Chapter 1 of 25 10 min read
तीन दिल, एक ऐप
कानपुर के चतुर्वेदी घर में एक रविवार का रिश्ता देखने का जलसा तब बिखर जाता है जब लड़के वाले सांवी के तलाक़ और मानव की बेरोज़गारी पर तंज़ कसते हैं। उसी शाम, अलग-अलग कमरों में, तीन ठुकराए हुए दिल एक ही तरकीब की तरफ़ बढ़ते हैं, और रात को गोलू देखता है कि एक ही मिनट में तीन स्वागत ईमेल आ गिरते हैं और ऐप उसके अपने पापा का रिश्ता उसकी अपनी बहन को सुझा देता है।
कुछ घर ऐसे होते हैं जहाँ रविवार आराम का दिन नहीं, इम्तिहान का दिन होता है।
कानपुर के उस पुराने तीन मंज़िला चतुर्वेदी मकान में आज सुबह से ही घमासान मचा था। छत पर अचार सूख रहा था, रसोई में कुकर सीटी पे सीटी दे रहा था, और ड्राइंग रूम में एक रिश्ता आने वाला था। रिश्ता सांवी के लिए। घर की बड़ी बेटी। बत्तीस साल की। और, जैसा कि मोहल्ला दिन में दस बार याद दिलाता था, तलाक़शुदा।
"सांवी! वो हरी वाली साड़ी पहन, पीली नहीं। पीले में तू पीलिया की मरीज़ लगती है। और गोलू, टीवी बंद कर, मेहमान आते ही होंगे!"
"दादी, टीवी तो पहले से बंद है। वो आपका चश्मा है जो धुँधला है।"
"ज़बान मत लड़ा। चश्मा साफ़ है, तेरी नीयत धुँधली है।"
सांवी रसोई से निकली, हरी साड़ी में, चेहरे पर वो मुस्कान जो पिछले दो साल से एक कवच बन चुकी थी। सुंदर, शांत, और अंदर से थकी हुई।
"दादी, अगर वो लोग फिर वही सवाल पूछें, तो इस बार मैं जवाब दे दूँ या आप ही सँभालेंगी?"
"तू बस चुप रहना, बेटा। मुस्कुराना। लड़की की मुस्कान ही उसका जवाब होती है।"
"और लड़के की? उसकी नौकरी उसका जवाब होती है, और लड़की की मुस्कान। वाह।"
तभी दरवाज़े की घंटी बजी, और पूरा घर एक झटके में सीधा खड़ा हो गया, जैसे स्कूल में इंस्पेक्टर आ गया हो। मेहमान आ गए। लड़के की माँ, सुनंदा जी, जिनके गले में इतना सोना था कि गर्दन झुकाना भी उनके लिए एक कसरत थी। साथ में लड़का, जो पूरे वक़्त मोबाइल में झाँकता रहा, और चार और रिश्तेदार, जो सिर्फ़ मुफ़्त के समोसे के लिए आए थे।
"आइए, आइए सुनंदा जी, बैठिए। बड़ी ख़ुशी हुई। गोलू, बेटा, पानी ला। ठंडा वाला।"
"बस बस, जगदीश जी, तकल्लुफ़ मत कीजिए। हम तो बस लड़की देखने आए हैं। वैसे... एक बात पूछूँ? बुरा मत मानिएगा। ये जो पहले वाली बात थी सांवी बिटिया की... मेरा मतलब, वो जो शादी टूटी थी... उसमें ग़लती किसकी थी? लड़की की या लड़के की?"
कमरे में समोसे की प्लेट हवा में रुक गई। सांवी की मुस्कान एक पल को काँपी, फिर संभल गई।
"आंटी, कभी-कभी किसी की ग़लती नहीं होती। बस दो लोग एक साथ ख़ुश नहीं रह पाते। मैंने अलग होना चुना। अपनी मर्ज़ी से।"
"हाय राम, अपनी मर्ज़ी से! सुना आपने? आजकल की लड़कियाँ। हमारे ज़माने में तो निभाना पड़ता था, बेटा। ख़ैर... लड़का तो दूसरी शादी कर के सेटल भी हो गया, सुना है। और आप... अभी तक यहीं।"
यहीं। दो अक्षर का एक शब्द, जो किसी हथौड़े से कम नहीं था। जगदीश की मुट्ठी घुटने पर कस गई। पर वो कुछ बोलते, उससे पहले सुनंदा जी की नज़र दीवार पर टँगी मानव की तस्वीर पर पड़ी।
"अच्छा, और ये छोटा वाला? आपका बेटा? क्या करता है?"
