अध्याय 8 / 28
बंद ज़ुबान
बर्फ़ का बादशाह द्वारा Avni Oberoi
अपने ज़ायके का राज़ समझने को बेचैन अगस्त्य चोरी-छुपे नयूरोलॉजिस्ट डॉक्टर सेठी के पास जाता है, जो बताता है कि उसका स्वाद ज़ुबान पर नहीं, सदमे से बंद हुए एक ज़हनी दरवाज़े के पीछे क़ैद है, और उसे सिर्फ़ उसी काली रात से जुड़ी कोई एक याद, कोई एक रहम खोल सकता है। अगस्त्य समझ जाता है कि जो अकेला ज़ायका उसे चखने में आता है वो चाबी है और महिका किसी तरह उसी याद पर खड़ी है, और वीर के 'पता करो ये लड़की है कौन' पर वो रात में एक फ़ैसला कर लेता है।
शाम ढले, बर्फ़ के बादशाह की काली गाड़ी उस दिन हिमराज की तरफ़ नहीं मुड़ी। वो दिल्ली के एक पुराने इलाक़े की ख़ामोश गली में जा रुकी। अगस्त्य मल्होत्रा, कॉलर ऊँचा किए, चेहरा छुपाए, किसी चोर की तरह अपने ही डर के दरवाज़े तक चला आया था। ... एक नामी नयूरोलॉजिस्ट, डॉक्टर सेठी का निजी क्लीनिक।
बारह साल में पहली बार वो किसी को वो बात बताने आया था जो उसने वीर तक से छुपाई थी। कि उसकी ज़ुबान मुर्दा है, कि हर मिठास राख है। और कि हाल ही में एक कैंटीन की लड़की के हाथ का खाना उस राख के बीच अकेला ज़िंदा ज़ायका बन कर उभरा है, और वो नहीं जानता क्यों।
"मिस्टर मल्होत्रा... आप जैसे आदमी को अपने आलीशान दफ़्तर के बजाय इस पुरानी गली में, छुप कर आते देखना..." "...मैं समझ सकता हूँ कि मामला मामूली नहीं है। आपने फ़ोन पर कहा, बारह साल से कोई स्वाद नहीं। ... कुछ भी नहीं? मीठा, नमकीन, खट्टा, कुछ नहीं?"
"कुछ नहीं, डॉक्टर। ... बारह साल से मैं जो खाता हूँ, वो सिर्फ़ बनावट है। ठंडा, गरम, नरम, सख़्त। स्वाद कोई नहीं।" "दुनिया मुझे बर्फ़ का बादशाह कहती है। मैं मिठाइयों का साम्राज्य चलाता हूँ... और अपनी ही बनाई एक कुल्फ़ी नहीं चख सकता।"
"और ये बारह साल पहले शुरू हुआ। ... अचानक। किसी एक रात।" "मिस्टर मल्होत्रा, ऐसी चीज़ें उम्र के साथ धीरे-धीरे नहीं आतीं। ये एक ही झटके में आती हैं, किसी बहुत बड़े सदमे के साथ। ... उस रात आपके साथ क्या हुआ था?"
अगस्त्य एक पल को चुप रह गया। उस सफ़ेद रौशनी में उसे बारह साल पुरानी वो बरसाती रात दिखने लगी। फ़्लाईओवर की टूटी रेलिंग, अस्पताल का बर्फ़ जैसा ठंडा गलियारा, और वो ख़बर जिसने उसकी पूरी दुनिया एक ही साँस में छीन ली थी।
"एक हादसा। ... उस रात मेरे माँ, बाप और छोटी बहन, तीनों चले गए। एक ही रात में, एक साथ।" "बस उसके बाद से मुझे कुछ चखने में नहीं आता। इतना काफ़ी है, डॉक्टर। मुझे वजह नहीं, इलाज चाहिए।"
"मिस्टर मल्होत्रा, आपका इलाज आपकी ज़ुबान पर है ही नहीं। ... क्योंकि आपकी ज़ुबान बीमार ही नहीं है।" "जिस रात आपने इतना बड़ा सदमा झेला, उस रात आपके दिमाग़ ने एक दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर दिया। और आपका सारा स्वाद उसी बंद दरवाज़े के पीछे क़ैद हो गया। ज़ुबान ने नहीं, ज़हन ने आपका ज़ायका छीना है।"
"दिमाग़?" "डॉक्टर, मैं यहाँ फ़लसफ़ा सुनने नहीं आया। दरवाज़ा बंद है तो खोलिए। ऑपरेशन, दवाई, जो लगे। पैसा कोई मसला नहीं।"
