अध्याय 14 / 25 पढ़ने में 12 मिनट
स्क्रीन घूमी
शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi
दादी की उँगली स्क्रीन को छूने ही वाली होती है कि गोलू पानी का गिलास फ़ोन पर उलट कर और राउटर खींच कर कठपुतली खाते को एक गिलास पानी में डुबो कर बचा लेता है। पर वो बाल-बाल बचना घर के तीनों पीछे हटे रिश्तों को जमा देता है, और थका हुआ गोलू अब सबको चुपके-चुपके सच की तरफ़ धकेलने लगता है। उसी की हिम्मत से जगदीश सरिता को अपना पूरा इक़रार लिख देता है कि वो कोई कर्नल नहीं, बस अकेला डाकबाबू है, पर वो सरिता के बजाय पूरे फ़ैमिली ग्रुप में जा गिरता है और घर भर के फ़ोन बजने लगते हैं।
दादी पुष्पा की उँगली उस चमकते फ़ोन की तरफ़ बढ़ी, और मेज़ पर बैठे हर इंसान की साँस रुक गई। एक टैप। बस एक टैप, और नक़ली मानव, इरा की हर चैट के साथ, पूरे परिवार की आँखों के सामने खुल जाता। और मेज़ के उस पार, गोलू के दिमाग़ में सोलह साल में सीखे हर हिसाब ने एक ही पल में एक ही जवाब निकाला। कुछ भी करो, बस वो टैप मत होने दो।
और गोलू ने वो किया जो बचपन से हर हारते हुए इंसान का आख़िरी हथियार रहा है। उसने अनाड़ीपन का सहारा लिया। वो अचानक, बड़ी बेढंगी सी हड़बड़ी में, अपनी कुर्सी से उठा, और उठते-उठते उसका हाथ मेज़ पर रखे पानी के भरे गिलास से टकरा गया।
"अरे! दादी बचो! गिर रहा है! ...ओह हो हो!"
और वो गिलास, जैसे किसी फ़िल्म की धीमी रफ़्तार में, हवा में झूला, पलटा, और उसका सारा पानी सीधे दादी पुष्पा के उस फ़ोन पर जा गिरा। स्क्रीन एक पल को टिमटिमाई, फिर नीली हुई, फिर काली। परफेक्ट रिश्ता, नक़ली मानव, इरा की चैट, सब, उस एक गिलास पानी में डूब गए।
"हाय राम! मेरा फ़ोन! ...गोलू, ये क्या किया तूने? अंधा है क्या? ...देख, बंद हो गया! पूरा भीग गया अंदर तक! ...अरे, अभी तो मैं तुम सबको दिखाने वाली थी! ...ये लड़का, हमेशा किसी न किसी चीज़ से टकराता रहता है!"
"सॉरी दादी, सॉरी! ...हाथ लग गया, मैंने जान-बूझ कर नहीं किया! ...रुको, रुको, इसे चावल में डालते हैं, चावल में डालने से ठीक हो जाता है! ...अभी लाता हूँ, आप इसे मत चलाओ, बिल्कुल मत चलाओ, वरना अंदर शॉर्ट हो जाएगा!"
और जो किसी ने नहीं देखा, वो ये कि गिलास गिराते-गिराते, गोलू का पैर मेज़ के नीचे से गुज़रा और दीवार में लगे राउटर का तार खींच गया। पूरे घर का इंटरनेट, एक झटके में, बंद। तो अब न फ़ोन चलता था, न इंटरनेट। वो नारंगी ऐप खुलने से पहले ही, दो बार मर चुका था।
चतुर्वेदी घर का सबसे बड़ा राज़, एक गिलास पानी में डूब कर बच गया। परिवार एक-एक कर के मेज़ से उठा, कोई खीजता हुआ, कोई राहत में, बिना जाने कि अभी-अभी एक सोलह साल के लड़के ने, एक गिलास पानी से, पूरे घर की छत गिरने से बचा ली।
"चावल में डाल के आ, और ध्यान से। ...और गोलू, एक बात कहूँ? ...तू जब भी बहुत घबराता है ना, तभी किसी चीज़ से टकराता है। ...मुझे तो लगता है, तेरे इस अनाड़ीपन के पीछे भी कोई हिसाब है।"
"हिसाब? ...दादी, अगर आपको मेरा हिसाब पता चल गया, तो आप वो फ़ोन ख़ुद पानी में डाल दोगी। ...भगवान, आज फिर एक गिलास पानी ने मुझे बचा लिया। पर अगली बार क्या गिराऊँगा? ...पूरा घड़ा?"
