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Chapter 4 of 25 10 min read

आंटी जासूस

शादी डॉट कॉम by Avni Oberoi

हर मोहल्ले में एक चांचल आंटी होती है। जिसे भगवान ने आँखें दूसरों के घर में झाँकने के लिए, और ज़बान उसे पूरे शहर में बाँटने के लिए दी होती है। कानपुर के इस मोहल्ले की चांचल आंटी अपनी छत पर खड़ी थीं, हाथ में वो दूरबीन जो कभी उनके स्वर्गीय पति पक्षी देखने के लिए लाए थे, और जिसका इस्तेमाल अब सिर्फ़ एक ही पक्षी पर होता था, पड़ोसी।

"कुछ तो गड़बड़ है चतुर्वेदी घर में। रोज़ रात बूढ़े जगदीश की छत पर टहलना, वो लड़की सांवी का देर रात तक बत्ती जलाना, और वो पुष्पा... कल मैंने उसे फ़ोन में हँसते देखा। अकेले। बुढ़िया अकेले क्यों हँसेगी?"

"मोहल्ला ख़ुफ़िया रिपोर्ट, नंबर सैंतालीस। चतुर्वेदी परिवार में असामान्य हलचल। जाँच जारी है। सूत्रों पर नज़र रखी जाए। चांचल, ओवर एंड आउट।"

और वो ख़ुफ़िया रिपोर्ट, पैंतीस औरतों की व्हाट्सएप लिस्ट पर, दो सेकंड में पूरे मोहल्ले में फैल गई। चांचल आंटी की जासूसी का एक ही उसूल था, सबूत बाद में, प्रसारण पहले। चांचल आंटी की एक और ख़ासियत थी। वो हर छोटी बात से एक बड़ी कहानी बुन लेती थीं। दूध वाला अगर चतुर्वेदी घर दो पैकेट ज़्यादा छोड़ जाए, तो ज़रूर कोई मेहमान छुपा है। बत्ती अगर देर रात जले, तो ज़रूर कोई राज़ पक रहा है।

"सोचो चांचल, सोचो। जगदीश शेव करने लगा है, पंद्रह साल से दाढ़ी थी। पुष्पा नए ब्लाउज़ सिलवा रही है। सांवी की आँखों में चमक है। और वो गोलू, दिन-रात फ़ोन में घुसा रहता है। इन सब का एक ही मतलब है।"

"...इस घर में कोई न कोई चक्कर चल रहा है। शायद पूरा परिवार ही किसी गिरोह में शामिल है। या... या फिर कोई ख़ज़ाना मिला है। हे भोलेनाथ, मुझे इसकी तह तक जाना ही होगा। मोहल्ले की इज़्ज़त मेरे कंधों पर है।"

उधर चतुर्वेदी घर में, दादी पुष्पा एक नए मोर्चे पर बुरी तरह फँसी थीं। इरा का मैसेज आया था, और इस बार वो चैट से आगे बढ़ना चाहती थी।

"गोलू! ये इरा कह रही है, बहुत हो गई टाइपिंग, मानव, अब आवाज़ सुनाओ। एक बार फ़ोन पर बात करते हैं। ...अब? अब मैं इसे क्या सुनाऊँ? अपनी बुढ़िया वाली आवाज़?"

"दादी, मैंने पहले ही कहा था। एक झूठ की एक उम्र होती है। इरा जवान लड़के की आवाज़ चाहती है। आपकी आवाज़ में तो अठारह सौ सत्तावन की क्रांति सुनाई देती है।"

"जवान लड़के की आवाज़... रुक। इस घर में एक जवान... मतलब आधा-जवान... मर्द की आवाज़ और है। तेरी।"

"नहीं। ना ना ना। दादी, मैं सोलह का हूँ। मेरी आवाज़ अभी भी फटती है। और मैं इरा दीदी से बात नहीं करूँगा। वो बहुत तेज़ है, पकड़ लेगी।"

"गोलू। मेरे प्यारे पोते। जिसकी मैं रोज़ सुबह बादाम वाला दूध बनाती हूँ। जिसकी परीक्षा में मैं मंदिर में नारियल चढ़ाती हूँ। क्या वो अपनी दादी के लिए बस दो मिनट फ़ोन पर बात नहीं कर सकता?"

"ये... ये ब्लैकमेल है। बादाम वाले दूध का ब्लैकमेल। ठीक है। दो मिनट। सिर्फ़ दो मिनट। और आप लाइनें लिख कर देंगी, मैं बस पढ़ूँगा।"

और इस तरह इतिहास की सबसे अजीब प्रेम-वार्ता शुरू हुई। एक तरफ़ इरा। दूसरी तरफ़ गोलू, जो मानव की आवाज़ बन रहा था, और उसके बग़ल में पुष्पा, जो मानव के शब्द लिख रही थीं। एक झूठ, दो परतों गहरा।

"हैलो... इरा। तुम्हारी... आवाज़... सुन कर... अच्छा लगा। मेरा दिल... एक तितली की तरह... उड़ रहा है।"

"मानव? तुम ठीक हो? इतना रुक-रुक कर क्यों बोल रहे हो? और तितली? तुमने चैट में तो कभी इतनी फ़िल्मी बात नहीं की।"

"बोल कि गला ख़राब है। सर्दी हो गई है। बोल बोल!"

