Chapter 6 of 25 10 min read
पहली मुलाक़ात
शनिवार आ गया, और गोलू भेड़ों को हाँकते कुत्ते की तरह हर किसी को अलग-अलग रखने की जान लगा देता है, ताकि इरा नक़ली मानव के जाल में न फँस जाए। उधर उसी पुराने कैफ़े में जगदीश और सरिता की पहली मुलाक़ात होती है, दो घबराए हुए बुज़ुर्ग, बरसों बाद इतने मीठे और इतने बहादुर, वो कर्नल का नाटक निभाता है और वो गर्मजोशी से हर बात पर यक़ीन करने का नाटक करती है। सांवी अनिकेत को लगभग सब कुछ बता ही देती है। पर तभी वही कैफ़े उन सबको एक साथ थाम लेता है, जगदीश जैसे ही सरिता का हाथ थामने बढ़ते हैं, कमरे के उस पार उन्हें अपनी बेटी सांवी दिख जाती है, और सरिता की नज़र दरवाज़े से अंदर आते अनिकेत पर पड़ती है।
शनिवार की सुबह चतुर्वेदी घर में ऐसी हलचल थी जैसे किसी युद्ध की तैयारी हो। और उस युद्ध का इकलौता सेनापति सोलह साल का था, बिना सोया हुआ, और आधा पागल। गोलू के पास एक असंभव हिसाब था। आज शाम एक ही कैफ़े में तीन धमाके होने वाले थे। पापा सरिता से मिलने जा रहे थे। इरा नक़ली मानव से मिलने आ रही थी। और वहीं असली मानव अपना ओपन-माइक करने वाला था।
"इरा... दीदी... मतलब इरा। सुनो, आज शाम को थोड़ा लेट आना कैफ़े। सात बजे नहीं, आठ बजे। हाँ, वो... मेरा एक ज़रूरी काम है। बहुत ज़रूरी। ...प्लीज़।"
गोलू ने एक घंटा ख़रीद लिया था। एक घंटा, जिसमें उसे पापा की डेट निपटानी थी, असली मानव को स्टेज से हटाना था, और इरा को नक़ली मानव के इंतज़ार में उलझाए रखना था। एक सोलह साल का लड़का, तीन ज़िंदगियों का ट्रैफ़िक सिग्नल।
"बस आज का दिन निकल जाए। भगवान, अगर तू है, तो आज पापा को सरिता जी से प्यार से मिलवा दे, और बाक़ी सबको एक-दूसरे से दूर रख। मैं तेरे मंदिर में पूरे नंबर से पास होने की मन्नत मानूँगा।"
और उधर, उस पुराने कैफ़े में, शहर के एक शांत कोने में, एक साठ साल का आदमी अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ने बैठा था। इश्क़ की लड़ाई। जगदीश। कर्नल रणविजय बन कर। उसने तीन बार शर्ट बदली थी। एक पुराना ब्लेज़र निकाला था, जो शादी के बाद पहली बार पहना। और सीने पर, हिम्मत के लिए, अपनी बेटी की एक पुरानी बैज लगा ली थी, ये सोच कर कि शायद ये फ़ौजी मेडल जैसी लगे।
"आराम से, जगदीश। सीना ताना। आवाज़ भारी। और भूलना मत, तू कर्नल है। पंद्रह साल से कोई तुझसे नहीं मिला था, और आज कोई ख़ास मिलने आ रहा है। ...बस घबराना मत।"
