DesiHub

Chapter 4 of 12

पहली बग़ावत

बड़ी बहू by Avni Oberoi

रणबीर का वो सवाल, और चर्वी का वो सर्द जवाब, दोनों उस शाम गलियारे की हवा में जमे रह गए थे। पर इस घर की लड़ाई किसी के जवाब का इंतज़ार नहीं करती। ... तीन दिन बाद, बाऊजी की शांति के पाठ की सुबह, राजवंश हवेली में पहली खुली बग़ावत का बिगुल बजा। और वो बिगुल था, कमर से बँधी चाबियों की एक झनकार।

सुबह से हवेली मेहमानों से भरने लगी थी। दूर-दूर के रिश्तेदार, बिरादरी के बुज़ुर्ग, फूलों की लड़ियाँ, हवन की तैयारी। और इसी भीड़ के बीच, आँगन पार करती हुई इंदुमती सीधे चर्वी की तरफ़ बढ़ीं, अपने सफ़ेद बनारसी पल्लू को सँभालते हुए, चेहरे पर वो रौब जो मातम में भी नहीं पिघलता।

"चर्वी। ... चाबियाँ।"

"चाबियाँ, माँजी?"

"घर की चाबियाँ। ... जो बहू अपने ससुर की कुर्सी की तरफ़ हाथ बढ़ाती है न, उसके भरोसे इस घर की रसोई नहीं छोड़ी जाती। ... आज से इस हवेली की चाबियाँ किरती के पास रहेंगी।"

और सबके सामने, हवन की तैयारी के बीच, इंदुमती ने चर्वी की कमर से बँधा चाबियों का वो गुच्छा खींच लिया, जो दस साल से इस घर की मालकिन की पहचान था। किरती एक क़दम आगे बढ़ी, हाथ बढ़ा कर वो गुच्छा थामने को, और उसके होंठों पर वो मीठी सी मुस्कान थी जिसके पीछे नाख़ून छिपे थे।

"आप फ़िक्र मत कीजिए दीदी। ... घर मैं सँभाल लूँगी। ... आप तो अब बड़े-बड़े दफ़्तरों की मालकिन ठहरीं, इन छोटी-छोटी चाबियों में आपका दिल कहाँ लगेगा।"

"रख लो, किरती। ... ये चाबियाँ इस घर की सबसे हल्की चीज़ हैं। ... जो असल बोझ मैं दस साल से उठा रही हूँ, वो किसी गुच्छे में नहीं आता।"

रात के दो बजे जो हाथ करोड़ों के सौदों पर दस्तख़त करवाता था, सुबह उसी हाथ से एक चाबी का गुच्छा छीन लिया गया, और उस चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई। चर्वी की उँगलियाँ एक पल को मिष्टी के सिर पर टिकीं, जो माँ के पल्लू से लिपटी ये सब चुपचाप देख रही थी। ... इस बर्फ़ जैसे तमाशे में वही इकलौती गर्माहट। और चर्वी का दिमाग़, हमेशा की तरह, पहले ही तीन चालें आगे चल रहा था।


आँगन के शोर से दूर, हवेली की पुरानी रसोई में तीन-तीन चूल्हे जल रहे थे। पाठ का भोग, मेहमानों का खाना, सब यहीं से उठता था। और इस पूरी छोटी सी रियासत की असली मलिका थी, रामदुलारी।

"चाबियाँ छीन लीं! ... भरे आँगन में, मेहमानों के सामने! ... अरे जिस बहू ने इस घर को दस साल अपने आँचल में समेटे रखा, आज उसी के हाथ से गुच्छा छीना जा रहा है। और वो किरती बिटिया... जिसे कढ़ी में हल्दी और बेसन का फ़र्क़ नहीं पता, उसे घर की चाबियाँ!"

