दस साल से राजवंश ख़ानदान का हर बड़ा फ़ैसला एक ही हाथ से होता आया है, बड़ी बहू चर्वी के हाथ से, पर तालियाँ हमेशा बटोरता आया है छोटा, चमकीला देवर कुनाल। चर्वी चुपचाप घर भी सँभालती है और डूबते कारोबार को भी, बिना नाम, बिना पहचान, बिना शुक्रिया। उसका अपना ब्याह बरसों से एक सर्द रिश्ता बन चुका है, जहाँ पति रणबीर और वो एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रहते हैं, और बीच में सिर्फ़ उनकी नन्ही बेटी मिष्टी की हँसी बची है। फिर एक रात मुखिया बाऊजी की मौत हो जाती है, और उनकी वसीयत वो सच खोल देती है जिसे ख़ानदान दस साल से देखना नहीं चाहता था, कि इस पूरे साम्राज्य को असल में चलाया किसने है। रातों-रात वही घर, वही सास, वही देवरानियाँ चर्वी के ख़िलाफ़ खड़े हो जाते हैं। सास-बहू की जंग, बोर्डरूम की साज़िशें, ननदों और देवरानियों का पाला बदलना, और उस टूटे ब्याह की धीमी वापसी, जहाँ रणबीर को आख़िरकार चुनना है कि वो अपने ख़ानदान के साथ है या अपनी पत्नी के। जिसे सब पैरों तले की धूल समझते रहे, आज उसी के हाथ में पूरे राजवंश की डोर है। और सबसे गहरा ज़ख़्म वो राज़ है जो दस साल पहले इसी घर ने दफ़ना दिया था।
विषय-सूची
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लखनऊ की राजवंश हवेली में पचास साल का जश्न है, और पूरा शहर छोटे देवर कुनाल को ख़ानदान बचाने का सेहरा पहना रहा है, जबकि असल में हर सौदा बड़ी बहू चर्वी ने चुपचाप बंद किया है। सास इंदुमती उसे नौकरानी की तरह हुक्म देती है, पति रणबीर से रिश्ता दस साल पुरानी बर्फ़ है, और बीच में सिर्फ़ नन्ही मिष्टी की हँसी बची है। उसी रात बूढ़े बाऊजी चल बसते हैं, और वसीयत के पढ़े जाने पर, कुनाल का ताज पक्का मान बैठे परिवार के सामने, वकील सेठी वो नाम पढ़ते हैं जो किसी ने सोचा भी नहीं था, चर्वी।
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वसीयत में चर्वी का नाम पढ़े जाते ही घर उबल पड़ता है, और इंदुमती उसे एक बीमार, बहके हुए बूढ़े की बड़बड़ाहट कह कर ठुकरा देती है। रामदुलारी की वफ़ादारी और किरती की मीठी साज़िश के बीच चर्वी उस कारोबार का हिसाब लगाती है जो सबकी सोच से कहीं ज़्यादा बीमार है, और आख़िर में इंदुमती पूरे ख़ानदान के सामने उसे सात दिन का अल्टीमेटम दे देती है, कि कुर्सी वापस कुनाल के नाम कर दे, वरना।
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इंदुमती के अल्टीमेटम के बीच चर्वी दस्तख़त करने से इनकार कर देती है और पहली बार खुल कर राजवंश ग्रुप के बोर्डरूम में चेयरपर्सन बन कर दाख़िल होती है, जहाँ सालों से उसके फ़ैसलों पर चलते डायरेक्टर और ख़ुद रणबीर पहली बार उस दिमाग़ का चेहरा देखते हैं। सेठी उसका पहला साथी बन कर आगाह करता है कि परिवार अब उसे हटाने के लिए ई.जी.एम. बुलाएगा, और गलियारे में रणबीर उसे रोक कर दस साल में पहली सच्ची बात पूछ बैठता है।
