Chapter 7 of 12
Episode 7: राज़
उस रात के बाद, मीरा एक फ़ैसला करती है, वो मल्होत्रा का सौदा ठुकरा देती है, सिर्फ़ आरव को बचाने के लिए। पर 'ना' सुनना मल्होत्रा को पसंद नहीं, और उसका बदला आरव की company को सात दिन में डुबोने वाला है। जैसे मीरा उसे बचाने के लिए लड़ रही है, उधर आरव एक पुरानी पीली फ़ाइल खोल बैठता है, और दस साल का दफ़न राज़ अचानक उसके हाथों में आ जाता है।
सुबह की पहली रोशनी पर्दों से छनकर कमरे में बिखर रही थी। आरव गहरी नींद में था, चेहरे पर एक ऐसा सुकून जो मीरा ने पहले कभी नहीं देखा था। और उसके बगल में, मीरा जाग रही थी, छत को घूरती हुई। रात ने सब कुछ बदल दिया था। और आरव के वो आख़िरी शब्द अब भी उसके कानों में गूँज रहे थे, 'मीरा, मुझे लगता है मैं सच में तुमसे प्यार करने लगा हूँ।'
उसने सब कुछ ग़लत समझा था। वो इस आदमी को बर्बाद करने आई थी। और आज वो इसी की बाँहों में पड़ी थी, और ये आदमी उससे प्यार करता था। और उसके अपने हाथ में अब भी एक चाक़ू था, मल्होत्रा का वो सौदा। एक 'हाँ', और इस सोते हुए चेहरे की पूरी दुनिया ख़त्म।
"मैं ये नहीं कर सकती। माफ़ करना, पापा... पर मैं ये नहीं कर सकती।"
उस एक पल में, दस साल की नफ़रत हार गई। मीरा ने फ़ैसला कर लिया था। वो धीरे से उठी, और कमरे से बाहर निकल गई। उसे एक फ़ोन करना था, जो वो कभी नहीं करना चाहती थी।
एक घंटे बाद, शहर के एक सुनसान cafe में, वो मल्होत्रा के सामने बैठी थी। उसने कोई भूमिका नहीं बाँधी, सीधे बात पर आ गई।
"मैं आपका सौदा नहीं करूँगी, मिस्टर मल्होत्रा। आरव की company को कुछ नहीं होगा, कम से कम मेरी तरफ़ से नहीं। आप अपने सबूत अपने पास रखिए। मुझे नहीं चाहिए। कुछ भी नहीं।"
"दस साल का बदला, एक ही रात में पिघल गया? वाह। मैंने कहा था ना, मोहब्बत आती-जाती रहती है। पर मुझे अंदाज़ा नहीं था कि तुम इतनी सस्ते में बिक जाओगी, वो भी एक डूबते हुए आदमी के हाथों।"
"ये मेरा फ़ैसला है। और ये आख़िरी है।"
"नहीं, मीरा। ये तुम्हारा फ़ैसला नहीं, तुम्हारी ग़लती थी। देखो, मुझे 'ना' सुनने की आदत नहीं है। और जो लोग मुझे 'ना' कहते हैं, मैं उन्हें सिखाता हूँ कि उस लफ़्ज़ की क़ीमत क्या होती है।"
मल्होत्रा ने इत्मीनान से अपना फ़ोन निकाला, कुछ देर screen देखी, और सिर्फ़ एक message भेजा। फिर उसने फ़ोन वापस रखा और मुस्कुराया।
"अभी-अभी मैंने आरव की company के उस loan का एक बड़ा हिस्सा वक़्त से पहले वापस माँग लिया है। Meridian Holdings के कागज़ों में वो clause हमेशा से छुपा था। पैंतालीस करोड़, सात दिन में। वो दे नहीं पाएगा। उसकी company ख़ुद-ब-ख़ुद डूब जाएगी। मुझे उसे ख़रीदना भी नहीं पड़ेगा। मैं बस आराम से बैठकर तमाशा देखूँगा।"
मीरा की साँस अटक गई। वो आरव को बचाने के लिए सौदा ठुकराने आई थी। और उसी ठुकराने ने आरव की मौत का परवाना लिख दिया था।
"और हाँ, एक आख़िरी बात, बेटी। मुझे बेनक़ाब करने की कोशिश भी मत करना। याद है मेरे auditor को मिली वो entry? उन खातों पर तुम्हारी उँगलियों के निशान हैं। और वो पुरानी पीली फ़ाइल, जो तुम सीने से लगाए घूमती हो? एक लफ़्ज़ मेरे मुँह से निकला, और तुम एक बेचारी, बेगुनाह बेटी नहीं रहोगी। तुम वो ठग बन जाओगी जिसने एक company को लूटने के लिए शादी रचाई। अब सोच लो।"