"इस दरवाज़े पर न कोई चाकू चलता है, न कोई दवाई। ... आपका सारा पैसा इसे नहीं खोल सकता।" "इसे सिर्फ़ एक चीज़ खोल सकती है। उसी रात से जुड़ी कोई गहरी याद। कोई इंसान, कोई पल, कोई ऐसा रहम जो उस बुरी रात में आपको छू गया हो। ... दिमाग़ जब उस याद को दोबारा पहचानता है, तभी वो बंद दरवाज़ा एक झिरी भर खुलता है।"
और उस सफ़ेद कमरे में बर्फ़ का बादशाह जैसे ख़ुद बर्फ़ बन गया। कोई एक याद। उस रात का कोई एक रहम। ... और उसके भीतर बारह साल पुराने उस ठंडे गलियारे की तस्वीर काँप उठी। एक अजनबी हाथ, स्टील का टिफ़िन, काँपते हाथों में थमाया गरम खाना।
"डॉक्टर... अगर ये सच है... तो जो एक चीज़ मुझे आज भी चखने में आती है, वो कोई खाना नहीं है।" "...वो कोई याद है। किसी एक हाथ की याद।"
"रुकिए। ... आपको कुछ चखने में आता है? अभी, इन दिनों?" "तो वो जो भी चीज़ है, मिस्टर मल्होत्रा, वो महज़ खाना नहीं। वो आपके उस बंद दरवाज़े की चाबी है। जो हाथ वो ज़ायका बनाता है, उसका किसी न किसी तरह उसी रात से रिश्ता है। ... वरना बारह साल की ये क़ैद यूँ न टूटती।"
अगस्त्य उस क्लीनिक से निकला तो हाथ में कोई दवाई की पर्ची नहीं थी, बस एक ऐसा सच था जो किसी भी दवाई से भारी था। जिस लड़की के खाने ने उसे बारह साल बाद जिलाया, उसका उस काली रात से कोई न कोई रिश्ता ज़रूर था। ... कैसा रिश्ता, ये वो अब तक नहीं जानता था।
अगली सुबह, निजी फ़्लोर पर, महिका हमेशा की तरह अपना टिफ़िन लिए हाज़िर थी। पर आज बादशाह की नज़रें उस पर किसी और ही तरह टिकी थीं। खाने पर नहीं, उन हाथों पर। जैसे कोई बंद ताला घूर रहा हो, जिसकी चाबी उसके सामने खड़ी हो, पर ताला अब भी दिख न रहा हो।
"आज राजमा-चावल, साहब। और वो भी आपकी पसंद का नहीं, मेरी पसंद का। ... पूरा ख़त्म कीजिएगा, वरना मैं यहीं कुर्सी डाल कर बैठ जाऊँगी।" "और आज आप फिर वैसे ही घूर रहे हैं मुझे। ... कल भी घूर रहे थे। कोई नई बीमारी लग गई है क्या आपको?"
"महिका... एक बात पूछूँ।" "तुमने कहा था, ये सब खाना बनाना तुमने अपनी माँ से सीखा। ... तुम्हारी माँ। वो क्या करती थीं? तुमने एक दिन कहा था, रात-रात भर काम।"
"हाँ, साहब। ... माँ रात-रात भर काम करती थीं, लोगों की सेवा में। कहती थीं, भूखे का पेट भर देना सबसे बड़ी इबादत है।" "उनके हाथ में जादू था। जो भी बनातीं, वो सिर्फ़ खाना नहीं, दुआ होती थी।" "मैं बारह-तेरह बरस की थी जब वो हमें छोड़ कर चली गईं। ... फिर नानी ने हमें पाला।"
और फिर वही हुआ जो पिछली बार हुआ था। एक बेवजह सर्द लहर अगस्त्य की रीढ़ को छू गई। रात को काम, लोगों की सेवा, बारह-तेरह साल पहले एक मौत। ... हर लफ़्ज़ किसी दूर की घंटी सा बजता था, पर वो घंटी किस मंदिर की है, ज़हन पकड़ नहीं पा रहा था। और सिर्फ़ हम जानते थे कि वो घंटी उसी गलियारे की है।
"और पता है साहब, एक अजीब बात। ... जिस दिन मैंने नानी को बताया कि मैं मल्होत्रा साहब के यहाँ काम करने लगी हूँ ना... उनका तो जैसे रंग ही उड़ गया।" "बूढ़े लोग भी ना। कहने लगीं, उस घर से जितना दूर रहो उतना अच्छा। ... अब भला आपसे किसी को क्या ख़तरा? आप तो बस एक बेचारे भूखे बादशाह हैं।"
"तुम्हारी नानी... सिर्फ़ मेरे घर का नाम सुन कर डर गईं।" "क्यों? उन्होंने कोई वजह बताई?"
