Chapter 8 of 12
Episode 8: टूट
राज़ खुल चुका है। आरव के सामने अब वो औरत नहीं, एक अजनबी खड़ी है, और मीरा जो सच आख़िरकार बोल रही है, वो उसके अपने झूठों के नीचे दबकर रह जाता है। घर से निकाली गई मीरा एक ही चौराहे पर खड़ी है, बदला पूरा करे या आरव को बचाए। उसकी सहेली इशा उसे सब छोड़कर भाग जाने की मिन्नत करती है। पर तभी मल्होत्रा एक ऐसी चाल चलता है, जो लड़ाई को पैसों से उठाकर सीधे ज़िंदगी और मौत पर ले आती है।
कमरे में एक भी आवाज़ नहीं थी। बस आरव के हाथ में खुली हुई वो पीली फ़ाइल, और दरवाज़े पर खड़ी मीरा। दस साल जिस राज़ को उसने सीने में दफ़न रखा था, वो अब दोनों के बीच, हवा में, नंगा पड़ा था। आरव ने धीरे से उस बच्ची की तस्वीर पर उँगली रखी, फिर मीरा की तरफ़ देखा।
"रमेश जोशी। ये तुम्हारे पिता हैं... है ना? सच बोलो, मीरा। आज, बस एक बार, सच बोलो।"
मीरा के पास एक आख़िरी झूठ का मौक़ा था। एक और कहानी, एक और बहाना। पर वो थक चुकी थी। झूठ बोलते-बोलते थक चुकी थी। उसने एक गहरी साँस ली, और दस साल में पहली बार, अपना सच ख़ुद अपने मुँह से बाहर आने दिया।
"हाँ। रमेश जोशी मेरे पिता थे। और विक्रम मल्होत्रा ने उन्हें बर्बाद किया था। उसी Meridian के जाल में फँसाकर, जिसमें आज तुम फँसे हो।"
"और इसीलिए तुम यहाँ आई। मेरे पास। मल्होत्रा तक पहुँचने के लिए।"
"मैंने ये शादी तुम्हें बचाने के लिए नहीं की थी, आरव। मैंने ये उस आदमी के क़रीब जाने के लिए की थी। तुम... तुम बस रास्ता थे।"
"रास्ता। मैं एक रास्ता था। तो ये सब... ये पूरी शादी, वो रातें जब हम साथ काम करते थे, वो... वो रात... सब एक चाल थी?"
"नहीं! आरव, सुनो मेरी बात। जो एक झूठ की तरह शुरू हुआ था, वो... वो कब सच बन गया, मुझे ख़ुद नहीं पता चला। उस रात जो मैंने महसूस किया, वो सच था। मैं तुमसे—"
"बस! बंद करो ये। मैं तुम्हारी कौन सी बात पर यक़ीन करूँ, मीरा? या जो भी तुम्हारा असली नाम है। तुमने मुझसे जो पहला लफ़्ज़ कहा था, वो भी झूठ था। तुम्हारा नाम झूठ, तुम्हारी वजहें झूठ, तुम्हारी हर मुस्कान झूठ। और अब तुम चाहती हो मैं तुम्हारे 'प्यार' पर यक़ीन कर लूँ?"
और यही उस रात का सबसे ज़ालिम सच था। मीरा अपनी ज़िंदगी में पहली बार पूरी तरह सच बोल रही थी, और ये वही एक पल था जब आरव उस पर यक़ीन नहीं कर सकता था। उसके अपने झूठों ने उस इकलौती सच्ची चीज़ को भी ज़हर बना दिया था, जो उसके पास बची थी।
"आरव, please... एक बार मेरी आँखों में देखो।"
"नहीं। मैं अब और नहीं देख सकता। निकल जाओ, मीरा। बस... निकल जाओ मेरे घर से। और कभी लौटकर मत आना।"
वो चिल्लाया नहीं। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बस एक टूटन थी। और वो टूटन किसी भी चीख़ से ज़्यादा गहरी थी। मीरा ने उसका सामान समेटा, और बिना पलटे चली गई। वो इस आदमी की दुनिया तबाह करने आई थी। वो कामयाब हो गई थी। उसे बस इतना नहीं पता था कि उसकी अपनी दुनिया भी उसी रस्सी से बँधी थी।
आधी रात। शहर के दूसरे कोने में, इशा के छोटे से फ़्लैट का दरवाज़ा खुला। इशा, मीरा की इकलौती सहेली, वो अकेली इंसान जो उसके दिल का असली राज़ शुरू से जानती थी। और आज, दस साल में पहली बार, मीरा का वो लोहे का खोल पिघल गया।
"मीरा? तेरा ये चेहरा... क्या हुआ? तू ठीक तो है?"
