Chapter 13 of 30 10 min read
पुरानी राख
रणबीर की एक लाइन इंदुमती तक पहुँचती है, और सुबह-सुबह रामदुलारी उसकी दरार देखने वाली पहली गवाह बन जाती है, जबकि चर्वी उसी रामदुलारी से उस रात की परतदार, अधूरी याद निकलवाती है। आख़िर में चर्वी ख़ुद को दस साल से बंद उस नर्सरी के दरवाज़े के सामने खड़ा पाती है, जहाँ बाऊजी का दिया डिक्टाफ़ोन उसका इंतज़ार कर रहा था, और उसकी आवाज़ अँधेरे में गूँज उठती है।
भोर से पहले ही हवेली में एक हलचल थी जो किसी ने बाहर से नहीं देखी। ... रणबीर, सारी रात जागा हुआ, अपनी माँ के कमरे तक गया था, और सिर्फ़ एक वाक्य कह कर लौट आया था, चर्वी का वही वाक्य, कि उसने उस रात क्या दस्तख़त किया था। ... उसने जवाब का इंतज़ार नहीं किया, बस दरवाज़ा खोला, कहा, और मुड़ गया।
इंदुमती के कमरे में अब भी अँधेरा था, पर वो सोई नहीं थी। ... बरसों में पहली बार उसके बाल खुले थे, उसकी पीठ मेज़ पर झुकी थी, और मेज़ पर वही पुराना, फीते वाला लिफ़ाफ़ा पड़ा था, अब ख़ाली।
रामदुलारी हर सुबह की तरह चाय की ट्रे ले कर भीतर आई, और दरवाज़े पर ही ठिठक गई, क्योंकि जो औरत उसने पचास साल से इस घर पर हुक्म चलाते देखा था, वो आज उस मेज़ पर वैसे ही झुकी बैठी थी जैसे कोई अपराधी अपने ही फ़ैसले का इंतज़ार करता है।
"दस्तक देना नहीं सीखा अब तक, रामदुलारी? ... या इस घर में अब चाबियाँ बदल गई हैं, तो अदब भी बदल गया?"
"माफ़ करना, माँ जी। ... बस चाय रखने आई थी।" ... "...आप ठीक तो हैं?"
"ठीक क्यों नहीं रहूँगी? ... मैंने वो किया जो एक माँ को करना चाहिए, अपने बेटे को उसकी बीवी की असलियत दिखाई।" ... "...रणबीर को सच जानने का हक़ था।"
"माँ जी, आप कभी रोई नहीं इस घर में, मैंने पचास साल में नहीं देखा। ... आज आपके हाथ काँप रहे हैं।"
"मेरे हाथ काँप रहे हैं, रामदुलारी, क्योंकि मेरा बेटा आज पहली बार मुझसे कोई सवाल नहीं, एक इल्ज़ाम ले कर आया था।" ... "...और एक माँ अपने बेटे की आँखों में अपने लिए इल्ज़ाम बर्दाश्त नहीं कर पाती।"
"पूरा सच, माँ जी? ... या सिर्फ़ वो हिस्सा, जो आपको सुरक्षित रखता है?"
इंदुमती का सिर उठा, और एक पल को उसकी आँखों में वो डर दिखा जो पचास साल की हुकूमत के नीचे कहीं दबा हुआ था। ... क्योंकि रामदुलारी इस घर की इकलौती नौकरानी नहीं थी, वो उस रात की भी गवाह थी।
"संभल कर बोलो, रामदुलारी। ... पचास साल की नौकरी एक सुबह में जा सकती है।" ... "...तुमने कभी किसी को कुछ बताया तो नहीं?"
