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Chapter 2 of 12

Episode 2: दावत

शर्तें by Hamid Siddiqui

शुक्रवार की रात। पुणे के सबसे महँगे restaurant की चौदहवीं मंज़िल, जहाँ शहर की सारी रोशनियाँ पैरों के नीचे बिछी थीं। आज की रात पर आरव रस्तोगी की पूरी company टिकी थी। एक investor, एक हाँ, और तीन सौ परिवारों की रोज़ी-रोटी बच जाती। पर मीरा जोशी के लिए ये सिर्फ़ एक dinner नहीं था। ये उस आदमी से पहली मुलाक़ात थी, जिसका नाम उसने दस साल हर रात नफ़रत के साथ लिया था।

"मीरा, सुनिए... ये आदमी आसान नहीं है। विक्रम मल्होत्रा जो एक बार देख ले, वो याद रखता है। बस आज की रात, हम एक खुश couple हैं। Please."

"आप साँस लीजिए, मिस्टर रस्तोगी। मैं अपना role जानती हूँ। आप बस वो investment मत गँवाइए।"

"आपको डर नहीं लगता? इतने बड़े आदमी के सामने, इतना सारा झूठ?"

"डर मुझे सिर्फ़ एक ही चीज़ से लगता था, मिस्टर रस्तोगी। और वो बहुत पहले हो चुका। अब तो बस काम बाक़ी है।"

आरव ने उसकी आँखों में देखा। उनमें एक पल के लिए कुछ चमका, कोई बहुत पुरानी चोट, जिसे वो छुपा नहीं पाई। वो कुछ पूछता, पर मीरा ने नज़रें फेर लीं।

आरव को नहीं पता था कि मीरा का असली role क्या था। उसने उस आदमी का चेहरा सिर्फ़ अख़बारों में देखा था। आज पहली बार, वो उसे आँखों में देखने वाली थी।

ठीक नौ बजे, वो आया। महँगा suit, सफ़ेद बाल, और एक मुस्कान जो कमरे में सबसे पहले पहुँचती थी। विक्रम मल्होत्रा।

"आरव! बैठो, बैठो। तुम्हारे पिता के साथ मेरा बहुत पुराना नाता था। बेचारे... वक़्त किसी को नहीं छोड़ता। और ये ज़रूर तुम्हारी ख़ूबसूरत पत्नी होंगी।"

"मीरा। आपसे मिलकर अच्छा लगा, मिस्टर मल्होत्रा। आपके बारे में बहुत सुना है।"

"अच्छा सुना होगा, या सच्चा? आजकल दोनों एक साथ कम ही मिलते हैं।"

"सच्चा सुना है। आप जैसे आदमी की पहचान उसके काम से होती है। और आपका काम तो... मशहूर है।"

मल्होत्रा हँसा। उसे नहीं पता था कि सामने बैठी औरत की हर बात के दो मतलब थे। एक आरव के लिए, और एक सिर्फ़ उसके लिए।

"तो आरव, काम की बात करें। तुम्हारी company कागज़ों पर तो बहुत सुंदर है। पर कागज़ झूठ भी बहुत अच्छा बोलते हैं। तुम मुझसे आख़िर चाहते क्या हो?"

"एक मौक़ा, सर। पच्चीस करोड़ का investment, और मैं इस company को वापस खड़ा कर दूँगा। आपका हर रुपया, ब्याज के साथ लौटेगा।"

"हर रुपया... हर कोई यही कहता है, बेटा। तुम्हारे पिता ने भी यही कहा था। एक बार।"

आरव का चेहरा सख़्त हो गया। मीरा ने देखा, कैसे सिर्फ़ एक वाक्य में मल्होत्रा ने आरव को फिर से एक बच्चा बना दिया। यही उसका तरीक़ा था। पहले इंसान को छोटा करो, फिर सस्ते में खरीद लो।

"मिस्टर मल्होत्रा, मेरे पति शायद नम्र हैं, इसलिए नहीं कहेंगे। तो मैं कहती हूँ। आप पैसा डर के मारे नहीं लगाते, मौक़ा देखकर लगाते हैं। और ये company एक मौक़ा है। बस इसे एक बार मेरी नज़रों से देखिए।"

"ओह? और आप किस नज़र से देखती हैं, मिसेज़ रस्तोगी?"

"एक accountant की नज़र से। इनके खाते मैं देखती हूँ। और मैं आपको यक़ीन से कहती हूँ, इस company की हड्डियाँ मज़बूत हैं। बस कुछ पुराने ज़ख़्म हैं, जो अब भर रहे हैं।"

"पत्नी भी, और accountant भी? आरव, तुम तो छुपे रुस्तम निकले। दोनों काम एक ही औरत से।"

मीरा मुस्कुराई, पर अंदर कुछ जल रहा था। ये वही हँसी थी, वही अंदाज़, जो उसने बचपन में एक बार देखा था। जिस रात इसी आदमी ने उसके पिता को 'दोस्त' कहकर गले लगाया था, और अगली सुबह उन्हें बर्बाद कर दिया था।

"ठीक है। मुझे तुम्हारी company में दिलचस्पी है। पर मैं अंधेरे में पैसा नहीं फेंकता। मेरी एक शर्त है। investment से पहले, मेरे अपने auditors आएँगे। हर खाता, हर entry, अपनी आँखों से देखेंगे। सब साफ़ निकला... तो पैसा तुम्हारा।"

मेज़ के नीचे आरव का हाथ ठंडा पड़ गया। उन्हीं खातों में वो सच दबा था जिसे मीरा अभी सीधा कर रही थी। मल्होत्रा के auditor उस सच को मिनटों में पकड़ लेते।

"ज़रूर सर। हमें... हमें कोई दिक़्क़त नहीं।"

"बिल्कुल भेजिए। हमें इंतज़ार रहेगा।"

ये एक चुनौती थी, और मीरा ने उसे मुस्कुराते हुए क़बूल कर लिया। आरव ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा, जैसे वो पागल हो। उसे नहीं पता था कि मीरा खातों के साथ क्या-क्या कर सकती थी।

"बढ़िया। मुझे ये रात अच्छी लगी। ख़ास तौर पर आप, मिसेज़ रस्तोगी। बहुत दिनों बाद किसी ने मुझसे आँख में आँख डालकर बात की।"

और फिर, जाते-जाते, वो रुका। उसने मीरा की तरफ़ देखा, ज़रा देर ज़्यादा। जैसे कोई भूली हुई बात याद करने की कोशिश कर रहा हो।

"एक बात पूछूँ? आपका चेहरा... कुछ जाना-पहचाना लगता है। मैं बरसों पहले एक आदमी को जानता था। जोशी। रमेश जोशी। आपका उससे कोई रिश्ता तो नहीं?"

कमरे की हवा रुक गई। रमेश जोशी। उसके पिता का नाम, उसी आदमी के मुँह से, जिसने उन्हें मारा था। मीरा का दिल ज़ोर से धड़का, पर उसका चेहरा पत्थर बना रहा।

"जोशी? नहीं। बहुत आम नाम है, मिस्टर मल्होत्रा। शायद आपको कोई और याद आ रहा है।"

"हाँ... शायद। मेरी याददाश्त भी अब धोखा देने लगी है। शुभ रात्रि, मिसेज़ रस्तोगी।"

वो चला गया। पर जाते हुए उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था, जो मीरा को रात भर सोने नहीं देने वाला था। क्या वो जानता था? या बस खेल रहा था? एक बात मीरा को समझ आ गई थी। ये शिकार उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक था जितना वो सोचती थी। और अब, शिकारी की नज़र उस पर भी थी।

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