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Chapter 9 of 12

Episode 9: वापसी

शर्तें by Hamid Siddiqui

रात के तीन बजे। hospital का वो ठंडा, सफ़ेद corridor। ICU के दरवाज़े के ऊपर जलती लाल बत्ती। और उसके नीचे एक बेंच पर बैठा आरव, बिल्कुल खाली, टूटा हुआ। एक ही रात में उसकी company राख हो गई थी, और अब दीवार के उस पार उसकी दादी साँसों से लड़ रही थीं। तभी, उसे क़दमों की आहट सुनाई दी। उसने सिर उठाया। सामने मीरा खड़ी थी।

"तुम? यहाँ तुम्हारी क्या ज़रूरत है? जो तुम चाहती थी, वो तो हो गया। मैं बर्बाद हो गया। जाओ, जाकर अपने पापा को बता दो, बदला पूरा हुआ।"

उसका एक-एक लफ़्ज़ एक चाक़ू था, और मीरा ने हर चाक़ू को अपने सीने में उतरने दिया। वो इसी की हक़दार थी।

"मैं माफ़ी माँगने नहीं आई, आरव। मुझे पता है उसकी अब कोई गुंजाइश नहीं बची।"

"तो फिर क्यों आई हो?"

"क्योंकि कहीं इस रास्ते में, तुम्हें बर्बाद होते देखना मेरी जीत नहीं रही, आरव। वो मेरी सबसे बड़ी सज़ा बन गई।"

आरव ने उसकी तरफ़ देखा। और पहली बार, वो कहानी जो उसने अपने मन में गढ़ी थी, कि सब कुछ झूठ था, उसमें एक दरार आ गई। क्योंकि जिस औरत को सिर्फ़ बदला चाहिए था, उसके पास इस corridor में, रात के तीन बजे, इन सूजी हुई आँखों के साथ खड़े होने की कोई वजह नहीं थी।

"तुम मुझ पर यक़ीन मत करो। मुझे उसकी ज़रूरत भी नहीं। पर एक बात सुन लो। इस पूरी दुनिया में अगर कोई विक्रम मल्होत्रा को हरा सकता है, तो वो मैं हूँ। मैंने दस साल उस आदमी को पढ़ा है। उसकी हर चाल, उसका हर Meridian, उसका हर झूठ, मुझे ज़बानी याद है।"

"तुम्हें मुझसे नफ़रत करने का पूरा हक़ है, आरव। और जिस दिन ये ख़त्म होगा, मैं चली जाऊँगी। पर अगर तुम्हें दादी को बचाना है, उन तीन सौ परिवारों को बचाना है, तो आज की रात, तुम्हें मेरी ज़रूरत है।"

ये सच था, और सबसे ज़ालिम क़िस्म का सच। ऐसा सच जिसे आरव ठुकरा नहीं सकता था। उसने उन बंद ICU के दरवाज़ों की तरफ़ देखा, जिनके पीछे उसका इकलौता बचा हुआ परिवार साँस लेने की जंग लड़ रहा था।

"मैं तुम पर भरोसा नहीं करता, मीरा। एक पल के लिए भी नहीं। और ये ख़त्म होते ही, तुम मेरी ज़िंदगी से हमेशा के लिए चली जाओगी। पर अभी... अभी मेरे पास कोई और रास्ता नहीं है। ठीक है। हम साथ लड़ेंगे। प्यार से नहीं, मजबूरी से।"

और इस तरह, एक सबसे अनोखा गठबंधन पैदा हुआ। भरोसे पर नहीं, मोहब्बत पर नहीं, बस एक साझे दुश्मन और एक मरती हुई बूढ़ी औरत पर टिका हुआ। दो लोग, जिनके पास एक-दूसरे से नफ़रत करने की हर वजह थी, एक ही चीज़ से बँधे, विक्रम मल्होत्रा का अंत।

अगले कुछ दिन एक अजीब जंग के थे। वो एक ही कमरे में काम करते, बारी-बारी से सोते, spreadsheets के ऊपर ठंडा खाना खाते। और उन दोनों के बीच, काँच की एक दीवार खड़ी थी। वो एक-दूसरे को देख सकते थे, पर छू नहीं सकते थे।

"हम ये loan भरकर नहीं जीत सकते, आरव। पैंतालीस करोड़ हमारे पास नहीं हैं। हमें जड़ पर वार करना होगा। Meridian को बेनक़ाब करना होगा, उस फ़रेब को जिस पर मल्होत्रा का पूरा साम्राज्य खड़ा है। अगर हम साबित कर दें कि उसकी कंपनी एक जुर्म है, तो ये पूरा loan, ये पूरा मल्होत्रा, कानून की एक ही चोट से ढह जाएगा।"

"और वो सबूत? वो है कहाँ?"

