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अध्याय 10 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

नकली मानव

शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi

कुछ लोग अपनी परछाईं से भागते हैं। मानव उस रात अपनी परछाईं का पीछा कर रहा था। अपने कमरे में, मेज़ पर एक डायरी खोले, दीवार पर तीन चिट्ठियाँ चिपकाए, वो एक ऐसे मुजरिम की तलाश में था जिसका चेहरा उसी का था।

"सोच मानव, सोच। किसी के पास मेरी दिवाली वाली फ़ोटो है। वो फ़ोटो मैंने कहीं डाली नहीं, किसी को भेजी नहीं। वो सिर्फ़ घर के फ़ोन में है। मतलब चोर बाहर का नहीं। चोर अंदर का है। इसी छत के नीचे।"

उसने घर के हर इंसान को शक की नज़र से देखना शुरू कर दिया। नाश्ते पर पापा को घूरा, जो अजीब तरह से शरमा रहे थे। दादी को घूरा, जो अजीब तरह से मुस्कुरा रही थीं। सांवी दीदी को घूरा, जो अजीब तरह से फ़ोन छुपा रही थीं। और नतीजा निकाला कि इस घर में हर कोई कुछ न कुछ छुपा रहा है, पर उसका नक़ली रूप कौन जी रहा है, ये अभी भी धुँधला था। और उसने तफ़्तीश वहीं से शुरू की, जहाँ से कोई अच्छा जासूस कभी शुरू नहीं करता, सबसे कम शक वाले इंसान से। अपनी दादी से। नाश्ते की मेज़ पर, पराठे के पीछे से, उसने अपनी सबसे मासूम आवाज़ में जाल फेंका, ये जाने बिना कि जिस मुजरिम को वो ढूँढ रहा है, वो ठीक उसके सामने, अचार परोस रही है।

"दादी, एक बात पूछूँ? आप आजकल फ़ोन पे इतनी बिज़ी क्यों रहती हैं? रात-रात भर टाइप करती रहती हैं। किससे इतनी बातें होती हैं आपकी?"

"मैं? फ़ोन? ...अरे बेटा, भजन सुनती हूँ। और वो क्या कहते हैं उसे, व्हाट्सएप पे 'पुष्पा देवी सत्संग ग्रुप'। आंटियाँ भजन भेजती हैं, मैं 'जय श्री राम' लिख देती हूँ। ...तू क्यों पूछ रहा है? तेरी बूढ़ी दादी अब जासूसी के लायक़ भी हो गई?"

"नहीं, ऐसी बात नहीं। बस... आप फ़ोन देख कर बहुत मुस्कुराती हैं आजकल, दादी। कभी-कभी तो हँस भी देती हैं। ...भजन में इतनी हँसी कैसी? कौन सा भजन है जो हँसाता है?"

"...आजकल के भजन मज़ेदार आने लगे हैं, बेटा। रीमिक्स वाले। ...ले, पराठा खा, ठंडा हो रहा है। और ये जासूसी छोड़ कर अपनी नौकरी ढूँढ। इस उम्र में लोग कमाते हैं, तू घर में सबका फ़ोन जाँच रहा है।"

और मानव पीछे हट गया, अपनी दादी को मन ही मन 'शायद बेगुनाह' की सूची में डालते हुए, जो उसके छोटे से जासूसी करियर की सबसे बड़ी भूल थी। मुजरिम ने उसे अचार के साथ एक और पराठा थमा दिया, और वो चला गया, ये सोचते हुए कि दादी तो बेचारी भजन सुनती हैं। तो वो अपनी सबसे अच्छी गवाह के पास पहुँचा। इरा। उसी कैफ़े में, अगली शाम, दो कड़वी काली कॉफ़ी के बीच, उसने अपनी जासूसी शुरू की, इतनी बेढंगी कि इरा को हँसी आ गई।

"इरा, ध्यान से बताओ। वो नक़ली मानव तुम्हें मैसेज कब भेजता है? दिन में, या रात में? टाइम बताओ। और वो किन बातों का ज़िक्र करता है? कोई घर की बात? कोई ऐसी बात जो सिर्फ़ मेरे क़रीबी जानते हों?"

