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Chapter 3 of 12

रसोई से बोर्डरूम

बड़ी बहू by Avni Oberoi

सूरज अभी उगा भी नहीं था, और हवेली की ऊपरी मंज़िल के एक कमरे में एक अकेली बत्ती जल रही थी। इंदुमती के दिए सात दिन अभी पूरे नहीं हुए थे। पर उस कमरे में, फ़ाइलों के एक ढेर के पीछे बैठी चर्वी अपना फ़ैसला कर चुकी थी।

उसके सामने मेज़ पर वो सारे काग़ज़ बिखरे थे जिन्हें इस घर का कोई नहीं जानता था। बैंक की किश्तें, टाउनशिप का डूबता क़र्ज़, और उन चार हज़ार मज़दूरों के नाम, जिनके घर का चूल्हा इसी राजवंश ग्रुप से जलता था।

"अगर मैंने ये कुर्सी कुनाल के नाम कर दी..." ... "...तो ये ग्रुप छह महीने में डूब जाएगा। और इसके साथ चार हज़ार परिवार भी।"

ये ग़ुरूर की बात नहीं थी। चर्वी को कुर्सी का कोई शौक़ नहीं था। ये बस हिसाब था, वो हिसाब जो इस पूरे घर में सिर्फ़ वो जोड़ सकती थी। कुनाल के हाथ में ये कारोबार एक जलती हुई माचिस से ज़्यादा कुछ नहीं था।

उसने फ़ोन उठाया और एक नंबर मिलाया जो इस घर में सिर्फ़ उसके पास था। दूसरी तरफ़, वकील सेठी। नींद से भारी, पर पहली घंटी पर ही चौकन्ना।

"चर्वी जी। ... सुबह के पाँच बजे हैं। इस वक़्त फ़ोन का मतलब या तो कोई मर गया है, या किसी ने कोई बड़ा फ़ैसला कर लिया है। ... और इस घर में मरने वाले तो अभी हाल में बीत चुके।"

"मैं दस्तख़त नहीं करूँगी, सेठी जी। ... कुर्सी वापस कुनाल के नाम नहीं करूँगी।"

"... बाऊजी जानते थे। इसीलिए उन्होंने ये बोझ आपके कंधों पर रखा, इस घर के किसी और के नहीं।" ... "पर आप जानती हैं इसका मतलब क्या है, चर्वी जी? दस साल आपने परदे के पीछे से ये कारोबार चलाया। अब आपको सामने आना पड़ेगा। सबके सामने। खुल कर।"

"इसीलिए तो फ़ोन किया है। ... आज बोर्ड की बैठक है न? ठीक दस बजे?" ... "मैं आ रही हूँ, सेठी जी। बड़ी बहू की तरह नहीं। इस ग्रुप की चेयरपर्सन की तरह।"

"दस साल से वो कमरा आपके भेजे हुए फ़ैसलों पर चलता आया है, और आज तक उसने आपका चेहरा नहीं देखा। ... आज उन सब बूढ़े शेरों के होश ठिकाने लगेंगे। मैं दरवाज़े पर आपका इंतज़ार करूँगा।"

फ़ोन रखते ही चर्वी उठी। जाने से पहले वो एक पल मिष्टी के कमरे में रुकी, अपनी सोती हुई बेटी का माथा चूमा। इस बर्फ़ जैसे घर में वो इकलौती गर्माहट, जिसके लिए ये सारी लड़ाई थी।

कमरे से निकलते हुए, गलियारे के अंधेरे कोने में वो बंद दरवाज़ा एक पल को उसकी नज़र में आया, जिसका ताला दस साल से नहीं खुला था। ... और आज पहली बार, चर्वी ने उससे नज़र नहीं फेरी।

नीचे रसोई में चूल्हा अभी-अभी सुलगा था। रामदुलारी ने जब चर्वी को इतनी सुबह सीढ़ियाँ उतरते देखा, तो उसके हाथ से चिमटा छूटते-छूटते बचा।

"हे राम! ... बहूरानी, ये क्या पहन रखा है तूने? ये तो वो... दफ़्तर वाली साड़ी है। और बाल भी यूँ कस के बाँधे।" ... "इस मुँह-अँधेरे में कहाँ चली?"