"हाँ, वो... गला ख़राब है। सर्दी। इसीलिए तितली। मतलब, सर्दी में तितलियाँ कम होती हैं, तो जो एक दिखी, उसकी बात कर रहा हूँ। ...समझी?"

"अच्छा, एक बात बताओ, मानव। कल कैफ़े में एक बहुत बदतमीज़ लड़के से मेरी लड़ाई हुई। तुम होते तो क्या करते?"

"लिख, लिख। बोल कि मैं उस लड़के को समझाता। बोल कि हर बदतमीज़ इंसान के अंदर एक टूटा हुआ बच्चा होता है।"

"मैं उस लड़के को समझाता। क्योंकि हर बदतमीज़ के अंदर एक टूटा हुआ बच्चा होता है। ..."

"दादी, वो बदतमीज़ लड़का असली मानव चाचा थे! मैं अपने ही चाचा का बचाव कर रहा हूँ, उसी लड़की के सामने, जिससे वो लड़े थे!"

"देखा, मानव? यही फ़र्क़ है तुम में और उस लड़के में। तुम समझते हो। वो सिर्फ़ चिढ़ता है। भगवान ऐसे दो इंसान एक जैसे कैसे बना देता है, पर अंदर से इतने अलग।"

गोलू ने आँखें बंद कर लीं। एक ही इंसान। बिल्कुल एक ही इंसान। बस एक बार दादी टाइप कर रही थीं, और एक बार वो ख़ुद बोल रहा था। और इरा दोनों को दो अलग लोग समझ रही थी।

"अच्छा, गला ठीक कर लो। और मानव, अगली बार बिना पर्ची के बात करना। मुझे लगा जैसे तुम कुछ पढ़ कर बोल रहे हो। ...मज़ाक कर रही हूँ। बाय।"

"...दादी। उसने कहा जैसे मैं पर्ची पढ़ रहा हूँ। वो पकड़ रही है। धीरे-धीरे। ये लड़की जासूस है, चांचल आंटी से भी बड़ी।"

फ़ोन कटा। गोलू पसीने में नहा चुका था। पुष्पा ख़ुशी से उछल रही थीं। और दोनों में से किसी को नहीं पता था कि छत के ऊपर, एक दूरबीन उनकी खिड़की पर टिकी थी।

"गोलू? वो बच्चा फ़ोन पर तितली-वितली की बात कर रहा है? किसी लड़की से? इतनी छोटी उम्र में? हे राम। ये घर तो पाप का अड्डा बनता जा रहा है। रिपोर्ट नंबर अड़तालीस।" और घर में सबसे ऊपर, सांवी अपने कमरे में एक अलग जंग लड़ रही थी। हँसी की नहीं। सच की। कल रात वीडियो कॉल पर वो अनिकेत को पहचान चुकी थी। और तब से वो एक ही सवाल से जूझ रही थी। क्या उसे बता दूँ? कि काया और वो चाय वाली दीदी एक ही है? कि मैं सांवी हूँ, तलाक़शुदा सांवी?

"अनिकेत जी, मुझे आपसे कुछ बताना है... नहीं। ...अनिकेत जी, काया मेरा असली नाम नहीं... नहीं, बहुत सीधा है। ...अनिकेत जी, मैं वो हूँ जो..."

हर बार वो लिखती, और हर बार मिटा देती। क्योंकि जैसे ही वो सच लिखती, उसके सामने उन लोगों के चेहरे आ जाते। बेचारी सांवी। तलाक़ वाली सांवी। पुराना सिक्का।

"काया के पास कोई अतीत नहीं है, अनिकेत। काया के साथ तुम हँसते हो। पर सांवी को जानते ही, तुम्हारी आँखों में भी वही तरस आ जाएगा जो सबकी आँखों में आता है। और मैं वो तरस दोबारा नहीं झेल सकती।"

और तभी, जैसे उसकी उलझन को और गहरा करने, फ़ोन में एक मैसेज चमका। अनिकेत का। काया के लिए। अनिकेत ने लिखा था। काया जी, कल कॉल अचानक कट गई, कोई बात नहीं। पर एक बात कहूँ? आपकी शक्ल किसी और की याद दिलाती है। किसी अच्छे इंसान की, जिससे मैं रोज़ मिलता हूँ पर ठीक से जानता नहीं। अजीब है ना। सांवी की साँस रुक गई। वो उसे पहचानने के क़रीब था। इतना क़रीब। एक क़दम, और काया और चाय वाली दीदी एक हो जातीं।

"शायद मेरी शक्ल आम है, अनिकेत जी। ऐसे बहुत से चेहरे होते हैं। ...अच्छा, अब सोना चाहिए। शुभ रात्रि।"