"मैंने दस साल किसी को कुछ नहीं बताया, माँ जी। ... न आपके ख़िलाफ़, न बहू के हक़ में। ... मैंने बस वो किया, जो एक डरी हुई औरत करती है, चुप रही।"
"तुम अच्छी हो, रामदुलारी। ... इस घर में तुमसे ज़्यादा वफ़ादार किसी को नहीं पाया मैंने।" ... "...अब चाय ठंडी हो रही है। ... जाओ।"
और इंदुमती वहीं बैठी रह गई, अपने ही कमरे में, अपने ही बेटे के एक वाक्य से हिली हुई, ये जानते हुए कि पहली बार इस घर में कोई उससे डरा नहीं था, कोई उसके सामने शर्मिंदा हुआ था, वो ख़ुद।
और उस सुबह पहली बार, इंदुमती को एक अजीब सा डर छूने लगा, कि बाऊजी की वसीयत सिर्फ़ कुर्सी की बात नहीं थी, वो एक हिसाब था, जो शायद अभी पूरा खुला भी नहीं था।
उधर रसोई में, जहाँ इस घर की असली गर्माहट अब भी बचती थी, चर्वी रामदुलारी को ढूँढती हुई पहुँची। ... रात भर की लड़ाई उसकी आँखों के नीचे बैठी थी, पर उसका इरादा साफ़ था।
"रामदुलारी दीदी। ... मुझे आज एक झूठ नहीं, एक याद चाहिए। ... तुम उस रात इस घर में थीं।"
रामदुलारी का हाथ, जो अभी तक आटा गूँथ रहा था, वहीं रुक गया। ... दस साल से वो इसी सवाल के आने का इंतज़ार करती आई थी, और डरती भी रही थी।
"बहू रानी, दस साल मैंने ये सवाल टाला है, क्योंकि जिसने मुझे इस घर में रोटी दी, उसी के ख़िलाफ़ बोलना... ये मेरे बस का नहीं।" ... "...पर तुम्हारी आँखों में आज वो ही दर्द है जो उस रात था। ... मैं अब और नहीं टाल सकती।"
"उस शाम टाउनशिप वाला काम डूबने की ख़बर पूरे घर में फैल चुकी थी, बैंक वाले फ़ोन पर फ़ोन कर रहे थे, और तुम, बहू रानी, पूरे दिन दफ़्तर के काग़ज़ों में डूबी रहीं, पेट से होते हुए भी। ... घर में हर कोई अपनी-अपनी घबराहट में था, और मैं सोच भी नहीं पाई थी कि रात इतनी भारी पड़ेगी।"
और रामदुलारी ने आँखें मूँद लीं, जैसे उस रात को फिर से जी रही हो। ... उस रात बाहर तूफ़ान था, ऐसा तूफ़ान जिसने पूरे लखनऊ की बत्तियाँ बुझा दी थीं, और भीतर हवेली किसी और ही तूफ़ान में डूबी थी।
"उस रात ऊपर की मंज़िल से आवाज़ें आ रही थीं, बहुत तेज़, बहुत कड़वी। ... मैं नीचे रसोई में थी, पर सीढ़ियों तक सुनाई देता था। ... एक औरत की आवाज़, और एक तुम्हारी, और फिर एक दरवाज़ा, बहुत ज़ोर से।"
"मुझे भी उस रात का पूरा हिस्सा याद नहीं, दीदी। ... डॉक्टर कहते हैं, सदमे में दिमाग़ ख़ुद कुछ हिस्से मिटा देता है। ... शायद इसीलिए मैंने कभी अपनी सफ़ाई पूरी नहीं दी, मेरे पास ख़ुद पूरी तस्वीर नहीं थी।"
रामदुलारी ने चर्वी का हाथ कस कर पकड़ लिया, दो औरतें, एक ही अधूरी याद के दो टुकड़े थामे।
"किसकी आवाज़ थी, दीदी?"
"बहू रानी, मैंने चेहरे नहीं देखे, सिर्फ़ आवाज़ें सुनी थीं, अँधेरी सीढ़ियों के उस पार से। ... मैं क़सम खा कर कह सकती हूँ, इतना ही जानती हूँ, तुम भीगी हुई, अकेली, उस रात फाटक के पास गिरी मिलीं, और उसके बाद जो हुआ... वो मैंने अपनी आँखों से नहीं देखा।"
"मैं इतना बता सकती हूँ, बहू रानी, तुम्हें उस रात सबसे पहले मैंने ही सम्भाला था, सूखे कपड़े, गरम पानी, और मैंने तुम्हारे कान में बस इतना कहा था, हिम्मत रखो, ऊपर वाला देख रहा है। ... उसके बाद जो अस्पताल में हुआ, वो मेरी पहुँच से बाहर था।"
और चर्वी समझ गई, रामदुलारी झूठ नहीं बोल रही थी, वो सच में सिर्फ़ इतना जानती थी, जितना एक डरी हुई नौकरानी अँधेरी सीढ़ियों से जान सकती है। ... पूरा नाम अब भी अँधेरे में था।
"पर एक बात मुझे आज तक याद है, बहू रानी। ... उस रात के बाद बाऊजी ख़ुद उस ऊपर वाले कमरे में गए, अकेले, और अपने हाथ से उसका ताला बंद किया। ... और उसके बाद, दस साल में, उन्होंने वो कमरा किसी को नहीं खोलने दिया, अपने अलावा।"
रामदुलारी ने अपने आँसू पोंछे, फिर, अपने पुराने ढंग से, चर्वी का हाथ थाम कर बोली, जैसे वो अब भी वही छोटी बहू हो जिसे उसने दस साल पहले पहली बार चाय पिलाई थी।
