अध्याय 3 / 12
Episode 3: खाता
शर्तें द्वारा Hamid Siddiqui
मल्होत्रा के auditors आने में बस दस दिन बाक़ी हैं, और रात के दो बजे खातों पर झुके मीरा और आरव के बीच की दीवारें गिरने लगती हैं। आरव अपना दर्द खोलता है, और मीरा पहली बार उसे एक मोहरा नहीं, एक इंसान की तरह देखती है। पर तभी पुराने कर्ज़ के कागज़ों में उसे एक नाम मिलता है, जो उसके बदले और उसके बढ़ते एहसासों को एक ही नामुमकिन गाँठ में बाँध देता है।
रात के दो बजे। पूरा शहर सो चुका था, पर रस्तोगी house की उस छोटी सी study में अब भी रोशनी जल रही थी। मेज़ पर खातों के पहाड़, ठंडी coffee के दो मग, और दो लोग, जो थककर भी रुक नहीं सकते थे। दस दिन। मल्होत्रा के auditors आने में सिर्फ़ दस दिन बचे थे।
मीरा की आँखें numbers पर दौड़ रही थीं। सामने बैठे आरव की टाई कब की ढीली पड़ चुकी थी, बाल बिखरे हुए। पहली बार वो उसे एक रईस businessman की तरह नहीं, एक थके हुए इंसान की तरह दिख रहा था।
"पता है मीरा, बचपन में मुझे ये सब बिल्कुल पसंद नहीं था। ये company, ये numbers, ये सब। मैं तो painter बनना चाहता था। हँसी आती है ना?"
"नहीं। फिर यहाँ कैसे पहुँचे?"
"एक phone call। एक रात। Papa का accident। और अगली सुबह, तीन सौ लोगों की रोज़ी-रोटी मेरे हाथ में थी। बाईस साल का था मैं। तब से बस... यही चल रहा है। रुकने का वक़्त ही नहीं मिला।"
मीरा का पेन एक पल को रुक गया। उसने सोचा था कि आरव रस्तोगी एक बिगड़ा हुआ, घमंडी वारिस होगा। पर ये आदमी तो उसी की तरह था। एक ऐसा बोझ ढोता हुआ, जो उसने ख़ुद कभी चुना ही नहीं था।
"पर सबसे अजीब बात पता है क्या है? पिछले कई सालों से ये घर हमेशा खाली सा लगता था। और अब, तुम्हारे आने के बाद... पता नहीं। थोड़ा कम खाली लगता है।"
मीरा ने नज़रें झुका लीं। ये सबसे ख़तरनाक पल था। क्योंकि उसके लिए ये घर एक मैदान-ए-जंग था, और ये आदमी उसका मोहरा। पर आरव की आँखों में जो था, वो कोई खेल नहीं था। वो सच था। और सच हमेशा मीरा के plans को मुश्किल बना देता था।
"और तुम? तुम इतनी अच्छी हो इस काम में। numbers जैसे तुमसे बात करते हैं। ये हुनर आया कहाँ से?"
"मेरे पिता से। वो भी हिसाब-किताब के आदमी थे। कहते थे, numbers कभी झूठ नहीं बोलते, मीरा। झूठ तो लोग बोलते हैं।"
"थे? मतलब, वो अब..."
"बहुत साल हो गए। मैं उनके बारे में बात नहीं करती।"
आरव ने और कुछ नहीं पूछा। पर उसने मीरा की तरफ़ ऐसे देखा, जैसे पहली बार उस दीवार के पीछे झाँक रहा हो जो वो हमेशा अपने और दुनिया के बीच खड़ी रखती थी। कमरे में कुछ बदल गया था। हवा थोड़ी और गहरी हो गई थी।
रात और गहराती गई। coffee कब की ख़त्म हो चुकी थी, पर कोई उठा नहीं। एक ही फ़ाइल पर झुकते हुए, उनके हाथ एक ही पन्ने पर आ मिले, और एक पल को किसी ने अपना हाथ नहीं हटाया। मीरा को अपने दिल की धड़कन अपने ही कानों में सुनाई देने लगी।
"मीरा..."