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बाऊजी की शांति के पाठ की सुबह इंदुमती भरे आँगन में चर्वी से घर की चाबियाँ छीन कर किरती को सौंप देती है, रामदुलारी को उसका साथ देने की सज़ा देती है, और पूरी बिरादरी के सामने बड़ी बहू को शरबत की ट्रे थमा कर, उसके सबसे गहरे ज़ख़्म पर एक ढका-छुपा तंज़ कस कर ज़लील करती है। तमाशे के आख़िर में कुनाल की तरफ़दारी करती त्रिशा अनजाने में वो बात कह जाती है जिससे चर्वी को पता चलता है कि उसकी आठ साल पुरानी निजी सहायक सुधा हफ़्तों पहले से, बाऊजी के जीते-जी ही, उसकी हर फ़ाइल कुनाल तक पहुँचाती आई है।
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अपना दफ़्तर बिका हुआ जान कर चर्वी सुधा को हटाने के बजाय उसे चारे की तरह इस्तेमाल करती है और कुनाल को जीतता हुआ मान कर चुपचाप उसके पैसों के पीछे चल पड़ती है, क्योंकि डूबता आदमी हमेशा कुछ ऐसा बेच बैठता है जो उसे कभी नहीं बेचना चाहिए। सेठी की क़ाबिलियत और रामदुलारी की रसोई से मिली एक भनक चर्वी को उस सच तक ले जाती है, कि कुनाल ने बाऊजी का बनाया फ़्लैगशिप ब्रांड चुपके से उनके सबसे पुराने दुश्मन सूर्यवंशी ग्रुप को बेचने के लिए दरवाज़ा खोल दिया है।
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ई.जी.एम. में पूरा ख़ानदान चर्वी को कुर्सी से उतारने आता है, पर गिड़गिड़ाने के बजाय वो पहली बार खुली जंग की चाल चलती है, कुनाल का पूरा फ़रेब खोले बिना सिर्फ़ इतना ज़ाहिर कर देती है कि राजवंश का ताज, बाऊजी का फ़्लैगशिप ब्रांड, चुपके से सूर्यवंशी को बेचा जा रहा है, और तटस्थ डायरेक्टरों को सहमा कर वोट अधर में लटका देती है। पहली बार इंदुमती उसमें नौकरानी नहीं रणनीतिकार देखती है, पर काग़ज़ से हार कर वो अब दस साल पुरानी अस्पताल की फ़ाइल मँगवा लेती है, ये ठान कर कि जिस बहू ने बोर्डरूम जीता, उसे उसी रात के ज़ख़्म से, अपने पति की नज़रों में क़ातिल साबित कर के तोड़ेगी।
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बोर्ड में हार कर इंदुमती जंग को घर के भीतर ले आती है और बड़ी बहू को चोर कहलवाना शुरू कर देती है, यहाँ तक कि आठ साल की मिष्टी भी माँ से पूछ बैठती है कि क्या वो सच में चोर है और उस बंद कमरे का राज़ क्या है। कुनाल पर से त्रिशा का यक़ीन पहली बार डगमगाता है, और तभी संवेदना का बहाना बना कर सूर्यवंशी का चिकना आदमी हवेली के फाटक पर आ खड़ा होता है, ये जताता हुआ कि दुश्मन के लिए दरवाज़ा घर के भीतर से ही खुल चुका है।
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कुनाल के कमज़ोर पड़ते ही मँझली बहू किरती अपनी चाल चलती है, और अपने सीधे-सादे पति शेखर को घर का बीच का वारिस बनाने के लिए इंदुमती और बिरादरी को अपने पाले में करने लगती है, जिससे दो पालों की जंग तीन हो जाती है। चर्वी को बोर्ड में एक ईमानदार वोट चाहिए, इसलिए वो शेखर को परखती है, जो एक पल के लिए सच के साथ उसके साथ खड़ा होने का वादा कर देता है, पर उसी रात किरती के दबाव में अपना प्रॉक्सी चर्वी के बजाय इंदुमती के नाम कर देता है, और चर्वी को इस दग़ा की ख़बर सिर्फ़ मेज़ पर आई एक ठंडी वोट-गिनती से मिलती है।
