Chapter 19 of 30 10 min read
औरत की ताक़त
वोटों और साथियों से महरूम चर्वी उन्हें गिनने लगती है जिन्हें इस घर के मर्दों ने कभी वोट के लायक़ नहीं समझा, यानी घर की औरतों को; त्रिशा पूरी तरह उसके साथ आ जाती है और सेठी वसीयत की एक भूली शर्त और चर्वी के नाम दर्ज दुगने-वोट वाले शेयर खोज निकालता है। इंदुमती पर पकड़ ढूँढ़ते हुए चर्वी और सेठी पाते हैं कि दस साल पुरानी गारंटी पर कुनाल के जाली दस्तख़त के नीचे का दूसरा हाथ ख़ुद इंदुमती का है, कि मूल घोटाला उसी ने अपने डूबते मायके के लिए रचा था।
लखनऊ की वो रात अभी पूरी तरह ढली भी नहीं थी कि चर्वी अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई। ... मेज़ पर बिखरे वो काग़ज़, जो कुछ पल पहले उसकी हार का ऐलान लग रहे थे, उसने एक-एक कर के फिर तरतीब से समेटने शुरू कर दिए, उस औरत की तरह जिसे रोने की मोहलत कभी मिली ही नहीं। ... सेठी अब भी वहीं बैठा था, अपने फ़ोन को यूँ घूरता हुआ जैसे वो अभी-अभी कोई मनहूस ख़बर सुना कर उसे धोखा दे गया हो।
"तीन वोट, बड़ी बहू जी... सिर्फ़ तीन। ... और वो तीनों अब सूर्यवंशी की जेब में हैं। ... मैंने हर डायरेक्टर गिना, हर प्रॉक्सी गिनी, दस बार गिनी।" ... "पर भोर तक उन्हें पलटने का कोई रास्ता मुझे नहीं दिखता।"
"आपने हर डायरेक्टर गिना, सेठी जी। ... हर प्रॉक्सी। ... पर एक चीज़ है, जो इस बोर्ड में बैठा हर मर्द दस साल से गिनना भूल जाता है।" ... "वो चीज़ मैं हूँ।"
"आपका मतलब...?"
"कुनाल ने मर्दों के वोट गिने, सेठी जी। ... बोर्ड के मर्द, सूर्यवंशी के मर्द, इस घर के बेटे। ... उसने वही गिना जो उसे हमेशा दिखता रहा है। ... पर इस साम्राज्य को दस साल जिन हाथों ने चलाया, वो हाथ मेज़ के नीचे थे, कभी किसी की गिनती में नहीं आए।" ... "आज रात मैं उन्हीं को गिनूँगी, जिन्हें इस घर ने कभी वोट के लायक़ समझा ही नहीं।"
चर्वी के दिमाग़ में वो पूरा बोर्ड एक शतरंज की बिसात की तरह खुल गया। ... कुनाल के पास सूर्यवंशी का पैसा था, इंदुमती का नाम था, और इस घर के मर्दों का ग़ुरूर। ... पर हर उस चाल के पीछे, जिस पर वो इतरा रहे थे, एक बात दबी थी जिसे उन्होंने कभी अपने हिसाब में नहीं रखा, कि इस घर की औरतें भी देखती हैं, सुनती हैं, और याद रखती हैं।
"आज रात हमें तीन काम करने हैं, सेठी जी। ... पहला, बाऊजी की वसीयत का एक-एक शब्द दोबारा पढ़ना है, वो हिस्से भी जिन्हें हम मामूली समझ कर छोड़ आए थे। ... दूसरा, राजवंश के पुराने शेयर रजिस्टर, दस साल पीछे तक।" ... "और तीसरा... त्रिशा।"
"त्रिशा जी? ... वो लड़की तो अपने कुनाल भैया की परछाईं है, बड़ी बहू जी। ... भरे आँगन में आपके ख़िलाफ़ खड़ी थी।"
"परछाईं तभी तक रहती है, सेठी जी, जब तक रौशनी सीधी हो। ... और कुनाल की रौशनी अब टेढ़ी पड़ चुकी है। ... त्रिशा ने कुछ देखा है, कुछ सुना है, मैं जानती हूँ। ... बस अब तक किसी ने उससे सही सवाल नहीं पूछा।"
जैसे उस रात की हवा में चर्वी की बात किसी को सुनाई दे गई हो, हवेली के दूसरे छोर पर त्रिशा अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी। ... कई रातों से एक बात उसके भीतर एक काँटे की तरह अटकी थी, वो बात जो उसने अपने चहेते कुनाल भैया के बारे में सुनी थी और किसी से कह नहीं पाई थी। ... आधी रात के बाद, आख़िरकार, वो उठी और दबे पाँव चर्वी के कमरे की तरफ़ चल पड़ी।
"भाभी... सो गईं क्या? ... मुझे... मुझे आपसे एक बात कहनी है। ... और अगर आज नहीं कही, तो शायद कभी हिम्मत नहीं होगी।"
"अंदर आ जा, त्रिशा। ... इस घर में इतनी रात गए कोई मेरे दरवाज़े पर नहीं आता, तो जो भी आया है, ज़रूर कोई सच ले कर आया है।"
"मैं बचपन से कुनाल भैया को हीरो मानती आई हूँ, भाभी। ... पूरा शहर उन्हें ताली बजाता था, तो मैंने भी बजाई। ... और आपको..." ... "आपको मैं हमेशा वही समझती रही जो माँ ने कहा, एक चालाक बहू, जो भैया की जगह छीनना चाहती है।"
"पर उस रात... सूर्यवंशी वाले फ़ोन के बाद... मैंने भैया को उनके कमरे में सुना, भाभी। ... वो किसी हीरो की आवाज़ नहीं थी। ... वो एक डरे हुए आदमी की आवाज़ थी, किसी के आगे गिड़गिड़ाता हुआ, 'तीनों वोट कल रात तक आपके खाते में होंगे' कहता हुआ।"
"तूने ये किसी और को बताया, त्रिशा? ... किसी को?"
