Chapter 6 of 12
बोर्ड की चाल
ई.जी.एम. में पूरा ख़ानदान चर्वी को कुर्सी से उतारने आता है, पर गिड़गिड़ाने के बजाय वो पहली बार खुली जंग की चाल चलती है, कुनाल का पूरा फ़रेब खोले बिना सिर्फ़ इतना ज़ाहिर कर देती है कि राजवंश का ताज, बाऊजी का फ़्लैगशिप ब्रांड, चुपके से सूर्यवंशी को बेचा जा रहा है, और तटस्थ डायरेक्टरों को सहमा कर वोट अधर में लटका देती है। पहली बार इंदुमती उसमें नौकरानी नहीं रणनीतिकार देखती है, पर काग़ज़ से हार कर वो अब दस साल पुरानी अस्पताल की फ़ाइल मँगवा लेती है, ये ठान कर कि जिस बहू ने बोर्डरूम जीता, उसे उसी रात के ज़ख़्म से, अपने पति की नज़रों में क़ातिल साबित कर के तोड़ेगी।
लखनऊ की उस सुबह, राजवंश ग्रुप के शीशे के टॉवर के नीचे एक के बाद एक गाड़ियाँ आ कर रुक रही थीं। ... आज कोई जश्न नहीं था। आज असाधारण आम बैठक थी, वो ई.जी.एम., जिसे परिवार ने एक ही मक़सद से बुलाया था, बड़ी बहू को उस कुर्सी से उतार फेंकने के लिए जो बाऊजी की वसीयत ने उसे सौंपी थी।
बारहवीं मंज़िल पर, बोर्डरूम के बग़ल वाले छोटे से कमरे में चर्वी खड़ी थी। बाहर पूरा ख़ानदान इस यक़ीन के साथ इकट्ठा हो रहा था कि आज की बैठक एक उलटी ताजपोशी है, जहाँ बहू का ताज उतार कर वापस कुनाल के सिर रख दिया जाएगा। ... और कमरे में सिर्फ़ एक आदमी था जो चर्वी का साथ देने आया था। सेठी।
"चर्वी जी, मैं झूठ नहीं बोलूँगा। ... मैंने रात भर वोट गिने हैं। इंदुमती जी, कुनाल, किरती का शेखर वाला प्रॉक्सी, और वो सब पुराने डायरेक्टर जो सालों से इस घर की रोटी तोड़ते आए हैं। ... अगर आज सीधा वोट पड़ा न, तो आप हार जाएँगी। काग़ज़ पर, गिनती आपके ख़िलाफ़ है।"
"मुझे पता है, सेठी जी। ... गिनती मेरे ख़िलाफ़ है। ... इसीलिए मैं वोट जीतने नहीं जा रही। मैं वोट डलने से पहले उन्हें डराने जा रही हूँ। ... जिस हाथ में काँप हो न, वो पर्ची नहीं गिराता।"
"चर्वी जी, सोच लीजिए। ... अगर आपने वहाँ कुनाल वाला सूर्यवंशी का पूरा सच खोल दिया, तो फ़्लैगशिप की क़ीमत उसी पल गिर जाएगी, बैंक भड़क उठेंगे, और जो घर बाऊजी बचाना चाहते थे, वो सरेआम फट जाएगा। ... और आप कुनाल को ग़द्दार साबित नहीं कर सकतीं, अभी नहीं, पूरे सबूत के बिना।"
"इसीलिए मैं पूरा सच नहीं खोलूँगी, सेठी जी। ... सिर्फ़ इतना, जितने से वो डर जाएँ, इतना नहीं जितने से घर जल जाए। ... कुनाल का नाम मैं नहीं लूँगी। मैं बस बोर्ड के बीच में वो एक सवाल रख दूँगी, जिसका जवाब उन्हें मुझे कुर्सी से उतारने से ज़्यादा प्यारा होगा, अपनी गर्दन।"
"और उधर कुनाल बाबा, आपके भेजे उन झूठे नंबरों वाली फ़ाइल को सीने से लगाए बैठे हैं, ये समझ कर कि उनके हाथ में आपकी मौत का परवाना है। ... आदमी जीत के नशे में सबसे बड़ी ग़लती यही करता है, चर्वी जी। ... सामने वाले को हारा हुआ मान लेता है।"
"यही तो मैं चाहती हूँ, सेठी जी। ... उसे मुझे हारा हुआ ही समझने दीजिए। ... चलिए। ... वो लोग एक बहू को गिड़गिड़ाते देखने बैठे हैं। ... उन्हें बहू ही दिखाऊँगी। ... पहले।"
