सामने आग बन कर बरसने वाली थी।
हिमराज के कोल्ड चेन कॉम्प्लेक्स में सुबह हो चुकी थी, पर वहाँ का हर चेहरा रात से भी ज़्यादा स्याह था। नंबर तीन फ़्रीज़र के बाहर इंजीनियरों की पूरी टीम पसीने में डूबी थी, तार खोलते, कोड आज़माते, पर हेड ऑफ़िस का वो ताला किसी सूरत नहीं टूट रहा था। और उस मोटे स्टील के उस पार, बर्फ़ में, नानी की साँसें हर मिनट धीमी होती जा रही थीं।
"नानी! नानी, आवाज़ दो, बस एक बार! ये दरवाज़ा इतना ठंडा है कि हाथ चिपक जाता है... अगस्त्य, तो अंदर कितनी ठंड होगी, सोचो! मेरी नानी वहाँ अकेली, उस बर्फ़ में..."
"इंजीनियर लॉकडाउन को बाईपास करने की हर कोशिश कर चुके हैं, महिका। ये सिस्टम मैंने ख़ुद डिज़ाइन करवाया था, ताकि कोई दुश्मन हिमराज की इस कोल्ड चेन को छू भी न सके। मैंने इसे इतना महफ़ूज़ बनाया कि आज मेरी अपनी चाबी भी इसके आगे बेकार है। सिर्फ़ एक कोड इसे खोल सकता है।"
"और वो कोड उस शैतान के पास है, साहब। सब मेरी ग़लती है, मैं पहरे पर सो गया, वरना वो अजनबी नानी को यहाँ तक ले ही कैसे जाते? हे भगवान, उस बूढ़ी जान को बचा ले, मेरी बची-खुची उम्र भी उसे दे दे..."
"अपने आप को कोसना बंद करो, बंसी काका। इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं। ये राणा की चाल है, और अब इसका जवाब मैं राणा से ही लूँगा।"
और अगस्त्य ने वो किया जो उसने कसम खाई थी कि दोबारा कभी नहीं करेगा, उसने उस आदमी को फ़ोन मिलाया जिसे वो बारह साल 'पिता' कहता आया था। दूसरी तरफ़ घंटी बजी, और फिर वही ठंडी, इत्मीनान भरी आवाज़ उभरी।
"अगस्त्य, बेटा। सुबह सुबह इतनी बेचैनी? सुना है तूने पूरे शहर को जगा रखा है, एक मामूली कोल्ड स्टोरेज के दरवाज़े के लिए। इतना तड़प क्यों रहा है, एक कैंटीन वाली की बूढ़ी नानी के लिए?"
"वो कोड दो, राणा। उस लॉकडाउन को खोलो, इसी वक़्त। एक बूढ़ी, बीमार औरत तुम्हारी बर्फ़ में जम रही है, और तुम्हें और मुझे, दोनों को पता है कि ये कोई हादसा नहीं। ये तुमने किया है।"
"हादसा? हाँ, दुनिया के लिए तो ये एक दुखद हादसा ही होगा। पर मैं तुझसे प्यार करता हूँ, बेटा, इसलिए एक रास्ता देता हूँ। बस तू निर्मला वर्मा की वो पीली फ़ाइलें, तहख़ाने का रिकॉर्ड, और मेरे ख़िलाफ़ जमा किया एक-एक काग़ज़ मेरे हवाले कर दे। मर्जर पर दस्तख़त कर, सत्रह तारीख़ को संजना से सगाई कर, और मैं ये कोड इसी पल भेज देता हूँ। एक बेकार सी जान के बदले तुझे बस अपनी ये ज़िद छोड़नी है।"
और वहीं वो पूरा जाल एक साँस में खुल गया, एक ज़िंदा जान की क़ीमत वो सारा सच था जो निर्मला वर्मा को बेगुनाह साबित कर सकता था। एक ही घड़ी में एक ज़िंदगी और एक इंसाफ़, दोनों राणा की उसी बर्फ़ीली मुट्ठी में सिमट गए थे।
"अगस्त्य, दे दो। वो फ़ाइलें, वो सबूत, सब दे दो उसे! मुझे कोई इंसाफ़ नहीं चाहिए, कोई बदला नहीं चाहिए, बस मेरी नानी चाहिए! मेरी माँ का नाम बाद में भी साफ़ हो सकता है, पर मेरी नानी की साँस... वो अभी छूट रही है!"