पर जगदीश के हाथ काँप रहे थे। मेज़ पर रखी पानी की गिलास में हल्की-हल्की लहरें उठ रही थीं। साठ साल का एक आदमी, जो सरहद पर कभी नहीं गया, इस वक़्त अपनी ज़िंदगी की सबसे डरावनी जगह पर बैठा था। एक ख़ाली कुर्सी के सामने, उम्मीद के साथ। और फिर, दरवाज़े से, वो अंदर आई। सरिता। अट्ठावन साल की। सादी सी साड़ी, कानों में छोटे झुमके, और एक ऐसी मुस्कान जो कमरे को थोड़ा और रौशन कर गई।
"कर्नल रणविजय? ...मैं सरिता। माफ़ कीजिए, थोड़ी देर हो गई। बस में भीड़ थी। ...आप सचमुच कर्नल जैसे लगते हैं। वो बैठने का तरीक़ा, बिल्कुल तना हुआ।"
"जी... जी सरिता जी। बैठिए। फ़ौज में यही सिखाते हैं। रीढ़ सीधी, इरादे मज़बूत। एक बार सिपाही, हमेशा सिपाही। ...जय हिंद।"
सरिता ने धीरे से चाय का ऑर्डर दिया, और जगदीश को गौर से देखा। उसके ब्लेज़र पर लगी वो बैज, जिस पर साफ़ लिखा था, कानपुर स्कूल एथलेटिक्स, दूसरा स्थान। और सरिता मुस्कुरा दी। पर कुछ कहा नहीं। क्योंकि सरिता समझदार थी। उसने पहली नज़र में भाँप लिया था कि ये आदमी कोई कर्नल नहीं। पर उसने ये भी भाँप लिया था कि इस आदमी की आँखों में जो अकेलापन है, वो सच्चा है। और उसने तय किया कि आज वो झूठ को नहीं, इस अकेलेपन को जवाब देगी।
"अच्छा कर्नल साहब, ये बताइए। आप किस रेजिमेंट में थे? मेरे पिता जी राजपूताना राइफ़ल्स में थे।"
"राजपूताना? वाह। मैं... मैं तो... डाक रेजिमेंट में था। मतलब... सीमा डाक। जहाँ ख़त पहुँचाना भी एक जंग है, सरिता जी। गोली से नहीं, ज़िम्मेदारी से लड़ते थे हम।"
डाक रेजिमेंट। जगदीश ने घबराहट में वो सच कह दिया जो उसकी असली ज़िंदगी थी। एक डाकिया। और उसे पता भी नहीं चला कि झूठ के बीच सच फिसल गया।
"सीमा डाक। कितना सुंदर कहा आपने। ख़त पहुँचाना भी एक जंग है। ...पता है कर्नल साहब, मुझे बड़ी-बड़ी बहादुरी की बातों से ज़्यादा, ऐसी छोटी, सच्ची बातें अच्छी लगती हैं।"
"तो कर्नल साहब, फ़ौज की ज़िंदगी कैसी रही? सरहद पर डर नहीं लगता था?"
"डर? ...सच कहूँ, सरिता जी? डर तो लगता था। रोज़। पर सबसे बड़ा डर सरहद का नहीं था। सबसे बड़ा डर था घर लौट कर एक ख़ाली कमरे में अकेले रहने का। ...वो डर, वो आज तक नहीं गया।"
और उस एक पल में, जगदीश झूठ बोलना भूल गया। कोई कर्नल नहीं बोला। एक अकेला आदमी बोला। और सरिता ने, उस पूरी शाम में पहली बार, अपने दिल में एक गर्माहट महसूस की।
"वो ख़ाली कमरा मैं भी जानती हूँ, कर्नल साहब। मेरे पति को गए दस साल हो गए। लोग कहते हैं वक़्त सब भर देता है। पर कोई ये नहीं बताता कि शाम की चाय अकेले पीना, वो कभी आसान नहीं होता।"
"तो आज... आज हम शाम की चाय अकेले नहीं पीएँगे। बस आज के लिए।"
"कर्नल साहब, एक बात कहूँ? मैं भी अपनी प्रोफ़ाइल में थोड़ा... सजा-धजा कर लिखा है। लोग सच्चाई से डरते हैं ना, तो हम सब थोड़ा बेहतर बन कर पेश आते हैं। शायद इसलिए कि हमें लगता है असली हम काफ़ी नहीं।"
