Chapter 22 of 28
अगस्त्य का फ़ैसला
बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi
त्रिलोकपुरी के उस टूटे दरवाज़े पर राणा का भेजा बेचेहरा आदमी घुस आता है और निर्मला के काग़ज़ ढूँढते हुए महिका की कलाई तक पहुँच जाता है, जबकि बीमार नानी और नन्हा चिंटू बेबस देखते रह जाते हैं और महिका अपनी माँ की डायरी को अपनी जान से लगा कर उसे देने से इनकार कर देती है। उधर हिमराज के टावर में वीर से त्रिलोकपुरी की ख़बर सुन कर बारह साल का जमा हुआ अगस्त्य पहली बार पिघल कर एक साफ़ फ़ैसला कर लेता है, वो हिमराज, सगाई और राणा का बेटा होना, सब एक साँस में छोड़ कर उस घर को बचाने और निर्मला का नाम साफ़ करने निकल पड़ता है। ऐन वक़्त पर गली में पहुँच कर वो ख़ून से सना उस आदमी को राणा के ही नाम से भगा देता है
महिका का काँपता हाथ कुंडी पर आ कर ठहर गया। उस पतली लकड़ी के उस पार बारह साल पुरानी वो पूरी काली रात खड़ी थी, और इस तरफ़ एक लड़की, एक सोता बच्चा, एक बीमार बुढ़िया। पर महिका ने दरवाज़ा नहीं खोला, बल्कि नानी की खाट और दरवाज़े के बीच आ खड़ी हुई।
"कौन है? इतनी रात को किसी शरीफ़ आदमी का इस गली में क्या काम? जो कहना है वहीं से कह दो। ये दरवाज़ा यूँ नहीं खुलेगा।"
दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई। न कोई नाम, न बहाना, बस एक ख़ामोशी जो किसी भी धमकी से भारी थी। और फिर एक भारी हाथ उस दरवाज़े पर पड़ा, और वो पुरानी कुंडी काग़ज़ की तरह चटख़ गई।
दरवाज़ा अंदर की तरफ़ खुलता चला गया, और दहलीज़ पर वो आदमी आ खड़ा हुआ। चौड़े कंधे, बुझी हुई आँखें, चेहरे पर वही सर्द ख़ामोशी, जैसे रात का एक टुकड़ा टूट कर उस घर में घुस आया हो। उसने न महिका को देखा, न चिंटू को, बस अपनी नज़र पूरे कमरे पर फिराई, जैसे किसी चीज़ को ढूँढ रहा हो।
"दीदी... ये वही गाड़ी वाला आदमी है ना? इसकी आँखें... दीदी, मुझे बहुत डर लग रहा है।"
"मेरे पीछे रह, चिंटू। इस घर में तुम्हारे मतलब का कुछ नहीं, न पैसा, न ज़ेवर। एक बीमार बुढ़िया है और दो भूखे बच्चे। जिसने भेजा है, उससे कह दो कि यहाँ लूटने को कुछ नहीं बचा।"
पर उस आदमी ने न जवाब दिया, न रुका। वो उस छोटे से कमरे में यूँ बढ़ा जैसे कोई मशीन चल पड़ी हो, और उसका हाथ सीधे उस पुराने टीन के बक्से की तरफ़ गया, जिसमें महिका की माँ का सामान रखा था। उसे पैसा नहीं चाहिए था, न ज़ेवर। उसे सिर्फ़ वो काग़ज़ चाहिए थे, जिनमें बारह साल पुराना एक सच अब भी साँस ले रहा था।
और तभी नानी की आँख खुल गई। एक बीमार बूढ़ी औरत ने अपनी धुँधली आँखों से देखा कि रात के उस पहर में एक अजनबी उसकी निर्मला का बक्सा टटोल रहा है, और उसके सूखे गले से एक काँपती चीख़ निकली।
"नहीं... उसे मत छूना! वो मेरी निर्मला का सामान है, उसमें तेरे मतलब की कोई चीज़ नहीं! महिका, बेटा, इन्हें रोक... ये वही लोग हैं, जिन्होंने मेरी बेटी को..."