"महिका, अगर मैंने ये सबूत दे दिए, तो राणा फिर कभी नहीं पकड़ा जाएगा। तुम्हारी माँ हमेशा के लिए एक क़ातिल नर्स रह जाएगी। और जो आदमी एक बार जीत जाए, इस बात की क्या गारंटी कि वो नानी को छोड़ भी देगा? यही सबूत तुम्हारी नानी की, तुम्हारी, चिंटू की, सबकी अकेली ढाल है।"
"वक़्त निकला जा रहा है, बेटा। हर गुज़रता मिनट उस बुढ़िया की एक साँस कम कर रहा है। तेरे पास सोचने के लिए बस चंद मिनट हैं। सबूत, या वो जान। दोनों एक साथ तेरे हाथ में नहीं रहेंगे।"
"तुझे मेरा जवाब कुछ ही देर में मिल जाएगा, राणा।"
अगस्त्य ने फ़ोन काट दिया, पर उसके चेहरे पर हार नहीं, एक ठंडी गणना थी। जिस दिमाग़ ने अपने हाथों से ये पिंजरा बनाया था, वही अब उस पिंजरे की एक-एक दरार टटोल रहा था।
उधर हवेली में, राणा ने घड़ी की तरफ़ देखा, एक सर्द मुस्कान के साथ, और फिर से फ़ोन उठा लिया। अगस्त्य के तुरंत न झुकने पर, बर्फ़ का असली मालिक अब एक ही सुबह में दो चीज़ें ख़त्म करने चला था।
"मल्होत्रा ने अभी तक हथियार नहीं डाले? कोई बात नहीं। तहख़ाने वाली उन फ़ाइलों को ख़त्म करने का काम इसी वक़्त शुरू करवाओ। और वो फ़्रीज़र, उसे बंद ही रहने दो। दोनों चीज़ें एक ही सुबह ख़त्म हो जाएँ, वो इंसाफ़ भी, और वो जान भी।"
"लॉकडाउन पूरे सिस्टम को जाम कर देता है, दरवाज़े को भी, कंट्रोल रूम को भी। पर फ़्रीज़र के भीतर एक चीज़ है जिस पर वो कोड नहीं चलता, मेंटेनेंस का वो पुराना सर्विस हैच, छत के रास्ते, जो सीधे चैम्बर के अंदर खुलता है, मैनुअल, बिजली से नहीं चलता। अगर कोई ऊपर से उस हैच के रास्ते अंदर उतरे, तो नानी तक पहुँच कर अंदर से उस इमरजेंसी हैंडल का जाम खोल सकता है।"
"पर साहब, वो हैच तो बहुत तंग है, और अंदर का तापमान माइनस में चला गया है! जो अंदर उतरेगा, वो ख़ुद उस बर्फ़ में जम जाएगा!"
"इसीलिए अंदर मैं उतरूँगा, बंसी काका। मुझसे बेहतर उस चैम्बर के अंदर का नक़्शा कोई नहीं जानता। नानी को अभी दो चीज़ें चाहिए, गरमाहट और थोड़ा सा वक़्त, और मैं उन्हें दोनों दे सकता हूँ, जब तक तुम लोग बाहर से ये दरवाज़ा तोड़ते हो।"
"नहीं! अगस्त्य, नहीं! तुम उस बर्फ़ में नहीं जाओगे! वो वैसी ही ठंडी है जैसी वो रात थी जिसने तुमसे तुम्हारा सब कुछ छीन लिया था! मैं तुम्हें और नानी को, दोनों को एक साथ उस बर्फ़ में नहीं खो सकती!"