उसने फ़ोन रख दिया, तेज़ी से, जैसे कोई गरम चीज़ छूट गई हो। एक और रात, सच एक और दिन के लिए टल गया। और नीचे उसकी दादी झूठ की परतें बुन रही थीं, और उससे भी नीचे, चांचल आंटी सबूत जमा कर रही थीं। अब चांचल आंटी की जासूसी का असली मक़सद था। सिर्फ़ ख़बर फैलाना नहीं। एक और चीज़। रिश्ता जोड़ना। और उन्होंने चतुर्वेदी घर की सबसे बड़ी 'समस्या' चुन ली थी। सांवी।

"बेचारी सांवी। तलाक़शुदा। कौन करेगा इससे शादी? मैं। मैं करवाऊँगी। चांचल जो ठान ले, वो होता है। और मैंने ढूँढ लिया है एक लड़का। सेटल्ड। सरकारी नौकरी। बस थोड़ा गंजा है, पर पेंशन पक्की है।"

और उस शाम, बिना किसी को बताए, बिना कोई इजाज़त लिए, चांचल आंटी ने उस गंजे-पर-सेटल्ड लड़के के पूरे परिवार को न्योता दे दिया। कल शाम। सांवी को देखने। जैसे सांवी कोई सामान हो जिसे वो अपनी मर्ज़ी से बेच सकती हों। चतुर्वेदी घर में किसी को कुछ पता नहीं था। जगदीश छत पर सरिता के जवाब का इंतज़ार कर रहे थे। पुष्पा इरा को अगला मैसेज लिख रही थीं। सांवी अनिकेत के बारे में सोच रही थी। और गोलू एक कोने में बैठा, तीनों का हिसाब सँभाल रहा था।

"आज का दिन ठीक निपट गया। कोई पकड़ा नहीं गया। कोई टकराया नहीं। शायद... शायद मैं ये संभाल लूँगा। शायद सब ठीक रहेगा।"

"वैसे... मज़ा भी आ रहा है थोड़ा। दादी की शरारत, पापा का इश्क़, दीदी की हँसी। इस घर में बरसों बाद जान लौटी है। बस कोई पकड़ा न जाए, तो सब सुंदर है।" गोलू, बेटा। ये मत कहना कभी। कहानी में जब भी कोई कहता है सब ठीक रहेगा, ठीक उसी वक़्त..."

...दरवाज़े की घंटी बजी।

"गोलू, देख तो कौन है इस वक़्त। तेरे पापा की दवा वाला होगा।"

गोलू ने दरवाज़ा खोला। और सामने, दवा वाला नहीं खड़ा था। सामने खड़ी थीं चांचल आंटी, चौड़ी मुस्कान के साथ, और उनके पीछे एक पूरा परिवार, सजा-धजा, मिठाई का डिब्बा थामे। एक अधेड़ जोड़ा, और उनके बीच एक गंजा, शरमाया हुआ लड़का।

"सरप्राइज़! पुष्पा बहन! सांवी बिटिया! मैं लड़का ले आई! ये हैं शर्मा जी, ये हैं शर्मा जी की पत्नी, और ये है हमारा दूल्हा राजा, तरुण! कल की जगह आज ही आ गए, कहीं आप मना न कर दें इसलिए!"

"चांचल! ये... ये क्या तरीक़ा है? बिना बताए? घर की हालत देखी है? न कुछ बना है, न..."

"अरे बहन, रिश्ते और बरसात, दोनों बिना बताए आते हैं! तरुण बेटा, अंदर आओ। सांवी बिटिया कहाँ है? ज़रा सामने तो आए, दूल्हे को दिखे तो सही कि माल कैसा है।"

माल। सीढ़ियों पर खड़ी सांवी के चेहरे से रंग उड़ गया। एक इंसान से माल तक का सफ़र, एक ही शब्द में। और उस एक पल में, चतुर्वेदी घर के हर कमरे में हड़कंप मच गया। सांवी सीढ़ियों पर जम गई। जगदीश छत से लुढ़कते हुए उतरे, फ़ोन जेब में ठूँसते हुए। पुष्पा का इरा वाला मैसेज अधूरा रह गया।

"मैंने अभी-अभी कहा था ना, सब ठीक रहेगा। ...मुझे कभी, कभी कुछ नहीं बोलना चाहिए। इस घर में जब भी कोई सुकून की साँस लेता है, ऊपर वाला दरवाज़े की घंटी बजा देता है।"

"नहीं। मैं फिर से नहीं। मैं फिर से किसी की मेज़ पर रखा माल नहीं बनूँगी।"

एक तलाक़शुदा बेटी, तीन छुपे हुए राज़, और दरवाज़े पर खड़ा एक बिन बुलाया रिश्ता, अपने पूरे ख़ानदान के साथ। चतुर्वेदी घर की सबसे लंबी शाम अभी शुरू हुई थी।

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