पर उस रात का बचाव एक फ़ोन से कहीं महँगा पड़ा। वो बाल-बाल बचना पूरे घर की हवा में एक अनदेखा डर छोड़ गया, और उस डर ने तेरहवीं शाम के सारे पीछे हटे रिश्तों को जमा कर, सड़ा कर रख दिया।
अगले कुछ दिनों में, सांवी और अनिकेत के बीच की वो नरम, नई गरमाहट पूरी तरह जम गई। अनिकेत की चाय अब कोई और लड़का दे जाता था। बेकरी का वो कोना, जहाँ वो रोज़ बैठता था, अब ख़ाली रहता। सांवी काउंटर के पीछे, सिर झुकाए, फिर से सिर्फ़ एक थकी हुई दुकानदार बन गई।
और वो अकेली नहीं थी। जगदीश सरिता के हर फ़ोन को बजने देता, बिना उठाए, हर बार एक चुभन के साथ। और मानव, जो न इरा के पास जा पा रहा था, न उसे भूल पा रहा था, घर में एक कमरे से दूसरे कमरे भटकता रहता, उलझा हुआ, चुप। एक ही छत के नीचे, तीन बंद कमरे, तीन बुझे हुए दिल।
और मानव सबसे ज़्यादा उलझा हुआ था। उसका फ़ोन दिन में कई बार जागता, इरा का नाम स्क्रीन पर आता, और वो उसे देखता रहता, न उठाता, न मिटाता। उसे नहीं पता था कि जिस इरा को उससे प्यार हुआ था, उसने असली मानव को चुना था, या उस नक़ली शायर को जो उसकी अपनी दिवाली वाली तस्वीर के पीछे छुपा था। और जब तक ये सवाल हल न हो, वो न आगे बढ़ पा रहा था, न पीछे हट पा रहा था। बस बीच में, अटका हुआ, अपने ही नाम के दो टुकड़ों के बीच।
और इस पूरे मलबे के बीच खड़ा था वो सोलह साल का लड़का, जिसने अब तक सबके झूठ ढोए थे। और उस रात, चावल के कटोरे में दादी का फ़ोन डालते हुए, गोलू ने अपने आप से एक बात तय कर ली।
"मैं और नहीं बचा सकता। ...हर बार गिलास नहीं गिरेगा। हर बार राउटर नहीं खिंचेगा। ...ये सब झूठ अब इतने भारी हो गए हैं कि इन्हें बचाना नहीं, इनसे बाहर निकालना पड़ेगा। ...अगर मैं इन्हें सच की तरफ़ धकेल दूँ, बहुत धीरे, एक-एक कदम... तो शायद ये ख़ुद बाहर आ जाएँ।"
और उस रात से, घर का सबसे छोटा इंसान, चुपके से, अपने परिवार को सच की तरफ़ धकेलने लगा। पहले वो सांवी के पास गया, बेकरी के उसी ख़ाली कोने में, जहाँ कभी एक अदरक वाली चाय रखी होती थी।
"बुआ... अनिकेत जी का फ़ोन क्यों नहीं उठा रहीं? ...मैंने देखा है, वो अब भी रोज़ इस गली से गुज़रते हैं, बस अंदर नहीं आते। ...आपने खिड़की बंद कर दी है ना, इसलिए। ...बुआ, चांचल आंटी के डर से आप अपनी सबसे अच्छी चीज़ फेंक दोगी?"
