अध्याय 19 / 25 पढ़ने में 11 मिनट
सजी हुई शाम
शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi
इतवार की शाम चतुर्वेदी घर एक रंगमंच बन जाता है जहाँ हर कोई एक ही संगम के लिए अलग-अलग झूठे बहाने से तैयार हो रहा है, और गोलू भेड़ों को हाँकते कुत्ते की तरह किसे किस कमरे में रखना है ये संभालता फिरता है। पापा 'डाकघर का पुनर्मिलन' बता कर नक़ली मेडल चमकाते हैं और सांवी 'केक की डिलीवरी' का बहाना बना कर बरसों बाद पहली बार सज-सँवर रही है, दोनों अंदर ही अंदर आस बाँधे कि आज वो आख़िरकार बहादुर बन जाएँगे। दरवाज़े पर बाल-बाल टकराने से बचा कर गोलू दोनों को अलग रिक्शों में रवाना करता है, फिर उसे एहसास होता है कि दोनों एक ही हॉल जा रहे हैं। और उस संगम में तक़दीर पिता-बेटी को पीठ-से-पीठ बग़ल की मेज़ों पर बिठा
इतवार की शाम, और चतुर्वेदी घर किसी रंगमंच में बदल चुका था। तीन बंद दरवाज़े, तीन शीशे, और हर शीशे के सामने एक इंसान, अपने-अपने नक़ाब को आख़िरी बार ठीक करता हुआ। सब एक ही जगह जा रहे थे, पर हर एक को यक़ीन था कि सिर्फ़ वही जा रहा है। और इस पूरे नाटक का इकलौता स्टेज मैनेजर, सोलह साल का गोलू, पसीने में तर, एक कमरे से दूसरे कमरे भाग रहा था।
"गोलू बेटा! ...मेरी वो नेवी-ब्लू वाली जैकेट कहाँ है? ...और ये मेडल, ज़रा चमका दे, कपड़े से। ...आज पुराने डाकघर वालों का बड़ा पुनर्मिलन है, समझे? ...तीस साल पुराने साथी आएँगे। ...जगदीश चतुर्वेदी फीका नहीं दिखना चाहिए।"
"आ गया अंकल, आ गया। ...ये लीजिए, मेडल चमक गया। ...'पुनर्मिलन'। ...वाह अंकल, कितना बढ़िया शब्द है। ...कोई और होता तो कहता वो एक शादी वाली मिक्सर में जा रहा है, ...पर आप उसे 'डाकघर का पुनर्मिलन' बना देते हैं। ...आपमें एक कवि छुपा है, अंकल।"
"और सुन गोलू, आज अगर किसी ने फ़ौज की बात छेड़ी, तो मैं पूरा तैयार हूँ। ...मैंने रात भर मोबाइल पर सब रट लिया। ...'रोजर दैट'। 'ओवर एंड आउट'। 'सैनिक कभी रिटायर नहीं होता'। ...बता, रौब पड़ेगा न? ...कोई पकड़ तो नहीं पाएगा कि मैंने ज़िंदगी में सिर्फ़ चिट्ठियाँ बाँटी हैं?"
"अंकल... 'ओवर' और 'आउट' साथ में नहीं बोलते, वो अलग-अलग बातें हैं। ...पर आप छोड़िए ये सब। ...आज इन नक़ली शब्दों की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। ...सरिता जी को फ़ौज नहीं, आपका दिल पसंद है। ...आप बस मुस्कुराते रहिएगा। बाक़ी सब वो संभाल लेंगी।"
और उस वर्दी के नीचे, उन नक़ली मेडलों के नीचे, एक बूढ़ा आदमी काँप रहा था। आज वो सरिता के साथ, सबके सामने, सिर उठा कर खड़ा होगा। बरसों बाद, पहली बार, वो छुपा हुआ नहीं, पूरा आदमी होगा। पर उस उम्मीद के साथ एक हल्की सी टीस भी थी।
"पता है गोलू, ...आज पहली बार मुझे लग रहा है कि मैं फिर से जी रहा हूँ। ...और मेरी बस एक ही चाहत है। ...काश मेरे बच्चे भी कभी इतने ख़ुश हों, जितना मैं आज हूँ। ...सांवी, मानव... दोनों अपने-अपने खोल में बंद हैं। ...काश कोई इनके दिल का ताला भी खोल दे।"
