Chapter 16 of 25 11 min read
माँ और बेटा
जगदीश आख़िरकार सरिता को अपना सच कह देता है कि वो कोई कर्नल नहीं, बस एक अकेला डाकबाबू है, और सरिता नरमी से अपना भी झूठ खोल देती है कि उसने भी ख़ुद को बड़ी हेडमिस्ट्रेस बता कर प्रोफ़ाइल सजाई थी, दो नक़ली लोग अपने असली रूप में एक-दूसरे से प्यार कर बैठते हैं। पर जगदीश सांवी और अनिकेत वाला बड़ा जाल अभी नहीं खोलता। उसी रात अनिकेत अपनी माँ से 'काया, या सांवी, जो भाग गई' का ज़िक्र करता है और सरिता चुपचाप जोड़ लेती है कि वो लड़की चतुर्वेदी घर की है। उधर मानव इरा को सच बताने पहुँचता है, पर कहने से पहले ही इरा बोल पड़ती है कि मुझे पहले से पता है कि हर बार तुम नहीं थे, और मुझे ये भी पता है कि वो कौन था।
जगदीश उस दरवाज़े पर जड़ खड़ा था, और उसके भीतर एक पूरा जाल कस रहा था। सामने सरिता, जिसे वो अपना सच बताने आया था। और उसके पीछे अनिकेत, वो लड़का जो उसकी बेटी की ज़िंदगी में सबसे गहराई तक उतर चुका था। दो सच, एक ही देहलीज़ पर, और जगदीश को समझ नहीं आ रहा था कि पहले कौन सा उठाए।
"कर्नल साहब? ...आप ठीक हैं? ...अचानक इतने पीले क्यों पड़ गए? ...अनिकेत, ज़रा पानी लाना, इन्हें कुछ हो रहा है। ...आइए, अंदर आ कर बैठिए, ऐसे दरवाज़े पर मत खड़े रहिए।"
"हाँ माँ, अभी लाता हूँ। ...अंकल, आप बैठिए। ...लगता है थकान है, या शायद रास्ते की गर्मी। ...आराम से, कोई जल्दी नहीं।"
और उस लड़के की मासूम गर्मजोशी, जो कुछ नहीं जानता था, जगदीश के दिल में और गहरा उतर गई। उसने तय किया कि पूरा जाल एक साथ नहीं खोलेगा। वो बहुत बड़ा था, बहुत उलझा हुआ। आज वो सिर्फ़ एक सच के लिए आया था, और वो एक सच वो कह कर ही जाएगा।
"नहीं बेटा, पानी नहीं। मैं ठीक हूँ। ...सरिता जी, मुझे बस एक बात कहनी है, और फिर मैं चला जाऊँगा। ...और ये बात मुझे यहीं, खड़े-खड़े कह लेने दीजिए, वरना मेरी हिम्मत फिर भाग जाएगी।"
अनिकेत, जो समझदार था, भाँप गया कि ये बात दो बड़ों के बीच की है। उसने हल्के से सिर हिलाया और अंदर चला गया, दोनों को उस देहलीज़ पर अकेला छोड़ते हुए। और जगदीश ने, ज़िंदगी में पहली बार बिना किसी कवच के, अपनी सबसे बड़ी सच्चाई खोल दी।
"सरिता जी, मैं कोई कर्नल रणविजय नहीं हूँ। ...मैं जगदीश चतुर्वेदी हूँ। एक रिटायर्ड डाकबाबू। न कोई फ़ौज, न कोई मेडल, न कोई सरहद। ...जो बैज मैंने सीने पर लगाई थी, वो मेरी बेटी की स्कूल की दौड़ वाली बैज थी। ...मैंने ये सब इसलिए गढ़ा, क्योंकि असली जगदीश इतना अकेला और डरा हुआ था कि उसे लगा, ऐसे कोई उसकी तरफ़ देखेगा भी नहीं।"
और वो कह कर, जगदीश ने आँखें झुका लीं, उस झटके के इंतज़ार में, उस तिरस्कार के इंतज़ार में, जिसके डर से वो बरसों एक झूठ के पीछे छुपा रहा था। पर जो आया, वो झटका नहीं था। वो एक हँसी थी। नरम, गर्म, समझदार।
"मुझे पता था, जगदीश जी।"
जगदीश ने चौंक कर सिर उठाया। सरिता मुस्कुरा रही थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे उस पहली मुलाक़ात में मुस्कुराई थी।
"आपकी उस बैज पर साफ़ लिखा था, कानपुर स्कूल एथलेटिक्स, दूसरा स्थान। ...कर्नल की मेडल पर स्कूल का नाम नहीं होता, जगदीश जी। ...मैं पहली शाम ही समझ गई थी कि आप कोई कर्नल नहीं। ...पर मैंने ये भी समझ लिया था कि आपका अकेलापन सच्चा है। और मैंने उसी अकेलेपन को जवाब देने का फ़ैसला किया, आपके झूठ को नहीं।"
