Chapter 14 of 28
बर्फ़ और आग
बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi
बर्फ़ का बादशाह बारह साल की चुप्पी तोड़ कर बोर्ड रूम में सबके सामने राणा का बिछाया ज़हर का झूठ राख कर देता है, महिका को बेगुनाह साबित कर के पहली बार अपने बाप समान गार्जियन और सत्रह तारीख़ की सगाई, दोनों से खुल कर टूट जाता है। ख़ाली कमरे में बारह साल की बर्फ़ पिघलती है और दोनों का पहला बोसा होता है, पर उसी साँस में दबा हुआ राज़ अगस्त्य के गले तक चढ़ आता है और वो महिका से उसकी माँ का नाम, निर्मला, पूछ बैठता है, एक ऐसा नाम जो महिका ने उसे कभी बताया ही नहीं था।
गलियारे में वर्दी के क़दम अब दरवाज़े की देहरी तक आ पहुँचे थे। महिका का आख़िरी लफ़्ज़, 'साहब', अभी भी उस काँच के कमरे की जमी हुई हवा में काँप रहा था। बर्फ़ का बादशाह अब तक सफ़ेद, ख़ामोश, जमा हुआ बैठा था। और फिर, कहीं बहुत गहरे, बारह साल पुरानी उस बर्फ़ में पहली दरार की आवाज़ आई। अगस्त्य मल्होत्रा अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
"रुको।" "पुलिस को बाहर ही रोको। कोई एफ़.आई.आर. दर्ज नहीं होगी।" "इस कमरे में आज सच में एक जुर्म हुआ है। पर वो इस लड़की ने नहीं किया।"
बारह साल में पहली बार बादशाह की आवाज़ में वो सर्दी नहीं थी जो हुक्म चलाती है। ये वो सर्दी थी जो हिसाब माँगती है। दिग्विजय राणा ने फ़ौरन अपनी वही बाप जैसी नरमी ओढ़ ली और अगस्त्य की तरफ़ एक हाथ बढ़ाया, जैसे किसी बहके हुए बेटे को सँभाल रहा हो।
"अगस्त्य, बेटा... मैं जानता हूँ ये सब देखना तुम्हारे लिए आसान नहीं।" "पर सबूत तुम्हारे अपने सामने है। तुम्हारी तबीयत, वो शीशी, वो रजिस्टर। तुम बैठ जाओ, ये गंदा काम मुझ पर छोड़ दो। मैं हूँ ना तुम्हारे लिए।"
"मैं बैठूँगा नहीं, दिग्विजय राणा। और आज ये काम आप नहीं, मैं करूँगा।" "मैंने वो खाना खाया था। दो कौर, सबके सामने। अगर उसमें ज़हर होता, तो मैं आज इस मेज़ के इस तरफ़ खड़ा हो कर आपसे बात नहीं कर रहा होता।"
"डॉक्टर की रिपोर्ट आ चुकी है। मेरे ख़ून में ज़हर का एक ज़र्रा नहीं। मैं गिरा था क्योंकि तीन दिन से मेरे हलक़ से एक निवाला नहीं उतरा था, किसी ज़हर से नहीं।" "और ये रजिस्टर... इस पन्ने की स्याही अभी सूखी भी नहीं। जिसे आप महिका के दस्तख़त बता रहे हैं, वो किसी और के हाथ की नक़ल है।"
"और अब सबसे ज़रूरी बात।" "आज सुबह पाँच बजे, जब ये कैंटीन अँधेरे में ख़ाली पड़ी थी, एक दस्ताना पहना हाथ मसालों की अलमारी के पीछे ये शीशी रख कर गया। वो हाथ महिका का नहीं था। और उस पूरी रिकॉर्डिंग की एक-एक साँस अब मेरे पास है।" "जो दो नए चेहरे कल से इस कैंटीन के चक्कर काट रहे थे, वो किसके भेजे हुए थे, ये भी अब मुझसे छुपा नहीं।"
काँच की उस लंबी मेज़ के गिर्द बैठे बोर्ड के लोग एक-दूसरे को देखने लगे, दबी-दबी सरगोशियाँ शुरू हो गईं। एक कोने में वीर बैठा था, वही वीर जो कल से बस यही कह रहा था कि पहले उस शीशी की जाँच तो हो। आज पहली बार उसके होंठों पर एक हल्की सी राहत तैरी, कि उसका पत्थर-दिल दोस्त बारह साल में आख़िरकार किसी एक इंसान के लिए बोला।
और यहीं दिग्विजय राणा की पिता जैसी मुस्कान एक पल को खिंच गई। उसने उसे फिर सँभाल लिया, पर अब उसके नीचे की ठंडक ज़रा सी झलक चुकी थी। उसने अपनी आवाज़ को और भी नरम कर लिया, जैसे नरमी ही अब उसका आख़िरी हथियार हो।
