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Chapter 5 of 25 10 min read

फ़ोन पे प्यार

शादी डॉट कॉम by Avni Oberoi

दरवाज़े पर खड़ा वो पूरा शर्मा ख़ानदान, मिठाई का डिब्बा थामे, और बीच में गंजा तरुण, ये सोच कर आया था कि बेचारी तलाक़शुदा लड़की तो हाथ जोड़ कर हाँ कह देगी। पर आज सांवी वो सांवी नहीं थी जो दो हफ़्ते पहले चुपचाप मुस्कुरा कर ताने सुन लेती थी। काया के नाम ने उसे एक चीज़ याद दिला दी थी। कि वो एक इंसान है, कोई माल नहीं।

"बैठिए, शर्मा जी। चाय पीजिए। पर एक बात साफ़ कर दूँ। मैं आज किसी को देखने-दिखाने के लिए तैयार नहीं। और सच कहूँ, शायद कभी उस तरह तैयार न हूँ। मैं शादी करूँगी तो अपनी मर्ज़ी से, किसी की दया से नहीं।"

"अरे सांवी बिटिया! ऐसे कैसे? मैंने कितनी मेहनत से... तरुण बेटा सरकारी है, पेंशन वाला! तेरे जैसी लड़की को तो..."

"मेरे जैसी लड़की को क्या, चांचल आंटी? आपका वाक्य पूरा कीजिए। नहीं कर पाएँगी। क्योंकि आपको भी पता है कि आगे जो शब्द आएगा, वो ग़लत है।"

शर्मा परिवार मिठाई का डिब्बा वापस उठा कर, नाक-भौं सिकोड़ता हुआ चला गया। और चांचल आंटी, अपनी ज़िंदगी में पहली बार, एक रिश्ता जुड़वाने में नाकाम, मुँह लटकाए घर लौटीं। पर उनके दिमाग़ में एक ही बात गूँज रही थी।

"ये सांवी इतनी बदल कैसे गई? इतनी हिम्मत कहाँ से आई? ज़रूर इसके पीछे कोई है। कोई मर्द। मुझे पता लगाना होगा। ये मोहल्ले की सबसे बड़ी ख़बर बनेगी।"

और पीछे, दरवाज़े की ओट में खड़ी पुष्पा ने अपनी पोती को पहली बार यूँ खड़े देखा, और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने कुछ कहा नहीं। बस मन ही मन एक बात सोची।

"मेरी बच्ची लौट रही है। जो दो साल पहले खो गई थी, वो सांवी लौट रही है। अब बस एक अच्छा लड़का मिल जाए, इसकी अपनी पसंद का। भगवान, इतना कर दे।"

पर पुष्पा के पास एक अच्छे लड़के के बारे में सोचने का वक़्त नहीं था। क्योंकि उनका अपना मोर्चा फिर गरम था। इरा का फ़ोन आने वाला था। और आज गोलू फिर मानव बनने वाला था।

"दादी, मैंने कहा था ना, एक बार बात की थी, बहुत हो गया। इरा तेज़ है। पिछली बार उसने पकड़ लगभग लिया था, पर्ची वाली बात।"

"इस बार पर्ची नहीं। इस बार मैंने पूरा भाषण तैयार किया है। देख, ये रहीं बीस लाइनें। हर सवाल का जवाब। बस तू आवाज़ भारी रखना और बीच-बीच में हँसना। जवान लड़के ऐसे ही करते हैं।"

"दादी, यहाँ लिखा है, जब वो पूछे तुम्हें कैसी लड़की पसंद है, तो बोलना, मुझे वो लड़की पसंद है जो घर भी संभाले और दिल भी। ...दादी, ये डायलॉग किसी सत्तर के दशक की फ़िल्म से चुराया है क्या?"

"राजेश खन्ना। मेरा पसंदीदा। और देख, अब तक तो चल ही रहा है। इरा को मानव पसंद है ना? तो राजेश खन्ना काम कर रहा है। बज गई घंटी, उठा, उठा!"

गोलू ने काँपते हाथ से फ़ोन उठाया, गला खँखारा, और अपनी सोलह साल की आवाज़ को जितना भारी कर सकता था, किया।

"हैलो... इरा। कैसी हो।"

"अरे वाह, आज तो आवाज़ बिल्कुल फ़िल्मी हीरो जैसी है। गला ठीक हो गया तुम्हारा? कल तो तितलियाँ उड़ रही थीं।"

"हाँ, अब बेहतर हूँ। सच कहूँ, इरा, तुमसे बात करके मेरा हर दिन थोड़ा बेहतर हो जाता है। जैसे सुबह की पहली चाय।"

"सुबह की पहली चाय। ये तुमने अच्छा कहा। पता है, मानव, तुम शब्दों से खेलना जानते हो। कभी-कभी लगता है तुम्हारे अंदर एक कवि छुपा है।"

बग़ल में बैठी पुष्पा मुट्ठी हवा में लहरा रही थीं, जैसे क्रिकेट में छक्का लगा हो। गोलू का पसीना छूट रहा था, पर बात, हैरानी की बात, सचमुच अच्छी चल रही थी।