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शेखर की दग़ा की ठंडी गिनती के बाद जंग बोर्डरूम से निकल कर हवेली की सीढ़ियाँ चढ़ जाती है, और दादी की बातों से डरी हुई नन्ही मिष्टी अपनी ज़िद से, बरसों बाद, अपने माँ-बाप को एक ही कमरे में ले आती है। उसी रात चर्वी और रणबीर की दस साल में पहली सच्ची बात होती है, जहाँ उस खोए हुए बेटे का ग़म किनारों पर उभर आता है और दोनों उस एक रात की अपनी-अपनी अलग कहानी थामे रह जाते हैं, जबकि अपनी माँ की खुली बेरहमी और चर्वी की बरसों की ख़ामोश सफ़ाई देख कर रणबीर के यक़ीन में पहली दरार पड़ती है। आख़िर में सोई हुई मिष्टी के सिरहाने रणबीर पिघल कर वो बात कहने ही वाला होता है जो शायद इस टूटे घर को जोड़ देती, तभी दरवाज़े
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ई.जी.एम. के दूसरे दौर की दौड़ में चर्वी और सेठी टाउनशिप के असली खातों में उतरते हैं और पाते हैं कि कुनाल का छेद कितना गहरा है, और ये कि बैंकों को चुप रखने के लिए वो महीनों से बाऊजी के दस्तख़त बना रहा है, यानी एक ही काग़ज़ में कुनाल को हमेशा के लिए ख़त्म करने का ज़हर है। पर चर्वी जानती है कि ये हथियार अभी चलाया तो फ़्लैगशिप ढह कर सीधे सूर्यवंशी के खुले डेटा-रूम में जा गिरेगा, इसलिए वो फंदा हाथ में लिए मुस्कुराती रहती है और कुनाल को जीतने का सपना देखने देती है। आख़िर में उसी जालसाज़ी वाली फ़ाइल की जिल्द के पीछे चिपका, दस साल पुराना एक ऐसा काग़ज़ निकलता है जो चर्वी ने कभी नहीं देखा था, वो मूल गार
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ई.जी.एम. के दूसरे दौर में कुनाल चर्वी को ललकारता है कि गड़बड़ी है तो भरे बोर्ड में साबित करे, और चर्वी फ़्लैगशिप को अलग दीवार के पीछे कर के, बिना उस दस साल पुराने काग़ज़ को छुए, सूर्यवंशी वाला गुप्त सौदा और बाऊजी के जाली दस्तख़त मेज़ पर रख देती है, जिससे चमकते देवर का उधार का ताज सबके सामने ढह जाता है और मोशन बिना एक वोट डले मर जाता है। ठीक उसी जीत की देहलीज़ पर इंदुमती काग़ज़ की जंग छोड़ कर वो दस साल पुरानी अस्पताल की फ़ाइल निकालती है और रणबीर के मुँह पर ऐलान कर देती है कि उसकी पत्नी की महत्वाकांक्षा ने ही उस रात उनके पहले बेटे, राजवंश के वारिस, को मार डाला था, और बड़ी बहू की सबसे बड़ी जीत उस
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बोर्डरूम की जीत के फ़ौरन बाद रणबीर बिखर कर चर्वी से भिड़ जाता है, और चर्वी पहली बार दस साल की चुप्पी तोड़ कर पलट कर जवाब देती है, यहाँ तक कि रणबीर को ख़ुद अपनी माँ के हिसाब में झोल दिखने लगते हैं। आख़िर में टूटा हुआ रणबीर चर्वी से सीधा सवाल पूछ बैठता है कि सच क्या है, और चर्वी सिर्फ़ इतना कहती है कि अपनी माँ से पूछो उसने उस रात क्या दस्तख़त किया था।
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रणबीर की एक लाइन इंदुमती तक पहुँचती है, और सुबह-सुबह रामदुलारी उसकी दरार देखने वाली पहली गवाह बन जाती है, जबकि चर्वी उसी रामदुलारी से उस रात की परतदार, अधूरी याद निकलवाती है। आख़िर में चर्वी ख़ुद को दस साल से बंद उस नर्सरी के दरवाज़े के सामने खड़ा पाती है, जहाँ बाऊजी का दिया डिक्टाफ़ोन उसका इंतज़ार कर रहा था, और उसकी आवाज़ अँधेरे में गूँज उठती है।