"आप... आप बस तैयार हो जाइए, अंकल। ...जितना आप सोच रहे हैं, उससे कहीं ज़्यादा लोगों के दिल के ताले आज खुलने वाले हैं। ...बहुत ज़्यादा लोगों के। ...आप जाइए, आईने में एक बार और ख़ुद को देख लीजिए।"
और उसी छत के नीचे, दो कमरे छोड़ कर, बिल्कुल वैसी ही घबराहट एक अलग सुर में काँप रही थी। गोलू भाग कर सांवी के कमरे में पहुँचा, जहाँ बरसों बाद पहली बार, सांवी दो झुमके हाथ में लिए, आईने के सामने खड़ी थी।
"गोलू, कौन सा? ...ये वाला, या ये? ...अरे, मैं इतनी घबराई क्यों हूँ, जैसे कोई बच्ची हो। ...और सुन, अगर कोई पूछे, तो मैं एक बड़े केक ऑर्डर की डिलीवरी के लिए गई हूँ, एक सगाई में। ...बस यही कहना। ...और किसी को शक न हो।"
"वो लाल वाला, दीदी, वो अच्छा लग रहा है। ...और हाँ, केक की डिलीवरी, याद है। ...आज मैंने इस घर में चार लोगों को चार अलग-अलग झूठ पकड़ाए हैं। ...मैं अलीबाई विभाग खोल लूँ तो कमा खाऊँ। ...पर दीदी, आप... आप आज बहुत सुंदर लग रही हैं। सच में।"
और उस मेकअप के नीचे, जो वो कभी नहीं लगाती थी, एक तलाक़शुदा औरत की काँपती हिम्मत छुपी थी। आज वो अनिकेत को ढूँढेगी। और आज वो वो शब्द कहेगी, जो वो आज तक नहीं कह पाई थी। तलाक़। आज वो दो औरतें बन कर जीना छोड़ देगी। न काया, न छुपी हुई सांवी। बस, सांवी।
"गोलू, मैं थक गई हूँ छुपते-छुपते। ...आज मैं सिर्फ़ सांवी बन कर जाऊँगी। ...जो है, जैसी हूँ। ...और अगर वो मुझे मेरे पूरे सच के साथ अपना ले, तो ठीक, ...और अगर नहीं, तो कम से कम मैं ख़ुद से नज़र तो मिला पाऊँगी।"
"आप जाइए दीदी, और आज बहादुर बन ही जाइए। ...आप डिज़र्व करती हैं। ..." और मन ही मन गोलू ने जोड़ा, उस डर के साथ जो सिर्फ़ उसे पता था, ..."बस भगवान करे, आप जिस बहादुरी की तलाश में जा रही हैं, वो आपको उस हॉल में अपने ही पापा के सामने न करनी पड़े।"
और फिर आया वो पल, जिसका गोलू को सबसे ज़्यादा डर था। दरवाज़े का पल। दोनों लगभग एक ही वक़्त तैयार हो गए थे, और वो छोटा सा गलियारा अब एक बारूदी सुरंग था। गोलू किसी सर्कस के कलाकार की तरह बीच में कूद पड़ा।
"अंकल, रुको! ...आपकी टाई टेढ़ी है, अंदर जा कर ठीक कर के आइए, दो मिनट! ...दीदी, आप वहीं रुकिए, मैं आपके लिए रिक्शा बुला रहा हूँ, आप बरामदे में मत आइए! ...बस दो मिनट, दोनों जहाँ हैं वहीं रुको!"
जगदीश अपने कमरे से निकला, ठीक उसी पल जब सांवी का दरवाज़ा खुला। दो नक़ाब, एक गलियारे में, एक-दूसरे से बस चंद क़दम दूर। और उन दोनों के बीच, हाथ फैलाए, एक कोट-स्टैंड की ओट लेता, गोलू खड़ा था, अपनी पूरी जान लगा कर उन दोनों की नज़रों को टकराने से रोकता हुआ।
"गोलू, ये घर आज इतना गुलज़ार क्यों है? ...इतनी हलचल? ...ऐसा लग रहा है जैसे पूरा परिवार आज कहीं जा रहा हो, सज-धज कर। ...क्या बात है?"