"वाह, अब तो तुम पूरे सी.आई.डी. लग रहे हो। ...ठीक है, इंस्पेक्टर साहब। मैसेज ज़्यादातर रात को आते हैं, दस के बाद। और हाँ, एक बार उसने लिखा था कि उसकी दादी बहुत बढ़िया अरहर की दाल बनाती हैं, और उसकी बहन की बेकरी है। ...तुम्हारी सच में बेकरी वाली बहन है?"

मानव का दिल बैठ गया। रात दस के बाद। दादी की अरहर की दाल। सांवी दीदी की बेकरी। ये कोई अजनबी नहीं जानता। ये सब इसी घर की बातें थीं, इसी रसोई की, इसी छत की। हर सुराग़ एक तीर था, और हर तीर उसके अपने दरवाज़े की तरफ़ इशारा कर रहा था।

"और कुछ? कोई और बात जो उसने लिखी हो, जो अटपटी लगी हो? कोई शब्द, कोई अंदाज़, जो किसी जवान लड़के का न लगे?"

"अब जो तुम पूछ रहे हो... हाँ। एक बार उसने लिखा था, 'बेटा, ठीक से खाना खाया कर'। ...बेटा। मैंने सोचा प्यार से कह रहा है। पर अब सोचती हूँ, कौन जवान लड़का अपनी पसंद की लड़की को 'बेटा' कहता है? ...ये तो जैसे किसी बड़े ने लिखा हो। किसी बुज़ुर्ग ने।"

और मानव को वो एक शब्द चुभ गया। बेटा। उसके दिमाग़ में एक चेहरा कौंधा, और फिर वो उसे झटक कर हटा गया, क्योंकि वो चेहरा इतना प्यारा, इतना भोला था कि शक करना भी पाप लगता था। नहीं, दादी नहीं। दादी को तो फ़ोन चलाना भी नहीं आता। ...है ना।

"अरहर की दाल... दादी। बेकरी... दीदी। ...इरा, जो मुझ बन कर तुमसे बात करता है, वो मेरी रसोई की दाल तक जानता है। ...ये किसी अपने का काम है। बहुत अपने का। और मुझे उसे रंगे हाथ पकड़ना होगा।"

और इसी वक़्त, चतुर्वेदी घर की ऊपर वाली मंज़िल पर, दो लोग एक छोटे से भूचाल से जूझ रहे थे। गोलू, दौड़ता हुआ, हाँफता हुआ, दादी के कमरे में घुसा, और दरवाज़ा पीछे से बंद कर लिया।

"दादी! दादी, बड़ी गड़बड़ हो गई। मानव चाचा को पता चल गया कि कोई उन बन कर इरा से बात कर रहा है! उन्होंने इरा को स्क्रीनशॉट देखा, अपनी फ़ोटो देखी! अब वो जासूसी कर रहे हैं, घर के अंदर! और आज उन्होंने अकाउंट का पासवर्ड रीसेट करने की कोशिश की, मेरे फ़ोन पर ओ.टी.पी. आया!"

"आया तो आने दे। तूने बताया तो नहीं ना उसे? ...अच्छा। मतलब वो अंदर तक नहीं घुस पाया, सिर्फ़ दरवाज़े तक आया है। ठीक है। हम खिड़कियाँ बंद कर लेंगे।"

"दादी, ये मज़ाक नहीं है! अब बस कर दीजिए ना, प्लीज़! बता दीजिए मानव चाचा को कि आपने प्यार में, उनकी भलाई के लिए ये किया। वो नाराज़ होंगे, दो दिन बात नहीं करेंगे, फिर मान जाएँगे। पर ये रोज़-रोज़ का डर तो ख़त्म होगा!"

"नहीं। अभी नहीं। ...गोलू, तू समझता नहीं। वो इरा, वो लड़की मानव के लिए बनी है। मैंने सत्तर साल में इतने रिश्ते जोड़े हैं, मुझे पता चल जाता है। अगर अभी सच बता दिया, तो मानव शर्म के मारे इरा से कभी नज़र नहीं मिला पाएगा। थोड़ा और, बस थोड़ा और, जब तक दोनों का दिल पक्का न हो जाए।"

और गोलू ने देखा कि दादी की ज़िद के पीछे कोई शरारत नहीं, एक बूढ़ी औरत की एक अजीब सी बहादुरी थी। वो अपने पोते की ख़ुशी के लिए पकड़े जाने का ख़तरा उठा रही थी, अपनी इज़्ज़त दाँव पर लगा रही थी। पर वो ये नहीं देख पा रही थी कि जिस पोते के लिए वो ये सब कर रही है, वही अब उसके ठीक पीछे शिकारी बन कर खड़ा है।