"अच्छा एक बात बताओ। तुम कॉमेडियन हो ना? मुझे कोई ऐसा किस्सा सुनाओ जो स्टेज पर हुआ हो। कोई सच्ची बात। पर्ची से नहीं, दिल से।"

पुष्पा की क़लम रुक गई। स्टेज का किस्सा? वो कहाँ से लाएँ? उन्होंने तो कभी मानव का शो देखा ही नहीं था, हमेशा टोकती रहीं कि नौकरी कर ले।

"एक बार... एक शो में सिर्फ़ तीन लोग आए थे। तीन। और उनमें से एक सो गया। तो मैंने पूरा शो उन दो लोगों के लिए किया, जो जागे थे। ...और सच कहूँ, वो मेरा सबसे अच्छा शो था। क्योंकि मैं किसी भीड़ के लिए नहीं, दो सच्चे लोगों के लिए बोल रहा था।"

और वो किस्सा गोलू ने किसी पर्ची से नहीं पढ़ा था। वो सच था। असली मानव का सच। गोलू ने उसे कई बार वो कहानी सुनाते सुना था। और उस एक पल में, नक़ली मानव के मुँह से असली मानव का दिल बोल गया।

"...वाह। मानव, ये सबसे सुंदर बात है जो तुमने आज तक कही। दो सच्चे लोगों के लिए। मुझे लगता है, मैं भी वैसी ही हूँ। भीड़ नहीं चाहिए। बस एक-दो सच्चे लोग।"

और उस पल, बग़ल में बैठी पुष्पा की हँसी धीमी हो गई। क्योंकि उन्होंने पहली बार सुना कि उनका मानव, असली मानव, स्टेज पर अकेला रहता है। तीन लोगों के आगे बोलता है। और उन्हें एहसास हुआ कि इस झूठ के पीछे एक सच्चा दर्द था, उनके अपने बेटे का।

"गोलू, मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरे मानव के शो में इतने कम लोग आते हैं। मैं तो हमेशा उसे डाँटती रही, कमाता क्यों नहीं। और वो अकेला, तीन लोगों के आगे..."

"दादी, इसीलिए तो वो इतना चिड़चिड़ा रहता है। कोई सुनने वाला नहीं ना। और अब आप उसके नाम से एक लड़की को हँसा रही हो, और उसे पता तक नहीं कि कोई उसकी बातों पर मर मिटा है।"

फ़ोन रखा गया। और तीनों, इरा, गोलू, और पुष्पा, अपनी-अपनी जगह मुस्कुरा रहे थे। सबसे अजीब प्रेम-वार्ता, और सबसे कामयाब। पर ये कामयाबी एक ख़तरा थी, जिसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। उसी दोपहर, शहर के दूसरे कोने में, असली मानव फिर उसी कैफ़े में था। और किस्मत, जिसे कॉमेडी की टाइमिंग बहुत अच्छी आती है, इरा को भी वहीं ले आई।

"आप फिर? इस पूरे शहर में क्या यही एक कैफ़े है? या आप मेरा पीछा कर रही हैं?"

"पीछा? आपका? भगवान न करे। मैं तो यहाँ किसी अच्छे इंसान का इंतज़ार कर रही हूँ। आपके बिल्कुल उलट। बस बदक़िस्मती से आप भी यहीं पाए जाते हैं, जैसे चाय में मक्खी।"

"अच्छा इंसान? हुँह। पता है, मैं भी किसी से बात करता हूँ। एक लड़की है। बहुत समझदार। वो मेरी हर बात समझती है। आपकी तरह हर वक़्त काटती नहीं।"

"वाह, बधाई हो। किसी बेचारी को आप जैसा झेलने वाला मिल गया। भगवान उसकी रक्षा करे। वो लड़की ज़रूर बहुत सब्र वाली होगी।"

"सब्र? उल्टा। वो कहती है मैं उसका दिन बेहतर कर देता हूँ। सुबह की पहली चाय जैसा। ये उसने ख़ुद कहा। तो आप जैसी लड़कियाँ भले मुझे बदतमीज़ समझें, कोई तो है जो मुझे... कवि समझती है।"

इरा एक पल को ठिठकी। सुबह की पहली चाय। कवि। ये तो वही शब्द थे जो उसने आज सुबह फ़ोन पर अपने मानव से सुने थे। पर उसने सिर झटक दिया। इत्तेफ़ाक़ होगा। पूरी दुनिया चाय के उदाहरण देती है।

"कवि? आप? जिसे बीस मिनट में एक लाइन नहीं आती? सुनिए, आप जो भी हैं, अपनी उस बेचारी कवयित्री-प्रेमी वाली कहानी अपने पास रखिए। मुझे मेरी कॉफ़ी पीने दीजिए। शांति से।"

और दोनों वहाँ खड़े, एक-दूसरे से चिढ़ते रहे। इरा को नहीं पता था कि जिस अच्छे इंसान का वो इंतज़ार कर रही थी, और जिस बदतमीज़ से वो लड़ रही थी, वो एक ही नाम के दो चेहरे थे। एक असली, एक दादी के हाथों गढ़ा हुआ।

"अजीब बात है। इस मानव नाम में कुछ तो है। एक मानव मुझे फ़ोन पर कविता सुनाता है, और एक मानव इस कैफ़े में मुझसे झगड़ता है। एक ही नाम। पर दिन-रात का फ़र्क़। ...या शायद कोई इंसान इतना दोहरा हो सकता है?"