और दरवाज़े से बाहर क़दम रखते ही चर्वी ने वो चेहरा पहन लिया जो ये घर दस साल से देखता आया था, झुकी हुई पलकें, धीमे क़दम, वो सीधी-सादी बड़ी बहू जिससे किसी को कोई ख़तरा नहीं। ... उस पार, पूरा ख़ानदान उसी बहू का इंतज़ार कर रहा था। उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि वो चेहरा सिर्फ़ एक पर्दा है।
बोर्डरूम की लंबी मेज़ के सिरहाने, बाऊजी की खाली कुर्सी के ठीक बग़ल में, इंदुमती बैठी थी, जैसे वो कुर्सी पहले से उसकी हो। एक तरफ़ कुनाल, फैला हुआ, मुस्कुराता। दूसरी तरफ़ रणबीर, चुप, बेचैन, अपनी ही पत्नी को ताकता हुआ। और मेज़ के दोनों ओर वो पुराने डायरेक्टर, जो हवा का रुख़ देख कर पाला चुनने के आदी थे।
"बैठक शुरू की जाए। ... मक़सद सबको पता है। ... एक मरते हुए, बहके हुए बूढ़े की वसीयत ने इस ख़ानदान की कुर्सी एक बहू के हाथ थमा दी। ... आज हम वो भूल सुधारेंगे। ... इस घर की बागडोर वापस उसके हाथ जाएगी जिसने इसे बचाया, कुनाल के हाथ।"
मेज़ के चारों ओर सिर हिले। सबको यक़ीन था कि आगे क्या होगा, बहू रोएगी, गिड़गिड़ाएगी, दस्तख़त करेगी और चुपचाप रसोई लौट जाएगी। ... सिर्फ़ रणबीर की नज़रें बेचैन थीं, बार-बार अपनी उस पत्नी पर ठहरतीं जिसे उसने दस साल से ठीक से देखा भी नहीं था।
"चर्वी। ... ये काग़ज़ रखे हैं तुम्हारे सामने। दस्तख़त कर दो, और अपनी बाक़ी की इज़्ज़त ले कर घर लौट जाओ। ... तुमसे घर तो सँभल नहीं रहा था, और तुम साम्राज्य सँभालने चली थीं। ... लौट जाओ वहीं, जहाँ तुम्हारी जगह है।"
"भाभी, बुरा मत मानिए। ... माँजी सही कह रही हैं। ... ये सब आपके बस का नहीं। बड़े लोगों के बड़े खेल हैं ये। ... आप बस दस्तख़त कीजिए, और मैं वादा करता हूँ, इस घर में आपको हमेशा वही इज़्ज़त मिलेगी, जो एक बड़ी बहू को मिलनी चाहिए।"
"आप सब ठीक कहते हैं। ... मैंने ये कुर्सी कभी माँगी नहीं थी, माँजी। ... ये बोझ मुझ पर बाऊजी ने डाला, मैंने ख़ुद नहीं उठाया। ... बस, दस्तख़त करने से पहले, एक मिनट। ... इस बोर्ड से सिर्फ़ एक बात कहनी है। ... उसके बाद जो आप कहेंगे, वही होगा।"
"कह लेने दीजिए, माँ। ... एक मिनट ही तो माँगा है।"
"बोलो। ... आख़िरी बार बोल लो। ... इसके बाद इस मेज़ पर तुम्हारी आवाज़ कभी नहीं गूँजेगी।"
और तभी, उस भरे बोर्डरूम में कुछ बदल गया। ... चर्वी की झुकी पलकें उठीं। ... कंधे सीधे हुए, ठोड़ी ऊँची, और वो दबी हुई आवाज़ जो अब तक माफ़ी माँग रही थी, अचानक पत्थर की तरह साफ़ और ठंडी हो गई। ... कमरा नहीं जानता था, पर अभी-अभी एक नौकरानी की जगह एक चेयरपर्सन खड़ी हुई थी।
"मैं वसीयत की बहस में नहीं पड़ूँगी। ... वो काग़ज़ है, आप उसे मानें या न मानें। ... पर उससे पहले, इस मेज़ पर बैठे उन पुराने डायरेक्टरों से मैं एक सवाल पूछती हूँ। ... आप एक हाथ को कुर्सी से हटाने आए हैं। ... पर क्या आपको पता, इसी वक़्त, इसी घर से क्या बेचा जा रहा है?"
