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Chapter 9 of 25 12 min read

राज़ पे राज़

शादी डॉट कॉम by Avni Oberoi

रात के तीन बजे, चतुर्वेदी घर की सबसे ऊपर वाली छत पर, एक अकेली नीली रोशनी जल रही थी। और उस रोशनी के पीछे, एक सोलह साल का लड़का, तीन कप ठंडी चाय और आधे खाए चिप्स के पैकेट के बीच, अपनी ज़िंदगी की सबसे अजीब जंग लड़ रहा था। एक कंपनी के ख़िलाफ़, अकेला। फ़ैमिली सर्कल का वो बटन दब नहीं रहा था, व्यवस्थापक ने बंद कर रखा था। तो गोलू ने वो किया जो एक थका हुआ, डरा हुआ, पर बहुत तेज़ दिमाग़ ही कर सकता है। उसने पूरे घर के फ़ोन को एक-एक कर के अलग नेटवर्क पर डाला, हर प्रोफ़ाइल का पता बदला, और ऐप को यक़ीन दिला दिया कि ये तीन लोग एक घर के नहीं, तीन अलग शहरों के हैं। सुबह की पहली अज़ान के साथ, वो नारंगी घड़ी अपने आप बुझ गई। फ़ैमिली सर्कल चालू तो हुआ, पर चतुर्वेदी घर उसकी पकड़ से फिसल गया। कोई ईमेल किसी ताऊ को नहीं गया। कोई राज़ चांचल आंटी तक नहीं पहुँचा। गोलू जीत गया था। पर वो जीत ऐसी थी जैसे कोई पूरी रात एक बाँध में उँगली डाले खड़ा रहे। और उस क़रीबी बचाव ने घर के हर छुपे हुए दिल को थोड़ा और डरा दिया। किसी को ठीक-ठीक पता नहीं था कि आफ़त कितने क़रीब से टली, पर सबको एक अजीब सी बेचैनी हो गई, जैसे किसी अनदेखी चीज़ ने उन्हें बहुत क़रीब से छू कर छोड़ दिया हो। और सबसे ज़्यादा थका, सबसे कम सोया, वो सोलह साल का चौकीदार था। सुबह गोलू स्कूल की तरफ़ घिसटता चला, आँखों के नीचे स्याह हलक़े, बैग एक कंधे पर लटका। एक तरफ़ बोर्ड की परीक्षा सिर पर थी, और दूसरी तरफ़ तीन अकेले दिलों का पूरा नक़ली संसार, जिसका इकलौता, बिना तनख़्वाह वाला रखवाला वो था। उसने आसमान की तरफ़ देखा और एक थकी हुई शिकायत की, कि भगवान, बाक़ी बच्चों के पास बस पढ़ाई है, मेरे पास ये भी है। और उसी शाम, जब बेकरी की भीड़ छँट गई और शीशे के बाहर गली में बत्तियाँ जलने लगीं, एक और तरह की जंग, बहुत नरम, बहुत मीठी, शुरू हुई। अनिकेत अपनी रोज़ वाली मेज़ पर बैठा रहा, चाय ख़त्म होने के बाद भी, बिना जाने कि वो क्यों नहीं उठ रहा। और सांवी, न जाने क्यों, आज उसे भगा नहीं रही थी। आज न कोई काया थी, न कोई नक़ली नाम, न कोई स्क्रीन। बस एक थकी हुई बेकरी वाली और एक सब्र वाला ग्राहक, एक ख़ाली दुकान में, पहली बार अपने असली रूप में आमने-सामने।

"ये लीजिए। आज के बचे हुए बिस्किट। थोड़े जल गए थे, इसलिए बेचे नहीं। ...पर फेंकने का मन भी नहीं हुआ। जली हुई चीज़ों से मुझे अजीब सी हमदर्दी है।"

"जली हुई चीज़ों से हमदर्दी? ...तब तो मैं आपकी सबसे पसंदीदा चीज़ होना चाहिए, दीदी। मुझसे ज़्यादा जला हुआ आदमी आपको इस गली में नहीं मिलेगा।"

