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Chapter 5 of 12

Episode 5: दिखावा

शर्तें by Hamid Siddiqui

शहर के सबसे आलीशान hotel का ballroom। झूमर, शैम्पेन, और पुणे का सारा रईस तबक़ा एक ही छत के नीचे। ये एक charity gala था, पर असल में ये एक stage था। और आज रात का सबसे बड़ा तमाशा थे, मिस्टर और मिसेज़ रस्तोगी, शहर का सबसे चमकता हुआ नया जोड़ा। किसी को नहीं पता था कि ये पूरा जोड़ा सिर्फ़ एक कागज़ पर टिका था।

मीरा ने गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी थी, और आरव की बाँह थामे वो हर मेहमान से ऐसे मिल रही थी जैसे सच में इस दुनिया की रानी हो। हर मुस्कान perfect, हर जवाब नपा-तुला। पर आज, उस perfect दिखावे के नीचे, कुछ असली पनप रहा था।

"तुम्हें पता है, तुम आज इस पूरे कमरे को चला रही हो। और किसी को अंदाज़ा भी नहीं कि तुम अंदर से कितनी डरी हुई हो।"

"मैं डरी हुई नहीं हूँ, मिस्टर रस्तोगी।"

"फिर मेरा हाथ इतनी ज़ोर से क्यों थामा हुआ है?"

मीरा ने अपना हाथ ढीला करना चाहा, पर कर नहीं पाई। तभी संगीत बदल गया, एक धीमी, गहरी धुन। आरव ने हौले से उसका हाथ खींचा।

"एक dance? लोगों को उम्मीद है। हमें convincing रहना है, याद है ना?"

वो dance floor पर आ गए। आरव का एक हाथ उसकी कमर पर, दूसरा उसके हाथ में। शुरुआत में ये सिर्फ़ एक performance थी, दुनिया को दिखाने के लिए। पर जैसे-जैसे वो घूमते गए, संगीत में डूबते गए, दिखावा कहीं पीछे छूटता गया।

"लोग देख रहे हैं।"

"देखने दो। मैं तो बस तुम्हें देख रहा हूँ।"

"ये... ये plan में नहीं था।"

"शायद सबसे अच्छी चीज़ें कभी plan में नहीं होतीं।"

और उन कुछ पलों के लिए, संगीत की उन कुछ धड़कनों में, मीरा भूल गई कि वो यहाँ क्यों आई थी। भूल गई बदला, भूल गई वो पीली फ़ाइल, भूल गई कि ये सब एक झूठ था। बस आरव था, वो धुन, और उसके अपने दिल की वो धड़कन जो अब कोई दिखावा नहीं थी। और यही उसकी सबसे ख़तरनाक भूल थी।

धुन ख़त्म हुई। तभी आरव को कुछ investors ने घेर लिया, business की बातें, हाथ मिलाना। और जब मीरा मुड़ी, तो ठीक सामने एक जाना-पहचाना चेहरा खड़ा था। विक्रम मल्होत्रा। हाथ में शैम्पेन के दो glass।

चारों तरफ़ हँसी थी, संगीत था, glass आपस में टकरा रहे थे। पर मीरा और मल्होत्रा के बीच की वो दो क़दम की दूरी, पूरे कमरे की सबसे ठंडी जगह थी।

"अकेली खड़ी एक ख़ूबसूरत औरत, ये किसी भी gala का सबसे बड़ा गुनाह है। एक glass लेंगी? या आप जैसी समझदार औरत शराब से भी परहेज़ करती है?"

"मैं काम के बीच नहीं पीती, मिस्टर मल्होत्रा।"

"काम। हाँ। आप तो हमेशा काम पर ही होती हैं, है ना... मिस जोशी?"

मीरा का दिल एक धड़कन के लिए रुक गया। मिस जोशी। मिसेज़ रस्तोगी नहीं। उसने ख़ुद को सँभालने की कोशिश की, पर मल्होत्रा की आँखों में वो चमक थी जो साफ़ कह रही थी, खेल ख़त्म।

"परेशान मत हो। मुझे शुरू से शक़ था। उस रात तुम्हारा चेहरा... और फिर मेरे auditor ने एक entry दिखाई। इतनी सफ़ाई से बदली हुई, जैसे किसी ने सालों इसी हुनर की training ली हो। एक forensic accountant। रमेश जोशी की बेटी। जो बरसों बाद बदला लेने आई है। मैंने सही पकड़ा ना?"