"अरे, पता नहीं, साहब। कोई पुरानी बात होगी बुज़ुर्गों की। ... आप इन बातों में मत पड़िए और चुपचाप खाइए।" "देखिए, राजमा ठंडा हो रहा है। और मुँह मत बनाइए। ... आपको तो वैसे भी स्वाद नहीं आता, तो कम से कम मेरे लिए ही खा लीजिए।"
अगस्त्य ने एक कौर मुँह में रखा, और फिर वही चमत्कार। मसाला, नमक, घर की आँच। राख के बीच फिर वही अकेला ज़िंदा ज़ायका। पर आज उस स्वाद में एक डर भी घुला था। डॉक्टर सेठी के लफ़्ज़ कानों में गूँज रहे थे। ये महज़ खाना नहीं, ये चाबी है। ... और वो ताला उसी काली रात पर जड़ा है।
महिका झुक कर उसकी थाली सीधी करने लगी, और पल भर को उसका आँचल उसके कंधे से छू गया। अगस्त्य की साँस रुक गई, और उसने ख़ुद को इस लड़की की तरफ़ यूँ खिंचते पाया जैसे बर्फ़ धूप की तरफ़। फिर उसने ख़ुद को झटके से पीछे खींच लिया। ... सच जानने से पहले वो अपना दिल यूँ खुला नहीं छोड़ सकता था।
उसी शाम, वीर ओबेरॉय फ़ाइलों का पुलिंदा लिए अगस्त्य के केबिन में दाख़िल हुआ, और अपने दोस्त को खिड़की के पास यूँ खोया देखा, जैसे वो जिस्म से यहाँ हो, पर ज़हन से कहीं बहुत दूर, किसी बारह साल पुरानी रात में।
"बॉस, इस हफ़्ते ये तीसरी बार है जब तुमने मेरी हर फ़ाइल को यूँ देखा, जैसे वो चीनी में लिखी हो।" "बारह साल से मैं तुम्हारा पत्थर वाला चेहरा पढ़ता आया हूँ, अगस्त्य। ... आजकल उस पत्थर में दरारें आ रही हैं। और मुझे पता है कहाँ से। ... तीसरी मंज़िल की उस भाप उगलती कैंटीन से।"
"वीर... अगर मैं तुमसे कहूँ कि उस लड़की के साथ कुछ है जो मैं ख़ुद समझ नहीं पा रहा... कुछ जो सिर्फ़ खाने का नहीं है...।" "...छोड़ो। तुम नहीं समझोगे। मैं ख़ुद नहीं समझ पा रहा।"
"अच्छा? बर्फ़ का बादशाह किसी को समझ नहीं पा रहा? ... ये तो हिमराज के इतिहास में पहली बार हो रहा है।" "देखो यार, इसका सीधा हल है। तुम पूरी कंपनी चलाते हो, तुम्हारे पास हर साधन है। ... अगर समझ नहीं आ रहा कि ये लड़की है कौन, तो पता करो ना। पूरी तरह। कहाँ से आई, इसका घर, इसकी माँ... सब कुछ।"
वीर ने ये बात हँसी-मज़ाक़ में कही थी, बहुत हल्के-फुल्के। पर अगस्त्य के चेहरे पर उसके लफ़्ज़ किसी बर्फ़ के टुकड़े की तरह जम गए। इसकी माँ। सब कुछ पता करो। ... डॉक्टर की बात और वीर की बात, दोनों एक ही अँधेरे दरवाज़े की तरफ़ उँगली उठा रही थीं।
"एक और बात, वीर।" "पूरे दफ़्तर में एक तारीख़ की फुसफुसाहट है। सत्रह। ... लोग कह रहे हैं उस दिन मेरी शादी है। सगाई, कार्ड, सब कुछ संजना तय कर रही है, मेरे पूछे बिना।"
"हाँ, बॉस। ... मैं भी यही सुन रहा हूँ। संजना मैडम हर किसी को बता रही हैं, सत्रह तारीख़। और राणा साहब का दफ़्तर भी अभी से तैयारियों में जुट गया है।" "तो... क्या तुमने ये तारीख़ दी है? सत्रह?"