"अगस्त्य... ये सब महज़ इत्तिफ़ाक़ हो सकता है, कोई ग़लतफ़हमी हो सकती है।" "एक मामूली कैंटीन वाली के लिए तुम अपने ही बोर्ड के सामने, अपने पिता समान इंसान पर उँगली उठा रहे हो? सोच लो, बेटा। ये कंपनी, ये नाम, ये सब जो आज तुम्हारे पास है, किसकी छाँव में खड़ा है, ये मत भूलना।"
"बारह साल से मैं आपको अपने बाप की जगह रखता आया हूँ, दिग्विजय राणा।" "और आज मैंने अपनी आँखों से देखा कि आपने एक बेगुनाह लड़की को चंद मिनटों में क़ातिल बना कर पुलिस के हवाले करते हुए पलक तक नहीं झपकाई। जिस आदमी के लिए किसी इंसान की पूरी ज़िंदगी इतनी सस्ती हो... मैं उसे आज से अपना कुछ नहीं मानता।"
और इस काँच के कमरे में एक सच ऐसा भी था जिसे अगस्त्य ख़ुद सिर्फ़ आधा जानता था, और पूरा सिर्फ़ हम। वो जानता था कि जिस लड़की को वो आज बचा रहा है, वो उसी नर्स की बेटी है जिसने बारह साल पहले उस काली रात गलियारे में उसे बचाया था। पर जो सिर्फ़ हम जानते थे, वो ये था कि जिस झूठ की शक्ल में आज महिका को क़ातिल बनाया गया, ठीक उसी झूठ ने बारह साल पहले उसकी माँ निर्मला को कुचला था। दोनों काग़ज़ एक ही हाथ ने छेड़े थे। और वो हाथ इसी कमरे में, बाप का मुखौटा ओढ़े बैठा था।
"अगस्त्य, रुको...!" "तुम एक कैंटीन वाली के लिए पापा से, इस पूरे बोर्ड से, हमारी सगाई से मुँह मोड़ रहे हो? सत्रह तारीख़ को हमारी शादी का कार्ड छप चुका है, पूरी दिल्ली को पता है...!"
"कौन सी सगाई, संजना? कौन सी सत्रह तारीख़?" "वो तारीख़ तुमने तय की थी, अख़बार में तुमने छपवाई थी, मैंने नहीं। मेरी ज़िंदगी में ऐसी कोई तारीख़ कभी थी ही नहीं। और अब कभी होगी भी नहीं।"
संजना के हाथ में पकड़े वो लफ़्ज़ बीच में ही रह गए। उसने अपने पिता की तरफ़ देखा, उस ठंडे, सधे हुए चेहरे की तरफ़ जिसने पल भर में एक ज़िंदा लड़की को क़ातिल के काग़ज़ में लपेट दिया था। कल बोर्ड रूम में उसने जो सर्द ख़याल मोड़ कर रख दिया था, आज वो उतनी आसानी से नहीं मुड़ा। पहली बार उसके भीतर एक बारीक सा सवाल हिला, कि उसके पिता आख़िर किस हद तक जा सकते हैं।
"इस लड़की पर कोई इल्ज़ाम नहीं। रजिस्टर ज़ब्त करो, वो शीशी फ़ोरेंसिक को भेजो, और इसे अभी छोड़ दो।" "ये मीटिंग ख़त्म हुई। सब बाहर जाओ।"
"साहब...।" "आपने... आपने सबके सामने, इन सबके ख़िलाफ़, मेरे लिए...? मैं तो समझ बैठी थी कि आज मेरी पूरी ज़िंदगी उन सलाख़ों के पीछे बंद हो जाएगी।"
पर बादशाह का हुक्म पत्थर की तरह गिर चुका था। सिक्योरिटी के हाथ महिका के कंधों से हट गए। बोर्ड के लोग एक-एक कर उठे। राणा एक पल अगस्त्य को घूरता रहा, फिर अपनी वही पिता जैसी संजीदगी ओढ़ कर, संजना को इशारा कर के बाहर निकल गया। देखते ही देखते वो लंबा काँच का कमरा ख़ाली हो गया। रह गए तो सिर्फ़ दो लोग। बर्फ़ का बादशाह, और वो लड़की जिसे उसने अभी-अभी सलाख़ों के मुँह से खींच लिया था।
बाहर दिल्ली की शाम काँच की दीवारों पर उतर रही थी, सुरमई और थकी हुई। कमरे का वो सारा शोर, वो इल्ज़ाम, वो हड़बड़ी, अचानक जा चुके थे, और उनकी जगह एक भारी सी ख़ामोशी ठहर गई थी। महिका अब तक काँप रही थी। जिस डर को उसने भरे कमरे में सँभाले रखा था, वो अब अकेले में उसके घुटनों तक उतर आया, और वो पास पड़ी कुर्सी का सहारा ले कर बैठ गई।
"आप... आप बोल सकते थे।" "मैं वहाँ सबके सामने गिड़गिड़ाती रही, आपका नाम लेती रही, और आप... आप एक बुत की तरह बैठे रहे। पुलिस दरवाज़े तक आ गई थी, साहब। हथकड़ी एक साँस की दूरी पर थी। ... तब आप चुप क्यों थे?"