"दफ़्तर, काकी। ... राजवंश ग्रुप के दफ़्तर।"

"अकेली? ... उस शेरों की माँद में जा रही है तू? माँजी को पता चला तो घर सिर पर उठा लेंगी।" ... "बहूरानी, सँभल के जाना। ये घर जब किसी के पीछे पड़ जाता है न, तो कुछ भी कर गुज़रता है। मैंने अपनी आँखों से देखा है। उस रात भी..."

"किस रात, काकी?"

"कुछ नहीं, कुछ नहीं। ... मेरी बुढ़िया ज़ुबान फिर बहक गई। भगवान का नाम ले कर जा।" ... "ये ले, ये दही-शक्कर मुँह में डाल के जा। पहली बार किसी इतने बड़े काम पे जा रही है मेरी बहूरानी। किसी की नज़र न लगे।"

चर्वी ने दही-शक्कर का वो कौर खा लिया और काकी का काँपता हाथ एक पल को अपने हाथ में थाम लिया। रामदुलारी उस रात के बारे में आज दूसरी बार बोलते-बोलते रुक गई थी। ... कुछ था जो वो जानती थी, और जिसका उसे दस साल बाद आज भी उतना ही डर था।


राजवंश ग्रुप का मुख्यालय शहर के बीचोंबीच शीशे की एक ऊँची इमारत थी। और उसकी सबसे ऊपरी मंज़िल पर वो बोर्डरूम, जहाँ एक लंबी, चमकती मेज़ के इर्द-गिर्द इस कारोबार के सबसे बड़े फ़ैसले लिए जाते थे।

आज उस मेज़ पर ग्रुप के सारे डायरेक्टर बैठे थे। बूढ़े, तजुर्बेकार, रौबदार चेहरे। दस साल से इन्हें हुक्म मिलते आए थे, फ़ोन पर, ईमेल पर, हमेशा कुनाल के नाम से। पर उन हुक्मों के पीछे का असली चेहरा इनमें से किसी ने कभी नहीं देखा था।

मेज़ के एक सिरे पर रणबीर बैठा था, चुप, अनमना। और दूसरे सिरे पर एक ख़ाली कुर्सी, बाऊजी की कुर्सी, जिस पर उनके जाने के बाद आज तक कोई नहीं बैठा था।

फिर दरवाज़ा खुला। और चर्वी अंदर आई। सादी नहीं, झुकी हुई नहीं। सीधी कमर, शांत क़दम, और आँखों में वो ठहराव जो सिर्फ़ उसके पास था।

एक पल को पूरे कमरे में सरगोशियाँ दौड़ गईं। किसी ने सोचा भी नहीं था कि आज उस दरवाज़े से यही औरत निकलेगी। वही चेहरा जिसे शहर ने पचास साल के जश्न में एक कोने में, हाथ में शरबत की ट्रे थामे देखा था।

"सज्जनो। ... आपके सामने खड़ी हैं चर्वी राजवंश। स्वर्गीय यशवंत राजवंश की वसीयत के अनुसार, आज से राजवंश ग्रुप की चेयरपर्सन।"

मेज़ के दूसरे सिरे से एक बुज़ुर्ग डायरेक्टर की भारी आवाज़ उभरी, रौब में लिपटी और तंज़ में डूबी। कि घर की एक बहू, जिसने ज़िंदगी में कभी बोर्डरूम की दहलीज़ नहीं लाँघी, वो इस डूबते जहाज़ की पतवार सँभालेगी?

