Chapter 4 of 12
Episode 4: झूठ
अपने सबसे बड़े राज़ को छुपाने के लिए मीरा आरव से पहला झूठ बोलती है, एक ऐसा झूठ जो इस बार उसे बचाने के लिए है। उनके बीच की क़ुर्बत एक अधूरे चुंबन तक पहुँचती है, और तभी मल्होत्रा का auditor दस्तक दे देता है। अब मीरा को अपनी पूरी क़ाबिलियत उल्टी दिशा में लगानी है, सच ढूँढने में नहीं, उसे दफ़नाने में। पर एक माहिर का हाथ हमेशा एक निशान छोड़ ही जाता है।
रात के ढाई बजे। आरव के हाथों में दो coffee mug, और मीरा के हाथों में एक ऐसा सच जो सब कुछ राख कर सकता था। 'क्या मिला तुम्हें?' सवाल हवा में लटका हुआ था। मीरा के पास सिर्फ़ एक पल था। और उस एक पल में, उसने वही किया जो उसने पूरी ज़िंदगी किया था। उसने झूठ बोला।
"कुछ ख़ास नहीं। एक पुराना vendor account है, दो साल से उलझा हुआ। देखने में डरावना लगता है, पर संभल जाएगा। बस थोड़ा वक़्त चाहिए।"
झूठ इतनी आसानी से निकला कि मीरा को ख़ुद पर हैरानी हुई। पर इस बार कुछ अलग था। आज तक उसने झूठ अपने मक़सद के लिए बोले थे। आज पहली बार, उसने एक झूठ किसी को बचाने के लिए बोला। आरव को। उस आदमी को, जिसे बचाना उसके plan में कभी था ही नहीं।
"पता है, तुम जब कहती हो ना कि 'संभल जाएगा', तो सच में यक़ीन हो जाता है। पता नहीं कैसे करती हो ये।"
उसका भरोसा एक चाक़ू की तरह मीरा के अंदर उतर गया। काश उसे पता होता कि जिस औरत पर वो इतना यक़ीन कर रहा है, वही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन भी बन सकती है।
वो आख़िरी file समेटने के लिए एक साथ झुके। और अचानक मीरा का चेहरा आरव के चेहरे से बस कुछ इंच दूर रह गया। वक़्त जैसे थम गया। आरव की नज़र एक पल को उसके होंठों पर ठहरी, फिर उसकी आँखों में लौट आई। और मीरा... मीरा पीछे नहीं हट पाई।
"मीरा... ये जो भी है हमारे बीच, ये contract वाला हिस्सा नहीं है। है ना?"
"मिस्टर रस्तोगी, हमें..."
"आरव। सिर्फ़ आरव। एक बार तो कह दो।"
मीरा के होंठ खुले, उसका नाम लेने को। एक पल के लिए उसका दिल चाहा कि ये लम्हा कभी ख़त्म न हो, कि वो भूल जाए कि वो यहाँ क्यों आई थी। पर तभी—
—मेज़ पर रखा आरव का phone ज़ोर से बज उठा। दोनों एक झटके से अलग हुए, जैसे किसी ने ठंडा पानी डाल दिया हो। आरव ने screen देखी, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मल्होत्रा का auditor है। देशपांडे। कल सुबह ठीक नौ बजे, पूरी team के साथ office आ रहा है।"
कल सुबह। यानी मीरा के पास सिर्फ़ एक रात थी। एक रात, उन सब झूठों को छुपाने के लिए जो आरव के पिता ने कंपनी बचाने की कोशिश में खातों में दबाए थे। और अब उन झूठों के नीचे, मीरा के अपने झूठ भी दबे थे।
पूरी ज़िंदगी मीरा ने एक ही काम किया था, झूठ को सच से अलग करना, numbers में छुपे फ़रेब को खींच निकालना। और आज, पहली बार, उसे ठीक उल्टा करना था। सच को छुपाना। फ़रेब को इतना सफ़ाई से सजाना कि देशपांडे जैसा शिकारी भी धोखा खा जाए।
"मीरा, अगर उन्हें कुछ मिल गया, तो सब ख़त्म। मैं जेल जा सकता हूँ। और ये आँच तुम तक भी आ सकती है। तुम चाहो तो अभी निकल सकती हो। मैं सच में बुरा नहीं मानूँगा।"
"मैं कहीं नहीं जा रही, आरव।"