"काकी। ... रहने दे। चाबियों से घर नहीं चलते, दिल से चलते हैं। ... और मेरा दिल आज भी इसी रसोई में है।"

"हाय मेरी बहूरानी। ... और बाहर देखा तूने? पूरी बिरादरी कुनाल बाबा के पैर छूने आई है। 'हाय, कंपनी बचा ली इस लड़के ने, कैसा होनहार है।' ... अरे मैंने उस लड़के को इसी रसोई में दूध के लिए बिलखते देखा है। जिसे आज तक दो और दो जोड़ना नहीं आया, शहर उसी के गले में सेहरा डाल रहा है। और जिसने सचमुच सब जोड़ा, वो यहाँ मेरे साथ छौंक लगा रही है।"

"काकी, धीरे। ... कोई सुन लेगा।"

"सुन ले। ... बहूरानी, मैं तुझसे एक बात कहती हूँ। ये घर ऊपर से जितना चमकता है, अंदर से उतना ही डँसता है। ... माँजी जब किसी के पीछे पड़ती हैं न, तो हद पार कर जाती हैं। ... उस रात भी, दस बरस पहले, जब तू..."

रामदुलारी की आवाज़ बीच में ही कट गई। रसोई के दरवाज़े पर एक साया पड़ा था। ... इंदुमती। न जाने कब से खड़ी सुन रही थीं।

"रामदुलारी। ... तीस साल से इस घर का नमक खा रही है, और आज पाला बदल रही है? ... आज के पाठ में तू रसोई नहीं सँभालेगी। ... जा, बाहर जूठे बर्तन उठा। जिस नौकर को अपनी औक़ात याद न रहे, उसे याद दिलानी पड़ती है।"

"माँजी... तीस साल... मैंने इन बच्चों को अपनी गोद में..."

"माँजी, रामदुलारी काकी के हाथ का भोग बाऊजी को सबसे प्रिय था। ... आज उन्हीं के पाठ में, उन्हीं के हाथ का भोग न बने... ये शायद बाऊजी की आत्मा को अच्छा न लगे।"

"बाऊजी अब इस घर में नहीं हैं, चर्वी। ... और तुम्हें उनकी पसंद-नापसंद बताने का हक़ भी नहीं रहा। ... इस घर में अब क्या होगा, ये मैं तय करूँगी। तुम अपनी चाबियाँ गँवा चुकी हो। ज़ुबान भी गँवाना चाहती हो?"

रामदुलारी को बर्तनों की तरफ़ धकेल दिया गया। जाते-जाते उसने चर्वी की तरफ़ एक नज़र देखा, वो नज़र जिसमें माफ़ी भी थी और डर भी। ... वो कुछ जानती थी, उस रात के बारे में, जिसे कहते-कहते वो आज फिर रुक गई थी। और चर्वी समझ गई, इस घर की सबसे वफ़ादार आवाज़ को भी डर की एक ज़ंजीर से बाँध कर रखा गया था।


दोपहर होते-होते आँगन में हवन की आग जल उठी। मंत्रों की गूँज, चंदन का धुआँ, और उसके बीच पूरी बिरादरी। तहज़ीब का पूरा तमाशा। और उस तमाशे के ठीक बीचोंबीच, बड़ी बहू की जगह पर, आज किरती बैठी थी, नई मालकिन की तरह सजी हुई।

और मेहमानों की भीड़ का असली मरकज़ था कुनाल। हर बुज़ुर्ग उसकी पीठ थपथपा रहा था, हर औरत उसकी तारीफ़ में लगी थी, वो नौजवान जिसने 'डूबते ख़ानदान को बचा लिया।' कुनाल हर तारीफ़ को यूँ पी रहा था जैसे ये उसका जन्मसिद्ध हक़ हो।

"देखा भाभी? ... पूरा लखनऊ मेरे कुनाल भैया के आगे सर झुका रहा है। ... और क्यों न झुकाए? जिस उम्र में लोग नौकरी ढूँढते हैं, उस उम्र में मेरे भैया ने पूरा ग्रुप सँभाल लिया। ... आप भी कुछ सीखिए उनसे।"