"मैं...।" "मैं जम गया था, महिका। जिस पल तुम्हें सबसे ज़्यादा मेरी ज़रूरत थी, ठीक उसी पल मेरे अंदर कुछ जम गया। मेरे पास इसकी कोई सफ़ाई नहीं है।"
"जम गए थे?" "बारह साल से आप यही तो कर रहे हैं ना, हर चीज़ के आगे जम जाना। मैं कोई थाली नहीं हूँ, साहब, जो आपकी ज़ुबान को अच्छी लगे तो रख ली और बाक़ी सब राख। मैं एक जीता-जागता इंसान हूँ। आज अगर आप एक पल और चुप रहते, तो...।"
"तो मैं तुम्हें कभी जाने नहीं देता।" "तुम्हें लगता है मैं तुम्हें उन सलाख़ों के पीछे जाने देता? उससे पहले मैं इस पूरे टावर को राख कर देता।"
और वो लफ़्ज़ कहते ही अगस्त्य ख़ुद ठिठक गया, जैसे उसने कुछ ऐसा कह दिया हो जिसे वो बारह साल से अपने सीने में ताले लगाए बैठा था। महिका ने ऊपर देखा। बादशाह की उन ठंडी आँखों में आज पहली बार वो सर्दी नहीं थी। वहाँ कुछ पिघल रहा था, कुछ जो बहुत बरसों से जमा हुआ था। दोनों के बीच की हवा अचानक भारी हो गई।
"आपने आज... सबके सामने... मेरे लिए अपने बाप जैसे आदमी से लड़ लिया।" "कोई मेरे लिए कभी इस तरह खड़ा नहीं हुआ, साहब। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं आपसे लड़ूँ, या...।"
"तुम्हें पता है इस पूरी दुनिया में तुम मेरे लिए क्या हो, महिका?" "बारह साल हो गए, हर मिठास मेरे लिए राख है, हर खाना बेमानी, पूरी दुनिया बेस्वाद। और उस पूरी बेस्वाद दुनिया में एक तुम हो, जिसे मेरी ज़ुबान पहचानती है। तुम मेरे लिए सिर्फ़ खाना नहीं हो। तुम वो अकेली गरमाहट हो जो मेरे अंदर अब तक बची है।"
और फिर बारह साल की बर्फ़ और उन दोनों के बीच खिंची वो अनकही डोर, दोनों एक साथ टूट गईं। पहला क़दम किसने बढ़ाया, ये न वो जान पाई न वो। बादशाह का हाथ उसके काँपते चेहरे तक पहुँचा, वो ठंडा हाथ जो अब जल रहा था, और उनके होंठ मिल गए। उस एक बोसे में बारह साल का सारा ग़म था, सारी भूख, और वो सारी तड़प जिसे दोनों ने कभी कोई नाम नहीं दिया था। कमरे की सुरमई शाम एक पल को ठहर गई, और उसके साथ वक़्त भी।
"रुकिए...।" "बंसी काका ने सुबह ज़बरदस्ती ये दो लड्डू मेरी जेब में ठूँस दिए थे, कि ऊपर जा कर तू भी कुछ अपने मुँह में डाल लेना। आज इतना कुछ हो गया, और मुझे अब जा कर याद आया।" "लीजिए। दुनिया का सबसे महँगा बादशाह, और एक कैंटीन के लड्डू। खा कर दिखाइए।"
और बादशाह ने वो लड्डू लिया, और खाया। दुनिया का सबसे ठंडा आदमी, एक कैंटीन के लड्डू के आगे हार गया। वही गरमाहट, वही ज़ायका जो बारह साल में सिर्फ़ इसी एक हाथ से उसकी ज़ुबान तक पहुँचता था। और उस मिठास के पीछे, बस एक पल को, कोई बहुत पुरानी परछाईं करवट ले कर फिर कहीं छुप गई।
"मुझे डर लग रहा है, साहब।" "बर्फ़ का बादशाह... और इतना गरम। ये सच नहीं लग रहा।" "इतनी अच्छी चीज़ें मेरी ज़िंदगी में ज़्यादा देर टिकती नहीं।"