"दादी, आप एक बात नहीं समझ रहीं। शिकारी और शिकार एक ही घर में हैं। एक ही डाइनिंग टेबल पर रोज़ खाना खाते हैं। ...ये जो खेल आप खेल रही हैं, इसका अंत अच्छा नहीं होगा, अगर हम ख़ुद इसे सही तरीक़े से ख़त्म न करें।"

"तू बस मेरे साथ रह, बेटा। एक हफ़्ता और। और चिंता मत कर। तेरी दादी ने आज तक कोई बाज़ी नहीं हारी। ...अब जा, और उन मैसेज को डिलीट कर दे जिनमें दाल और बेकरी का ज़िक्र है। सुराग़ मिटा दे। बाक़ी मैं देख लूँगी।"

और गोलू ने, भारी मन से, वो मैसेज मिटाए, दादी की चालों के निशान एक-एक कर के धोए। पर उसे पता था कि कुछ सुराग़ मिटाए नहीं जा सकते। जैसे मानव के दिल में उठा वो शक, जो अब हर पल गहरा होता जा रहा था। और ठीक तभी, सीढ़ियों पर क़दमों की आहट हुई। भारी, तेज़, आते हुए क़दम। गोलू का ख़ून जम गया। नोटबुक अभी भी खुली पड़ी थी, पन्नों पर 'नक़ली मानव', 'इरा', 'मंगल, दुबई' साफ़ लिखा हुआ।

"दादी, कोई आ रहा है! जल्दी, नोटबुक छुपाओ! अरे तकिये के नीचे, तकिये के नीचे!"

दादी ने बिजली की फुर्ती से नोटबुक तकिये के नीचे ठूँसी, माला उठाई, आँखें बंद कीं, और एक गहरा, भक्ति भरा 'हरे राम' शुरू कर दिया। और ठीक उसी पल दरवाज़ा खुला, और मानव का शक भरा चेहरा अंदर झाँका।

"यहाँ क्या चल रहा है? दरवाज़ा बंद क्यों था? और गोलू, तू यहाँ दादी के कमरे में इतनी देर से क्या कर रहा है?"

"पूजा कर रही थी, बेटा। और गोलू को गीता का अठारहवाँ अध्याय समझा रही थी। कर्मयोग। तुझे भी सुनना है? आ, बैठ, दो घंटे में पूरा हो जाएगा। बहुत ज्ञान की बातें हैं।"

और मानव, जो सच से बस एक क़दम दूर खड़ा था, दुनिया के सबसे पुराने हथियार से हार कर भाग खड़ा हुआ, दो घंटे के प्रवचन का ख़तरा। 'नहीं नहीं, रहने दो दादी, बाद में' कहते हुए वो दरवाज़ा बंद कर के भाग गया, और गोलू ने राहत की एक ऐसी साँस ली जैसे कोई फाँसी के फंदे से उतरा हो। और इस पूरे शोर के बीच, घर के दो और कोनों में, दो और कहानियाँ चुपचाप, नरमी से आगे बढ़ रही थीं। सांवी और अनिकेत अब रोज़ मिलते थे, बेकरी की उस शांत मेज़ पर, बिना नक़ाब के, बिना जल्दी के। दो लोग जो एक-दूसरे को असली रूप में जान रहे थे, और हर दिन थोड़ा और क़रीब आ रहे थे, हर दिन एक-एक बंद दरवाज़े के थोड़ा और पास। और उधर जगदीश, जो सरिता के साथ एक सच्चे प्यार में गहरा उतर चुका था, एक रात अपने कमरे में बैठा, सरिता की चिट्ठियाँ पढ़ते हुए, एक फ़ैसला कर बैठा। बहुत हुआ ये कर्नल का नाटक। जिस औरत से वो सच में प्यार करता है, उससे झूठ बोल कर वो और नहीं जी सकता। वो सरिता को सच बता देगा। कि वो कोई कर्नल नहीं, बस एक अकेला डाकिया है। और अगर सरिता ठुकरा दे, तो भी, कम से कम सच के साथ ठुकराया जाना, झूठ के साथ चाहे जाने से बेहतर है। पर वो रात, वो पूरी रात, मानव की थी। शिकारी की। जो अब अपने जाल का आख़िरी धागा बुन रहा था। कैफ़े में, इरा के सामने बैठा, मानव ने अपना फ़ोन निकाला और एक नया अकाउंट बनाया। अपने असली नाम से, अपनी असली शक्ल से, पर साफ़ लिखा, यही असली मानव है। और फिर उसने इरा की तरफ़ देखा, आँखों में एक ठंडा, पक्का इरादा।