"किसी को नहीं, भाभी। ... किसे बताती? ... इस घर में तो हर कोई भैया को मसीहा और आपको चोर मानता है।" ... "पर मैंने अपनी आँखों से भैया को डेटा-रूम की फ़ाइलें किसी बाहर वाले को भेजते देखा है। ... मेरे अपने भाई ने इस घर का ताज बेच दिया, और मैं चुप रह कर उसका साथ नहीं दे सकती। ... अब नहीं।"
चर्वी ने देखा कि त्रिशा की आँखों में आँसू थे, पर उसकी ठोड़ी तनी हुई थी। ... ये वो लड़की नहीं थी, जो कुछ हफ़्ते पहले भरे आँगन में उसे ज़लील होते देख कर अपने भैया की तरफ़ खड़ी थी। ... एक भाई का मोह टूटना आसान नहीं होता, और त्रिशा ने आज वो टूटन अपने ही हाथों चुनी थी।
"तूने आज जो किया, त्रिशा, वो हिम्मत बड़े-बड़े मर्द उस बोर्डरूम में नहीं दिखा पाए। ... और सुन, तू भैया के ख़िलाफ़ नहीं खड़ी हुई। ... तू एक झूठ के ख़िलाफ़ खड़ी हुई है। ... यही फ़र्क़ है, जो कल भोर इस घर को बचाएगा।"
भोर से कुछ घंटे पहले, सेठी बाऊजी की वसीयत और राजवंश के पुराने शेयर रजिस्टर के बीच धँसा बैठा था, उसकी ऐनक के काँच पर मेज़ के लैंप की रौशनी काँप रही थी। ... और फिर, दस साल पुराने एक पन्ने पर, उसकी उँगली एक जगह आ कर रुक गई, और उसका हमेशा सपाट रहने वाला चेहरा पहली बार किसी हैरानी से खुल गया।
"बड़ी बहू जी... ये देखिए, यहाँ। ... दस साल पहले, जब कारोबार डूब रहा था, आपने अपने गहने और अपने पिता का हिस्सा बेच कर जो रक़म कंपनी में डाली थी..." ... "यशवंत जी ने उसके बदले चुपचाप कंपनी के कुछ शेयर आपके नाम कर दिए थे। ... एक अलग वर्ग के शेयर, तादाद में कम, पर वोट के हक़ के साथ।"
"मुझे... मुझे तो कभी बताया ही नहीं गया।"
"बाऊजी शायद जानते थे कि जिस दिन ये बात खुलेगी, उस दिन आपको इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी। ... और वसीयत में एक भूली-बिसरी शर्त भी है, बड़ी बहू जी, जिसे हम मामूली समझ कर छोड़ आए थे।" ... "कि इन शेयरों के वोट, किसी भी बिक्री के फ़ैसले में, दुगने गिने जाएँगे।"
"दुगने..." ... "सेठी जी, अगर इन शेयरों के वोट दुगने हैं, और त्रिशा के पास कुनाल के सौदे का गवाह होना, और शेखर भैया का झुकता हुआ मन... ... तो वो तीन ख़रीदे हुए वोट अब उतने भारी नहीं रहे, जितने कुनाल समझ रहा है।"
"जिन औरतों को इस घर ने कभी वोट के लायक़ नहीं समझा, बड़ी बहू जी, कल भोर उन्हीं के हाथ में ये फ़ैसला होगा। ... यशवंत जी होते, तो आज मुस्कुराते।"
"त्रिशा का सच, मेरे नाम के ये शेयर, और शेखर भैया की एक ईमानदार पलक। ... इनमें से कोई अकेला काफ़ी नहीं है, सेठी जी। ... पर आज रात मैं इन तीनों को एक साथ बाँध दूँगी।"
पर चर्वी जानती थी कि बोर्ड की गिनती जीत लेना काफ़ी नहीं है। ... भोर होते ही इंदुमती फिर वही करेगी जो वो दस साल से करती आई है, काग़ज़ की हार को किसी पुराने ज़ख़्म की चोट में बदल देना। ... उसे इंदुमती पर एक ऐसी पकड़ चाहिए थी, जो सास के हर मुखौटे को उतार दे। ... और उसी पकड़ की तलाश में, उसने वो फ़ाइल फिर से खोली, जिसे उसने दस साल पहले अपने सिर लिया था।