"वहीं, जहाँ दस साल से है। ख़ुद मल्होत्रा के पास। उसकी अपनी तिजोरी में बंद। वही सबूत, जो मेरे पापा को बेगुनाह साबित करता है, और मल्होत्रा को एक मुजरिम।"

देर रात, थकान में डूबे, एक पल के लिए वो पुरानी सहूलियत लौट आई। मीरा का हाथ एक file की तरफ़ बढ़ा, आरव का भी, और एक लम्हे के लिए दोनों रुक गए, बहुत क़रीब। फिर दोनों पीछे हट गए। ज़ख़्म बहुत ताज़ा था, और मोहब्बत बहुत ख़तरनाक।

"पता है सबसे बुरा क्या है? सब कुछ जानने के बाद भी, आज भी, इस कमरे में तुम्हारे साथ बैठना मुझे अच्छा लगता है। और मैं इसके लिए ख़ुद से नफ़रत करता हूँ।"

"मुझे तुम्हारी माफ़ी नहीं चाहिए, आरव। बस ये जंग ख़त्म होने दो। फिर मैं चली जाऊँगी, और तुम मुझे कभी याद भी नहीं करोगे।"

उसने ये कह तो दिया, पर उसके अंदर का एक हिस्सा, वो हिस्सा जिसे उसने दस साल बदले की मिट्टी के नीचे दबा रखा था, चीख़कर कह रहा था कि वो जाना नहीं चाहती। पर वो ये ख़्वाहिश रखने का हक़ कब का खो चुकी थी।

और फिर, loan के कागज़ों में गहरे, मीरा को वो दरवाज़ा मिल गया। उस सबूत तक पहुँचने का इकलौता रास्ता। और जब उसे समझ आया कि उस रास्ते की क़ीमत क्या है, तो उसके चेहरे का सारा रंग उड़ गया।

"उस तिजोरी तक पहुँचने का सिर्फ़ एक रास्ता है। मुझे... मुझे वापस उसके पास जाना होगा। मल्होत्रा के पास। उसे यक़ीन दिलाना होगा कि मैंने उसका सौदा क़बूल कर लिया है।"

"नहीं। बिल्कुल नहीं। वो जानता है तुम कौन हो। उसके पास तुम्हारे ख़िलाफ़ हर सबूत है, वो entry, तुम्हारी फ़ाइल, सब कुछ। तुम उसके पास गई, और अगर उसे ज़रा सा भी शक़ हुआ, तो वो तुम्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।"

और वहीं, उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जिसे वो छुपाना चाहता था। उसके लिए डर। उसकी फ़िक्र। वो जज़्बात जिन्हें वो अब भी महसूस नहीं करना चाहता था। उसे अब भी उसकी परवाह थी। और उस पल, ये बात दोनों ने साफ़ सुन ली।

"ये अकेला रास्ता है, आरव। उस सबूत तक पहुँचने का अकेला रास्ता। और उसके बिना, दादी, तुम, ये company, सब हार जाएँगे। मैं ये कर सकती हूँ। और इसीलिए, मुझे ये करना होगा।"

वापस मल्होत्रा की माँद में। उस आदमी के पास, जिसके हाथ में उसके ख़िलाफ़ हर हथियार था, जो उसका हर राज़ जानता था। अकेले। ये उसकी ज़िंदगी का सबसे ख़तरनाक क़दम था। और जैसे ही मीरा ने आरव की आँखों में छुपे उस डर को देखा, उसने अपना फ़ैसला कर लिया।

"मैं उसके पास वापस जा रही हूँ। और इस बार, मैं ख़ाली हाथ नहीं लौटूँगी।"

बाहर, hospital की खिड़की के पार, शहर की रोशनियाँ रात के अँधेरे में काँप रही थीं। मीरा जोशी एक बार फिर शेर की माँद में क़दम रखने वाली थी। पर इस बार वो शिकार नहीं थी। इस बार, वो ख़ुद एक शिकारी थी। और शिकारी कभी ख़ाली हाथ नहीं लौटता।

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