"न-नहीं अंकल, कुछ नहीं। ...बस, दीदी केक देने जा रही हैं, मानव का आज शो है, और मैं दोस्त के घर पढ़ने। ...संयोग है, सब एक ही शाम। ...आप जाइए न, आपको पुनर्मिलन में देर हो रही है। रिक्शा दरवाज़े पर है।"
और किसी जादूगर की तरह, गोलू ने पहले जगदीश को एक रिक्शे में बिठाया, हाथ हिलाया, और उसके ओझल होने का इंतज़ार किया। फिर, पूरे एक मिनट बाद, सांवी को दूसरे रिक्शे में बिठाया। दोनों गए, अलग-अलग, बिना एक-दूसरे को देखे। गोलू ने राहत की एक लंबी साँस ली, और ख़ुद को शाबाशी दी।
"चलो, बच गए। ...घर पर तो दोनों को अलग रख लिया। ..." और फिर, गली के मोड़ पर दोनों रिक्शों को एक ही दिशा में मुड़ते देख, उसका ख़ून जम गया। ..."रुको। ...अंकल उसी हॉल जा रहे हैं। ...और दीदी भी उसी हॉल जा रही हैं। ...मैंने इन्हें घर पर तो अलग रखा, पर वहाँ? ...वहाँ तो मैं दो जगह एक साथ नहीं हो सकता!"
"मानव! इरा! ...SOS! ...दोनों निकल चुके हैं, एक ही हॉल की तरफ़। ...मैं पीछे-पीछे आ रहा हूँ। ...तुम किसी तरह पापा और दीदी को अलग-अलग कोने में रखना, उन्हें आमने-सामने मत आने देना! ...भगवान के लिए, आज कोई गड़बड़ मत होने देना!"
परफेक्ट रिश्ता संगम। शहर का सबसे बड़ा हॉल, झिलमिलाती रोशनियों से सजा हुआ। हर मेज़ पर नाम की पर्चियाँ, हर दीवार पर ऐप का लोगो, और चारों तरफ़ हर उम्र के घबराए हुए अजनबी, अपने-अपने दिल की उम्मीद सीने में दबाए। और एक कोने में, एक छोटा सा मंच, एक माइक, जो अभी ख़ामोश था।
सांवी एक दरवाज़े से अंदर आई, दिल किसी ढोल की तरह बजता हुआ। उसकी नज़रें भीड़ में एक ही चेहरा ढूँढ रही थीं। अनिकेत। वो अपनी सफ़ाई, अपना इक़बालिया बयान, मन ही मन सौवीं बार दोहरा रही थी।
"बस आज, सांवी। ...आज तू उसे सब बता देगी। ...तलाक़, काया, वो डर, सब। ...और फिर तेरे सिर से ये बोझ उतर जाएगा। ...बस उसे ढूँढ, और आज हिम्मत मत हारना।"
और ठीक उसी पल, हॉल के दूसरे दरवाज़े से, कर्नल रणविजय अंदर आए। सीना ताने, मेडल चमकाते, और अंदर से उतने ही घबराए हुए। उनकी आँखें भी भीड़ में एक ही चेहरा ढूँढ रही थीं। सरिता।
"सीधे खड़े रहो, जगदीश। ...आज सरिता के साथ, सबके सामने। ...आज तुम किसी कोने में नहीं छुपोगे। ...आज तुम्हारा अकेलापन ख़त्म होता है। ...बस, आँख मत चुराना, आज नहीं।"
और यहाँ, उस ऐप के डेटा को पढ़ते हुए, वहाँ खड़े वॉलंटियर्स ने वो किया, जो पूरे मौसम से ये कहानी करती आई थी। उन्होंने पर्चियों के हिसाब से दोनों को बिठाया, ठीक बग़ल की दो मेज़ों पर। पीठ से पीठ सटाए। एक बाप और उसकी बेटी, बस एक फ़ुट की दूरी पर, और दोनों में से कोई नहीं मुड़ा।
दोनों अपनी-अपनी उम्मीद में इतने डूबे थे कि उन्हें पीठ के पीछे बैठे अपने ही ख़ून की गरमाहट महसूस नहीं हुई। सांवी बार-बार फ़ोन देख रही थी, अनिकेत के आने के इंतज़ार में। और जगदीश दूर वाले दरवाज़े पर टकटकी लगाए था, सरिता के आने के इंतज़ार में। उनकी कुर्सियाँ लगभग छू रही थीं।
"जी... माफ़ कीजिए, ये अनिकेत नाम के किसी मेहमान की मेज़ किधर है? ...नहीं? ...कोई बात नहीं, मैं ख़ुद देख लूँगी। ...शुक्रिया।"