"महिका, सुनो मेरी बात। बारह साल पहले ऐसी ही एक बर्फ़ जैसी रात में, तुम्हारी माँ एक अजनबी लड़के के लिए अंदर गई थी, बिना ये सोचे कि उसका ख़ुद का क्या होगा। आज मैं उसी माँ की माँ के लिए अंदर जा रहा हूँ। ये बर्फ़ मुझसे मेरा सब कुछ छीन चुकी है, अब मैं इससे कुछ वापस छीनूँगा। बस भरोसा रखो मुझ पर, और वो दरवाज़ा तोड़ते रहो।"
उसने महिका के माथे पर एक बोसा दिया, अपना कोट फ़र्श पर गिरने दिया, और छत की सँकरी सीढ़ी से उस सर्विस हैच की तरफ़ चढ़ गया। जो आदमी बारह साल पहले एक बर्फ़ीली रात में जम गया था, आज वो अपने पैरों से, अपनी मर्ज़ी से, उसी बर्फ़ में उतर रहा था।
हैच का भारी ढक्कन चरमराया, और अंदर से जमा देने वाली भाप की एक सफ़ेद दीवार अगस्त्य के चेहरे से टकराई। वो अपने आप को उस अँधेरे, धुँधले चैम्बर में उतारता चला गया, जहाँ हर साँस के साथ फेफड़ों में सुइयाँ सी चुभती थीं। और वहीं, बर्फ़ के भारी डिब्बों के बीच एक कोने में, एक छोटी सी सिमटी हुई परछाईं पड़ी थी।
"नानी! नानी, आँखें खोलिए! मैं अगस्त्य हूँ। मैं आपका अपना हूँ, नानी। बस थोड़ी देर, बस थोड़ी और साँस लीजिए, मैं आपको यहाँ से ज़िंदा निकाल कर ले जाऊँगा!"
नानी की पलकें बस ज़रा सी काँपीं, एक धुँधली सी हरकत, इतनी कि अगस्त्य को पता चल गया कि साँस अभी बाक़ी है। उसने उन्हें अपने सीने से भींच लिया और हैच की तरफ़ चीख़ा।
"हैंडल बाहर से जाम कर दिया गया है, मैं इसे अंदर से खोलने की कोशिश कर रहा हूँ! महिका, दरवाज़े से हटना मत, जब मैं कहूँ तब पूरा ज़ोर लगाना, एक साथ!"
"मैं यहीं हूँ, अगस्त्य! मैं कहीं नहीं जा रही! सब लोग इस हैंडल पर, अभी, पूरी ताक़त से! अगस्त्य, नानी को छोड़ना मत, और ख़ुद को भी मत छोड़ना, सुन रहे हो! तुम दोनों मुझे ज़िंदा चाहिए!"
"लगाओ ज़ोर, सब मिल कर लगाओ! भगवान के लिए, ये मनहूस दरवाज़ा खुल जा! साहब अंदर हैं, नानी अंदर हैं, टूट जा, अरे टूट जा तू!"
अंदर, अगस्त्य की उँगलियाँ अब सुन्न पड़ने लगी थीं, और जिस हैंडल के जाम को वो घुमाने की कोशिश कर रहा था, वो टस से मस नहीं हो रहा था। नानी को एक बाँह से सीने से लगाए, दूसरे हाथ से वो उस लोहे से जूझ रहा था, और वो जमा देने वाली ठंड अब उसे भी अपनी तरफ़ खींच रही थी, ठीक बारह साल पहले की तरह।
"थोड़ा और... बस थोड़ा और... नानी, आपकी बेटी ने उस रात हार नहीं मानी थी... तो मैं भी नहीं मानूँगा... ये जाम... खिसक रहा है... महिका! अभी! बाहर से पूरा ज़ोर, अभी के अभी!"
"सब एक साथ! एक... दो... तीन... खींचो! जान लगा दो, खींचो!"
और तभी, उस जमे हुए स्टील ने एक लंबी, दर्दनाक कराह भरी, इतनी गहरी कि पल भर को अलार्म की चीख़ भी दब गई। सील टूटी, दरवाज़ा एक इंच सरका, फिर एक बालिश्त, और अंदर से जमी हुई सफ़ेद भाप की एक दीवार बाहर लुढ़क आई, महिका के पैरों से लिपटती हुई।
"अगस्त्य! नानी! कहाँ हो तुम... मुझे कुछ दिख नहीं रहा... ये धुँध... अगस्त्य, जवाब दो! कोई तो जवाब दो!"
भाप छँटने लगी, और उस लाल रौशनी में, चैम्बर के फ़र्श पर, एक देह पड़ी थी। बिल्कुल स्थिर। एक भी हरकत नहीं। उस बर्फ़ीली, धुँधली, लाल अँधेरी हवा में कोई नहीं बता सकता था कि वो निश्चल देह उस बूढ़ी नानी की थी, या उस आदमी की जो उसे बचाने अपनी मर्ज़ी से इस बर्फ़ में उतरा था। महिका की एक चीख़ पूरे कॉम्प्लेक्स में गूँज उठी, और ठीक उस थमी हुई साँस पर, कहानी बर्फ़ बन कर रुक गई।
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