नानी की बात एक ज़ोरदार खाँसी में डूब गई, और उनका बूढ़ा जिस्म खाट पर दोहरा हो गया। पर सिर्फ़ महिका जानती थी कि जिस चीज़ के लिए ये आदमी आया है, वो अब उस बक्से में थी ही नहीं। वो डायरी तो उसके अपने सीने से लगी हुई थी।
उस आदमी ने बक्सा उलट दिया, पुरानी तस्वीरें, एक फटी साड़ी, कुछ चिट्ठियाँ, सब ज़मीन पर बिखर गईं, पर जो पन्ने वो ढूँढ रहा था वो उसे नहीं मिले। और फिर उसकी बुझी नज़र उस बिखरे सामान से उठ कर महिका के सीने से चिपके कपड़े पर आ कर ठहर गई।
"नहीं। ये तुम्हें नहीं मिलेगी। मेरी जान चली जाए, पर मेरी माँ का ये आख़िरी सच मैं तुम्हें नहीं दूँगी। तुम इसे मेरे मुर्दा हाथों से ही ले सकते हो।"
और वो ख़ामोश आदमी एक क़दम बढ़ा, और उसका भारी हाथ महिका की पतली कलाई की तरफ़ उठा। चिंटू चीख़ पड़ा, और छत से लटका अकेला बल्ब उस खींचतान में हिल कर परछाइयाँ नचाने लगा। उस झूलती रौशनी में, बारह साल पुरानी वो मशीन अब उसी बेगुनाह नर्स की बेटी की कलाई तक पहुँच चुकी थी।
और ठीक उसी घड़ी, दिल्ली के दूसरे छोर पर, हिमराज के टावर की सबसे ऊँची मंज़िल पर, अगस्त्य मल्होत्रा अपने अँधेरे केबिन में अकेला बैठा था। सामने एक अछूती थाली, फिर से राख जैसी बेस्वाद, क्योंकि जिस हाथ का खाना उसे लगता था, वो हाथ उसने ख़ुद अपनी बर्फ़ से दूर कर दिया था।
और तभी वीर ओबेरॉय बिना दस्तक दिए वो दरवाज़ा धकेलता हुआ अंदर आया, साँस फूली हुई, चेहरा उतरा हुआ। बारह साल की दोस्ती में वीर ने अगस्त्य को कभी उस तरह नहीं पुकारा था, जिस तरह उसने आज पुकारा।
"अगस्त्य, सब छोड़ और मेरी बात सुन। राणा ने मर्जर की मीटिंग इसी हफ़्ते खिसका दी है, तेरे दस्तख़त की जगह तक नहीं छोड़ी। वो पूरा हिमराज तेरे हाथ से निकाल रहा है। तेरे कमज़ोर पड़ने का इंतज़ार था, और तूने वो मौक़ा उसे दे दिया।"
"ले जाने दे, वीर। हिमराज, ट्रस्ट, कुर्सी, जो चाहिए ले जाने दे उसे। बारह साल से मैं जिस साम्राज्य पर बैठा हूँ, उसकी हर ईंट के नीचे एक झूठ दफ़्न है। ऐसी बादशाहत का मैं करूँगा भी क्या।"
"बात सिर्फ़ हिमराज की नहीं है, अगस्त्य। राणा ने आज रात अपना एक आदमी त्रिलोकपुरी भेजा है। उसी लड़की के घर, जहाँ एक बीमार बुढ़िया और एक छोटा बच्चा है। निर्मला वर्मा के छोड़े काग़ज़ उठाने... और उस घर को 'समझाने'।"
और 'त्रिलोकपुरी' का वो एक लफ़्ज़ वो कर गया, जो बारह साल की किसी बोर्ड मीटिंग ने नहीं किया था। बर्फ़ का बादशाह अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, और पहली बार उसकी उन सर्द आँखों में राख नहीं, आग थी।
"निर्मला वर्मा के घर... एक बुढ़िया और एक बच्चा। वीर, तुझे पता है वो घर किसका है। और मुझे पता है उस रात असल में हुआ क्या था। जिस औरत को उन्होंने बारह साल पहले एक झूठे इल्ज़ाम में कुचला, आज उसी की बेटी के दरवाज़े पर उन्होंने वही मशीन दोबारा भेज दी है।"