कमरे की हवा रुक गई। ... पुराने डायरेक्टर आगे झुक आए। और मेज़ के उस पार, कुनाल के चेहरे की चमक एक पल में जम गई।
"पिछले हफ़्ते इस ग्रुप का सबसे गोपनीय काग़ज़ किसी बाहरी ख़रीदार के लिए खोला गया है। ... एक डेटा-रूम। ... और जो चीज़ बिकने को मेज़ पर रखी है, वो टाउनशिप का घाटा नहीं। ... वो हमारा फ़्लैगशिप है। बाऊजी का अचार-मसालों वाला वही ब्रांड, जिसके मुनाफ़े से दस साल इस पूरे ग्रुप की साँस चली है। ... और ख़रीदार? ... वो घराना, जिसका नाम सुन कर बाऊजी की मुट्ठी भिंच जाती थी। ... सूर्यवंशी।"
"झूठ! ... सफ़ेद झूठ! ... भाभी के पास कोई सबूत है? ... एक काग़ज़? ... ये घरेलू औरत की कोरी कल्पना है! ... खाली दिमाग़ की गढ़ी हुई कहानियाँ। ... वोट कराइए, माँजी, वोट! ... इसकी बकवास में वक़्त मत गँवाइए।"
"मुझे कुछ साबित नहीं करना, कुनाल। ... आज नहीं। ... मैं बस इस बोर्ड से एक हिसाब पूछती हूँ। ... अगर आप आज वसीयत की चुनी हुई मालकिन को कुर्सी से उतार दें, और कल सुबह फ़्लैगशिप सूर्यवंशी के हाथ चला जाए... ... तो उन चार हज़ार मज़दूरों को, उन बैंकों को जवाब कौन देगा? ... कुर्सी बचाने की इतनी जल्दी है? ... पहले ये देख लीजिए कि जिस डाल पर आप बैठे हैं, उसे कौन नीचे से काट रहा है।"
और वहीं, चर्वी की चाल चल गई। ... पुराने डायरेक्टर एक-दूसरे को देखने लगे। किसी ने पर्ची की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया। ... क्योंकि अब सवाल कुर्सी का नहीं रहा था। सवाल ये था, अगर आज उन्होंने इस औरत को हटाया और कल फ़्लैगशिप बिक गया, तो इतिहास उन्हें वही नाख़ुदा कहेगा जिन्होंने ऐन मौक़े पर डूबते जहाज़ की पतवार फेंक दी।
"ये... ये सब झूठ है। ... कुनाल, बोलो कुछ! ... तुम... ... दस साल तक जिसे मैं रसोई की एक बहू समझती रही..."