"आप... आप जानती थीं, और फिर भी बैठी रहीं? ...उस पूरी शाम मेरी झूठी बहादुरी सुनती रहीं? ...सरिता जी, आप या तो सबसे भली औरत हैं, या सबसे बड़ी शरारती।"
"और मैं भी कोई पूरी सच्ची नहीं हूँ, जगदीश जी। ...मैंने भी अपनी प्रोफ़ाइल सजाई थी। ...मैंने लिखा था कि मैं एक बड़े स्कूल की हेडमिस्ट्रेस रही हूँ, कि मैंने पूरा देश घूमा है, कि मैं बड़ी दुनियादार हूँ। ...सच ये है कि मैं एक छोटे से प्राइमरी स्कूल में बच्चों को गिनती सिखाती थी। और कानपुर से बाहर, ज़िंदगी में एक बार भी नहीं गई। ...तो देखिए, आपके सामने कोई हेडमिस्ट्रेस नहीं, बस एक अकेली मास्टरनी खड़ी है।"
और वहाँ, उस देहलीज़ पर, दो लोग खड़े थे, दोनों ने अपने अकेलेपन को एक भव्य नक़ली रूप में सजाया था, और दोनों अब, एक-दूसरे के सामने, अपने असली, सादे, थके हुए रूप में खड़े थे। एक नक़ली कर्नल, एक नक़ली हेडमिस्ट्रेस, और उन दोनों नक़ाबों के नीचे, दो बहुत सच्चे, बहुत अकेले इंसान।
"तो हम दोनों एक जैसे निकले, सरिता जी। ...दो बूढ़े ठग, जो सिर्फ़ इसलिए थोड़े बड़े बन गए क्योंकि उन्हें डर था कि असली वो काफ़ी नहीं। ...पर पता है, आज, इस दरवाज़े पर, वो नक़ली मास्टरनी नहीं, ये असली मास्टरनी मुझे कहीं ज़्यादा अच्छी लग रही है।"
"और मुझे वो नक़ली कर्नल से कहीं ज़्यादा, ये सच्चा डाकबाबू पसंद है, जो पूरी उम्र दूसरों की चिट्ठियाँ बाँटता रहा। ...क्योंकि जो आदमी बरसों तक दूसरों के प्यार के संदेश पहुँचाता रहा, वो प्यार की क़ीमत सबसे अच्छी तरह जानता होगा। ...आइए, अब अंदर आइए। इस बार सच्ची चाय पीते हैं। दो सच्चे लोग।"
और वो घर का सबसे मीठा रिश्ता था, दो बुज़ुर्ग, जिन्होंने अपने झूठ के नीचे से एक-दूसरे का सच ढूँढ लिया था। पर जगदीश, उस गरमाहट के बीच भी, एक बात नहीं कह पाया। वो बड़ा जाल, कि उसकी बेटी और सरिता का बेटा... वो अभी उसके सीने में ही रहा। कुछ सच इतने भारी होते हैं कि उन्हें एक ख़ुशी के पल में उठाया नहीं जाता।
और उसी रात, जगदीश के जाने के बाद, सरिता और अनिकेत खाने की मेज़ पर बैठे थे। पर अनिकेत की थाली में खाना यूँ ही पड़ा रहा। वो गुमसुम था, दूर कहीं खोया हुआ, उसी उदासी में जो पिछले कुछ दिनों से उसके चेहरे पर जमी थी। और एक माँ से अपने बेटे की उदासी नहीं छुपती।
"अनिकेत। ...तू आजकल इतना चुप क्यों है, बेटा? ...तेरी वो हँसी कहाँ गई? ...और वो जो तू रोज़ रात फ़ोन पर मुस्कुराता रहता था, वो भी बंद हो गई है। ...कुछ हुआ है क्या? ...माँ से मत छुपा।"
"एक थी, माँ। ...मैं उसे बहुत दिन काया के नाम से जानता था। फ़ोन पर बातें होती थीं। ...फिर पता चला कि उसका असली नाम सांवी है। और वो सांवी, मेरी अपनी गली की वो बेकरी वाली दीदी थी। ...मैंने उसका सबसे बड़ा राज़ जान कर भी उसका इंतज़ार किया, माँ। महीनों। ...और फिर एक दिन, अचानक, उसने सब बंद कर दिया। फ़ोन उठाना बंद। खिड़की बंद। ...बिना कुछ कहे, वो भाग गई।"
और सरिता का हाथ, जो थाली की तरफ़ बढ़ रहा था, हवा में रुक गया। सांवी। बेकरी। चतुर्वेदी की गली। वो नाम उसके कानों में किसी दूर की घंटी की तरह बजा, और एक अनदेखी तस्वीर उसके मन में धीरे-धीरे उभरने लगी।
"ये सांवी... बेटा, ये लड़की क्या करती है? ...कहाँ रहती है? ...और तू कह रहा है, बेकरी वाली, चतुर्वेदी की गली में?"