"आपकी बात बिलकुल सही है। घर की बहू ने शायद कभी बोर्डरूम नहीं देखा।" ... "पर पिछली नौ तिमाहियों में इस ग्रुप के हर बड़े फ़ैसले पर जो दस्तख़त हुए हैं, वो चाहे किसी के भी नाम से हों... सोचे मैंने हैं, लिखवाए मैंने हैं।"

कमरे में एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई। किसी का हाथ फ़ाइल पर जमा रह गया, किसी की क़लम हवा में रुक गई।

"मिस्टर मेहरा, सिंगापुर वाली किश्त, जो पिछले महीने बाल-बाल बची, वो आपकी टीम ने नहीं, मैंने बचाई थी। रात के दो बजे।" ... "और मिस्टर देसाई, अचार-मसालों के ब्रांड का असली मुनाफ़ा इकतीस फ़ीसदी नहीं है। उन्नीस है। बाक़ी बारह फ़ीसदी हर तिमाही टाउनशिप के घाटे की खाई में गिर जाता है। ये आँकड़ा आपकी किसी रिपोर्ट में नहीं मिलेगा। ... सिर्फ़ मेरे पास है।"

मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे उन बूढ़े, तजुर्बेकार चेहरों पर धीरे-धीरे एक पहचान उतरने लगी। दस साल से जिन फ़ैसलों की तह में एक तेज़, बेरहम, सटीक दिमाग़ काम कर रहा था, वो दिमाग़ आज पहली बार उनके सामने, हाड़-माँस में खड़ा था। और वो किसी मर्द का नहीं था।

और मेज़ के सिरे पर बैठा रणबीर... रणबीर बस देखता रह गया। जिस औरत के साथ वो दस साल एक ही छत के नीचे रहा था, जिसे वो 'बस चर्वी' समझता आया था, वो इस कमरे में यूँ खड़ी थी जैसे ये पूरा कमरा उसी का बनाया हुआ हो।

एक और आवाज़ उठी, इस बार थोड़ी नरम, थोड़ी घबराई हुई। कि बैंक पहले ही हमसे नाराज़ हैं, बाज़ार का भरोसा डगमगा रहा है, और ऐसे में कुर्सी की ये लड़ाई सबको और डरा देगी। बेहतर है स्थिरता के लिए कुर्सी कुनाल के नाम रहे।

"बैंक नाराज़ है, ये सच है। इसीलिए कल रात मैंने ख़ुद अगली किश्त की तारीख़ तीस दिन आगे बढ़वा ली।" ... "आप जिस स्थिरता की बात कर रहे हैं, सज्जनो, वो कुनाल के नाम में नहीं है। वो इन तीस दिनों में है। और वो तीस दिन इस मेज़ पर बैठे किसी और ने नहीं, मैंने ख़रीदे हैं।"

जो डायरेक्टर एक घरेलू औरत का तमाशा देखने बैठे थे, वो अब आगे झुक कर सुन रहे थे। किसी ने चर्वी को टोका नहीं। अब किसी की हिम्मत नहीं हुई।

"मैं जानती हूँ आप सबके मन में सवाल हैं। ... होने भी चाहिए।" ... "पर मैं आपसे भरोसा नहीं माँग रही, सज्जनो। मैं बस आपसे कहूँगी, अगले तीस दिन इस ग्रुप के आँकड़ों पर नज़र रखिए। और फिर ख़ुद तय कीजिए कि इस कुर्सी पर बैठने के लायक़ कौन है।"

बैठक ख़त्म हुई तो कमरे की हवा बदल चुकी थी। डायरेक्टर एक-एक कर के निकले, हर कोई उस औरत को एक नई नज़र से देखता हुआ जिसे वो कल तक जानते तक नहीं थे। और रणबीर सबसे आख़िर में उठा, जैसे उसके पाँव कुर्सी से चिपक गए हों।


सेठी चर्वी को एक तरफ़, एक छोटे से कमरे में ले गए। उनके सूखे, संजीदा चेहरे पर आज एक बहुत हल्की सी मुस्कान थी।

"पैंतीस साल से मैं इस इमारत में बैठकें देख रहा हूँ, चर्वी जी। ... आज जो देखा, वो पहले कभी नहीं देखा। एक कमरे भर बूढ़े शेरों को एक औरत ने बिना आवाज़ ऊँची किए चुप करा दिया।" ... "पर अब सुनिए। असली लड़ाई तो अब शुरू होगी।"