पहली बार उसने उसे उसके नाम से बुलाया था। आरव ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा। उस एक शब्द में कुछ था, जो किसी contract में नहीं लिखा था। और मीरा को ख़ुद नहीं पता था कि वो ये किसके लिए कर रही है, plan के लिए, या उसके लिए।
"आरव... मेरे नाम से तुम्हारी आवाज़ अच्छी लगती है। काश तुम ये किसी शर्त की वजह से नहीं, अपनी मर्ज़ी से कहतीं।"
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया। क्योंकि सच तो ये था कि अभी, इसी पल, उसने अपनी मर्ज़ी से ही कहा था। और शायद यही बात उसे सबसे ज़्यादा डरा रही थी।
पूरी रात मीरा खातों पर झुकी रही। वही forensic accountant का दिमाग़, पर इस बार एक चोर की तरह काम करता हुआ। उसने entries दोबारा लिखीं, तारीख़ें बदलीं, झूठे bills को असली के बीच ऐसे छुपाया जैसे घने जंगल में एक अकेला पेड़। हर वो रास्ता मिटाया जो मल्होत्रा तक, या उसके पिता तक जाता था।
एक बार उसका हाथ काँपकर रुक गया। एक entry ऐसी थी जिसे छुपाना लगभग नामुमकिन था, आरव के पिता की एक आख़िरी, बेताब हेराफेरी, जो सीधे Meridian Holdings की तरफ़ इशारा करती थी। अगर देशपांडे ये पकड़ लेता, तो धागा सीधे मल्होत्रा तक, और फिर मीरा के अपने बदले तक पहुँच जाता। उसने एक गहरी साँस ली, और उस एक entry को सात छोटे-छोटे झूठे लेन-देन में ऐसे तोड़ दिया कि सच पहचान में ही न आए।
सुबह के चार बजे वो थककर पीछे झुकी। काम लगभग पूरा था। उसने एक नज़र आरव पर डाली, जो सामने sofa पर सो चुका था, थका हुआ, मासूम। और मीरा ने सोचा, मैं तुम्हें बचा भी रही हूँ, और धोखा भी दे रही हूँ। एक ही साँस में, एक ही रात में।
सुबह ठीक नौ बजे देशपांडे आया। पतला, चश्मे वाला, और आँखों में वो ठंडक जो इंसानों से ज़्यादा संख्याओं पर यक़ीन करती है। उसने एक भी शब्द बोले बिना अपना laptop खोला, और खुदाई शुरू कर दी।
घंटे रेंगते रहे। मीरा शांत बैठी रही, चेहरे पर एक हल्की मुस्कान चिपकाए, पर अंदर हर click, हर pdf के साथ उसका दिल धड़कता रहा। उसने हर रास्ता बंद किया था। हर एक। वो जानती थी, उसका काम बेदाग़ है।
"उसे कुछ मिलेगा तो नहीं ना?"
"नहीं। मैंने हर entry ख़ुद जाँची है। मेरा काम perfect है।"
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ग़लती थी। क्योंकि कोई काम perfect नहीं होता। और देशपांडे का सारा हुनर इसी एक बात में था, perfection में दरार ढूँढ निकालना।
दोपहर ढाई बजे, देशपांडे अचानक रुका। उसने अपना चश्मा उतारा, screen के और पास झुका, और उसके होंठों पर एक हल्की, ख़तरनाक सी मुस्कान आ गई। उसने एक entry पर उँगली टिका दी।
'दिलचस्प,' देशपांडे ने धीमे से कहा, उसकी सपाट आवाज़ में पहली बार कोई रंग आया। 'ये entry पिछले कुछ ही दिनों में बदली गई है। बहुत साफ़ हाथों से। इतनी सफ़ाई से कोई आम accountant नहीं कर सकता। ये किसी माहिर का काम है।' और फिर उसने धीरे से अपना सिर उठाया, और सीधे मीरा की आँखों में देखा।
मीरा का ख़ून जम गया। उसने हर रास्ता मिटाया था, पर एक चीज़ वो कभी नहीं मिटा सकती थी, अपनी क़ाबिलियत। वो entry, जिसे सिर्फ़ उसके जैसा कोई छू सकता था, अब देशपांडे के सामने चीख़-चीख़कर कह रही थी कि इस कंपनी में कोई छुपा हुआ माहिर मौजूद है। और उस माहिर का चेहरा, ठीक उसके सामने बैठा था।