"मानव? वो... वो कलाकार है जी। कॉमेडी करता है। स्टेज पर। लोगों को हँसाता है।"
"हँसाता है! मतलब कमाता कुछ नहीं। अरे वाह जी वाह। एक बेटी घर बैठी है, एक बेटा मसख़री कर रहा है। भगवान इस घर को सलामत रखे।"
और ठीक उसी वक़्त, जैसे किस्मत को भी कॉमेडी की टाइमिंग आती हो, मानव अपने कमरे से निकला, बिखरे बाल, आधी नींद में, और सीधा मेहमानों के सामने आ खड़ा हुआ। उसकी टी-शर्ट पर लिखा था, अंग्रेज़ी में, मैं अभी ठीक हूँ, और सुनंदा जी ने उसे ऊपर से नीचे तक ऐसे देखा जैसे किसी ने चाय में मक्खी दिखा दी हो।
"अच्छा जगदीश जी, हम चलते हैं। घर में सोच-विचार कर के बता देंगे। पर सच कहूँ... लड़का हमारा हीरा है। और हीरे के साथ हम कोई... पुराना सिक्का नहीं जोड़ते।"
दरवाज़ा बंद हुआ। और उस बंद दरवाज़े के पीछे, चार लोग खड़े रह गए, चुप, जैसे किसी ने उनके चेहरे पर एक-एक थप्पड़ रख कर छोड़ दिया हो।
"मसख़रा। सुना दादी? हीरे वाली आंटी ने मुझे मसख़रा बोला। कम से कम टिकट लगा कर बोलतीं। दो सौ रुपये का मज़ाक मुफ़्त में सुना गईं।"
"तू चुप कर, मेरे लाल। उस औरत की औक़ात नहीं थी इस घर की देहरी पर पैर रखने की। समोसे भी हमारे खाए और ताने भी हमारे दिए। पुराना सिक्का। हुँह। उस औरत का लड़का तो जेब में रखने लायक भी नहीं।"
"मैं ऊपर जा रही हूँ।"
"बेटा, खाना तो..."
"भूख नहीं है, पापा। पुराने सिक्कों को ज़्यादा भूख नहीं लगती।"
और वो सीढ़ियाँ चढ़ गई। एक-एक क़दम पर वो मुस्कान थोड़ी-थोड़ी उतरती गई, और जब वो अपने कमरे पहुँची, तो वो कवच पूरी तरह गिर चुका था। पीछे रह गया सिर्फ़ एक अकेला, थका हुआ चेहरा।
उस शाम, चतुर्वेदी घर की तीन अलग-अलग खिड़कियों में तीन अलग-अलग बत्तियाँ जलीं। और तीन दिलों ने, एक-दूसरे से बेख़बर, एक ही तरकीब सोची।
सबसे पहले, दादी पुष्पा के कमरे में।
"गोलू! ओ गोलू! इधर आ, चुपके से। दरवाज़ा बंद कर।"
"दादी, आपकी आँखों में जब ये चमक आती है ना, तो घर में कोई ना कोई फँसता ज़रूर है। इस बार कौन?"
"तेरा चाचा मानव। आज उस औरत ने उसे मसख़रा कह दिया, सुना तूने? मेरे मानव को! जिसका दिल सोने का है!"
"सोने का दिल और खाली जेब। बढ़िया कॉम्बिनेशन है, दादी।"
"बस इसीलिए। ये जो तेरा वाला मोबाइल का जादू है ना, उससे एक चीज़ बना। शादी वाली। जिसमें लड़के-लड़कियाँ मिलते हैं। मेरी सहेली शांति की बहू ऐसे ही मिली थी।"
"मैट्रिमोनियल ऐप? दादी, आप मानव चाचा की प्रोफ़ाइल बनाना चाहती हैं? उनसे पूछे बिना?"
