Chapter 7 of 28
औकात की बात
बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi
कल की हार का बदला लेने के लिए संजना एक चमकदार टेस्टिंग की महफ़िल में सबके सामने महिका को उसकी औकात याद दिलाती है, पर जब बादशाह को अपनी बेस्वाद कुल्फ़ी पर मुहर लगानी होती है और संजना महिका को निकलवाना चाहती है, तो अगस्त्य उसे रोक कर अनजाने में ज़ाहिर कर देता है कि उसे इस लड़की की कितनी गहरी ज़रूरत है। रात, सूनी पार्किंग में संजना मुस्कुरा कर वो तारीख़ बता देती है जिस दिन वो मल्होत्रा बनेगी और महिका उसकी ज़िंदगी से हमेशा के लिए मिटा दी जाएगी।
सुबह की पहली धूप जब हिमराज के शीशे के महल पर पड़ी, तो बर्फ़ का बादशाह अपने निजी फ़्लोर पर ठीक वहीं खड़ा था जहाँ रात उसे छोड़ गई थी। अगस्त्य मल्होत्रा ने पूरी रात आँख नहीं झपकी थी। जेब में बारह साल पुराने उस स्टील के ढक्कन की ठंडक अब भी बसी थी, और ज़हन में बस एक ही सवाल बर्फ़ सा जमा था। एक ही हाथ का ज़ायका, दो बार, बारह साल के फ़ासले पर। ये मुमकिन कैसे है।
तभी लिफ़्ट खुली और महिका, हमेशा की तरह, एक छोटे तूफ़ान की तरह अंदर आई, हाथ में गरम टिफ़िन। पर आज बर्फ़ का बादशाह उसे यूँ देख रहा था जैसे पहली बार देख रहा हो। उसके हाथों को, और उस डिब्बे को जो वो थामे थी।
"गुड मॉर्निंग, साहब! ... आज गरम-गरम आलू के परांठे बनाए हैं, दही और घर के अचार के साथ। ... और आज कोई बहाना नहीं। पूरी थाली ख़त्म करनी है। ... देखा है ख़ुद को आईने में? लगता है रातभर सोए ही नहीं।"
"तुमने..." "...तुमने ये आज सुबह बनाया? अभी, अपने इन्हीं हाथों से?"
"और नहीं तो क्या, साहब? आपके लिए बासी खाना लाऊँगी क्या? ... चार बजे उठ कर बनाती हूँ, चिंटू को स्कूल भेजती हूँ, फिर दौड़ती हुई यहाँ। ... पर आज आप कुछ अजीब से देख रहे हैं मुझे। ... क्या हुआ?"
और अगस्त्य के होंठों तक वो सवाल आया जो रातभर उसे काटता रहा था। तुम्हारी माँ कौन थीं। इन हाथों में ये ज़ायका कहाँ से उतरा। पर उसने उसे निगल लिया, क्योंकि उसे ख़ुद नहीं पता था कि वो किस अँधेरे का दरवाज़ा खटखटा रहा है।
उसने चुपचाप एक कौर तोड़ा, मुँह में रखा, और फिर वही हुआ। नमक। घी। गेहूँ की मिठास। बारह साल की बेस्वाद राख के बीच सिर्फ़ इस एक हाथ का ज़ायका ज़िंदा था। और अब वो जानता था कि ये ज़ायका उसी काली रात के गलियारे से चला आ रहा है, पर कैसे, ये नहीं जानता था।
"बैठ जाओ।" "...तुम रोज़ इतनी दूर से, सिर्फ़ मेरे एक खाने के लिए।" "बेकार है। मैं कह दूँगा गाड़ी भेज दिया करें, ताकि नाश्ता वक़्त पर पहुँचे।"
"वाह! तो बर्फ़ का बादशाह अब मेरे लिए गाड़ी भेजेगा?" "...या अपने नाश्ते के लिए? बहाना जो भी हो, साहब, नीयत तो अच्छी है।" "अब चुपचाप खाइए। एक कौर छोड़ा ना, तो कल से बच्चों की तरह हाथ से खिलाऊँगी। ... घूरिए मत।"
"तुम एक पूरी कंपनी के मालिक से बात कर रही हो।" "...और तुम, एक कैंटीन की लड़की, मुझे बच्चों की तरह खिलाने की धमकी दे रही हो।"