"इरा, ध्यान से सुनो। मैं अभी, इसी वक़्त, तुम्हें एक मैसेज भेजूँगा, अपने इस असली अकाउंट से। तुम अपना फ़ोन देखती रहना। और ठीक उसी वक़्त, तुम उस नक़ली मानव को भी एक मैसेज करना, कुछ भी। अगर वो नक़ली मानव अभी, इसी पल, जवाब देता है... तो इसका मतलब वो अभी ऑनलाइन है। जागा हुआ। और मुझे यक़ीन है, वो मेरे अपने घर में, मेरी अपनी छत के नीचे बैठा है।"

"और अगर वो जवाब न दे?"

"तो हम कल फिर कोशिश करेंगे। और परसों। जब तक वो एक बार, सिर्फ़ एक बार, ग़लत वक़्त पर ऑनलाइन न आ जाए। ...इरा, कोई कितना भी सावधान हो, एक दिन थक जाता है। और उस एक थकी हुई रात में, मैं उसे पकड़ लूँगा।"

"मानव, एक बात कहूँ? ...ये नक़ली मानव, जिसे तुम पकड़ना चाहते हो, उसने मुझसे बहुत प्यारी बातें की हैं। इतनी प्यारी कि कभी-कभी लगता है काश वो सच होतीं। और अब मैं उसी को पकड़वाने में तुम्हारी मदद कर रही हूँ। पता नहीं क्यों, थोड़ा बुरा भी लग रहा है।"

"बुरा मत लगाओ, इरा। जो झूठ बोल कर, दूसरे का चेहरा लगा कर तुम्हारा दिल जीतता है, वो प्यार नहीं होता, धोखा होता है। तुम्हें सच मिलना चाहिए। असली आदमी मिलना चाहिए। ...भले ही असली आदमी मेरे जैसा बदमिज़ाज ही क्यों न हो।"

और इरा चुप हो गई। और मानव भी। दोनों में से किसी को अंदाज़ा नहीं था कि वो प्यारी बातें भी उसी घर से आई थीं जिससे ये बदमिज़ाज आदमी आया था। कि नक़ली मानव और असली मानव, दोनों के पीछे एक ही छत थी, एक ही ख़ून था। धोखा और सच, एक ही दादी के हाथों से लिखे गए थे। और ठीक उसी पल, कैफ़े से कुछ ही किलोमीटर दूर, चतुर्वेदी घर की ऊपर वाली मंज़िल पर, एक बूढ़ी औरत अपने पलंग पर बैठी, अपनी नीली नोटबुक खोले, मानव के अकाउंट में लॉग-इन थी, और इरा के लिए रात वाला एक प्यारा मैसेज टाइप कर रही थी। बेख़बर। बिल्कुल बेख़बर। एक ही अकाउंट। दो हाथ। एक कैफ़े में, जाल बिछाता हुआ पोता। और एक घर में, उसी जाल की तरफ़ बढ़ती हुई दादी, बिना जाने। और उन दोनों के बीच, कहीं, एक थका हुआ सोलह साल का लड़का, जो अभी-अभी सोने जा रहा था, ये सोच कर कि आज की रात, शायद, चैन से कट जाएगी।

"बस। बहुत हुआ। ...इरा, तैयार हो? ...मैं भेज रहा हूँ। अभी। ...देखते हैं, नक़ली मानव, तू है कौन।"

और मानव ने अपनी उँगली भेजो के बटन पर रखी, और दबा दी। मैसेज उड़ गया, रात के अँधेरे में, उस घर की तरफ़ जहाँ उसका जवाब, बिना जाने, पहले से बैठा हुआ था। जाल बिछ चुका था। और अब बस इंतज़ार था, कि कौन, किस पल, उसमें पैर रखता है।

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