"सरिता जी, आप... आप बहुत समझदार हैं। और शायद आप ठीक कहती हैं। कभी-कभी असली इंसान इतना डरा होता है कि उसे एक नक़ली कवच पहनना पड़ता है। बस बाहर निकलने के लिए।"
दो लोग, दोनों थोड़े झूठे, दोनों थोड़े अकेले, एक मेज़ पर चाय पीते हुए, बरसों बाद पहली बार सच्चे। और कैफ़े का शोर धीरे-धीरे उनके लिए ग़ायब हो गया। और इसी बीच, कैफ़े के बाहर, गोलू एक खंभे के पीछे छुपा, हाँफते हुए, अपने फ़ोन पर तीन बातें एक साथ संभाल रहा था। असली मानव को उसने एक झूठा मैसेज भेज कर स्टेज का वक़्त एक घंटा आगे खिसकवा दिया था।
"पापा अंदर हैं, सरिता जी के साथ। दीदी भी अंदर हैं, किसी के साथ। और इरा आठ बजे आएगी। बस मानव चाचा स्टेज पर देर से चढ़ें, तो मैं इरा को टाल सकता हूँ। ...भगवान, बस थोड़ी देर और।"
पर गोलू, चतुर होते हुए भी, एक चीज़ नहीं देख पा रहा था। वो बाहर से खिड़की के अंदर झाँक रहा था, पर उसे ये नहीं दिख रहा था कि अंदर, पापा और दीदी, एक ही कमरे में, बस कुछ मेज़ों की दूरी पर बैठे थे। और उसी कैफ़े के एक और कोने में, एक और मुलाक़ात चल रही थी। सांवी और अनिकेत। काया और अनिकेत। जो आज असल में, आमने-सामने, मिलने आए थे। दिन के उजाले में। सांवी काँप रही थी। क्योंकि उसे पता था। ये आदमी उसे रोज़ चाय के काउंटर पर देखता है। अगर आज इसने काया और चाय वाली दीदी को जोड़ लिया, तो सब ख़त्म।
"काया जी। सच कहूँ, आपको सामने देख कर अजीब लग रहा है। जाना-पहचाना। जैसे हम पहले भी मिले हों। ...मिले हैं क्या?"
"नहीं... शायद नहीं। मेरी शक्ल आम है। ...अनिकेत जी, मुझे आपसे एक बात कहनी है। बहुत दिन से रुकी हुई है। मेरा असली..."
सांवी की ज़बान काँपी। सच उसके होंठों पर था। काया मेरा असली नाम नहीं। मैं सांवी हूँ। तलाक़शुदा सांवी। तुम्हारी गली की चाय वाली। सब कुछ, एक साँस की दूरी पर।
"कहिए, काया जी। मैं सुन रहा हूँ। और सच बताऊँ, मैंने ज़िंदगी में इतनी चीज़ें झेली हैं कि अब किसी की सच्चाई से डर नहीं लगता। जो भी है, कह दीजिए। बीच में कुछ नहीं आएगा।"
"अगर... अगर मैं वो न होऊँ जो आप सोचते हैं? अगर मेरा एक अतीत हो, जिस पर लोग तरस खाते हों? तब भी आप... ऐसे ही बात करेंगे मुझसे?"
"काया जी, अतीत तो हर किसी का होता है। मेरा भी है। और वो हल्का नहीं है। पर मैं मानता हूँ कि इंसान अपने सबसे बुरे दिन से नहीं जाना जाता। वो इससे जाना जाता है कि उस दिन के बाद वो कैसे उठा। तो हाँ। तब भी ऐसे ही।"
उसकी नरमी ने सांवी को हिम्मत दी। उसने गहरी साँस ली। आँख उठाई। और कहने ही वाली थी।
"अनिकेत, मैं... मेरा असली नाम... मैं..."