वो मूल गारंटी, जिसके इल्ज़ाम में उसने दस साल चुप्पी की सज़ा काटी थी, अब उसके सामने खुली पड़ी थी। ... कुनाल के जाली दस्तख़त तो वो पहले ही पहचान चुकी थी। ... पर उसके ठीक नीचे, हाशिये पर, एक दूसरा, पुराना, बेहद क़रीबी हाथ का दस्तख़त था, जिसे वो दस साल से एक अनजान परछाईं समझती आई थी।
"बड़ी बहू जी, मैंने इस दूसरे दस्तख़त का मिलान करने की कोशिश की, दस साल की हर फ़ाइल से। ... और आज रात, शेयर रजिस्टर खंगालते हुए, वो मिल गया।" ... "जिस खाते में उस रात कंपनी का पैसा गया था, वो सूर्यवंशी का नहीं था, कुनाल का भी नहीं। ... वो एक डूबती हुई पुरानी फ़र्म थी, इंदुमती जी के मायके की।"
"मायके की..." ... "सेठी जी, आप... आप कह क्या रहे हैं?"
"दस साल पहले जो घोटाला हुआ, बड़ी बहू जी, उसका असली हाथ कुनाल नहीं था। ... कुनाल तो सिर्फ़ आगे का चेहरा था, वो जोकर जिसे नचाया गया। ... कंपनी का पैसा चुपके से इंदुमती जी अपने डूबते मायके में डाल रही थीं, महीनों से। ... और जब वो सब भरभरा कर गिरने लगा..." ... "तो जिस औरत ने अपने गहने बेच कर वो छेद भरा, और सारा इल्ज़ाम अपने सिर लिया, वो आप थीं।"
और उसी एक पल में, दस साल के सारे बिखरे टुकड़े चर्वी के सामने आ कर जुड़ गए। ... वो अस्पताल की फ़ाइल जिसे इंदुमती हथियार की तरह घुमाती रही, रामदुलारी की उस तूफ़ानी रात की अधूरी याद, और बाऊजी की वो चुप्पी जो उन्हें मरते दम तक अंदर ही अंदर खाती रही। ... ये सब एक ही नाम की तरफ़ इशारा कर रहे थे। ... जिस सास ने उसे दस साल चोर कहा, भरे आँगन में ज़लील किया, अपने ही बेटे की नज़रों में गिराया, उस मूल गुनाह पर पहला दस्तख़त उसी के अपने हाथ का था।
"दस साल, सेठी जी। ... दस साल इस घर ने मुझे उस गुनाह का चोर बना कर रखा, जिसकी असली गुनहगार वो औरत थी, जो हर सुबह मुझे नौकरानी की तरह हुक्म देती रही।" ... "और मैंने... मैंने अपने गहने बेच कर उसी का गुनाह ढका, बाऊजी के एक कहने पर।"
"बड़ी बहू जी, ये सिर्फ़ एक पुराना काग़ज़ नहीं है। ... ये वही पकड़ है, जिसकी आपको तलाश थी। ... इस एक दस्तख़त से आप कल भोर, बोर्ड के सामने, इंदुमती जी का हर मुखौटा उतार सकती हैं।"
"जो औरत ये दस्तख़त कर के, दस साल मुझे चोर कह सकती है, सेठी जी..." ... "...उस औरत ने और क्या-क्या छुपाया होगा, इस घर की सबसे बंद कोठरी में?"
खिड़की के बाहर लखनऊ की भोर फूट रही थी, वही भोर जिसे कुनाल राजवंश का ताज बिकते देखने के लिए बुला रहा था। ... पर चर्वी के हाथ में अब वो दस साल पुराना दस्तख़त था, जो हर चोर और हर मालकिन की जगह अदल-बदल देने वाला था। ... जिस देहरी पर उसे दस साल थूका गया था, आज उसी घर की मालकिन का गुनाह उसकी अपनी हथेली पर खुला रखा था। ... और सबसे गहरा ज़ख़्म, वो जो इस दस्तख़त से भी नीचे दबा पड़ा था, अब भी अँधेरे में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था।
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