"खेल ख़त्म, इशा। उसे सब पता चल गया। फ़ाइल... उसने पापा वाली फ़ाइल देख ली। मैंने उसे खो दिया। मैंने... मैंने सब खो दिया।"
और फिर, दस साल में पहली बार, मीरा जोशी रो पड़ी। वो आँसू जो उसने अपने पिता के जाने के बाद से कहीं अंदर बंद कर रखे थे, आज इशा के कंधे पर बह निकले।
"बस कर, मीरा। बहुत हो गया। तूने अपनी पूरी जवानी इस बदले की आग में झोंक दी। मैं तुझे तब से जानती हूँ जब तेरे पापा ज़िंदा थे। उन्होंने तुझे जीना सिखाया था, मरना नहीं। वो आज होते, तो यही कहते, छोड़ दे ये सब।"
"मल्होत्रा को उसके हाल पर छोड़ दे। आरव को उसकी ज़िंदगी जीने दे। और तू, एक बार, सिर्फ़ एक बार, अपने लिए जी। इस शहर से निकल जा, मीरा। नई शुरुआत कर। अभी भी देर नहीं हुई।"
"मैं उसे ऐसे कैसे छोड़ दूँ, इशा? मैंने उसकी हर चीज़ तबाह कर दी। उसकी company, उसका भरोसा, उसका दिल। सब कुछ। मैं भागकर चैन से कैसे जी पाऊँगी?"
"तूने नहीं, मीरा। मल्होत्रा ने तबाह किया। और तू अकेली उसे नहीं हरा सकती। वो आदमी तुझे भी निगल जाएगा, हड्डियों समेत। please, इस बार ख़ुद को बचा ले। बस एक बार।"
इशा सही थी। उसका एक-एक लफ़्ज़ सही था। मीरा ये जानती थी। और इसीलिए उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे मुश्किल फ़ैसला लिया। छोड़ देने का फ़ैसला। उसने अपने आँसू पोंछे, अपना bag उठाया, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
और ठीक उसी पल, जब उसका हाथ दरवाज़े के हैंडल पर था, उसका फ़ोन बज उठा। एक अनजान नंबर। उसने सोचा छोड़ दे। काश उसने छोड़ दिया होता। पर उसने फ़ोन उठा लिया।
उधर से रस्तोगी घर की पुरानी काम वाली बाई की घबराई हुई, रोती हुई आवाज़ आई। मल्होत्रा के आदमी घर पर आए थे, हाथ में कुर्की का notice लेकर। दरवाज़े पर धक्का-मुक्की हुई, चीख़-पुकार। और इसी हंगामे में, दादी...
दादी, जिनका दिल पहले से कमज़ोर था, जो अपने पोते के घर की दहलीज़ पर उन गुंडों के सामने सीना तानकर खड़ी हो गई थीं, अचानक गिर पड़ीं। उन्हें आनन-फानन में hospital ले जाया गया था। और आरव, बिल्कुल अकेला, ICU के बाहर खड़ा था। एक रात में उसकी company राख हो गई थी, और अब उसकी दादी ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थीं।
"दादी... नहीं।"
वही दादी, जिन्होंने मीरा को पहली ही रात पढ़ लिया था, पर नफ़रत से नहीं, प्यार से। जिनकी आवाज़ में मीरा को अपनी ही मरहूम दादी की याद आई थी। ये थी मल्होत्रा की असली चाल। वो सिर्फ़ company के लिए नहीं आया था। वो पूरे परिवार को ख़त्म करने आया था।
मीरा के हाथ से दरवाज़े का हैंडल छूट गया। bag उसकी उँगलियों से फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़ा। पीछे से इशा उसका नाम पुकार रही थी, पर मीरा को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। ये जंग उसने शुरू की थी। और अब वो जानती थी, इसे ख़त्म करने वाली भी सिर्फ़ वही थी।
मीरा जोशी ने अपने आँसू पोंछे। और पहली बार, उसका दुख किसी और चीज़ में बदल गया, किसी ज़्यादा सख़्त, ज़्यादा ख़तरनाक चीज़ में। एक मक़सद में। भाग जाना अब कोई रास्ता नहीं था। अब सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा था, और वो सीधा विक्रम मल्होत्रा से होकर जाता था।