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अध्याय 12 / 12 18+

Episode 12: शर्तों के बाद

शर्तें द्वारा Hamid Siddiqui

कई हफ्तों बाद रस्तोगी हाउस में तूफान के बाद की शांति फैल गई थी। मल्होत्रा का साम्राज्य पूरी तरह ढह चुका था। Meridian Holdings की सारी गुप्त फाइलें खुल गई थीं और उसके खिलाफ केस पत्थर की लकीर बन गया था। आरव की कंपनी बच गई थी।

तीन सौ परिवारों की जिंदगी फिर से पटरी पर थी। और सबसे अच्छी खबर ये थी कि दादी अस्पताल से पूरी तरह ठीक होकर घर लौट आई थीं। उनके चेहरे पर वही पुरानी चमक थी।

"अरे वाह, दोनों बच्चे इकट्ठे बैठे हैं। चाय लाई हूँ। अस्पताल की चाय तो बिल्कुल फीकी थी। घर की चाय में ही जान है।"

मीरा खिड़की के पास खड़ी चाय का कप थामे मुस्कुरा रही थी। उसकी inquiry भी खत्म हो चुकी थी। उसने जो cooperation दी थी उसकी वजह से अदालत ने बहुत नरमी दिखाई। कोई जेल नहीं बस कुछ महीने की सेवा और जुर्माना। वो इस फैसले से अंदर तक सुकून महसूस कर रही थी।

"पिताजी का नाम आखिरकार साफ हो गया दादी। दस साल बाद भी सही। और company भी बच गई। अब बस... एक सवाल बचा है।"

आज वो दिन था जिसका इंतजार दोनों कर रहे थे। एक साल का contract खत्म हो रहा था। वो पेपर वाली शादी अब कानूनी तौर पर खत्म। अब अगर वो साथ रहते हैं तो वो कोई मजबूरी नहीं बल्कि अपना खुला फैसला होगा।

"मीरा... contract आज खत्म हो गया। अब कोई शर्त नहीं बची। मैं जानना चाहता हूँ कि तुम क्या चाहती हो।"

"आरव मैंने तुम्हें बहुत दर्द दिया। उस रात जब तुमने मुझे घर से निकाला था... वो सब याद करके लगता है कि मैं इस खुशी का हकदार नहीं। तुम्हारा भरोसा तोड़ा मैंने।"

"उस रात मैं गुस्से में था। लेकिन बाद में जब मैंने देखा कि तुमने अपना दस साल का बदला मेरे लिए जला दिया... अपनी आजादी दांव पर लगा दी... तब मुझे एहसास हुआ कि तुम कितनी बड़ी हो। मैं तुम्हें फिर से खोना नहीं चाहता।"

आरव ने उसके हाथ थाम लिए। कमरे में वो पुरानी गर्माहट लौट आई थी। Episode 6 वाली रात याद आ गई जब पहली बार उन्होंने एक दूसरे को छुआ था। लेकिन अब सब कुछ अलग था। अब कोई छुपा हुआ राज नहीं था।

"मैंने सोचा था कि बदला लेकर ही जी पाऊंगी। लेकिन तुम्हें बचाते हुए मुझे पता चला कि इंसाफ बदले से कहीं बड़ा है। और तुम... तुम मेरी वजह से सब कुछ खो सकते थे।"

"अब वो सब पीछे छोड़ दो। मैं तुमसे प्यार करता हूँ मीरा। contract वाली नहीं... असली वाली। मैं आज चुनता हूँ तुम्हें। बिना किसी कागज के। बिना किसी डर के। क्या तुम भी मुझे चुनोगी?"

"हाँ आरव। मैं भी चुनती हूँ तुम्हें। अब कोई शर्त नहीं... सिर्फ हम।"

"अरे वाह। आखिरकार दोनों की समझ आई। मैंने पहले दिन ही कहा था ना... इस घर में प्यार बहुत आसानी से हो जाता है चाहे तुम चाहो या ना चाहो।"

दादी की हंसी पूरे घर में गूंज गई। उनकी वो पुरानी बात आज पूरी तरह सच हो गई थी। दोनों के चेहरों पर शर्म और खुशी एक साथ थी।

"दादी आप हमेशा सही निकलती हैं। आज से हमारी नई कहानी शुरू होती है।"