और सांवी हँस पड़ी। एक असली हँसी, जो काउंटर के पीछे से नहीं, कहीं गहरे से आई। वही हँसी जो हफ़्तों से अनिकेत सिर्फ़ अपने फ़ोन पर सुनता आया था। और उसने वो हँसी पहचान ली, पर कुछ कहा नहीं। उसने बस उसे बचा कर, दिल के एक कोने में रख लिया।

"पता है, ये जला हुआ बिस्किट, आपकी उन परफ़ेक्ट, सजी हुई वाली चीज़ों से ज़्यादा अच्छा है। इसमें एक स्वाद है, थोड़ा कड़वा, थोड़ा असली। सजी हुई चीज़ें सुंदर तो होती हैं, पर याद नहीं रहतीं। ...जली हुई याद रह जाती हैं।"

"आप हर चीज़ में कोई गहरी बात ढूँढ लेते हैं। एक बिस्किट में भी। ...मेरे यहाँ लोग बस दाम पूछते हैं, अनिकेत जी। आप स्वाद पूछते हैं। शायद इसीलिए मैं आपको भगा नहीं पाती।"

"अच्छा? आप इतने जले हुए कैसे हैं, अनिकेत जी? देखने में तो आप बिल्कुल शांत लगते हैं। जैसे आपको कभी कोई परेशानी हुई ही न हो।"

"शांत दिखना और शांत होना, दो अलग चीज़ें हैं, दीदी। मैंने किसी को बहुत क़रीब से खोया है। और उसके बाद आदमी सीख जाता है कि दर्द को अंदर कैसे शांत रखते हैं, ताकि बाहर वालों को असहज न होना पड़े। ...बस, इतना ही बताऊँगा आज।"

और सांवी ने और नहीं पूछा। क्योंकि उसे भी एक दरवाज़ा बंद रखना था। तलाक़ वाला। तरस वाला। दो लोग एक ख़ाली बेकरी में, दोनों अपने-अपने बंद कमरे लिए, और फिर भी, अजीब बात, एक-दूसरे के पास बैठे हुए ज़्यादा हल्के महसूस कर रहे थे। उसने बिना पूछे उसकी ख़ाली प्याली फिर से भर दी, वैसे ही, जैसे बरसों से किसी अपने के लिए भरती हो। और अनिकेत ने वो छोटी सी बात लक्ष्य कर ली, बिना पूछे भरी हुई चाय, और उसके सीने में कुछ ऐसा हिला जो बरसों से जमा हुआ था। दो अजनबी, और इतनी जानी-पहचानी सी एक चाय।

"अच्छा, एक और बिस्किट पैक कर दीजिए। जला हुआ नहीं, अच्छा वाला। ...किसी छोटे के लिए। उसे मीठा बहुत पसंद है।"

किसी छोटे के लिए। सांवी के मन में एक सवाल आया, पर उसने पूछा नहीं। शायद कोई भतीजा होगा, कोई रिश्तेदार का बच्चा। उसे क्या पता कि अनिकेत के उस एक वाक्य के पीछे भी एक पूरा बंद कमरा था, बिल्कुल उसी के जैसा।

"किसी छोटे के लिए मीठा, और अपने लिए सबसे कड़वी अदरक वाली चाय। आप उलटे इंसान हैं, अनिकेत जी। ...पर पता है, आज पहली बार आपसे बात करके अच्छा लगा। बिना जल्दबाज़ी के।"

"मुझे भी अच्छा लगा। पता है, कभी-कभी लगता है मैं आपको बहुत पहले से जानता हूँ। इस दुकान से भी पहले से। ...अजीब है ना? दो अजनबी, और फिर भी इतने जाने-पहचाने।"

और वहाँ, उस एक पल में, वो ऐप उनके बीच खड़ा था, अनदेखा, अनकहा। परफेक्ट रिश्ता, जिसने उन्हें काया और अनिकेत बना कर पहले ही जोड़ दिया था। दोनों को कहीं न कहीं उसका एहसास था। पर दोनों ने उसका नाम नहीं लिया। क्योंकि इस पल में, बिना नाम के, वो सच्चा था। और वो उसे टूटने नहीं देना चाहते थे।

"अच्छा, अब चलता हूँ, देर हो रही है। ...दीदी, एक बात कहूँ? जिस दिन आप वो बात कहने को तैयार हों, जो कल कैफ़े से रुकी हुई है, मैं यहीं मिलूँगा। इसी मेज़ पर, इसी अदरक वाली चाय के साथ। ...इस बार मैं भागूँगा नहीं। और शायद आप भी मत भागिएगा।"

