Chapter 11 of 12
Episode 11: हिसाब
मल्होत्रा समझता है कि उसने जीत लिया है, उसके हाथ में मीरा की हेराफेरी का सबूत है। पर वो भूल गया कि वो एक accountant से लड़ रहा है। मीरा अपना असली जाल बिछाती है, और दस साल का दबा हुआ सच, उसके पिता की बेगुनाही, आख़िरकार सामने आता है। पर इस आख़िरी हिसाब में मीरा को अपने सबसे बड़े हथियार और अपने सबसे गहरे ज़ख़्म के बीच चुनना है। और जीत की क़ीमत, वो किसी ने नहीं सोची थी।
मल्होत्रा का दफ़्तर, सुबह की रोशनी में और भी ठंडा लग रहा था। मेज़ पर एक फ़ाइल रखी थी, मीरा की हेराफेरी का सबूत। वही entry, वही धागा जिसे देशपांडे ने पकड़ा था, अब मल्होत्रा के हाथ में था। और उसके साथ, मीरा की पूरी ज़िंदगी।
"सीधी बात करते हैं, मीरा। ये सबूत तुम्हें सलाख़ों के पीछे भेजने के लिए काफ़ी है। तो अब दो ही रास्ते हैं। या तो तुम मेरे साथ आ जाओ, आरव को छोड़ दो, उसकी company मेरे नाम कर दो। या फिर मैं ये फ़ाइल पुलिस को दे दूँ, और तुम और तुम्हारा आरव, दोनों डूब जाओ। सोच लो।"
मीरा का सिर झुका हुआ था, कंधे ढले हुए। मल्होत्रा मुस्कुराया। ये हारी हुई औरत का चेहरा था, उसने ज़िंदगी में सैकड़ों बार देखा था। उसे नहीं पता था कि ये चेहरा बाक़ी सबसे अलग था।
"आप सही कह रहे हैं, मिस्टर मल्होत्रा। आप हमेशा दो कदम आगे रहते हैं। पर इस बार आपने एक छोटी सी ग़लती कर दी।"
"आप पिछले दस साल से बड़े-बड़े businessmen से लड़ते आए हैं। और मैं... मैं एक accountant हूँ।"
मीरा ने अपने bag से एक छोटी सी pen drive निकाली, और धीरे से मेज़ पर रख दी। मल्होत्रा की मुस्कान एक पल के लिए काँपी।
"इसमें Meridian Holdings की पूरी कुंडली है। हर नकली कंपनी, हर झूठा लेन-देन, हर वो आदमी जिसे आपने बर्बाद किया। सिर्फ़ मेरे पिता नहीं, मिस्टर मल्होत्रा। पैंतालीस और लोग। दस साल का पूरा हिसाब, एक-एक रुपये का। पूरी तरह तैयार, सीधे EOW के लिए।"
"और अगर तुमने ये किया, तो तुम भी जेल जाओगी। वो हेराफेरी तुम्हारी है। तुम मुझे डुबाओगी, तो ख़ुद भी डूबोगी।"
"हाँ। शायद। पर ज़रा हिसाब लगाइए। आप अपना पूरा साम्राज्य खोएँगे, अपनी इज़्ज़त, अपनी आज़ादी, सब कुछ। और मैं? मैं सिर्फ़ कुछ साल। और सच कहूँ? आपको बर्बाद होते देखने के लिए, वो क़ीमत मैं हँसते हुए चुका दूँगी।"
कमरे की हवा बदल गई। पहली बार, विक्रम मल्होत्रा की आँखों में वो चीज़ उतरी, जो उसने उम्र भर दूसरों की आँखों में डाली थी। डर।
"और अब वो बात, जो मैं दस साल से आपके मुँह पर कहना चाहती थी। मेरे पिता, रमेश जोशी, उन्होंने आपकी Meridian में कभी पैसा नहीं डुबाया। आपने उन्हें फँसाया। उनके नकली दस्तख़त बनाए, उनके नाम वो कर्ज़ चढ़ाया जो उन्होंने कभी लिया ही नहीं। और जब वो सच के लिए लड़े, तो आपने उन्हें चोर साबित कर दिया।"
"वो एक ईमानदार आदमी थे। और वो एक मुजरिम का दाग़ माथे पर लेकर इस दुनिया से गए। उस आख़िरी रात उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर सिर्फ़ इतना कहा था, बेटा, मैंने कुछ नहीं किया। और मैं उनकी आँखों में सच देख सकती थी। उस दिन मैं सोलह साल की थी।"
"तुम्हारे पिता एक कमज़ोर आदमी थे, मीरा। मैंने बस उस कमज़ोरी का इस्तेमाल किया। ये business है। इसमें ईमानदार और भावुक लोग सबसे पहले हारते हैं।"
और ये थी वो बात, जिसका इक़बाल सुनने के लिए मीरा दस साल जी थी। पर जब वो सुनी, तो वैसी नहीं लगी जैसी उसने सोची थी। कोई जश्न नहीं हुआ, कोई जीत नहीं। बस एक पुरानी, थकी हुई टीस उठी, और शांत हो गई।
अब हिसाब मीरा के हाथ में था। सबूत, इक़बाल, सब कुछ। वो इस आदमी को इसी पल मिट्टी में मिला सकती थी। दस साल का सपना उसकी मुट्ठी में काँप रहा था। पर सामने दो रास्ते थे।
एक रास्ता सीधा था, और बेरहम। Meridian को आज ही, अभी गिरा दो। पर उस आग में वो ग़ैरक़ानूनी कर्ज़, वो company, आरव, और तीन सौ परिवार, सब जलकर राख हो जाते। उसका बदला आरव की लाश पर खड़ा होता।
दूसरा रास्ता धीमा था, मुश्किल, सब्र माँगता हुआ। कानून के हाथ में सबूत दो। वो ग़ैरक़ानूनी कर्ज़ रद्द करवाओ, company बचाओ, आरव को बचाओ। और मल्होत्रा को बर्बादी नहीं, सज़ा दिलाओ। पर इस रास्ते में मीरा का अपना बदला, वो जंगली, मीठा बदला, कभी पूरा न होता।
मीरा ने आरव का चेहरा सोचा। दादी का। उन तीन सौ घरों के चूल्हों का। और दस साल में पहली बार, उसने अपना हाथ उस हथियार से हटा लिया, जिसे उसने इतने बरस अपने आँसुओं से धार दी थी।
"मैं आपको बर्बाद नहीं करूँगी, मिस्टर मल्होत्रा।"
"क्या?"