"हाँ माँ। एक छोटी सी घरेलू बेकरी चलाती है। ...और वो... वो तलाक़शुदा है, माँ। और मुझे लगता है, वो उसी दाग़ से डरती है। ...जिस दिन मोहल्ले ने उसे फिर 'तलाक़शुदा' कह कर देखा, उसी दिन वो मुझसे दूर हट गई। ...उसे लगता है वो मेरे लायक़ नहीं। ...और मैं उसे ये यक़ीन ही नहीं दिला पाया कि मेरे लिए वो पूरी दुनिया है।"
और सरिता के मन में, एक-एक टुकड़ा जुड़ता चला गया। सांवी चतुर्वेदी। चतुर्वेदी की गली। और अभी कुछ ही देर पहले, इसी दरवाज़े पर खड़ा वो आदमी, जगदीश चतुर्वेदी, जिसने अनिकेत को देख कर पूछा था, ये तो वही लड़का है जो सांवी की दुकान पर... ...और तब सरिता को समझ आया। वो नक़ली कर्नल, जिससे उसे प्यार हुआ था, उसी सांवी का पिता था।
"हे भगवान। ...जगदीश जी... सांवी चतुर्वेदी के पिता। ...और मेरा बेटा, उसी सांवी से... ...मैं जिस आदमी से मिल रही हूँ, वो उसी लड़की का बाप है जिससे मेरे बेटे का दिल जुड़ा है। ...ये कैसा जाल है?"
और इस तरह, घर के बड़े, एक-एक कर के, वो पूरी तस्वीर देखने लगे थे, जिसे देखने से बच्चे डर रहे थे। पहले जगदीश ने देखी, अब सरिता ने। पर सरिता, एक माँ की तरह, समझ गई कि ये तस्वीर अभी अनिकेत के सामने नहीं रखी जा सकती। उसका ज़ख़्म बहुत ताज़ा था, और ये गुत्थी बहुत उलझी हुई।
"अनिकेत, एक बात सुन, बेटा। ...शायद वो लड़की भागी नहीं है। शायद वो बस डरी हुई है। ...और मैंने ज़िंदगी में एक बात सीखी है, कि जो इंसान सबसे ज़्यादा डरता है, वही अक्सर सबसे ज़्यादा चाहता है। ...उसे वक़्त दे। और उम्मीद मत छोड़। ...कभी-कभी दो टूटे हुए लोगों को जुड़ने में थोड़ा वक़्त लगता है, बस।"
"आपको सच में लगता है, माँ? ...कि वो डरी हुई है, गई नहीं? ...पता नहीं क्यों, आपके मुँह से सुन कर, थोड़ी उम्मीद बँध रही है।"
"मुझे सच में लगता है, बेटा। ...और तू एक काम कर। उस पर दबाव मत डाल, पर दरवाज़ा भी बंद मत कर। ...रोज़ की तरह उसकी गली से गुज़र। उसकी दुकान से चाय ले। कुछ मत कह, बस वहाँ रह। ...ताकि जिस दिन उसका डर थके, तो तू उसे वहीं मिले, जहाँ वो तुझे छोड़ कर गई थी। ...इंतज़ार भी एक तरह का प्यार होता है, अनिकेत। और तू वो अच्छे से जानता है।"
और सरिता ने अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा, एक ऐसा राज़ अपने सीने में दबाए, जो उसके बेटे की ख़ुशी की चाबी थी, पर जिसे खोलने का अभी सही वक़्त नहीं था। ठीक वैसे ही, जैसे उसी शहर में, एक और घर में, एक सोलह साल का लड़का, महीनों से, सबकी ख़ुशी के राज़ अपने सीने में दबाए बैठा था। इस कहानी में हर पीढ़ी के पास किसी न किसी का एक राज़ था, प्यार में, अनकहा।