और वो चला गया, गली की धुँधली बत्तियों में। सांवी वहीं खड़ी रह गई, हाथ में वो अच्छा वाला बिस्किट पैक किए हुए, किसी अनजाने छोटे के लिए। और दो साल में पहली बार उसने अपने आप को उम्मीद करने दी। एक छोटी, काँपती हुई उम्मीद। और सबसे अजीब बात ये थी कि उस उम्मीद से वो डर रही थी, दर्द से ज़्यादा। और उसी रात, शहर के दूसरे कोने में, उसी पुराने कैफ़े में, एक बिल्कुल अलग तरह का प्यार, नोक-झोंक और चिढ़ के लिबास में, अपना रास्ता ढूँढ रहा था। मानव, असली मानव, स्टेज से उतरा ही था, अपने चुटकुलों की आधी-अधूरी तालियाँ बटोर कर, तभी सामने वाली मेज़ पर एक जाना-पहचाना, नापसंद चेहरा बैठा दिखा। इरा।

"तुम फिर यहाँ? ...देखो, अगर मेरी मेज़ के बारे में शिकायत करने आई हो, तो वो मेज़ पहले मेरी थी। मैं यहाँ हर शनिवार परफ़ॉर्म करता हूँ। तुम बस दो हफ़्ते से टपक रही हो।"

"वाह। 'टपक रही हो'। स्टेज पर तो तुम्हारे चुटकुले नहीं चले, पर असल ज़िंदगी में तुम बिना कोशिश के मज़ाकिया हो। ...बैठने दोगे, या ये मेज़ भी तुम्हारे बाप-दादा की जागीर है?"

और मानव, जो चिढ़ने की पूरी तैयारी से बैठा था, अपनी हँसी रोक नहीं पाया। इस लड़की की ज़बान तेज़ थी, उसी की तरह। और सच कहें तो, स्टेज के नीचे बैठे उन साढ़े नौ ऊबे लोगों से ज़्यादा, इस एक चिढ़ी हुई लड़की ने उसके मज़ाक़ को समझा था।

"जागीर नहीं है। पर मेहनत से कमाई हुई मेज़ है। रोज़ आ कर, आधे-अधूरे लोगों के सामने, अपने सबसे बुरे चुटकुले सुना कर। ...तुम्हें क्या लगता है, ये आसान है? स्टेज पर अकेले खड़े हो कर, और किसी का न हँसना?"

"नहीं, आसान नहीं है। मैं फ़िज़ियोथेरेपिस्ट हूँ। मेरे पास रोज़ ऐसे लोग आते हैं जिनका शरीर उन्हें धोखा दे चुका है, और फिर भी वो चलने की कोशिश करते हैं। ...अकेले खड़े हो कर कोशिश करना, मैं समझती हूँ वो क्या होता है।"

"तुम... तुम अजीब लड़की हो। सामने से मेरी मेज़ छीनती हो, फिर अचानक ऐसी बात कह देती हो जो कोई नहीं कहता। ...आज पहली बार किसी ने ये नहीं कहा कि 'कोई ढंग की नौकरी क्यों नहीं कर लेते'। बस इसी एक बात के लिए, आज की चाय मेरी तरफ़ से।"

"वाह, बेरोज़गार कॉमेडियन मुझे चाय पिला रहा है। ...ठीक है, पी लूँगी। पर एक शर्त पर। कि तुम सच में उतने बुरे नहीं हो जितना दिखाते हो। ...और ये मैं ऐसे ही नहीं कह रही। मुझे तो तुम्हारा दूसरा रूप और भी अच्छा लगता है।"

और एक पल के लिए, दो तेज़ ज़बानों के बीच, एक नरम सी चीज़ तैर गई। मानव ने इरा को पहली बार सच में देखा। और इरा ने भी। पर फिर, इरा ने वो किया जिसने सब कुछ उलझा दिया। उसने मुस्कुरा कर, बड़े प्यार से, एक ऐसे मानव की बात कर दी जिसे ये वाला मानव जानता ही नहीं था।