रात गहरी हो चुकी थी। दादी सो चुकी थीं। आरव ने मीरा का हाथ पकड़कर उसे धीरे से बेडरूम में ले जाया। उनके बीच अब कोई दीवार नहीं थी।

"अब कोई contract नहीं मीरा। सिर्फ तू और मैं।"

"आरव... मुझे छूओ। जैसे पहले कभी नहीं छुआ।"

आरव ने उसे अपने सीने से लगा लिया। उनके होंठ मिले। पहले धीरे से फिर गहराई से। उसके हाथ उसकी पीठ पर फिरने लगे। उसकी साड़ी का आंचल खिसक गया।

"अह्ह... आरव... तुम्हारे हाथ... बहुत अच्छा लग रहा है।"

"तुम कितनी नरम हो... मैं तुम्हें पूरे दिन छूता रह सकता हूँ।"

कपड़े एक के बाद एक गिरते गए। आरव ने उसे बेड पर लिटाया। उसके होंठ उसकी गर्दन पर फिरे फिर नीचे छाती पर। उसने उसके स्तन को चूसा। मीरा की कमर उठ गई।

"हाँ... वहाँ... और जोर से... अह्हह... आरव मैं बहुत गीली हो गई हूँ।"

"मैं अंदर आ रहा हूँ मीरा... तुम कितनी टाइट हो... हाँ... बस यही।"

"और तेज... हाँ... आरव... मुझे पूरी तरह भर दो... अह्ह... मैं तुम्हारी हूँ।"

उनकी गति तेज होती गई। पसीना उनकी त्वचा पर चमक रहा था। मीरा की उंगलियां आरव की पीठ पर निशान बना रही थीं। दोनों एक दूसरे में पूरी तरह घुल गए।

"मीरा... मैं... आने वाला हूँ... तुम भी आओ... साथ में।"

"हाँ... अब... अह्हह... आरव... मैं आ गई...!"

वे थककर एक दूसरे की बाहों में लेट गए। सांसें अभी भी तेज थीं। लेकिन उनके चेहरों पर वो शांति थी जो सिर्फ सच्चे मिलन के बाद आती है।

सुबह की नरम धूप कमरे में फैल रही थी। मीरा आरव की छाती पर सिर रखे जागी। उसकी उंगलियां उसके बालों में खेल रही थीं।

"गुड मॉर्निंग मेरी जान। कल रात... वो सबसे खूबसूरत रात थी।"

"और अब कई रातें आएंगी। बिना किसी शर्त के। बिना किसी डर के।"

तभी दरवाजा हल्का सा खुला। दादी चाय की ट्रे लेकर अंदर आईं। उन्होंने दोनों को इस हाल में देखा तो उनकी आँखों में प्यार भरी शरारत आ गई।

"अरे वाह... क्या नजारा है सुबह-सुबह। शरमाओ मत बच्चे। प्यार करने वाले को शर्म कैसी?"

"दादी... आप... हम..."

"मैंने कहा था ना पहले दिन... इस घर में प्यार बहुत आसानी से हो जाता है चाहे तुम चाहो या ना चाहो। देखा मैं कितनी सही थी।"

"हाँ दादी आप हमेशा सही होती हैं। हमने एक दूसरे को चुन लिया है। अब ये रिश्ता हमारा अपना है।"

"बहुत अच्छा। अब ये घर पूरी तरह से घर लगेगा। मीरा बेटी अब तुम सच में मेरी बहू हो। contract या बिना contract।"

"थैंक यू दादी। आपकी वजह से हम यहां तक पहुंचे।"

"अब हम साथ हैं। हर खुशी और हर मुश्किल में।"

दादी मुस्कुराती हुई चली गईं। कमरे में दोनों एक दूसरे की ओर देख रहे थे। उनकी आँखों में वादा था। वो प्यार जो तूफान से निकलकर और मजबूत हो गया था।

"आरव... मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ।"

"और मैं तुमसे मीरा। अब हमारी कहानी शर्तों के बाद शुरू होती है।"

लेकिन ठीक उसी पल आरव के फोन पर एक अनजाना मैसेज आया। Meridian के आखिरी पार्टनर का नाम था उसमें। और एक चेतावनी। शायद नया खतरा उनकी नई जिंदगी की ओर बढ़ रहा था।

क्या उनकी खुशी अब भी टिक पाएगी? क्या सीजन दो में ये नया राज उन्हें फिर से आजमाएगा? वो तो वक्त ही बताएगा।

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