महिका खिलखिला कर हँस दी, पर उसका ध्यान उसके लफ़्ज़ों पर नहीं, उसके हाथों पर था। वो हाथ, जो हर सुबह उसे बारह साल पुरानी एक क़ब्र से खींच लाते थे, और जिन्हें वो न समझ पा रहा था, न छोड़।
उसी दोपहर, हिमराज के सबसे ऊँचे फ़्लोर पर, "बर्फ़ का बादशाह" की नई कुल्फ़ी रेंज की ख़ास टेस्टिंग थी। शहर के बड़े इन्वेस्टर और अख़बार वाले उस शीशे के हॉल में जमा थे। और महफ़िल की मेज़बानी, दुल्हन बन कर, संजना राणा सँभाल रही थी। कल की बेइज़्ज़ती अब भी उसकी आँखों में जमी थी, और आज वो हिसाब चुकाने आई थी।
रेशमी साड़ियों और हीरों की भीड़ में, महिका अपनी सस्ती सूती सलवार-क़मीज़ में किसी और ही दुनिया की लगती थी। वो एक कोने में कुल्फ़ी की ट्रे थामे खड़ी थी, और संजना की बाज़-नज़र ने उसे फ़ौरन ढूँढ़ लिया।
"अरे, महिका! इधर आओ, बेटा।" "आप सब से मिलवाऊँ, ये है हमारी कैंटीन की लड़की। ... अच्छी बात है ना, कि हिमराज में नीचे तबके के लोगों को भी कभी ऊपर आने का मौक़ा मिल जाता है।" "जाओ बेटा, मेहमानों को कुल्फ़ी सर्व करो। ... और ट्रे गिरा मत देना। ये कालीन तुम्हारी छह महीने की तनख़्वाह से महँगा है।"
और हॉल में एक दबी हुई हँसी दौड़ गई, रेशमी लोगों की वो हँसी जो चाबुक से भी गहरी चुभती है। महिका के कान लाल हो गए। पर उसने न ट्रे नीचे रखी, न सिर झुकाया।
"जी, मैडम। अभी सर्व कर देती हूँ।" "लीजिए साहब, कुल्फ़ी लीजिए। ... और कालीन की फ़िक्र मत कीजिए। ... जो लोग अपने हाथ की कमाई खाते हैं ना, उनके हाथ कभी नहीं काँपते। गिरती तो उनकी चीज़ें हैं, जिन्हें सब कुछ मुफ़्त में मिल जाता है।"
संजना की मुस्कान एक पल को जम गई। तीर सीधा निशाने पर लगा था, और महफ़िल का एक हिस्सा दबी ज़ुबान में मुस्कुरा भी दिया था। पर संजना राणा ने अपनी हार को फ़ौरन एक नए वार में बदल दिया।
"ओहो, ज़बान तो बड़ी तेज़ है इसकी। ... पर बेटा, ज़बान से पेट नहीं भरता। पेट औकात से भरता है।" "ये बेचारी दिन के इतने में काम करती है जितने में मैं एक स्कार्फ़ नहीं ख़रीदती। ... इसकी जगह नीचे है, उस भाप उगलती कैंटीन में।"
"बिल्कुल सही कहा, मैडम। मेरी जगह उसी कैंटीन में है।" "वहाँ मैं रोज़ दो सौ लोगों का पेट भरती हूँ, अपने हाथों से। और मुझे उस मेहनत पर फ़ख़्र है।" "औकात कपड़ों से नहीं होती, मैडम। ... मेरी नानी कहती हैं, औकात इंसान की नीयत से होती है। और नीयत ख़रीदी नहीं जाती।"
तभी हॉल में हलचल दौड़ी। बर्फ़ का बादशाह अंदर आया, और इन्वेस्टरों की आँखें चमक उठीं। आज उसे सबके सामने अपनी नई कुल्फ़ी चख कर उस पर मुहर लगानी थी, करोड़ों की लॉन्च उसकी एक "हाँ" पर टिकी थी। और सिर्फ़ हम जानते थे, कि जिससे सब स्वाद का फ़ैसला माँग रहे थे, उसकी अपनी ज़ुबान बारह साल से मुर्दा पड़ी थी।
"अगस्त्य, आ गए। सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।" "ये लो, हमारी नई शाही मलाई कुल्फ़ी। ... चखो, और बता दो कि बर्फ़ का बादशाह इसे अपना नाम देता है या नहीं।"