"अगर आपको सब पता है, तो ये नाटक क्यों कर रहे हैं?"

"क्योंकि तुम मुझे पसंद आई, मीरा। तुम बिल्कुल मेरे जैसी हो। ठंडी, सब्र वाली, और ज़रूरत पड़ने पर बेरहम। और मैं अपने जैसे लोगों को बर्बाद नहीं करता। मैं उन्हें एक offer देता हूँ।"

मीरा चुप रही। उसका सारा plan, दस साल की मेहनत, इस आदमी की मुट्ठी में थी। और वो आराम से मुस्कुरा रहा था, जैसे शतरंज की बाज़ी पहले ही जीत चुका हो।

"एक बात समझ लीजिए, मिस्टर मल्होत्रा। मैं यहाँ डरने नहीं आई। और जो औरत अपना सब कुछ खो चुकी हो, उससे ज़्यादा ख़तरनाक इस दुनिया में कोई नहीं होता। तो आप मुझे offer दे रहे हैं... या मुझसे डरकर मुझे ख़रीदना चाहते हैं?"

"शायद दोनों। देखा? इसीलिए तो तुम पसंद हो मुझे।"

"तुम्हें आरव की company चाहिए, और मुझे भी। ये मेरे साम्राज्य का आख़िरी बचा हुआ टुकड़ा है। और तुम उस company के अंदर हो। तुम वो धागा जानती हो जिसे खींचने भर से ये पूरी company ताश के पत्तों की तरह मेरे हाथ में आ गिरेगी। बस वो धागा खींच दो।"

"और बदले में?"

"बदले में... मैं तुम्हें वो दूँगा जो तुम पूरे दस साल से ढूँढ रही हो। तुम्हारे पिता की बर्बादी के असली कागज़। वो सबूत, जिससे तुम पूरी दुनिया को दिखा सको कि वो बेगुनाह थे। उनका खोया हुआ नाम वापस। तुम्हारा पूरा बदला। सब कुछ, बस एक हस्ताक्षर की दूरी पर।"

मीरा की साँस अटक गई। दस साल। दस साल से वो सिर्फ़ इसी एक चीज़ के लिए जी रही थी, अपने पिता का बेगुनाह नाम। और ये आदमी उसे थाली में सजाकर दे रहा था। सिर्फ़ एक क़ीमत पर। आरव।

वही आरव, जो कुछ ही देर पहले उसके साथ नाच रहा था। वही आरव जिसने उस पर आँख मूँदकर भरोसा किया था। वही आरव, जिसकी मुस्कान अब उसके अपने सपनों में आने लगी थी। उसे बर्बाद करके, वो अपने पिता को वापस पा सकती थी। एक ज़िंदगी, एक नाम के बदले।

एक पल के लिए, सिर्फ़ एक पल के लिए, मीरा ने वो सब अपनी आँखों के सामने देख लिया। अपने पिता का नाम अख़बारों में, बड़े-बड़े अक्षरों में, बेगुनाह लिखा हुआ। मल्होत्रा घुटनों पर। दस साल का बोझ उतरता हुआ। और फिर उसने आरव का चेहरा देखा, और वो पूरी तस्वीर राख होकर बिखर गई। पर सबसे डरावनी बात ये थी, कि उस एक पल में, उसने उस तस्वीर को सच में चाहा था।

"जल्दी मत करो। आराम से सोचना। पर एक बात हमेशा याद रखना, मीरा। मोहब्बत तो आती-जाती रहती है। पर बदला... बदला पूरी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक बार दरवाज़े पर दस्तक देता है। और आज, वो तुम्हारे दरवाज़े पर खड़ा है।"

मीरा को 'नहीं' कहना चाहिए था। उसके किसी भी plan में इस आदमी के साथ कोई सौदा नहीं था। उसके दिल में, अब, आरव था। उसे उसी पल मुड़कर चले जाना चाहिए था। पर वो नहीं मुड़ी। वो वहीं खड़ी रही, ख़ामोश। और उसकी वो ख़ामोशी, ख़ुद में एक जवाब थी। मल्होत्रा धीरे से मुस्कुराया। उसे अपना जवाब मिल चुका था।

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