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बाऊजी की अधूरी आवाज़ अभी थमी ही थी कि मिष्टी के तेज़ बुख़ार ने चर्वी और रणबीर को एक ही रात में एक ही कमरे में ला खड़ा किया, और सुबह होते-होते रणबीर पहली बार अपने ग़म की पूरी ज़िम्मेदारी ख़ुद ले लेता है। रात के आख़िर में चर्वी उसे बाऊजी के टेप के बारे में बताती है, और अपने पति का हाथ थामे उसी बंद नर्सरी की तरफ़ बढ़ जाती है, दस साल में पहली बार सच को अकेले नहीं ढोने का फ़ैसला ले कर।
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चर्वी और रणबीर आख़िरकार उस बंद नर्सरी में एक साथ खड़े होते हैं, पर ठीक उसी पल एक रात का फ़ोन सारा माहौल बदल देता है, बैंक क़र्ज़ वापस माँगने वाला है और सूर्यवंशी वालों ने सौदे की अफ़वाह हवा दी है, और चर्वी को अपने पति के साथ के उस अधूरे पल को पीछे छोड़ कर मज़दूरों और कारोबार को बचाने दौड़ना पड़ता है। सुबह होते-होते उसे पता चलता है कि वो फ़ोन घर के भीतर से ही गया था, और जब वो इंदुमती का सामना करती है, सास मुखौटा पूरी तरह उतार कर धमकी देती है कि रिकॉर्डिंग बजाने से भी इस घर का यक़ीन उसकी तरफ़ नहीं जाएगा।
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रणबीर ख़ुद अपने हाथ से बाऊजी की रिकॉर्डिंग बजाता है, और बूढ़े की आवाज़ दफ़न सच का पहला हिस्सा खोल देती है, कि दस साल पहले कारोबार चर्वी ने बचाया था और सारा इल्ज़ाम बाऊजी के कहने पर अपने सिर ले लिया था, यानी रणबीर का दस साल का ग़म उसकी माँ के झूठ पर टिका था, और वो पहली बार इंदुमती से भिड़ जाता है। पर घिरी हुई सास ख़ुद को बचाने के लिए सच को दो टुकड़ों में बाँट देती है, कारोबार वाला आधा सच क़ुबूल कर के, पर बेटे की मौत का इल्ज़ाम अब भी चर्वी पर डाल कर, और उसे साबित करने उस रात की एक ख़रीदी हुई बूढ़ी नर्स को गवाह बना कर हवेली बुला लेती है।
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बूढ़ी सिस्टर का रटा हुआ जुमला, कि चर्वी ने उस रात बच्चे से पहले कारोबार चुना, रणबीर का यक़ीन एक बार फिर तोड़ देता है, जबकि चर्वी को उस रटे हुए वाक्य में ही एक झोल दिखता है। चुपचाप धागे जोड़ते हुए वो सिस्टर को किरती के भाई के नर्सिंग होम और वहाँ की एक हाल की मोटी रक़म तक ले जाती है, और किरती का सामना करने पर मँझली बहू मुस्कुराते हुए अपना हाथ मान लेती है, आख़िर में धमकी देती है कि चर्वी ने अगर उस पुरानी रात में खोदना जारी रखा, तो अगली बार जो निकलेगा, वो मिष्टी के इस घर में रहने के हक़ पर ही सवाल खड़ा कर देगा।
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किरती की धमकी को दिल में दबा कर चर्वी अगली सुबह फिर बोर्डरूम की जंग की तरफ़ मुड़ जाती है, जबकि कुनाल, हर तरफ़ से घिरा और बरबाद, आख़िरकार सूर्यवंशी ग्रुप के साथ पूरी तरह जा मिलता है। शेखर, अपनी बीवी की चालों से घिन खाता हुआ, चर्वी की तरफ़ एक क़दम झुकता है, बिना अभी पूरी तरह पाला बदले। ई.जी.एम. के दूसरे दौर की पूर्वसंध्या पर सेठी उम्मीद भरा वोटों का हिसाब लिए आता है, और ठीक उसी वक़्त एक फ़ोन सब पलट देता है, कि जिन प्रॉक्सी वोटों पर चर्वी टिकी थी, वो कुनाल के ज़रिए चुपचाप सूर्यवंशी ने ख़रीद लिए हैं, और फ़्लैगशिप का सौदा भोर होते-होते पास होने लायक़ वोट जुटा चुका है।