अगस्त्य ने चाँदी की वो प्याली उठाई। कैमरे चमके, पूरा हॉल साँस रोक कर रुक गया। और उसमें रखी लाखों की वो कुल्फ़ी उसके लिए बस सफ़ेद, बेस्वाद राख थी। उसने एक चम्मच मुँह में रखा, और भीतर वही पुराना ख़ालीपन फैल गया। पर आज इन्वेस्टरों की नज़रें उसके चेहरे की हर लकीर पढ़ रही थीं।
"और हाँ, इससे पहले कि हम आगे बढ़ें..." "...ये कैंटीन वाली अपना काम कर चुकी। सिक्योरिटी, इसे नीचे वापस भेज दो। ऐसी बड़ी टेस्टिंग में स्टाफ़ का यूँ खड़े रहना अच्छा नहीं लगता।"
और तभी बर्फ़ के बादशाह ने वो किया जो किसी ने नहीं सोचा था। उसने हाथ उठाया, और एक लफ़्ज़ कहा, इतनी तेज़ी से कि उसकी अपनी आवाज़ ने उसे धोखा दे दिया। "रुको।" पल भर को उस पत्थर के चेहरे पर कुछ चमका जो घबराहट के बहुत क़रीब था। और संजना की पैनी आँखों ने वो चमक पकड़ ली।
"ये यहीं रहेगी। ... ये हिमराज की क्वालिटी टेस्टर है। मेरी किसी चीज़ पर मेरा नाम तब तक नहीं लगता, जब तक ये उसे चख कर मंज़ूर न कर ले।" "महिका। इधर आओ। ... इसे चखो, और इन सबको बताओ कि ये बादशाह के नाम के लायक़ है या नहीं।"
एक अजीब मंज़र था। शहर के सबसे रईस लोग, और उन सबके बीच खड़ी एक कैंटीन की लड़की, जिसके एक फ़ैसले पर करोड़ों की लॉन्च टिकी थी। महिका ने काँपते हाथों से चम्मच उठाया, एक कौर लिया, और आँखें बंद कर लीं, जैसे स्वाद को नहीं, उसकी रूह को टटोल रही हो।
"मलाई अच्छी है, साहब। ... पर इलायची थोड़ी ज़्यादा है, और चाशनी में वो बात नहीं जो घर की होती है। ये ज़बान पर मीठी लगेगी, पर दिल तक नहीं पहुँचेगी।" "बादशाह के नाम के लायक़ बनानी है, तो थोड़ा और प्यार डालना पड़ेगा। असली मिठास बाज़ार से नहीं, हाथ से आती है।"
और हैरत की बात, इन्वेस्टर मुस्कुरा दिए। बरसों बाद उन्होंने कोई रेशमी झूठ नहीं, कोई सच्ची बात सुनी थी। अगस्त्य ने धीरे से सिर हिलाया, जैसे उसका अपना फ़ैसला उसी लड़की के होंठों से निकला हो। पर संजना अब मुस्कुरा नहीं रही थी। उसने वो देख लिया जो कभी नहीं देखना चाहती थी। अगस्त्य को इस लड़की की ज़रूरत थी, सिर्फ़ खाने की नहीं, किसी बहुत गहरी, ख़तरनाक तरह की।
महफ़िल छँटने लगी, और उस शोर के बीच एक पल के लिए अगस्त्य और महिका पास-पास रह गए। और उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी अपनी साँस, इस लड़की के पास, कितनी हल्की हो जाती है।
"तुमने आज... मुझे फिर बचा लिया।" "पूरा हॉल मेरे एक लफ़्ज़ के इंतज़ार में था। और वो लफ़्ज़ मेरे पास नहीं था। ... वो तुम्हारे पास था।"
"मैंने कुछ नहीं किया, साहब। बस सच कहा।" "...आप इतने पास खड़े हैं तो मुझे कुछ अजीब सा लगता है। ... आप ज़रा हट जाइए ना।"
पर वो हटा नहीं। और वो भी नहीं गई। दो अधूरे लोग, एक ऐसे फ़ासले पर खड़े थे जो हर दिन थोड़ा और कम होता जा रहा था। फिर अचानक, जैसे किसी ने उसे भीतर से झिंझोड़ा हो, अगस्त्य एक क़दम पीछे हट गया। क्योंकि इस लड़की के हाथ में एक राज़ था जिसे वो ख़ुद समझ नहीं पाया था, और जब तक उसे न समझ ले, अपने दिल को यूँ खुला नहीं छोड़ सकता था।