"बहू रानी, इतने सालों में तुमने इस बुढ़िया से कभी झूठ नहीं बुलवाया, न सच। ... आज पहली बार पूछा है, तो जितना जानती थी, बता दिया। ... बाक़ी, मुझे लगता है, उस कमरे के अंदर ही मिलेगा।"
चर्वी रसोई से निकली, और बिना सोचे-समझे, उसके पैर उसी सीढ़ी की तरफ़ मुड़ गए जिस पर उसने दस साल से क़दम नहीं रखा था। ... हवेली की सबसे ऊपरी मंज़िल पर, गलियारे के आख़िर में, वो दरवाज़ा था, जिसे इस घर में सब बस "वो कमरा" कहते थे।
दरवाज़े पर धूल की हल्की परत थी, और एक पुराना ताला, जंग खाया हुआ। ... इसी दरवाज़े के पीछे, ऐन उसी रात, एक नन्ही ज़िंदगी की सबसे पहली और आख़िरी साँसें दफ़न थीं। ... चर्वी ने दस साल में पहली बार उस ताले को छुआ।
दस साल तक चर्वी ने इस दरवाज़े से नज़रें चुराई थीं, हर बार जब वो इस गलियारे से गुज़री थी। ... आज पहली बार वो रुकी, और नज़रें नहीं चुराईं।
और तभी उसे वो हफ़्ता याद आया, जिसे उसने बरसों कोशिश करके भुला दिया था। ... बाऊजी की मौत से ठीक एक हफ़्ता पहले, एक शाम, बूढ़े हाथों ने चर्वी की हथेली पर एक छोटा सा पुराना डिक्टाफ़ोन रख दिया था, और कहा था, बेटा, इसे तब सुनना, जब तुम्हें लगे कि अब सुनने की हिम्मत आ गई है।
उस शाम बाऊजी की आवाज़ काँप रही थी, जैसे वो जानते हों कि ये आख़िरी हफ़्ता है। ... उन्होंने बस इतना कहा था, इस घर ने तुमसे जो चुराया, वो मैं वापस नहीं कर सकता, पर सच लौटा सकता हूँ, जब तुम तैयार हो।
उस रात, बाऊजी के दिए हुए उस डर से भागते हुए, चर्वी ख़ुद इसी दरवाज़े तक आई थी, चाबी उसके पास पहले से थी, वसीयत के साथ सौंपी हुई इस पूरे घर की चाबियों में एक। ... उसने बस इतना किया था, दरवाज़ा खोला, बिना अंदर देखे वो डिक्टाफ़ोन भीतर मेज़ पर रख दिया, और फिर से ताला बंद कर दिया, बिना एक पल रुके, बिना अंदर झाँके। ... उस दिन के बाद, आज, पहली बार, वो दरवाज़ा फिर खुलने जा रहा था।
चर्वी ने ताला खोला, और दरवाज़ा भीतर की तरफ़ धीरे से खुल गया, एक सिसकती हुई चरमराहट के साथ, जैसे कमरा भी दस साल से साँस रोके बैठा हो।
कमरे के भीतर वक़्त वहीं रुका हुआ था जहाँ दस साल पहले छोड़ा गया था। ... एक खाली पालना, धूल की चादर ओढ़े। ... दीवार पर टँगा एक अधूरा नाम, जो कभी पूरा नहीं हुआ। ... और मेज़ पर, ठीक वहीं जहाँ चर्वी ने उसे रखा था, वो छोटा सा डिक्टाफ़ोन।
एक कोने में तीन छोटे कुर्ते अब भी उसी थैले में बँधे रखे थे जो अस्पताल से वापस आया था, कभी खोले नहीं गए। ... खिड़की पर एक झुनझुना पड़ा था, जिस पर धूल की मोटी तह जम चुकी थी। ... चर्वी ने दस साल में पहली बार वो कमरा अपनी आँखों से देखा, जिसे उसने अब तक सिर्फ़ अपनी नींद में देखा था।
चर्वी के क़दम काँपते हुए उस मेज़ तक पहुँचे। ... उसकी उँगलियाँ उस डिक्टाफ़ोन पर वैसे ही जम गईं जैसे दस साल पहले उस बच्चे के गाल पर जमी होंगी। ... बाऊजी के आख़िरी लफ़्ज़ अब भी उसके कानों में थे, जब तुम्हें लगे कि सुनने की हिम्मत आ गई है।
"आज है वो दिन, बाऊजी।"
उसने काँपती उँगली से वो पुराना बटन दबाया। ... कमरे में एक पल को सिर्फ़ टेप की सरसराहट गूँजी, और फिर, दस साल की चुप्पी के पार से, एक बूढ़ी, कमज़ोर, पर साफ़ आवाज़ उभरी।
"बेटा... ... जब तक तुम ये सुनोगी, मैं जा चुका होऊँगा। ... और जो सच मैंने तुमसे दफ़नवाया... ... वही अब तुम्हें बचा सकता है।"
और उस बंद, दस साल पुराने कमरे में, एक मरे हुए आदमी की आवाज़ अँधेरे में गूँजती रही, चर्वी को अकेला छोड़ कर उस सवाल के साथ जिसका जवाब अब सिर्फ़ यही टेप दे सकता था। ... बाहर हवेली में रात उतर आई थी, और भीतर, एक भूली हुई क़ब्र से, बाऊजी की आख़िरी आवाज़ जाग उठी थी।
Comments
No comments yet. Be the first to share your thoughts.