"काम कीजिए, मिस्टर रस्तोगी। हमारे पास वक़्त नहीं है।"
पर उसकी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो वो चाहती थी। आरव हल्के से मुस्कुराया और पीछे हट गया। 'मैं और coffee बना के लाता हूँ,' उसने कहा, और उठकर चला गया। मीरा ने एक लंबी साँस छोड़ी। ये नहीं होना चाहिए था। ये उसके plan में नहीं था।
अकेली बैठी, मीरा ने ख़ुद को ज़बरदस्ती वापस काम में झोंक दिया। भावनाएँ बाद में। हमेशा बाद में। उसने कंपनी के पुराने loan के कागज़ उठाए, वही कर्ज़ जो आरव की कंपनी की जान निचोड़ रहा था। और तभी, एक नाम पर उसकी नज़र अटक गई।
"Meridian Holdings... ये नाम कहीं देखा है मैंने।"
सबसे बड़ा कर्ज़ किसी bank का नहीं था। वो एक private company से आया था। Meridian Holdings। एक shell company, जिसका कोई चेहरा नहीं था, सिर्फ़ कागज़ों पर एक नाम। मीरा ने ये नाम पहले भी कहीं देखा था। पर कहाँ?
उसके हाथ धीरे-धीरे ठंडे पड़ने लगे। उसने अपने bag से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी फ़ाइल निकाली, जिसे वो हर जगह अपने साथ रखती थी। उसके पिता की फ़ाइल। उनकी बर्बादी की फ़ाइल। और उसमें, दस साल पुराने एक कागज़ पर, वही नाम लिखा था। Meridian Holdings।
उसने काँपते हाथों से दोनों कागज़ आमने-सामने रख दिए। वही registration number। वही पता, एक ऐसा office जो शायद कभी खुलता ही नहीं था। और सबसे नीचे, वही टेढ़े-मेढ़े दस्तख़त, जो उसके पिता की बर्बादी के कागज़ों पर भी मौजूद थे। अब कोई शक़ बाक़ी नहीं था।
वही company जिसने उसके पिता को कर्ज़ के जाल में फँसाकर डुबो दिया था, आज ठीक उसी तरह आरव की कंपनी का गला घोंट रही थी। दो अलग कहानियाँ, दो अलग बर्बादियाँ, पर दोनों के पीछे एक ही हाथ था। विक्रम मल्होत्रा।
"नहीं... ये नहीं हो सकता।"
मीरा की पूरी दुनिया एक पल में उलट गई। उसका plan बहुत simple था। मल्होत्रा के क़रीब जाओ, उसे बर्बाद करो, और चुपचाप चले जाओ। पर अब? अब मल्होत्रा को गिराने का मतलब था वो कर्ज़ खींचना, जो आरव की कंपनी को पल भर में डुबो देता। तीन सौ परिवार। आरव का सपना। उसके पिता का सपना।
उसका बदला, और जिस आदमी की आँखों में वो अभी-अभी डूबने लगी थी, दोनों एक ही धागे से बँधे थे। एक को बचाने के लिए उसे दूसरे की क़ुर्बानी देनी पड़ती। और मीरा को नहीं पता था कि वो किसे चुनेगी।
"मैं ये किसी के साथ नहीं कर सकती... पर मैं अब रुक भी नहीं सकती।"
उसे अपने पिता का चेहरा याद आया। वो आख़िरी रात, जब टूटी हुई आवाज़ में उन्होंने कहा था, 'मीरा, इन लोगों को इन्हीं की ज़बान में जवाब देना।' पूरे दस साल उसने ख़ुद को सिर्फ़ इसी एक वादे पर ज़िंदा रखा था। और आज पहली बार, उस वादे की क़ीमत एक मासूम सी मुस्कान थी।
वो उस पन्ने को ऐसे घूरती रही, जैसे घूरने भर से वो नाम मिट जाएगा। उसे आरव के लौटते क़दमों की आहट सुनाई ही नहीं दी।
"ये लो, फ्रेश coffee। और तुम तो ऐसे बैठी हो जैसे अभी-अभी कोई भूत देख लिया हो।... मीरा? क्या हुआ? क्या मिला तुम्हें?"
मीरा ने धीरे से सिर उठाया। आरव के हाथों में दो coffee mug थे, और चेहरे पर वही भोली सी मुस्कान, जिस पर उसे अभी-अभी प्यार आने लगा था। और उसके अपने हाथों में वो सच था, जो इस मुस्कान को हमेशा के लिए मिटा सकता था। उसके पास सिर्फ़ एक पल था। सच बोले, या एक और झूठ गढ़े। मीरा जोशी ने अपने होंठ खोले...