"बोलिए, सेठी जी।"

"आज आपने कमरा जीता है, पर वोट नहीं। ... ये परिवार अब एक ई.जी.एम. बुलाएगा। असाधारण आम बैठक। पूरे बोर्ड के सामने वोट करा कर वो आपको इसी कुर्सी से हटाने की कोशिश करेंगे। और इंदुमती जी के पास अब भी बहुत से वोट हैं।"

"मेरे पास बाऊजी की सौंपी हुई हर वो फ़ाइल है जो साबित करती है कि पिछले दस साल ये ग्रुप असल में किसने चलाया। ... वक़्त आने पर वो सब बोलेंगी।" ... "पर एक बात याद रखिए, चर्वी जी। इंदुमती जी सिर्फ़ काग़ज़ और वोट से नहीं लड़ेंगी। जिस दिन उन्हें लगेगा कि वो हार रही हैं, उस दिन वो कुछ और उठाएँगी। कुछ पुराना। कुछ ऐसा जिसका आप पर आज भी ज़ोर चलता है।"

चर्वी के चेहरे पर कुछ नहीं बदला। पर सेठी नहीं जानते थे कि उन्होंने अभी-अभी किस पुराने ज़ख़्म को उँगली से छू लिया था। कुछ पुराना। कुछ ऐसा जिसका दस साल बाद भी ज़ोर चलता था। ... एक बीती हुई रात, और एक फ़ाइल, जो किसी अस्पताल की धूल में कहीं दबी पड़ी थी।

"जो उठाना चाहें उठाएँ, सेठी जी। ... मैंने दस साल इस घर से हारना सीखा है।" ... "अब जीतना सीख रही हूँ।"

"बाऊजी अक्सर कहते थे, इस घर में अक़्ल सिर्फ़ एक इंसान के पास है, और वो सबको चुपचाप चाय पिलाती रहती है। ... आज पहली बार समझ आया, वो क्या कहना चाहते थे।"


शाम ढल रही थी जब चर्वी उस शीशे की इमारत से निकली। गाड़ी तक पहुँचने से पहले, बाहर के उस लंबे, ख़ामोश गलियारे में, कोई उसका इंतज़ार कर रहा था। ... रणबीर।

लग रहा था वो बोर्डरूम से निकलने के बाद से शायद वहीं खड़ा था। उसके चेहरे पर वो उलझन थी जो चर्वी ने दस साल में उस पर कभी नहीं देखी थी।

"चर्वी। ... अंदर, उस कमरे में... जो तुमने कहा। वो सिंगापुर वाली किश्त, वो आँकड़े, टाउनशिप का वो घाटा... वो सब..." ... "दस साल... ये सब तुम थीं? ... सब कुछ?"

दस साल की चुप्पी, दस साल की अनदेखी, दस साल की वो हर अकेली रात, सब कुछ रणबीर के उस एक सवाल में सिमट आया था। ... तुम थीं? सब कुछ?

चर्वी एक पल को रुकी। उसने रणबीर की तरफ़ देखा, उस चेहरे की तरफ़ जो शायद आज पहली बार उसे सच में देख रहा था। और फिर वो बहुत हल्के से मुस्कुराई। पर उस मुस्कान में रत्ती भर गर्माहट नहीं थी।

"तुमने कभी सुना ही नहीं, रणबीर। ... अब क्यों सुनना चाहते हो?"

और चर्वी आगे बढ़ गई, अपनी गाड़ी की तरफ़, रणबीर को उसी गलियारे में अकेला छोड़ कर। उसका वो सवाल हवा में लटका रह गया, और उसका जवाब, दस साल की चुप्पी से भी ज़्यादा सर्द, रणबीर के कानों में गूँजता रहा। ... तुमने कभी सुना ही नहीं, रणबीर। अब क्यों सुनना चाहते हो?

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