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Chapter 1 of 12

Episode 1: शर्तें

शर्तें by Hamid Siddiqui

पुणे की एक शाम। बाहर बारिश अभी-अभी रुकी थी, और शहर की रोशनियाँ गीली सड़कों पर पिघल रही थीं। चौदहवीं मंज़िल के उस काँच वाले office में सिर्फ़ दो लोग बचे थे। बीच में एक मेज़, और मेज़ पर रखा था एक कागज़, एक शादी का contract, जो दोनों में से किसी ने दिल से नहीं चाहा था।

"एक साल। No feelings, no drama, और मेरे काम पर कोई सवाल नहीं। Audit ख़त्म, और हम दोनों चुपचाप अलग। बहुत simple, मिस्टर रस्तोगी।"

"शादी का offer मैं दे रहा हूँ, और शर्तें आप रख रही हैं?"

"क्योंकि ज़रूरत आपको है, मुझे नहीं। आपकी company की हालत मुझे पता है। दस दिन में bank का audit है, और आपके खाते, सच कहूँ तो, सच नहीं बोलते।"

"आप सीधे point पर आती हैं।"

"मेरे पास time बर्बाद करने की आदत नहीं। इस पूरे शहर में मैं अकेली forensic accountant हूँ जो एक ही दिन में आपके books भी सीधे करेगी और शादी के कागज़ पर sign भी। आपको दोनों चाहिए। तो, deal?"

आरव चुप हो गया। पिछले दो हफ़्तों में उसने बारह लोगों से बात की थी। हर किसी ने उसकी company के numbers देखे और नज़रें चुरा लीं। ये पहली थी जिसने आँख तक नहीं झपकाई। उसके पिता की बनाई हुई company, तीन सौ परिवारों की रोज़ी-रोटी, और उन सबके नीचे दबा एक पहाड़ जितना कर्ज़।

"ये company मेरे पिता का सपना थी। मैं इसे डूबने नहीं दे सकता। पर एक बात बताइए, आप जैसी smart लड़की एक साल किसी अजनबी की नकली बीवी क्यों बनेगी? पैसा तो आप ऐसे भी कमा लेतीं।"

"मेरी वजहें मेरी हैं, मिस्टर रस्तोगी। आप बस इतना जानिए कि मैं अपना काम बहुत अच्छे से करती हूँ।"

वो झूठ बोल रही थी। उसके पास सिर्फ़ एक वजह थी। बस एक। और उस वजह का नाम अभी इस कमरे में नहीं आया था।

"अरे! इतनी रात तक काम? बेटा, चाय तो पूछ लेता मेहमान से।"

दरवाज़े से दादी अंदर आईं, हाथ में चाय की ट्रे, और आँखों में बयालीस साल का तजुर्बा।

"बैठो बेटा, बैठो। तो तुम हो वो लड़की जो मेरे पोते की डूबती नैया पार लगाएगी।"

"मैं सिर्फ़ उनके खाते ठीक कर रही हूँ, दादी जी।"

"हम्म। मैं बयालीस साल से लोगों को पढ़ रही हूँ, बेटी। और एक बात कहूँ?... तुम दोनों झूठ बहुत अच्छा बोलते हो, बस अपने आप से।"

मीरा के चेहरे पर एक पल के लिए कुछ काँपा। दादी की आवाज़ में किसी और की आवाज़ थी, बहुत पुरानी, बहुत प्यारी। उसकी अपनी दादी की, जो अब नहीं थीं। उस घर की तरह, जो अब नहीं था।

उसने वो ख़याल वहीं रोक दिया। भावनाएँ बाद में। अभी सिर्फ़ काम।

"तो दादी जी, आपका आशीर्वाद मिलेगा?"

"आशीर्वाद तो मिलेगा। पर ध्यान रखना, इस घर में प्यार बहुत आसानी से हो जाता है। चाहे तुम चाहो या ना चाहो।"

मीरा ने मुस्कुराकर बात टाल दी। उसने पेन उठाया, और contract पर अपना नाम लिख दिया। पेन काग़ज़ पर ऐसे चला, जैसे कोई चीज़ धार पर रखी जा रही हो।

"ठीक है। तो अब मेरी एक शर्त।... Friday को एक बहुत बड़े investor के साथ dinner है। वो माना, तो company बच जाएगी। उस रात आपको मेरी पत्नी की तरह, पूरी तरह convincing होना पड़ेगा।"

"Oh, मैं convincing रहूँगी।"

"उसका नाम है... विक्रम मल्होत्रा।"

मीरा का हाथ हवा में रुक गया। कमरे की हवा जैसे जम गई।

आरव को नहीं पता था कि विक्रम मल्होत्रा कौन था। उसे नहीं पता था कि यही वो आदमी था जिसने सालों पहले मीरा के पिता को बर्बाद किया था। उन्हें इतना नीचे गिराया कि वो फिर कभी उठ नहीं पाए। मीरा ने ये शादी किसी को बचाने के लिए नहीं की थी। उसने ये शादी उस आदमी के क़रीब जाने के लिए की थी।

"विक्रम मल्होत्रा।... हाँ। मैं ज़रूर convincing रहूँगी।"

कुछ कहानियाँ प्यार से शुरू नहीं होतीं। कुछ कहानियाँ बदले से शुरू होती हैं। और मीरा जोशी की कहानी, अभी-अभी शुरू हुई थी।

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