"नहीं।" "मैंने कोई तारीख़ नहीं दी, वीर। ... राणा साहब से मैंने बोर्ड में साफ़ कह दिया था, तारीख़ मैं तय करूँगा, कोई और नहीं। और मैंने अब तक कोई तय नहीं की।" "ये सत्रह तारीख़ संजना का ख़्वाब है, मेरा फ़ैसला नहीं। ... और इस साम्राज्य में फ़ैसले अब भी मैं करता हूँ।"
और वीर ने वो देखा जो उसने बारह साल से नहीं देखा था। अगस्त्य अपनी ही ज़िंदगी की डोर वापस अपने हाथ में लेने लगा था। पर वीर ये नहीं जानता था कि जिस तारीख़ को उसका दोस्त टाल रहा है, उसी तारीख़ पर संजना ने एक कैंटीन की लड़की की उलटी गिनती लिख दी है।
"जो भी हो बॉस... सत्रह तारीख़ हो या सतरहवीं सदी, पहले ये पता करो कि वो लड़की तुम्हारे लिए है कौन।" "क्योंकि बारह साल में पहली बार तुम किसी की वजह से जाग रहे हो। ... और यक़ीन मानो, वो कोई फ़ाइल नहीं है। वो राजमा-चावल वाली लड़की है।"
रात गहरा गई। हिमराज का शीशे का महल ख़ाली हो चुका था, और अपने अँधेरे केबिन में बर्फ़ का बादशाह बिल्कुल अकेला बैठा था। मेज़ पर दो चीज़ें रखी थीं। एक तरफ़ डॉक्टर सेठी की दी हुई फ़ाइल। और दूसरी तरफ़, बारह साल से सँभाला वो स्टील का ढक्कन, उस नर्स के टिफ़िन का।
डॉक्टर की फ़ाइल कह रही थी, इलाज उस रात से जुड़ी किसी याद में है। कोई इंसान, कोई रहम। और उसकी अपनी याद बार-बार उसी गलियारे पर लौट रही थी, जहाँ एक अजनबी हाथ ने उसे टिफ़िन थमाया था। दोनों रास्ते आ कर एक ही काली रात पर मिल रहे थे।
"उस रात एक हाथ ने मुझे खाना दिया था। ... और बारह साल बाद, एक हाथ का खाना मुझे फिर चखने में आता है।" "और डॉक्टर कहता है, दोनों का रिश्ता उसी एक रात से है।" "...तो क्या ये सिर्फ़ इत्तिफ़ाक़ है? कि वही ज़ायका ख़ुद चल कर मेरी कैंटीन में आ खड़ा हुआ?"
और बारह साल में पहली बार, बर्फ़ के बादशाह के ज़हन में इत्तिफ़ाक़ लफ़्ज़ पर से यक़ीन उठ गया। जिस लड़की को वो अब तक चमत्कार समझ रहा था, अब वो सोचने लगा, क्या उसका आना सचमुच इत्तिफ़ाक़ था? ... या उसके पीछे कोई धागा है, जो उसी काली रात से बँधा है?
"मुझे इस लड़की का चमत्कार नहीं चाहिए। ... मुझे इसका सच चाहिए।" "मैं जान कर रहूँगा कि महिका असल में है कौन। किसकी बेटी है, उसकी माँ कौन थी, और उस काली रात से उसका क्या रिश्ता है।" "ज़रूरत पड़ी तो इसकी ज़िंदगी की एक-एक ईंट अलग कर दूँगा... पर उस रात का हर राज़ खोल कर रहूँगा।"
और उस अँधेरे केबिन में बर्फ़ के बादशाह ने फ़ैसला कर लिया। वो उस लड़की का हर राज़ खोल कर रहेगा। ... पर उसे नहीं पता था कि उस धागे का दूसरा सिरा उसके अपने ही अभिभावक के हाथ में है। कि जिस माँ का नाम वो ढूँढ़ने निकला है, वो वही नर्स है जिसे उसके अपने लोगों ने उसी रात मिटा डाला था। ... अपने ज़ख़्म का इलाज ढूँढ़ता बादशाह, अनजाने में अपने सबसे बड़े गुनाह की तरफ़ क़दम बढ़ा चुका था। ... और अब लौटना मुमकिन नहीं था।
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