"मैं आपको सज़ा दिलाऊँगी। फ़र्क समझते हैं दोनों में? बर्बादी में सिर्फ़ मेरा गुस्सा होता। सज़ा में मेरे पिता का इंसाफ़ है। उन्हें मेरा बदला नहीं चाहिए था। उन्हें बस अपना नाम वापस चाहिए था। और वो मैं उन्हें कानून से दिलाऊँगी, आपकी लाश पर खड़े होकर नहीं।"
उस एक पल में, मीरा जोशी ने अपनी ज़िंदगी का सबसे मुश्किल काम किया। उसने वो हथियार नीचे रख दिया, जिसे उसने दस साल सींचा था। उसने बदले की जगह इंसाफ़ चुना, और अपनी भूख की जगह आरव को। उसने अपने बदले को अपने ही हाथों राख कर दिया, और जिसे बर्बाद करने आई थी, उसे बचाना चुना।
सबूत वहाँ पहुँचे, जहाँ उन्हें पहुँचना चाहिए था। किसी क़ातिल के पास नहीं, किसी अख़बार के पास नहीं, बल्कि EOW के पास, fraud की जाँच करने वालों के पास। ख़ामोश, दर्ज, और जिनसे इनकार नामुमकिन था। एक forensic accountant का बदला, ऐसे नंबरों में लिखा, जो कभी झूठ नहीं बोलते।
कुछ ही हफ़्तों में Meridian Holdings की एक-एक परत खुलने लगी। आरव की company पर चढ़ा वो ग़ैरक़ानूनी कर्ज़ रद्द हो गया। और विक्रम मल्होत्रा का साम्राज्य, जो दस साल के दबे हुए झूठ पर खड़ा था, अंदर से दरकने लगा। जो आदमी हमेशा दो कदम आगे रहता था, उसने उस औरत को आते कभी नहीं देखा, जिसके हाथ में सिर्फ़ एक calculator था।
पर हर जीत की एक क़ीमत होती है। मल्होत्रा के ख़िलाफ़ केस को पत्थर की लकीर बनाने के लिए, मीरा को वो सब सौंपना पड़ा, वो खाते भी जिनसे उसने ख़ुद छेड़छाड़ की थी। उसने अपना गुनाह छुपाया नहीं। मल्होत्रा को डुबाने के लिए, उसने ख़ुद को भी उसी पानी में उतार दिया।
उसने आरव की company बचा ली थी। उसने अपने पिता का नाम, दस साल देर से ही सही, साफ़ कर दिया था। और शायद उसी एक साँस में, अपनी आज़ादी भी दाँव पर लगा दी थी। उसके ख़िलाफ़ जाँच अब तय थी।
तूफ़ान थम चुका था। और उसके बाद की उस गहरी ख़ामोशी में, आरव और मीरा आमने-सामने खड़े थे। अब आरव सब जानता था। उसने अपनी आँखों से देखा था कि कैसे मीरा ने अपना दस साल का बदला, अपनी आज़ादी, सब कुछ उसके लिए जला दिया।
"तुमने ये सब... मेरे लिए किया। उन सब बातों के बाद भी, जो मैंने उस रात तुमसे कही थीं।"
"मैंने ये तुम्हारी माफ़ी पाने के लिए नहीं किया, आरव। मैंने ये इसलिए किया, क्योंकि ये सही था। और क्योंकि तुम्हें बर्बाद करके अपने पिता को वापस पाना, वो जीत नहीं होती। वो बस एक और बर्बादी होती।"
जंग ख़त्म हो चुकी थी। मल्होत्रा गिर चुका था। उसके पिता को उनका नाम वापस मिल गया था। पर आरव के सामने खड़ी, उस थमी हुई ख़ामोशी में, मीरा को एहसास हुआ कि सबसे मुश्किल सवाल का जवाब अभी बाकी था। 'क्या वो जीत गई?' नहीं। बल्कि, 'इतना सब एक-दूसरे के साथ करने के बाद... क्या अब भी कोई हम बचा है?' और उस सवाल का जवाब, उन दोनों में से किसी के पास नहीं था।