"तो अब क्या? मर्जर की मीटिंग कल सुबह है, अगस्त्य। अगर तू आज रात राणा से नहीं लड़ा, तो सुबह तक हिमराज उसका हो जाएगा। तेरी सारी ताक़त, तेरा नाम, सब उसके हाथ चला जाएगा।"
"जाने दे। बारह साल से मैं इसी ताक़त के पीछे छुपता रहा, ये सोच कर कि किसी दिन इसी से राणा से बदला लूँगा। पर आज समझ आया, वीर, कि बदले के चक्कर में मैं ख़ुद वही होता जा रहा था, जो वो है। मुझे बदला नहीं चाहिए। मुझे बस वो घर बचाना है, और उस औरत का नाम साफ़ करना है, जो..." "...जो बेगुनाह थी। बस इतना।"
"गाड़ी नीचे तैयार है, तू जा। बोर्ड और राणा को मैं यहाँ सँभालता हूँ। और अगस्त्य... जिस लड़की के लिए तू आज अपना पूरा साम्राज्य छोड़ कर जा रहा है, किसी दिन उसे ये भी बता देना।"
पर अगस्त्य तब तक जा चुका था, बारह साल में पहली बार किसी थाली के लिए नहीं, किसी जान के लिए। उस तंग गली की तरफ़, जहाँ उस जैसी गाड़ियाँ कभी नहीं पहुँचती थीं, आज दो पहुँच रही थीं। एक मिटाने, एक बचाने।
उधर त्रिलोकपुरी के उस कमरे में वो भारी हाथ महिका की कलाई पर कस चुका था, और वो पूरी ताक़त से ख़ुद को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी। नन्हा चिंटू उस पहाड़ जैसे आदमी की पीठ पर अपनी छोटी मुट्ठियाँ मार रहा था, और नानी खाट से उतरने की कोशिश में ज़मीन पर आ गिरी थीं।
"छोड़ मुझे! ले जा तोड़ के मेरी कलाई, पर ये डायरी छोड़ कर ही जाएगा तू! चिंटू, नानी को सँभाल... और इस दरिंदे को छोड़!"
और ठीक उसी पल, उस गली में एक और गाड़ी की हेडलाइटें भक से फट पड़ीं, और टायरों की तेज़ चीख़ गूँज गई। गाड़ी के रुकने से पहले ही उसका दरवाज़ा खुला, और एक लंबा साया, बदहवास, उस टूटे दरवाज़े की तरफ़ लपका।
"छोड़ो उसे! अपना हाथ हटाओ उस लड़की से, अभी!"
उस झूलते बल्ब की रौशनी में महिका ने जो चेहरा देखा, उसे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हुआ। बर्फ़ का बादशाह, अगस्त्य मल्होत्रा, अपने महँगे सूट में उसकी टूटी दहलीज़ पर खड़ा था, हाँफता हुआ, और उसकी आँखों में वो सर्दी नहीं थी जो वो जानती थी।
उस ख़ामोश आदमी ने महिका की कलाई छोड़ी और नए दुश्मन की तरफ़ मुड़ा। वो नाज़ुक बादशाह, जिसने कभी किसी पर हाथ नहीं उठाया था, अँधेरों के उस आदमी से भिड़ गया। एक भारी घूँसा अगस्त्य के होंठ पर पड़ा, ख़ून की लकीर ठोड़ी तक बह आई, पर उसने उसे धक्का दे कर दरवाज़े से पीछे कर दिया।
"तुम्हें दिग्विजय राणा ने भेजा है, मैं जानता हूँ। और मैं उसका वही बेटा हूँ, जिसके नाम पर तुम ये सब कर रहे हो। अब मेरा हुक्म सुनो, इस घर से निकल जाओ, अभी, इसी वक़्त। और राणा से कहना, कि आज से उसका ये खेल अगस्त्य मल्होत्रा के ख़िलाफ़ है।"
राणा का नाम, राणा के ही आदमी के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हुआ, और वो काम कर गया। तनख़्वाह का आदमी अपने मालिक के बेटे से नहीं भिड़ता। उस बेचेहरा आदमी ने एक पल अगस्त्य को घूरा, और फिर बिना एक लफ़्ज़ कहे रात के अँधेरे में घुल गया। बाहर वो काली गाड़ी गली से निकल गई।