मीरा वहाँ से ख़ाली हाथ नहीं लौटी। वो अपने और आरव, दोनों के गले में एक फंदा लेकर लौटी। वो उसे बचाने गई थी, और हालात पहले से कहीं बदतर कर आई थी।
दोपहर तक खबर पूरे office में आग की तरह फैल गई। Loan early call। पैंतालीस करोड़। फ़ोन लगातार बजते रहे, चेहरे उतरते गए। और इन सबके बीच खड़ा था आरव, ये समझने की कोशिश करता हुआ कि जो आदमी कल तक हाथ मिला रहा था, वो आज अचानक क्यों पलट गया।
"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा मीरा। मल्होत्रा को अचानक क्या हो गया? सात दिन। सात दिन में पैंतालीस करोड़। ये नामुमकिन है।"
"पर एक बात का सुकून है। अच्छा हुआ तुम मेरे साथ हो। पता नहीं तुम्हारे बिना मैं ये सब कैसे झेलता।"
उसके इन शब्दों ने मीरा के अंदर कुछ चटका दिया। वो उसके साथ थी। पर वो ये कभी नहीं कह सकती थी कि ये पूरा तूफ़ान उसी की वजह से आया था।
"हम कोई रास्ता निकालेंगे, आरव। मैं वादा करती हूँ। मैं तुम्हें डूबने नहीं दूँगी।"
और इस बार, वो झूठ नहीं बोल रही थी। पूरी रात मीरा खातों में डूबी रही, पर इस बार कुछ छुपाने के लिए नहीं, कुछ बचाने के लिए। उसका वही हुनर, जो उसने इस आदमी को बर्बाद करने के लिए सीखा था, आज उसी को बचाने में लगा था। पर वक़्त बहुत कम था, और झूठ बहुत ज़्यादा।
रात गहरी हो चुकी थी। थकी हुई मीरा कुछ पल के लिए सोफे पर आँख लगाने चली गई थी। और आरव, बेचैन, किसी पुराने case की मिसाल ढूँढ रहा था, कोई कानूनी रास्ता जिससे वो ये early call रोक सके। मीरा ने एक बार ज़िक्र किया था कि उसके पास पुरानी फ़ाइलों का एक ज़ख़ीरा है।
उसने मीरा का bag खोला। उसे कोई case file नहीं मिली। उसे मिली एक पुरानी, पीली पड़ चुकी फ़ाइल, जिसके किनारे वक़्त ने कुतर दिए थे।
उसने फ़ाइल खोली। सबसे ऊपर एक धुँधली सी तस्वीर थी। एक छोटी बच्ची, कोई बारह साल की, एक प्यारे से चेहरे वाले आदमी के साथ हँसती हुई। तस्वीर के पीछे, बच्चों वाली टेढ़ी लिखाई में लिखा था, 'मैं और पापा।'
और नीचे, कागज़ों पर वो नाम लिखा था, जिसने आरव की रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ा दी। रमेश जोशी।
रमेश जोशी। वही नाम जो मल्होत्रा ने उस रात dinner पर लगभग ले लिया था। दिवालिया होने के कागज़। Meridian Holdings। और एक काँपते हाथ से लिखा हुआ आख़िरी नोट, 'मीरा, इन लोगों को इन्हीं की ज़बान में जवाब देना।'
"जोशी... मीरा जोशी।"
टुकड़े आपस में जुड़ने लगे। वो forensic accountant, जो कहीं से अचानक उसकी ज़िंदगी में आ गई थी। जो मल्होत्रा को इतनी अच्छी तरह संभालना जानती थी। जिसने 'अपनी वजहों' से एक अजनबी से शादी कर ली थी। आरव को पूरी कहानी नहीं पता थी। उसे नहीं पता था कि मीरा उसे बर्बाद करने आई थी। पर पहली बार उसे ये एहसास हुआ कि मीरा किसी और ही वजह से उसकी ज़िंदगी में आई थी। और वो वजह, अभी उसके काँपते हाथों में थी।
तभी, कमरे की बत्ती जल उठी। आरव ने चौंककर पलटकर देखा। दरवाज़े पर मीरा खड़ी थी। और आरव के हाथ में, पूरी खुली हुई, उसके पिता की वो फ़ाइल थी।
"मीरा... ये क्या है? ये... ये सब क्या है?"
मीरा की दुनिया एक पल में थम गई। दस साल का वो राज़, जिसे उसने अपने सीने में दफ़न करके रखा था, आज उसी आदमी के हाथों में खुला पड़ा था, जिससे वो प्यार करने लगी थी। अब कोई झूठ नहीं बचा था। अब सिर्फ़ सच बाकी था। और वो सच, अपने साथ सबसे बड़ी तबाही लेकर आने वाला था।