और पहली बार, दस साल में पहली बार, इंदुमती ने अपनी बड़ी बहू को सचमुच देखा। ... सामने कोई गिड़गिड़ाती, रोती बहू नहीं खड़ी थी। सामने वो दिमाग़ खड़ा था जो पूरी बैठक से दस क़दम आगे चल कर, चुपचाप, उसे मात दे चुका था।
"मैंने ये कुर्सी कभी नहीं माँगी, माँजी। ... पर जब तक ये घर बिकने से नहीं बच जाता, मैं इससे उतरूँगी भी नहीं। ... वसीयत ने मुझे इस ग्रुप का दिमाग़ नहीं बनाया। ... वो मैं दस साल पहले ही बन चुकी थी। ... आप सबने बस आज देखा।"
उस दिन कोई वोट नहीं पड़ा। ... मोशन अधर में लटक गया, बैठक अगली तारीख़ तक टल गई। ... जो ख़ानदान बड़ी बहू को दफ़नाने आया था, वो हिली हुई, बिखरी हुई हालत में उठ कर चला गया। ... चर्वी बाल-बाल बची थी, बस एक बाल के फ़ासले से। पर वो बची थी। ... और पूरे कमरे में सिर्फ़ एक जोड़ी आँखें थीं जो उसे नए सिरे से देख रही थीं। रणबीर की।
बोर्डरूम के बाहर, शीशे के उस लंबे गलियारे में, ख़ानदान गुस्से और हैरानी में बिखर चुका था। चर्वी तेज़ क़दमों से निकल रही थी कि पीछे से एक आवाज़ ने उसे रोक लिया। ... वो आवाज़ जिसे उसने बरसों से अपनी तरफ़ मुड़ते नहीं सुना था।
"चर्वी। ... रुको। ... वो... वो अंदर जो था... वो तुम थीं? ... वो नंबर, वो सूर्यवंशी वाली बात, वो पूरी चाल... ... मैं जिस औरत के साथ दस साल से एक छत के नीचे रह रहा हूँ, मैं उसे जानता ही नहीं।"
"तुमने आज पहली बार देखा, रणबीर। ... मैं दस साल से यहीं थी। ... इसी घर में, इसी मेज़ पर, हर उस फ़ैसले के पीछे जिसका सेहरा किसी और के सिर बँधा। ... तुमने कभी मुड़ कर देखा ही नहीं।"
"अगर... अगर ये सब तुम थीं... ... तो जो माँ कहती हैं, दस साल से, तुम्हारे बारे में... ... जो तुमने उस साल किया था, जिसकी वजह से हमारा... ... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, चर्वी।"
और एक पल को, बस एक पल को, चर्वी रुक गई। ... दस साल की उस बर्फ़ में एक महीन-सी दरार आई। उसके होंठ खुले, जैसे वो कुछ कहने ही वाली हो, वो सच जो दस साल से उसके सीने में दबा था। ... रणबीर की आँखों में पहली बार वो सवाल था, जिसका उसने बरसों इंतज़ार किया था।
"नहीं, रणबीर। ... जो तुमने दस साल नहीं सुना, वो एक गलियारे में खड़े हो कर एक मिनट में नहीं सुनोगे। ... और मुझे अभी एक घर बचाना है, अपना ब्याह नहीं। ... जाओ। ... तुम्हारी माँ को तुम्हारी ज़रूरत होगी। ... आज उनका बहुत कुछ टूटा है।"
और चर्वी गलियारे के मोड़ पर ओझल हो गई। ... रणबीर वहीं खड़ा रह गया, उसके भीतर बरसों से जमी कोई चीज़ पहली बार हिली थी। ... पर उसे नहीं पता था कि ऊपर, हवेली में, उसकी माँ पहले ही उस एक चीज़ की तरफ़ हाथ बढ़ा चुकी थी, जो इस दरार को फिर से, हमेशा के लिए, पाट देगी।
उस रात हवेली में बत्तियाँ जल्दी बुझ गईं। ... पर इंदुमती के कमरे में एक दिया देर तक जलता रहा। बोर्डरूम की हार उसके सीने पर राख की तरह बैठी थी। ... आज, ज़िंदगी में पहली बार, वो एक बहू से हारी थी। ... और इंदुमती रावत हारना नहीं जानती थी।