और फिर कमरे में सिर्फ़ साँसों की आवाज़ बची, और उस झूलते बल्ब की डगमगाती रौशनी। चिंटू नानी को सँभालने लगा, और महिका दीवार से लगी खड़ी रही, माँ की डायरी सीने से चिपकाए, नज़रें उस आदमी पर जमाए, जिसकी वो कभी उम्मीद तक नहीं कर सकती थी।
"आप... आप यहाँ क्या कर रहे हैं, अगस्त्य जी? आपको किसने बुलाया? आप उसी राणा के बेटे हैं, जिसने ये आदमी भेजा। मैं आपके किसी अहसान के नीचे नहीं दबूँगी।"
"मुझे किसी ने नहीं बुलाया, महिका। मैं ख़ुद आया। और तुम ठीक कहती हो, मैं उसी राणा का बेटा था। था। आज रात मैंने वो बेटा होना छोड़ दिया।"
"छोड़ दिया, मतलब? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, और समझना भी नहीं है। मैं आपकी दवाई नहीं हूँ, अगस्त्य जी। न आपका हथियार, न आपका पछतावा। जो कुछ हम दोनों के बीच था, वो उसी दिन ख़त्म हो गया, जिस दिन पता चला कि आप हफ़्तों से जानते थे कि मैं किसकी बेटी हूँ, और फिर भी चुप रहे।"
"तुम्हारा हर इल्ज़ाम सच है। मैं चुप रहा, और इसकी सज़ा भुगतूँगा। पर आज मैं तुम्हारी दवाई माँगने नहीं आया, महिका। आज मैंने हिमराज छोड़ दिया, संजना से रिश्ता तोड़ दिया। जिस आदमी को बारह साल 'पापा' कहता रहा, आज उसे भी छोड़ दिया। और ये सब मैंने तुम्हें पाने के लिए नहीं किया।"
"तो... तो फिर किसके लिए किया? एक कैंटीन वाली के लिए एक आदमी अपना पूरा साम्राज्य क्यों छोड़ देगा? क्या मिलेगा आपको इस सब से, अगस्त्य जी? सच बताइए।"
और ख़ून से सने होंठ लिए, बर्फ़ का बादशाह उस एक सच की कगार पर आ खड़ा हुआ, जो उसने आज तक किसी को नहीं बताया था। बारह साल का दफ़्न राज़ उसके गले तक चढ़ आया, वो राज़ जो उस मरहूम नर्स को, अस्पताल के गलियारे को, और एक मरे हुए परिवार को एक ही रात से बाँधता था। और हम, जो सब जानते थे, साँस रोके खड़े रहे।
"क्या मिलेगा... तुम पूछती हो मुझे इस सब से क्या मिलेगा। महिका, जिस काली रात ने तुम्हारी माँ की दुनिया उजाड़ी, उस रात का आधा सच सिर्फ़ उस डायरी में नहीं है। उसका बाक़ी आधा... यहाँ दफ़्न है। मेरे इसी सीने में। बारह साल से।"
"आपके सीने में? आपका... मेरी माँ की उस रात से आख़िर क्या रिश्ता है, अगस्त्य जी?"
"वो मैं तुम्हें आज नहीं बता सकता। आज बस इतना जान लो, कि जिस लड़की को बचाने मैं अपना सब छोड़ कर यहाँ आया हूँ, उसका मुझ पर एक ऐसा हक़ है, जो वो ख़ुद नहीं जानती। और वो पूरा सच मैं तुम्हें बहुत जल्द बताऊँगा। वो सच, जो तुम्हारी माँ मरते दम तक तुमसे नहीं कह पाईं।"
और महिका अपने टूटे घर की दहलीज़ पर पत्थर की तरह जम गई, माँ की डायरी सीने से लगाए, और सामने वो आदमी, ख़ून से सना, एक अनकहे सच से भरा हुआ। बारह साल पुरानी वो रात अब उन दोनों के बीच सिर्फ़ एक साँस की दूरी पर टँगी थी। पर आज वो सच गिरा नहीं, वो वहीं हवा में, अगली सुबह के इंतज़ार में काँपता रह गया।
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