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वोटों और साथियों से महरूम चर्वी उन्हें गिनने लगती है जिन्हें इस घर के मर्दों ने कभी वोट के लायक़ नहीं समझा, यानी घर की औरतों को; त्रिशा पूरी तरह उसके साथ आ जाती है और सेठी वसीयत की एक भूली शर्त और चर्वी के नाम दर्ज दुगने-वोट वाले शेयर खोज निकालता है। इंदुमती पर पकड़ ढूँढ़ते हुए चर्वी और सेठी पाते हैं कि दस साल पुरानी गारंटी पर कुनाल के जाली दस्तख़त के नीचे का दूसरा हाथ ख़ुद इंदुमती का है, कि मूल घोटाला उसी ने अपने डूबते मायके के लिए रचा था।
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चर्वी के हाथ में अब इंदुमती को बेनक़ाब करने का हथियार है, पर इस्तेमाल का मतलब पूरे ख़ानदान को जलते देखना है; वो मिष्टी को नानी के घर भेज देती है जबकि रणबीर बिकाऊ नर्स की गवाही तोड़ता है। रात को रणबीर दस साल देर से माफ़ी माँगने दौड़ा आता है, पर उससे पहले ख़बर आती है कि इंदुमती और कुनाल ने आज ही रात फ़्लैगशिप का सौदा पास करवाने के लिए इमरजेंसी बोर्ड बैठक बुला ली है।
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फ़्लैगशिप के सौदे वाली रात चर्वी बोर्ड में पूरा फंदा खोल देती है, कुनाल के जाली दस्तख़त, सूर्यवंशी वाला गुप्त सौदा, और आख़िर में वो दस साल पुराना काग़ज़ जो इंदुमती को मूल घोटाले का असली गुनहगार साबित करता है, जिससे सौदा ढह जाता है और असली मालकिन बेनक़ाब हो जाती है। कारोबार और मुखौटा गँवा कर घिरी हुई इंदुमती आख़िरी ज़ख़्म की तरफ़ मुड़ती है और भरे बोर्ड में रणबीर के मुँह पर क़ुबूल कर लेती है कि उस रात पेट से चर्वी को तूफ़ान में फाटक के बाहर उसी ने धकेला था।
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इंदुमती के क़ुबूलनामे के फ़ौरन बाद टूटा हुआ रणबीर माफ़ी माँगने चर्वी के पीछे हवेली की छत तक चला आता है, पर आज़ाद हो चुकी चर्वी को वो इतनी आसानी से वापस नहीं मिलता। आख़िर में जब रणबीर कहता है कि वो अब उस पर यक़ीन करता है, चर्वी सिर्फ़ इतना पूछती है, जिसने माँ को बिना सबूत माना, वो सबूत के साथ ही उसे मानता है, तो इस शादी में अजनबी असल में कौन है।
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सेठी ख़बर लाते हैं कि सूर्यवंशी के वकीलों ने कल रात खुले सच को ही हथियार बना कर बाऊजी की वसीयत को अदालत में चुनौती दे दी है, और बरबाद कुनाल ख़ुद चर्वी के पास आ कर क़ुबूल करता है कि याचिका का आधा सबूत उसी का दिया हुआ है। शाम ढलते ही राजवंश हाउस के फाटक पर ख़ुद रणविजय सूर्यवंशी आ खड़े होते हैं, धमकी के लहजे में नहीं, बल्कि एक ऐसी नरम मुस्कान के साथ जो किसी भी चीख़ से ज़्यादा ख़तरनाक लगती है।
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रणविजय सूर्यवंशी हवेली की बैठक में पूरा राजवंश ग्रुप 'इज़्ज़त के साथ' ख़रीदने का वो सौदा रखता है जो किसी भी धमकी से ज़्यादा ख़तरनाक है, और पहली बार पूरा घर, टूटी हुई इंदुमती समेत, बड़ी बहू के फ़ैसले का इंतज़ार करता है, जबकि रणबीर खुले आम पत्नी के बग़ल में खड़ा होता है। चर्वी सौदा ठुकरा कर अपनी शर्तों पर लड़ने का ऐलान करती है, और अकेले में सेठी से कह देती है कि ये जंग जीतने के बाद वो मिष्टी को ले कर ये घर छोड़ देगी।