"पूछूँगी तो वो नाटक करेगा, नखरे दिखाएगा, मना कर देगा। तू बस बना। नाम, फ़ोटो, सब। और जो कोई लड़की बात करे ना, उसका जवाब मैं दूँगी। मानव के नाम से।"
"तो आप... मानव चाचा बन कर लड़कियों से बात करेंगी। सत्तर साल की उम्र में। एक अट्ठाईस साल के लड़के के नाम से।"
"उम्र दिल की होती है, गोलू। और मेरा दिल पच्चीस का है। चल, बना। परफेक्ट रिश्ता, वही वाला जो टीवी पर आता है।"
गोलू ने एक लंबी साँस ली, वो साँस जो इस घर का हर सोलह साल का बच्चा एक दिन लेना सीख जाता है, और चुपचाप फ़ोन उठा लिया। एक बना।
अब घर के दूसरे कोने में, जगदीश के कमरे में। साठ साल के जगदीश चतुर्वेदी। रिटायर्ड सब-पोस्टमास्टर। पंद्रह साल से विधुर। दीवार पर पत्नी की माला चढ़ी तस्वीर, और उसके सामने बैठा एक अकेला आदमी, जिसने आज पहली बार किसी को अपनी बेटी को पुराना सिक्का कहते सुना था, और चुप रह गया था।
"सुनती हो? आज मैं कुछ नहीं बोल पाया। तुम होतीं तो झाड़ू उठा लेतीं उस औरत पर। मैं बस... बैठा रहा। पानी पिलाता रहा।"
उसने फ़ोन उठाया। बहुत देर तक बस उसे घूरता रहा। फिर वही ऐप, जिसका इश्तिहार उसने दोपहर की चाय के साथ देखा था। परफेक्ट रिश्ता।
"साठ की उम्र में... शादी की वेबसाइट। छी। लोग क्या कहेंगे। बुढ़ऊ को इश्क़ चढ़ा।"
पर उँगली रुकी नहीं। अकेलापन एक ऐसा चोर है जो शर्म के दरवाज़े से भी अंदर घुस आता है। उसने फ़ॉर्म भरना शुरू किया। नाम के ख़ाने पर पहुँचा, और रुक गया।
"जगदीश चतुर्वेदी, रिटायर्ड पोस्टमास्टर... कौन देखेगा इसे? कौन बात करेगा एक बूढ़े डाकिये से?"
और तभी, टीवी पर एक पुरानी फ़ौजी फ़िल्म चल रही थी, और परदे पर एक कर्नल छाती ताने खड़ा था, और जगदीश की आँखों में एक शरारती चमक आ गई, वैसी ही जैसी माँ की आँखों में थी।
"कर्नल... रणविजय सिंह। रिटायर्ड। भारतीय सेना। शौक़: घुड़सवारी, शायरी, और... देशसेवा।"
"वाह जगदीश। घुड़सवारी। तुझे तो स्कूटर पे बैठते डर लगता है।"
पर उस झूठ में एक अजीब सी हिम्मत थी। जैसे कोई आदमी बरसों बाद फिर से लंबा खड़ा हुआ हो। उसने सेव दबाया। कर्नल रणविजय ऑनलाइन आ गए।
और सबसे ऊपर, तीसरी मंज़िल पर, सांवी के कमरे में। बत्ती बुझी थी। बस फ़ोन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसने दिन भर के आँसू पोंछ लिए थे, और अब वो सिर्फ़ अँधेरे में लेटी छत को देख रही थी।
"पुराना सिक्का। बत्तीस साल की, और लोग ऐसे बात करते हैं जैसे मैं ख़त्म हो गई हूँ।"
उसने वही ऐप खोला, जो पिछले तीन दिन से उसके फ़ोन में डला था, बिना खोले। परफेक्ट रिश्ता। नाम के ख़ाने पर उसकी उँगली रुकी।
"सांवी चतुर्वेदी नहीं। सांवी को तो सब जानते हैं। तलाक़ वाली सांवी। बेचारी सांवी।"