और वहीं, इरा के तेज़ दिमाग़ में, एक छोटा सा सवाल जाग गया, जो आगे चल कर पूरी कहानी बदल देगा। पर अभी के लिए, उसने उसे टाल दिया। और घर में, इन सब से बेख़बर, जगदीश छत पर टहलते हुए एक अलग ही डर से जूझ रहे थे। सरिता ने आमने-सामने मिलने की बात की थी। और कर्नल रणविजय को, यानी जगदीश को, असल में मिलना था। एक चैट पर कर्नल बनना आसान था। शब्दों के पीछे छुपना आसान था। पर आमने-सामने? जहाँ सरिता उसकी आँखें देखेगी, उसके हाथ की काँपती चाय की प्याली देखेगी, उसकी घिसी हुई चप्पल देखेगी? वहाँ झूठ कैसे टिकेगा? फिर भी, दिल की हिम्मत कर, उसने सरिता को लिखा। सरिता जी, इस शनिवार, शहर के उस पुराने कैफ़े में, चाय पर? मैं आपको असल में जानना चाहता हूँ। ...और भेज कर वो पूरी रात सो नहीं पाया। उस रात जगदीश आईने के सामने खड़े, एक कर्नल की तरह चलने की कोशिश करते रहे। सीना ताना, ठोड़ी ऊँची, हाथ पीछे बाँधे। पर हर दो क़दम पर उनका घुटना चरमराता, और कर्नल फिर से एक थका हुआ डाकिया बन जाता। और फिर वो रुक गए। पत्नी की तस्वीर के सामने। और धीरे से बोले, जैसे माफ़ी माँग रहे हों। सुनती हो, उन्होंने कहा, मैं झूठ बोल रहा हूँ, ये सच है। पर बरसों बाद किसी के साथ चाय पीने का मन हुआ है। इतना बुरा तो नहीं ना। तुम नाराज़ तो नहीं? अब यहाँ ध्यान दीजिए। क्योंकि किस्मत एक जाल बुन रही थी, जिसके तीन धागे एक ही जगह जुड़ने वाले थे। इसी शनिवार। इसी शहर के इसी पुराने कैफ़े में। उसी शाम, इरा ने फिर 'मानव' को मैसेज किया। और इस बार उसने एक फ़ैसला ले लिया था।

"मानव, बहुत हो गई फ़ोन और चैट। अब मैं तुमसे आमने-सामने मिलना चाहती हूँ। इसी शनिवार। और मुझे पता है कहाँ। वो पुराना कैफ़े, जहाँ शनिवार की शाम ओपन-माइक होता है। सुना है वहाँ नए कॉमेडियन बोलते हैं। तुम कॉमेडियन हो, तुम्हें वहाँ अच्छा लगेगा।"

पुष्पा ने वो मैसेज पढ़ा, और उनके हाथ से चश्मा गिरते-गिरते बचा। क्योंकि वो कैफ़े, वो ओपन-माइक, वो जगह जहाँ शनिवार की शाम नए कॉमेडियन बोलते थे, वहाँ एक ख़ास कॉमेडियन हर शनिवार बोलता था।

"हे राम। वो कैफ़े... शनिवार की शाम... वहाँ तो मेरा मानव ख़ुद स्टेज पर होता है। असली मानव। इरा वहाँ नक़ली मानव से मिलने जाएगी, और सामने असली मानव खड़ा होगा। दोनों... एक ही जगह।"

"मना कर दें? कह दें मानव शहर से बाहर है? नहीं, तो वो कहेगी अगले हफ़्ते मिलते हैं। भगवान, मैंने ये झूठ इतना बड़ा कर दिया कि अब इसे न निगल सकती हूँ, न उगल सकती हूँ।"

"दादी। समझ रहे हो क्या हुआ? इरा शनिवार को उसी कैफ़े जाएगी जहाँ असली मानव चाचा स्टेज पर होंगे। झूठ, सीधे सच के सामने। और उसी दिन, उसी कैफ़े में, पापा भी सरिता जी से मिलने आ रहे हैं। ...ये कैफ़े नहीं, ये बम है। और शनिवार को फटेगा।"

तीन झूठ, एक कैफ़े, एक शनिवार। पुष्पा ने काँपते हाथ से क़लम रखी। इस बार कोई पर्ची, कोई भाषण, कोई राजेश खन्ना का डायलॉग काम नहीं आने वाला था। इस बार, झूठ को सच के दरवाज़े पर, आमने-सामने, खड़ा होना था।

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