"पता है, सामने तुम इतने बदमिज़ाज हो, पर चैट पर तुम बिल्कुल अलग हो जाते हो। इतने प्यारे, इतने शायराना। कल रात वाली वो लाइन... 'तुम्हारी हँसी मेरे दिन का सबसे अच्छा चुटकुला है'... मानव, वो पढ़ कर मैं सो नहीं पाई।"

मानव का चेहरा जम गया। चैट? शायरी? कल रात वाली लाइन? उसने तो इस लड़की को कभी एक मैसेज नहीं भेजा। उसे तो पता भी नहीं था कि इरा उसका नंबर कैसे जानती है। उसे लगा शायद वो किसी और की बात कर रही है, या मज़ाक कर रही है।

"चैट पर प्यारा? मैं? ...इरा, तुमने ग़लत आदमी पकड़ लिया है। मैं ज़िंदगी में किसी को शायरी नहीं भेजता। मुझसे रोमांटिक मैसेज लिखवाना है तो पहले मुझे बेहोश करना पड़ेगा। तुम किसी और की बात कर रही हो।"

"अरे वाह, अब शरमा रहे हो? ...ठीक है, मिस्टर 'मैं रोमांटिक नहीं हूँ'। रुको, मैं तुम्हें तुम्हारी ही औकात दिखाती हूँ। अभी दिखाती हूँ कि तुमने क्या-क्या लिखा है।"

और इरा ने अपना फ़ोन निकाला, हँसते हुए, बड़े मज़े से, अपनी उँगली स्क्रीन पर फिराई, और उस चैट को खोला जो उसे पूरे हफ़्ते हँसाती, शरमाती, जगाती रही थी। और फिर उसने वो फ़ोन घुमा कर मानव के सामने कर दिया।

"ये देखो। मानव चतुर्वेदी। तुम्हारा नाम, तुम्हारी फ़ोटो। और ये सब तुमने ही तो लिखा है। अब बोलो कि तुम रोमांटिक नहीं हो।"

और मानव ने स्क्रीन देखी। और उसका ख़ून जम गया। ऊपर उसका अपना नाम लिखा था। मानव चतुर्वेदी। बग़ल में उसकी अपनी तस्वीर, वो जो उसने पिछली दिवाली पर खिंचवाई थी। और नीचे, दर्जनों मैसेज, प्यार भरे, नरम, शायराना, एक-एक शब्द किसी और के, पर उसके नाम से।

"ये... ये मैं हूँ। मेरा नाम। मेरी फ़ोटो। मेरी वो दिवाली वाली तस्वीर, जो सिर्फ़ घर के फ़ोन में है। ...पर ये शब्द... ये मैंने कभी नहीं लिखे। ...इरा, मैंने ये कभी नहीं लिखा।"

"क्या मतलब तुमने नहीं लिखा? तुम्हारा नाम है, तुम्हारा चेहरा है। पिछले एक हफ़्ते से मैं तुमसे यहीं बात कर रही हूँ। अगर ये तुम नहीं हो, मानव... तो फिर मुझसे रोज़ रात बात कौन कर रहा है?"

और मानव उस स्क्रीन को घूरता रह गया, अपने ही नाम को, अपने ही चेहरे को, किसी अजनबी की ज़बान बोलते हुए। एक बात एकदम साफ़ हो गई, बर्फ़ की तरह ठंडी। कोई उसका रूप जी रहा था। कोई उसके नाम से, उसकी फ़ोटो से, एक लड़की को रिझा रहा था, और उससे इतनी अच्छी बातें कर रहा था कि इरा रात भर सो नहीं पाती थी। और वो कोई अजनबी नहीं था। उसकी दिवाली वाली तस्वीर, उसकी हँसी की आदतें, वो बातें जो सिर्फ़ इस घर की दीवारें जानती थीं, ये सब किसी बाहरी को कैसे मिलतीं। किसी अपने ने ही उसे चुराया था।

"ये फ़ोटो घर के बाहर किसी के पास नहीं है, इरा। किसी के पास नहीं। ...इसका मतलब, जो तुमसे मानव बन कर बात कर रहा है... वो मेरे अपने घर में बैठा है। मेरे अपने लोगों में से कोई। ...और मैं क़सम खाता हूँ, मैं उसे ढूँढ कर रहूँगा।"

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