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अपने ही खाते में झूठी गवाह की क़ीमत का लेन-देन पा कर शेखर किरती से पूरी तरह टूट जाता है और भरे आँगन में अपना वोट और अपनी आवाज़ बड़ी भाभी के हवाले कर देता है, जबकि झूठी गवाह की रचयिता के रूप में बेनक़ाब किरती पहली बार रिश्तेदारों के बीच अकेली पड़ जाती है। किरती के ढहने से मिला गोमती फ़ाइनेंस का धागा पकड़ कर चर्वी, शेखर और सेठी वो सच खोज निकालते हैं कि सूर्यवंशी का 'मेहरबान सौदा' उसी दफ़न पैसे से खड़ा है जिसने दस साल पहले सब कुछ शुरू किया था।
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सुनवाई वाली सुबह चर्वी बोर्डरूम में असली मुखिया की तरह पूरी कड़ी खोल देती है, कि सूर्यवंशी का 'मेहरबान सौदा' दरअसल इसी घर के दस साल पहले चुराए पैसे से खड़ा है, जिससे सौदा और वसीयत की याचिका दोनों मर जाते हैं, रणबीर खुल कर उसके साथ खड़ा होता है और कुनाल पहली बार सच क़ुबूल कर के कुर्सी छोड़ देता है। पर जीत की देहरी पर सेठी गोमती फ़ाइनेंस की बुनियाद वाला पन्ना उसके हाथ में रखता है, जिस पर सूर्यवंशी नहीं, बल्कि एक ऐसा नाम दर्ज है जिसे पूरा शहर देवता मानता है।
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साम्राज्य बच जाने के बाद जंग हवेली लौटती है, भरी मेज़ पर, जहाँ थकी और गहनों-विहीन इंदुमती पहली बार उस बहू का सामना करती है जिसे उसने दस साल तोड़ने की कोशिश की। मिष्टी दोनों औरतों को एक ही कमरे में खींच लाती है, इंदुमती माफ़ी का पहला शब्द बोलने की कोशिश करती है, पर गला बंद हो जाता है, और चर्वी बिना कुछ कहे पलट जाती है।
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इंदुमती की अधूरी माफ़ी के अगले दिन, रणबीर चर्वी को भूलने के लिए नहीं कहता, बल्कि उसे छोटे-छोटे, बिना दिखावे वाले तरीक़ों से कमाना शुरू करता है, वो बेटी जिसे उसने आधा-अधूरा जाना, और वो पत्नी जिसे उसने कभी ठीक से देखा ही नहीं। रात में, दीवार के उस पार से वही लोरी आती है जिसकी वजह से ये शादी टूटी थी, और इस बार रणबीर पलटता नहीं, दस्तक देता है।
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रणबीर की दस्तक दस साल से बंद दरवाज़ा खोलती है, और पहली बार चर्वी और रणबीर अपने खोए बेटे विहान का ग़म एक साथ रोते हैं। पूरे शहर के सामने रणबीर परिवार की इज़्ज़त बचाने का दबाव ठुकरा कर सच बोलता है, और चर्वी पर्दे के पीछे से नहीं, सबके सामने राजवंश की मालकिन बन कर कुर्सी संभालती है। आख़िर में चर्वी अपना छुपा फ़ैसला रणबीर पर खोल कर, अपना जवाब कल सुबह तक सीने में बंद कर के चली जाती है।
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भोर में चर्वी अपना जवाब लाती है, कि वो पुराना क़ैदख़ाना घर सच में छोड़ चुकी है और नए घर में रुक रही है सिर्फ़ इसलिए कि ग्यारह साल में पहली बार वो ख़ुद रुकना चाहती है, और रणबीर से बराबरी का ब्याह माँगने को कहती है। रामदुलारी को उस रात का बोझ उतार कर मेज़ पर जगह मिलती है, कुनाल पहली ईमानदार कमाई की चिट्ठी भेजता है, इंदुमती चाबियाँ लौटा कर गहने विहान ट्रस्ट के नाम करती है, आँगन में विहान का अमलतास लगता है, और लोरी पहली बार पूरे घर में गूँजती है।