"गोलू, तू नहीं समझेगा। ...जिस दिन पूरा मोहल्ला मुझे फिर 'तलाक़शुदा काया' कह कर देखेगा, उस दिन अनिकेत को भी शर्म आएगी मेरे साथ खड़े होने में। ...मैं उसे वो शर्म नहीं झेलने दूँगी। ...उससे पहले मैं ख़ुद हट जाऊँगी। ...ये तरस से बेहतर है।"
"बुआ, जिस आदमी ने आपका सबसे बड़ा राज़ जान कर भी आपका इंतज़ार किया, वो शर्म नहीं करेगा। ...आप उसे तरस वाला समझ रही हैं, पर शायद वो आपको बचाने के लिए पूरे मोहल्ले से लड़ने को तैयार हो। ...आपने पूछा ही नहीं। ...बस डर कर भाग गईं।"
"पूछती कैसे, गोलू? ...अगर मैं पूछती, और वो एक पल को भी झिझकता, एक पल को भी सोचता कि लोग क्या कहेंगे... तो मैं वो झिझक ज़िंदगी भर नहीं भूल पाती। ...इससे अच्छा है, न पूछूँ। ...उम्मीद से मरना, उम्मीद टूट कर मरने से आसान है।"
"बुआ, आप हर आदमी को अपने पुराने पति के तराज़ू पर तौल रही हैं। ...पर हर आदमी वो नहीं होता। ...कुछ लोग झिझकते नहीं, बुआ। कुछ लोग बस रुक जाते हैं। ...अनिकेत जी रुके थे। महीनों। बिना कुछ माँगे।"
सांवी ने कुछ नहीं कहा। बस अपने हाथ की ख़ाली प्याली को घुमाती रही, और उसकी आँखों के कोने भीग आए। गोलू जानता था कि आज वो नहीं मानेगी। पर उसने एक बीज बो दिया था, और बीज को उगने में वक़्त लगता है। वो उठा, और अपने अगले मोर्चे की तरफ़ बढ़ा।
और फिर गोलू पापा के कमरे में गया, जहाँ जगदीश, अकेला, अपनी उसी पुरानी कुर्सी पर बैठा, सरिता के न उठाए गए फ़ोनों की लिस्ट को घूर रहा था। एक बूढ़ा आदमी, अपनी ही ख़ुशी से भागता हुआ।
"पापा... आप सरिता जी का फ़ोन क्यों नहीं उठाते? ...मैंने देखा है, वो रोज़ फ़ोन करती हैं। और आप रोज़ उसे बजने देते हैं, और फिर पूरी शाम उदास बैठे रहते हैं। ...ये कौन सी बहादुरी है, पापा? कर्नल तो आप भागने में हो गए।"
"तू नहीं समझेगा, बेटा। ...मैंने उस औरत से झूठ बोला है। कर्नल बन कर। मेडल लगा कर। बड़ी-बड़ी बातें कर के। ...अब अगर वो सच जान गई कि मैं कोई कर्नल नहीं, बस एक रिटायर्ड डाकबाबू हूँ, तो? ...उसकी नज़रों में गिर जाऊँगा। इससे अच्छा है, चुपचाप हट जाऊँ।"
"पापा, सरिता जी ने आपके अकेलेपन से प्यार किया है, आपके मेडल से नहीं। ...और झूठ का बोझ, वो आपको अंदर ही अंदर खा जाएगा। सच कह देने से आदमी हल्का हो जाता है, पापा। ...अगर वो सच जान कर भी रुक जाएँ, तो सोचो, इस उम्र में कोई आपको पूरा जानेगा, और फिर भी रहेगा। ...ये मौक़ा यूँ फेंक दोगे?"
और वो सोलह साल का लड़का, जो हफ़्ते भर पहले अपनी बुआ को सच की तरफ़ धकेल रहा था, आज वही शब्द अपने पापा से कह गया। और फिर, थका हुआ, आँखों में नींद लिए, वो चला गया, ये सोचते हुए कि उसने अपना काम कर दिया। बाक़ी अब बड़ों पर था।
और उस रात, अकेले कमरे में, गोलू की बात जगदीश के अंदर धीरे-धीरे उगती रही। सच कह देने से आदमी हल्का हो जाता है। उसने बार-बार सरिता की वो आख़िरी हँसी याद की, वो 'सीमा डाक' वाली बात, वो साथ में पी हुई चाय। और उसने एक फ़ैसला किया।
"ठीक है। ...मैं सच कहूँगा। पर अपनी शर्तों पर। ...मैं सरिता जी को सब बता दूँगा, कि मैं कोई कर्नल नहीं। और फिर, इज़्ज़त से, अलविदा कह दूँगा। ...ताकि मेरा राज़ भी बचा रहे, और उनके साथ मेरा झूठ भी ख़त्म हो जाए। ...आख़िरी बार। सच के साथ।"
और जगदीश ने अपना फ़ोन उठाया, चश्मा ठीक किया, और काँपती उँगलियों से, एक-एक अक्षर, अपने पूरे दिल का इक़रार लिखने लगा। बरसों की तनहाई, एक झूठ, और एक देर से आया प्यार, सब एक संदेश में।