"...काया। बस काया। एक नई शक्ल। जिसका कोई पुराना नहीं। कोई तरस नहीं। सिर्फ़ काया।"
"शौक़: बेकिंग, पुरानी हिंदी फ़िल्में, और बारिश में चाय। उम्र... बत्तीस। और हाँ। कोई माफ़ी नहीं। कोई सफ़ाई नहीं। बस काया।"
और जैसे ही उसने वो नाम टाइप किया, दो साल में पहली बार, उसके होंठों पर एक असली मुस्कान आई। छोटी सी। डरी हुई। पर असली।
तीन कमरे। तीन झूठ। तीन उम्मीदें। और नीचे, ड्राइंग रूम के सोफ़े पर, इन तीनों से बेख़बर, इस पूरी कहानी का इकलौता गवाह बैठा था। गोलू।
रात के ग्यारह बजे थे। गोलू घर का इंटरनेट ठीक कर रहा था, क्योंकि दादी की शिकायत थी कि उनके सास-बहू वाले सीरियल अटक रहे थे। उसने सारे फ़ोन एक ही वाई-फ़ाई से जोड़े। घर का इकलौता कनेक्शन। एक ही पता। एक ही छत।
"बस, हो गया। अब सबके सीरियल भी चलेंगे और दादी के ताने भी।"
और तभी, उसकी अपनी स्क्रीन पर, जिस पर वो सबके अकाउंट का हिसाब रखता था, एक नोटिफ़िकेशन चमकी। परफेक्ट रिश्ता में आपका स्वागत है, पुष्पा जी के बनाए अकाउंट के लिए।
"हाँ हाँ, मानव चाचा वाला। दादी का काम।"
ठीक तीस सेकंड बाद, दूसरी नोटिफ़िकेशन। परफेक्ट रिश्ता में आपका स्वागत है, कर्नल रणविजय।
"कर्नल... रणविजय? ये कौन... रुको। ये तो पापा के फ़ोन से आया है। पापा? पापा भी?"
और उसने साँस भी नहीं ली थी कि तीसरी नोटिफ़िकेशन आई। परफेक्ट रिश्ता में आपका स्वागत है, काया।
"काया... दीदी का नंबर है ये। सांवी दीदी भी? दादी, पापा, दीदी... एक ही मिनट में... एक ही ऐप पे?"
गोलू सोलह साल का था। उसकी उम्र वीडियो गेम खेलने की थी, गर्लफ़्रेंड बनाने की, परीक्षा में नक़ल करने की। और इस पल, वो अपने ही घर के तीन लोगों का सबसे बड़ा राज़ अकेला थामे बैठा था।
उसने काँपते हाथ से स्क्रीन को देखा। और तभी, ऐप ने अपना पहला जादू दिखाया। काया के अकाउंट पर एक चमकीली लाइन उभरी। आपके लिए एक बेहतरीन रिश्ता। परफेक्ट मैच।
और उस परफेक्ट मैच की तस्वीर में, छाती ताने, मूँछों पर ताव देते, खड़े थे... कर्नल रणविजय। यानी जगदीश। यानी सांवी के अपने पापा।
"नहीं नहीं नहीं। मना करो। हटाओ इसे। दीदी अगर सुबह उठ कर ये मैच खोलेगी, तो उसे अपने ही पापा की फ़ोटो दिखेगी, कर्नल बन कर। और पापा अगर काया को देखेंगे..."
"ऐप ने... पापा का रिश्ता... दीदी को भेज दिया। नब्बे परसेंट मैच। ...हे भगवान। मैं मर गया।"
और इस तरह, कानपुर के एक पुराने घर में, एक ऐप ने वो खेल शुरू किया जिसे रोक पाना अब किसी के बस में नहीं था। तीन दिल। तीन नक़ाब। और एक सोलह साल का लड़का, जो अब पूरी रात सो नहीं पाने वाला था।
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