"देख लिया आपने, बाऊजी? ... आपकी वो चुपचाप बहू, आज भरी मेज़ पर मुझे मात दे गई। ... काग़ज़ से नहीं हारेगी ये। वोट से नहीं हारेगी। ... इसका दिमाग़ हम सबसे तेज़ चलता है।"
और उस अकेले दिये की रौशनी में इंदुमती के भीतर डर ने करवट ली। ... और इस औरत के भीतर डर हमेशा एक ही चीज़ में बदलता था, ज़ुल्म। ... अगर काग़ज़ इस बहू को नहीं झुका सकते, तो वो काग़ज़ से आगे जाएगी।
"बोर्ड में तू मुझसे जीत गई, बहू। ... मान लिया। ... पर एक रात है, दस साल पुरानी, जिससे तू आज भी नहीं जीत सकती। ... एक ज़ख़्म है, जो आज भी तेरा मालिक है। ... और तेरा वो तेज़ दिमाग़ भी, उस एक रात के आगे, घुटनों पर आ जाएगा।"
इंदुमती उठी और अपनी पुरानी अलमारी का वो ख़ाना खोला जिसकी चाबी वो बरसों से सीने से लगाए रखती थी। ... गलियारे के उस पार वो बंद नर्सरी थी, जिसका ताला दस साल से नहीं खुला, जहाँ एक ऐसे बच्चे का सामान अब भी रखा था जो कभी इस घर में साँस नहीं ले पाया। ... बाऊजी मरते-मरते कह गए थे कि उन्होंने हिसाब बराबर कर दिया। ... इंदुमती अब उसी हिसाब को फिर से बिगाड़ने जा रही थी।
"हाँ, मैं इंदुमती रावत बोल रही हूँ। ... इतनी रात गए तंग करने की माफ़ी। ... पर मुझे एक फ़ाइल चाहिए। ... दस साल पुरानी। ... उस अस्पताल की, उस रात की। ... मेरी बड़ी बहू के नाम की। ... उसका एक-एक काग़ज़। ... कल सुबह से पहले मेरे हाथ में हो। ... क़ीमत जो भी हो, चुका दूँगी।"
और फ़ोन रखते ही कमरे में एक भयानक ख़ामोशी उतर आई। ... सुनने वाला जानता था कि उस रात असल में क्या हुआ था। ... कि जिस तूफ़ान में चर्वी का अनजन्मा बेटा छिन गया, उस रात उस गर्भवती बहू को बारिश में घर से बाहर किसी और ने धकेला था। ... पर इंदुमती उस सच को नहीं, अपने ही गुनाह को एक हथियार में ढालने जा रही थी, और उसकी नोक सीधे रणबीर के दस साल पुराने ज़ख़्म पर टिकी थी।
"बोर्ड की लड़ाई तूने जीत ली, बहू। ... वो मैं तुझे दे देती हूँ। ... पर कल ये फ़ाइल मैं अपने बेटे के हाथ में रख दूँगी। ... और उसे फिर याद दिलाऊँगी कि उसका पहलौठा, राजवंश का वारिस, किसकी वजह से इस दुनिया में आने से पहले ही चला गया। ... तू बोर्डरूम की मालकिन बन ले। ... पर अपने ही पति की नज़रों में, तू आज भी वही क़ातिल रहेगी।"
बाहर, हवेली के उस बंद कमरे का ताला अब भी लटका हुआ था। ... पर उसके भीतर सोया वो दस साल पुराना ज़ख़्म अब जाग चुका था। ... चर्वी ने आज बोर्डरूम की जंग एक बाल के फ़ासले से जीत ली थी। ... पर उसे नहीं पता था कि जिस पल वो जीत रही थी, ठीक उसी पल उसकी सास ने काग़ज़ और वोट की लड़ाई छोड़ कर वो हथियार उठा लिया था, जिसका कोई तोड़ चर्वी के तेज़ दिमाग़ के पास भी नहीं था। ... वो रात। ... और वो फ़ाइल, इसी वक़्त, अँधेरे में, राजवंश की हवेली की तरफ़ चल पड़ी थी।
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