"चर्वी, बेटा। ... मेहमान आए हैं। शरबत के गिलास ख़ाली पड़े हैं, और पंडित जी की थाली अभी तक नहीं लगी। ... यही तो असली बहू का धरम है, बहनों। कुर्सियाँ और वसीयतें तो आती-जाती रहती हैं। बहू की पहचान तो उसकी सेवा से होती है। ... जा बेटा, मेहमानों को शरबत पिला।"

पूरी बिरादरी की नज़रें चर्वी पर आ टिकीं। वो औरत, जिसका नाम कल ही एक वसीयत ने पूरे राजवंश साम्राज्य की मालकिन लिखा था, आज उसी घर के आँगन में, इन्हीं मेहमानों के सामने, शरबत की ट्रे उठाने को कहा जा रहा था। ... और चर्वी के चेहरे पर एक शिकन नहीं आई।

"जैसा आप कहें, माँजी। ... हर चीज़ को उसकी सही जगह पर रखना... यही तो हमेशा से इस बड़ी बहू का काम रहा है। ... आज भी वही करूँगी।"

कमरे में बैठे किसी ने उस वाक्य में कुछ ख़ास नहीं सुना, एक झुकी हुई बहू का आज्ञाकारी जवाब। पर ट्रे के पास खड़ी त्रिशा के माथे पर एक बल पड़ा। 'हर चीज़ को उसकी सही जगह पर।' ... इस घर में सबसे बड़ी चीज़ अपनी जगह से हटी थी या हटाई गई थी, ये सोच कर एक पल को वो ठिठक गई।

"और हाँ, चर्वी। ... आज बाऊजी की शांति का पाठ है। भगवान से प्रार्थना करना कि इस बार तेरे हाथों इस घर की कोई अमानत बरबाद न हो। ... इस घर ने पहले भी देखा है... तेरे हाथ में आ कर इस ख़ानदान की सबसे क़ीमती चीज़ें कैसे मिट्टी हो जाती हैं।"

और पहली बार, उस पूरी सुबह में पहली बार, चर्वी का हाथ ट्रे पर एक पल को काँपा। ऊपर की मंज़िल का वो बंद कमरा, जिसका ताला दस साल से नहीं खुला था, जैसे एक पल को इस आँगन में उतर आया। ... पर चर्वी ने पलट कर कोई जवाब नहीं दिया। कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं जिन्हें भरे आँगन में नहीं खोला जाता। उसने बस ट्रे उठाई और आगे बढ़ गई।

"माँ... ये आप क्या..."

इंदुमती की एक तीखी नज़र ने त्रिशा की बात वहीं रोक दी। पर लड़की के मन में पहली बार एक काँटा चुभ गया था। वो अपने चमकते हुए कुनाल भैया की बहन थी, पर आज उसने पहली बार अपनी माँ की उस मीठी आवाज़ में वो ज़हर सुना था, जो सिर्फ़ एक ही औरत के लिए बचा कर रखा गया था।

और चर्वी? चर्वी शरबत के गिलास बाँटती रही, एक-एक मेहमान के आगे झुकती रही, चेहरे पर वही शांत मुस्कान। पर उसकी आँखें उस पूरे आँगन को पढ़ रही थीं। कौन इंदुमती के साथ है, कौन डर से चुप है, कौन आगे चल कर ई.जी.एम. में एक वोट बन सकता है। ... जिसे वो लोग एक झुकी हुई नौकरानी समझ रहे थे, वो असल में अपनी अगली चाल का नक़्शा बना रही थी।


पाठ ख़त्म होते-होते शाम उतरने लगी, मेहमान छँटने लगे। चर्वी शरबत की ख़ाली ट्रे रख कर आँगन के एक शांत कोने में, बरामदे की तरफ़ चली गई, दो घड़ी साँस लेने। और वहीं, उसके पीछे-पीछे त्रिशा चली आई।

"आपको लगता है आप बहुत होशियार हैं न, भाभी? ... बोर्डरूम में जा कर बड़े-बड़े आँकड़े गिना आईं। ... पर आप कुनाल भैया से नहीं जीत सकतीं। वो आपसे हमेशा एक क़दम आगे रहे हैं।"