"सरिता जी। ...मुझे आपसे एक सच कहना है। मैं कोई कर्नल रणविजय नहीं हूँ। ...मैं जगदीश चतुर्वेदी हूँ। एक रिटायर्ड डाकबाबू। जिसने पूरी उम्र दूसरों की चिट्ठियाँ पहुँचाईं, और अपनी एक भी नहीं लिख पाया। ...मैंने वो कर्नल इसलिए गढ़ा, क्योंकि असली मैं इतना अकेला था कि किसी के सामने आने की हिम्मत नहीं थी।"
"...और फिर आप मिलीं। और पहली बार, बरसों बाद, शाम की चाय अकेली नहीं लगी। ...पर मैं इस झूठ के साथ आपके क़ाबिल नहीं। ...इसलिए मैं जा रहा हूँ। आपको मेरा झूठ नहीं, मेरा सच याद रहे। ...एक बूढ़ा आदमी, जिसे इस उम्र में, आख़िरी बार, प्यार हो गया था। ...अलविदा, सरिता जी।"
और जगदीश ने वो पूरा इक़रार, अपनी पूरी रूह निचोड़ कर, लिख दिया। पर उसने एक छोटी सी चीज़ नहीं देखी। उसका फ़ोन, कुछ देर पहले तक, उसी फ़ैमिली ग्रुप में खुला था, जहाँ दिन में सब्ज़ी की लिस्ट चलती थी। और ऐप ने, आदतन, सबसे ऊपर वही आख़िरी खुली हुई चैट रखी थी। सरिता की नहीं। पूरे परिवार की।
जगदीश ने ऊपर लिखा नाम नहीं पढ़ा। उसकी आँखें आँसुओं से धुँधली थीं, और उसका दिल बस एक बार, आख़िरी बार, हल्का होना चाहता था। उसने भेजने वाले तीर के निशान पर उँगली रखी, आँखें बंद कीं, और दबा दिया।
"हो गया। ...अब सरिता जी सच जान जाएँगी। और ये बात यहीं, हम दोनों के बीच, ख़त्म हो जाएगी। ...बस। ...अब कोई कर्नल नहीं। कोई झूठ नहीं।"
पर उसकी बात 'हम दोनों के बीच' नहीं रुकी। ठीक उसी पल, चतुर्वेदी घर के हर कोने में, एक-एक फ़ोन काँप उठा। सांवी के कमरे में। मानव की जेब में। गोलू के तकिए के पास। और बैठक में रखे उस पुराने फ़ोन में भी, जिस पर पूरे परिवार का ग्रुप खुलता था।
"फ़ैमिली ग्रुप में इतनी रात को कौन... ...पापा? ...पापा ने कुछ भेजा है? ...इतना लंबा? ...'मैं कोई कर्नल रणविजय नहीं हूँ'... ये... ये क्या है?"
और गोलू, जो अभी-अभी सोने जा रहा था, उसने वो नोटिफ़िकेशन देखा, और उसका पूरा शरीर बर्फ़ हो गया। उसने एक ही नज़र में सब समझ लिया। पापा ने सरिता जी के लिए लिखा इक़रार, ग़लती से, पूरे फ़ैमिली ग्रुप में भेज दिया था।
"नहीं... नहीं, नहीं, नहीं! ...ये फ़ैमिली ग्रुप में चला गया! ...पापा ने पूरा सच, सरिता जी की जगह, पूरे परिवार को भेज दिया! ...और इस बार कोई गिलास पानी इसे नहीं मिटा सकता!"
और वहाँ, चतुर्वेदी परिवार के उस ग्रुप में, जगदीश का पूरा इक़रार खुला पड़ा था। कोई कर्नल नहीं। एक अकेला डाकबाबू। एक देर से आया प्यार। एक अलविदा। सब, काले अक्षरों में, हर उस इंसान के सामने जिससे उसने वो सबसे ज़्यादा छुपाया था।
और उधर, अपने कमरे में, जगदीश एक हल्की, थकी हुई मुस्कान के साथ आँखें मूँदे बैठा था, ये सोच कर कि उसने अभी-अभी, चुपचाप, अपने दिल का सबसे भारी बोझ, सिर्फ़ एक इंसान के साथ बाँट लिया। उसे नहीं पता था कि उस बोझ को अब उसका पूरा परिवार पढ़ रहा था।
एक कमरे में एक बाप, राहत में, आँखें बंद किए। और बाक़ी घर में, एक-एक कर के, फ़ोन बजते रहे। सांवी का। मानव का। गोलू का। और वो सच, जो एक झूठ से भी भारी था, अब पूरे चतुर्वेदी घर की हथेलियों में काँप रहा था। ...और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि सबसे पहले उस कमरे का दरवाज़ा कौन खटखटाए, जहाँ कर्नल रणविजय, आख़िरी बार, चैन से सो रहे थे।
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