"इस बार टिकेगी।" "मैंने बारह साल किसी चीज़ को अपने पास रुकने नहीं दिया, महिका। पर तुम्हें मैं जाने नहीं दूँगा। ये मेरा वादा है।"
पर अगस्त्य के सीने में उसी पल कुछ और भी जाग उठा। डॉक्टर सेठी के वो लफ़्ज़ उसके कानों में गूँज गए, कि उसका ज़ायका ज़ुबान पर नहीं, किसी याद के पीछे क़ैद है, किसी एक रहम के पीछे। और महिका को इस तरह बाँहों में थामे हुए, बारह साल पहले उस अस्पताल के गलियारे का वो हाथ, वो टिफ़िन, वो अकेली दुआ, सब एक साथ उसके गले तक चढ़ आए। वीर ने कभी कहा था, पता करो ये लड़की आख़िर है कौन। अगस्त्य को पता चल चुका था। ज़रूरत से कहीं ज़्यादा।
और यही वो पल था जहाँ मोहब्बत ठहर कर, फिर पीछे हट गई। जो राज़ अगस्त्य बारह दिन से नहीं, बारह साल से अपने सीने में दबाए बैठा था, वो अब उसकी ज़ुबान की नोक तक आ पहुँचा। उसने धीरे से महिका को अपने से ज़रा अलग किया और उसकी आँखों में देखा, जैसे किसी बहुत पुराने चेहरे को उसमें ढूँढ रहा हो।
"महिका... तुमने मुझे बताया था कि तुम्हारी माँ नर्स थीं।" "कि वो सारी-सारी रात जाग कर अजनबियों की जान बचाती थीं। कि उनका हाथ, उनका ज़ायका, तुममें उतरा है।"
"हाँ...।" "मेरी माँ। दुनिया की सबसे नेक औरत। मैंने कभी सोचा नहीं था कि आप जैसा कोई मेरी माँ की बात इतने ध्यान से सुनेगा।" "पर आप अचानक ये सब क्यों पूछ रहे हैं...?"
अगस्त्य के होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। बारह साल से जो नाम उसने सिर्फ़ पुरानी पीली फ़ाइलों में, सिर्फ़ अपने भीतर देखा था, वो अब पहली बार उसकी अपनी ज़ुबान पर आने को था। और उसे पता था, ये नाम कहते ही, इन दोनों के बीच का सब कुछ हमेशा के लिए बदल जाएगा।
"उनका नाम...।" "तुम्हारी माँ का नाम... निर्मला था ना?"
और महिका ठहर गई। पूरी तरह। उसके चेहरे की वो गरमाहट, वो हँसी, वो अभी-अभी वाला बोसा, सब एक पल में जम गए, जैसे किसी ने अभी-अभी उसके भीतर बहुत गहरा एक पत्ता पलट दिया हो।
"साहब...।" "मैंने आपको अपनी माँ का नाम कभी नहीं बताया।" "आपको उनका नाम... कैसे पता?"
और उस काँच के कमरे में, जहाँ अभी-अभी बारह साल की बर्फ़ पिघली थी, एक नई, और कहीं ज़्यादा गहरी सर्दी उतरने लगी। बादशाह के पास इस सवाल का कोई ऐसा जवाब नहीं था जो वो दे सकता। और महिका की सुलगती नज़र उसके चेहरे पर जमी थी, बस एक सवाल लिए। अभी-अभी जो बोसा बारह साल का ग़म धो कर गया था, वो अब एक अनकहे राज़ की नोक पर काँप रहा था। बादशाह ने महिका को उसकी माँ का नाम दे दिया था। और अब उसे बताना बाक़ी था कि वो नाम उसे आख़िर मिला कहाँ से।
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