"मैं किसी से जीतने नहीं निकली, त्रिशा। ... मैं बस इस घर को डूबने से बचाने निकली हूँ। ... तुम्हारे कुनाल भैया समेत।"

"बचाने? ... भैया को तो पहले से सब पता था! उन्हें पता था कि आप दस्तख़त नहीं करेंगी, उन्हें पता था कि आप बोर्ड में जा कर तमाशा करेंगी। ... उनके पास तो हफ़्तों पहले से आपकी वो टाउनशिप वाली फ़ाइल थी, असली नंबरों वाली। उन्नीस फ़ीसदी, इकतीस फ़ीसदी, वो सारा हिसाब। उन्होंने घर में सबको दिखाया कि आप बरसों से घाटा छुपाती आई हैं।"

त्रिशा के लिए वो बस अपने भाई की तारीफ़ थी। पर चर्वी के लिए वो एक बर्फ़ का तीर था जो सीधे कलेजे में उतर गया। ... वो फ़ाइल। असली नंबर। टाउनशिप के घाटे का वही सच जो उसने कल ही बोर्डरूम में कहा था, कि ये आँकड़ा किसी रिपोर्ट में नहीं, सिर्फ़ उसके पास है। ... वो फ़ाइल इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक ही जगह रहती थी। उसकी अपनी मेज़ की बंद दराज़ में। और एक ही और इंसान की पहुँच में।

"हफ़्तों पहले... ये फ़ाइल कुनाल के पास हफ़्तों पहले से थी? ... सुधा।"

"सुधा? ... कौन सुधा? ... भाभी, आप ठीक तो हैं? आपका चेहरा..."

सुधा। चर्वी की निजी सहायक। आठ साल से उसके साथ, उसके साये की तरह। दफ़्तर में वो इकलौता इंसान जिस पर चर्वी ने आँख मूँद कर भरोसा किया था। जिसके हाथ में उसने अपनी हर फ़ाइल, हर काग़ज़, हर राज़ सौंपा था। ... और त्रिशा ने कहा था, 'हफ़्तों पहले।' ... हफ़्ते पहले। यानी बाऊजी की मौत से पहले। वसीयत के पढ़े जाने से पहले। ... जब चर्वी अभी सिर्फ़ 'बड़ी बहू' थी, तब भी कोई पहले से उसके ख़िलाफ़ मोहरे बिछा रहा था।

"मुझे लगा ये बग़ावत आज हुई है। ... इस आँगन में, इन छीनी हुई चाबियों से। ... पर ये बग़ावत तो बरसों पहले हो चुकी थी। मेरे अपने दफ़्तर में। मेरे अपने भरोसे को ख़रीद कर। ... और मैं, दस साल इस घर का हर हिसाब जोड़ने वाली मैं... ये एक हिसाब कभी देख ही नहीं पाई।"

बाहर आँगन में हवन की आख़िरी लौ बुझ रही थी। और चर्वी जिस ज़मीन पर खड़ी थी, वो उसके पैरों के नीचे से खिसक चुकी थी। ... आज की असली बग़ावत हवेली के आँगन में नहीं हुई थी, माँजी के छीने हुए चाबियों के गुच्छे में नहीं थी। ... वो हफ़्तों पहले हो चुकी थी, उसके अपने कमरे में, उसकी अपनी सबसे भरोसेमंद आवाज़ के होंठों पर एक ख़रीदी हुई ख़ामोशी बन कर। ... और सबसे भयानक सवाल अब भी बाक़ी था। ... अगर सुधा बाऊजी के जीते-जी ही बिक चुकी थी, तो ये सिर्फ़ कुनाल की चाल थी... या घर के अंदर किसी और की, जो इस जंग की तैयारी उसी दिन से कर रहा था, जिस दिन बाऊजी ने चुपचाप अपनी वसीयत बदली थी?

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.