और ठीक उसी पल, किस्मत, जो पूरे दिन इस कैफ़े में एक जाल बुन रही थी, ने अपना आख़िरी धागा खींचा। कैफ़े के दूसरे कोने में, जगदीश ने अपनी पूरी ज़िंदगी की हिम्मत जुटाई। और मेज़ के पार, धीरे से, सरिता का हाथ थामने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। बरसों बाद, पहली बार। और ठीक उसी पल, जैसे कोई अनदेखी डोर खिंची हो, जगदीश की नज़र ऊपर उठी, कमरे के उस पार, और वहाँ, एक कोने की मेज़ पर, उसने देखा।
"सां... सांवी? मेरी बेटी? यहाँ? इस कैफ़े में?"
जगदीश का बढ़ा हुआ हाथ, सरिता के हाथ से एक इंच दूर, हवा में जम गया। उसकी बेटी, वहाँ, किसी आदमी के साथ। और अगर सांवी ने ऊपर देखा, तो वो अपने पापा को एक अजनबी औरत के साथ, कर्नल बने हुए देख लेती। और उधर, सरिता, जिसने जगदीश की जमी हुई नज़र का पीछा किया, उसकी अपनी नज़र दरवाज़े की तरफ़ मुड़ी। जहाँ, ठीक उसी पल, एक आदमी अंदर दाख़िल हो रहा था। जाना-पहचाना। बहुत जाना-पहचाना।
"अनिकेत? ...ये तो मेरा बेटा है। मेरा अनिकेत यहाँ क्या कर रहा है?"
और सरिता ने, एक माँ की सहज घबराहट में, अपना चेहरा थोड़ा घुमा लिया, ताकि अनिकेत उसे इस अजनबी कर्नल के साथ न देख ले। उसका दिल धड़क रहा था। उसे नहीं पता था कि उसका बेटा जिस लड़की से मिलने आया है, वो इसी कर्नल की बेटी है।
"सरिता जी, मुझे... मुझे अचानक याद आया, मेरा एक ज़रूरी काम है। मैं... मैं थोड़ी देर में आता हूँ। आप बैठिए।"
और उधर सांवी, जो अभी-अभी अपना सच कहने वाली थी, उसने अनिकेत को दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए पाया, और उसका दिल बैठ गया। अनिकेत उठ खड़ा हुआ था, किसी को पहचान कर।
"एक मिनट, काया जी। वो सामने... वो मेरी माँ हैं क्या? माँ यहाँ? और उनके साथ वो कौन... रुकिए, वो चेहरा..."
एक पल में, चार नज़रें, एक अनदेखे जाल के चार कोनों पर। जगदीश उठने को हुआ, चेहरा छुपाता हुआ। सरिता मुड़ी बैठी थी, बेटे से नज़र चुराती। सांवी काँप रही थी, अपने पापा की तरफ़ पीठ किए। और अनिकेत, बीच में खड़ा, तीनों को देखता हुआ, पर किसी को जोड़ न पाता हुआ। एक कैफ़े। चार लोग। जगदीश, जो अपनी बेटी को देख रहा था, पर उस आदमी को नहीं, जिसके साथ वो थी। सरिता, जो अपने बेटे को देख रही थी, पर उस लड़की को नहीं, जिसके साथ वो था। सांवी, जो अभी-अभी अपना राज़ कहने वाली थी। और अनिकेत, जो सबको देख रहा था, पर सच किसी को नहीं। चार दिल, चार राज़, एक लट्टे की दूरी पर। हर कोई किसी न किसी को पहचान रहा था, पर कोई भी पूरी तस्वीर नहीं देख पा रहा था। और सबसे बड़ा मज़ाक ये कि वो पूरी तस्वीर, अगर एक पल को भी सब एक-दूसरे की आँखों में देख लेते, तो साफ़ हो जाती। ...पर देखने वाली थी। बहुत जल्द।
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