उस शाम, अकेले अपने केबिन में, शहर की बत्तियों को घूरते हुए, अगस्त्य ने एक फ़ैसला किया। उसे जानना था। इस ज़ायके की जड़ कहाँ है, ये लड़की कौन है, इसकी माँ कौन थी। बारह साल में पहली बार बर्फ़ का बादशाह किसी सच के पीछे भागने को तैयार था। पर उसे नहीं पता था कि वो सच उसे किस काली रात तक खींच ले जाएगा।
रात गहरा चुकी थी। हिमराज की सूनी पार्किंग में, महिका थकी-हारी घर लौटने को निकली ही थी कि एक ठंडी, महकती परछाईं उसका रास्ता रोक कर आ खड़ी हुई। संजना राणा। अब कोई महफ़िल नहीं थी, कोई कैमरा नहीं। सिर्फ़ दो औरतें, और उनके बीच खड़ा एक आदमी जो वहाँ था भी नहीं।
"आज तुमने बहुत तालियाँ बटोरीं, है ना? सबके सामने बादशाह की क्वालिटी टेस्टर बन कर।" "पर एक बात कान खोल कर सुन लो। अगस्त्य को तुम्हारी ज़रूरत है, ये मैंने आज देख लिया। ... और जिस चीज़ की उसे ज़रूरत हो, उसे मैं उसकी ज़िंदगी में एक पल नहीं रहने देती।"
"मैडम, मैं कोई चीज़ नहीं हूँ। ... और मुझे न आपकी ये नौकरी चाहिए, न आपके साहब। ... मैं बस अपना काम करती हूँ और घर चली जाती हूँ। ... आप बेवजह मुझसे इतना डरती हैं।"
"डरती? मैं, तुमसे?" "ना, बेटा। मैं तो बस एक हक़ीक़त याद दिला रही हूँ। ... तुम्हारे जैसी लड़कियाँ इन महलों में मेहमान होती हैं, मालकिन नहीं। ... और मेहमान को एक दिन जाना ही पड़ता है।"
और फिर संजना ने वो किया जो उसके ग़ुस्से से भी ख़तरनाक था। वो मुस्कुराई। एक ऐसी मुस्कान जिसमें कोई जलन नहीं, सिर्फ़ पत्थर जैसा यक़ीन था। उसने अपने फ़ोन का कैलेंडर खोला, और उसकी चमकती स्क्रीन महिका के चेहरे के सामने कर दी।
"ये देखो। ... इसी महीने की सत्रह तारीख़।" "उस दिन मल्होत्रा हवेली में मेरी माँग सिंदूर से भरेगी। उस दिन मैं संजना राणा नहीं, संजना मल्होत्रा बन जाऊँगी।" "और जिस दिन मैं इस साम्राज्य की मालकिन बनूँगी ना, महिका... उसी दिन तुम अगस्त्य मल्होत्रा की ज़िंदगी से हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दी जाओगी। ... तारीख़ याद कर लो। सत्रह। ... आज से उलटी गिनती शुरू।"
और संजना राणा, अपनी हील्स की ठक-ठक अँधेरे में पीछे छोड़ती, ग़ायब हो गई। महिका उस सूनी पार्किंग में जमी खड़ी रह गई, और ज़हन में बस एक ही लफ़्ज़ गूँजता रहा। सत्रह तारीख़। ... उसे नहीं पता था कि उस एक तारीख़ का उसके टूटे घर से, उसकी मरहूम माँ से, या उस बादशाह से क्या गहरा रिश्ता है, जो अब उसके बिना एक कौर नहीं निगल पाता। पर उसे इतना ज़रूर महसूस हुआ कि उस एक तारीख़ ने अभी उसकी ज़िंदगी में एक उलटी गिनती शुरू कर दी थी। ... सत्रह तारीख़। ... और इस बर्फ़ के महल में, वक़्त हमेशा से अमीरों का ही साथ देता आया है।
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