और उसी रात, शहर के दूसरे कोने में, उसी पुराने कैफ़े में, घर का तीसरा दिल भी अपना एक फ़ैसला लेकर बैठा था। मानव। जिसने कई दिन ख़ुद से लड़ते-लड़ते तय कर लिया था कि वो इरा के साथ किसी झूठ पर कुछ नहीं बनाएगा।
उसने ये बात मन में सौ बार दोहराई थी। वो इरा को सब सच बता देगा, कि जिस प्यारे, शायराना मानव पर वो मरती थी, वो असल में वो था ही नहीं। और फिर जो होगा, देखा जाएगा। पर वो एक झूठे की चोरी की तारीफ़ पर प्यार नहीं कमाएगा।
"क्या बात है, आज कॉमेडियन साहब इतने गंभीर क्यों हैं? ...न कोई बत्तख़ का जोक, न कोई मेज़ का झगड़ा। ...चाय भी ठंडी कर दी। ...मानव, तुम्हारा ये उदास वाला रूप तुम पर बिल्कुल नहीं जँचता। बोलो, क्या हुआ?"
"इरा... मुझे तुमसे एक सच कहना है। ...और हो सकता है इसके बाद तुम मुझसे कभी बात न करो। ...पर मैं ये बोझ और नहीं ढो सकता। ...इरा, वो जो शायरी वाला मानव तुमसे हर रात बात करता था, वो प्यारी-प्यारी बातें करता था... वो मैं नहीं था।"
"अच्छा? ...बोलो, मानव। ...मैं सुन रही हूँ।"
"मेरे अपने घर में किसी ने, मेरी फ़ोटो लगा कर, मेरे नाम से, तुमसे बातें कीं। ...मुझे लगता है वो मेरा भतीजा गोलू था, उसने ख़ुद माना था। ...जो मानव तुम्हें अच्छा लगा, वो एक गढ़ा हुआ आदमी था, इरा। ...असली मैं बस ये हूँ। बदमिज़ाज, बेरोज़गार, बत्तख़ के जोक वाला मानव। ...जो तुमसे रात भर शायरी करता था, वो कभी था ही नहीं। ...माफ़ कर दो।"
और मानव ने आँखें बंद कर लीं, उस तूफ़ान के इंतज़ार में, जो अब आने वाला था। ग़ुस्सा। धोखे का एहसास। शायद एक थप्पड़, या उससे बुरा, एक ख़ामोश उठ कर चले जाना। उसने अपने आप को हर उस चीज़ के लिए तैयार कर लिया था। हर चीज़ के लिए, सिवाय उसके जो हुआ।
क्योंकि इरा न चौंकी, न ग़ुस्सा हुई, न उठ कर गई। उसने बस, बड़े इत्मीनान से, अपनी कॉफ़ी का प्याला नीचे रखा, और मानव की तरफ़ देखा, एक ऐसी शांत, हल्की मुस्कान के साथ, जो किसी ऐसे इंसान की होती है जो पहले से सब जानता हो।
"मानव... रुको। ...इतनी मेहनत से सफ़ाई मत दो। ...मुझे पहले से पता है कि हर बार तुम नहीं थे। ...हफ़्तों से पता है। ...और मुझे ये भी बहुत अच्छे से पता है कि वो कौन था, जो तुम्हारे नाम से मुझसे बातें करता था। ...और मानव, एक बात बता दूँ? ...वो गोलू नहीं था।"
और मानव अपनी जगह जम गया, मुँह खुला, आँखें फटी। वो यहाँ अपना सबसे बड़ा राज़ खोलने आया था, और पता चला कि इरा वो राज़ उससे भी पहले से जानती थी। और सिर्फ़ जानती ही नहीं थी, वो उस असली नक़ली मानव को भी जानती थी, जिसे ख़ुद मानव आज तक नहीं पहचान पाया था। ...और अब वो उसे, बड़े आराम से, अपने प्याले पर उँगली घुमाते हुए, ये बताने वाली थी कि उसके अपने घर में, महीनों से, कौन उसका रूप जी रहा था।
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