"बेटा, ज़रा पानी मिलेगा? ...और अगर सरिता नाम की कोई महिला आएँ, तो उन्हें इसी मेज़ पर भेज देना। ...मैं यहीं हूँ, कर्नल रणविजय। ...वो मुझे पहचान लेंगी।"
और एक बार, बस एक बार, सांवी को लगा कि पीठ के पीछे बैठे उस आदमी की खाँसी कुछ जानी-पहचानी है। उसने आधा मुड़ने का सोचा, फिर टाल दिया, अनिकेत को ढूँढना ज़्यादा ज़रूरी था। और उधर जगदीश को भी एक पल लगा कि बग़ल की कुर्सी से आती चूड़ियों की वो खनक उसने कहीं सुनी है, बहुत बार सुनी है, पर उसने भी टाल दी, उसका पूरा ध्यान तो दरवाज़े पर था। दो दिल, पीठ से पीठ, तक़दीर की एक शरारत भर की दूरी पर।
और तभी, हॉल की रोशनियाँ मद्धम हुईं, और मंच पर एक चमकीली आवाज़ गूँजी। एक उत्साही एंकर माइक थामे खड़ा था, और पूरे हॉल की नज़र उसकी तरफ़ घूम गई। पर सांवी और जगदीश, दोनों, अब भी अपनी-अपनी उम्मीद की तरफ़ ही देख रहे थे।
"परफेक्ट रिश्ता संगम में आप सबका स्वागत है! ...आज की शाम, जहाँ प्यार को एक पता मिलता है! ...और शुरुआत करते हैं अपने कुछ ख़ास मेहमानों से, जिन्हें हमारे एल्गोरिदम ने इस शहर में सबसे ज़्यादा पसंद दिलाई। ...तालियाँ हो जाएँ!"
सांवी का दिल मंच पर नहीं, दरवाज़े पर टँगा था। वो एंकर की बातें सुन ही नहीं रही थी। उसकी उँगलियाँ फ़ोन पर थीं, आँखें भीड़ पर, और सारा ध्यान एक ही सवाल पर, अनिकेत कब आएगा।
"तो हमारे पहले ख़ास मेहमान, ...एक ऐसी शख़्सियत जिनकी प्रोफ़ाइल को इस पूरे शहर में सबसे ज़्यादा सराहा गया, ...रिटायर्ड, शानदार, कर्नल रणविजय जी! ...कर्नल साहब, कृपया मंच पर पधारिए!"
और उसी एक साँस में, दो चीज़ें हुईं। सांवी की पीठ के पीछे एक कुर्सी घिसटी, कोई खड़ा हुआ। और वो नाम, कर्नल रणविजय, जो सांवी ने कहीं पढ़ा था, उसके कानों में एक अजीब सी जानी-पहचानी घंटी की तरह बजा। दोनों वजहों से, वो मुड़ी। और ठीक उसी पल, जगदीश, मंच की तरफ़ जाने को उठा, और मुड़ते ही उसकी नज़र बग़ल की मेज़ पर बैठी उस जवान औरत पर पड़ी।
"...सांवी? ...बेटा? ...तुम... तुम यहाँ?"
"...पापा?! ...आप? ...आप कर्नल रणविजय हैं? ...आप... आप भी यहाँ?"
और वो पहचान, बिना किसी आवाज़ के, उस शोर से भरे हॉल में फट पड़ी। दोनों जड़, आँखें एक-दूसरे में गड़ी हुई। एक तरफ़ कर्नल की चमकती वर्दी, दूसरी तरफ़ बेटी की वो लाली, जो उसने बरसों बाद लगाई थी। दोनों के फ़ोन में वही ऐप। और एक ही पल में, दोनों को सब समझ आ गया, कि सामने वाला भी यहीं है, एक नक़ाब में, प्यार की तलाश में। जो झूठ हर एक ने दूसरे से छुपाया था, वो अब खड़ा हो कर एक-दूसरे को देख रहा था।
"कर्नल रणविजय जी? ...आप कहाँ हैं? ...अरे, कोई तो हमारे कर्नल साहब को ढूँढिए! ...मंच आपका इंतज़ार कर रहा है, सर!"
पर कर्नल रणविजय एक क़दम नहीं चल पाए। क्योंकि कर्नल रणविजय अपनी ही बेटी को देख रहे थे। और काया की साँस रुक गई थी। क्योंकि काया अपने ही पिता को देख रही थी। पूरा हॉल एक नाम के लिए तालियाँ बजा रहा था, ये जाने बिना कि उस नाम के नीचे, अभी-अभी, एक पूरा परिवार, आमने-सामने, चटख़ कर खुल गया था।
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