Chapter 22 of 25 12 min read
लाइव हो गया
चांचल का लाइव कैमरा चतुर्वेदी परिवार के हर राज़ को पूरे कानपुर के फ़ोनों तक बहा देता है, तलाक़, नक़ली कर्नल, कठपुतली चलाती दादी, सब कुछ। पर पहली बार, छुपने के बजाय, पूरा परिवार संगम के मंच पर एक साथ खड़ा हो जाता है और एक-एक कर के अपना सच ख़ुद, ज़ोर से, सबके सामने कह देता है। जगदीश मानता है कि वो कोई कर्नल नहीं, बस एक अकेला डाकबाबू है जिसे इस उम्र में प्यार हुआ, सांवी अपने तलाक़ को शर्म की जगह अपनी ताक़त बना कर अपना लेती है, और दादी पुष्पा बेशर्मी से अपनी पूरी कठपुतली-कहानी सुना कर हॉल को हँसा देती हैं, जबकि मानव और इरा साथ खड़े होते हैं। सच की ये आँधी हॉल और लाइव, दोनों को परिवार के हक़ में मो
चांचल के फ़ोन की स्क्रीन पर वो लाल शब्द जल रहा था। लाइव। और उसके साथ ही, कानपुर के सैकड़ों फ़ोन एक साथ जगमगा उठे। मोहल्ले के व्हाट्सएप ग्रुप, रिश्तेदारों की चैट, आधी रात तक जागने वाली हर आंटी, सबके पास अब चतुर्वेदी परिवार का पूरा तमाशा पहुँच रहा था। और चांचल, कुर्सी पर खड़ी, अपने सबसे बड़े पल में डूबी हुई थी।
"तो देखिए, देखिए, मेरे प्यारे मोहल्ले वालो! ...जिस चतुर्वेदी परिवार को आप शरीफ़ समझते थे, ...उसका असली चेहरा! ...ये देखिए, कर्नल की वर्दी में एक बूढ़ा डाकबाबू! ...ये रही वो बेटी जिसका तलाक़ हो चुका है! ...और उधर एक दादी, जो अपने पोते के नाम से लड़कियों को..."
और परिवार का हर सदस्य जैसे पत्थर बन गया। जगदीश का चेहरा राख हो गया, सांवी की आँखें डर से फैल गईं, दूर खड़े मानव ने इरा का हाथ कस कर पकड़ लिया। सालों की जो शर्म वो छुपाते आए थे, वो अब पूरे शहर के सामने नंगी खड़ी थी। और एक पल को, लगा कि ये परिवार अब बिखर जाएगा।
"पापा, ...हमें यहाँ से निकलना होगा। ...अभी। ...पूरा मोहल्ला देख रहा है, ...कल घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा। ...भागिए, पापा, पीछे वाले दरवाज़े से..."
"हाँ... हाँ, चल, निकल... " उसने सांवी का हाथ थामा, दो क़दम पीछे लिए, और फिर अचानक रुक गया। "...नहीं। ...बेटा, हम आज तक इसीलिए तो भाग रहे थे। ...और भागते-भागते हम एक-दूसरे से भी छुप गए। ...आज अगर हम फिर भागे, तो ये डर हमें ज़िंदगी भर दौड़ाता रहेगा। ...बस, अब और नहीं।"
और चांचल के फ़ोन के कोने में एक छोटा सा नंबर था, जो देखने वालों की गिनती बता रहा था। पचास। सौ। दो सौ। हर पल बढ़ता हुआ। पूरा मोहल्ला, पूरा शहर, अब इस परिवार की तरफ़ ताक रहा था, इस इंतज़ार में कि ये कब गिरेंगे। पर इस परिवार ने गिरने के बजाय, कुछ और ही तय कर लिया था।
पर तभी, हॉल के एक कोने से, एक बुज़ुर्ग औरत अपनी छड़ी टेकती हुई खड़ी हुई। पुष्पा। सत्तर साल की, चाँदी जैसे बाल, और आँखों में वो चमक जो हार मानना जानती ही नहीं। उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, और सीधे उस कैमरे की तरफ़ चल पड़ी।
"बस, चांचल? ...या कुछ और भी दिखाना है? ...ज़रा वो कैमरा इधर घुमा। ...मेरी तरफ़। ...जब पूरा तमाशा दिखा ही रही हो, तो अधूरा क्यों? ...पूरा दिखाओ।"
चांचल एक पल को हड़बड़ा गई। ये उसकी योजना में नहीं था। वो तो शिकार पर थी, और शिकार ख़ुद चल कर कैमरे के सामने आ रहा था, बिना किसी डर के। पुष्पा ने कैमरे की तरफ़ देखा, और फिर पूरे हॉल की तरफ़, जहाँ अब हर आँख उन पर टिकी थी।
"हाँ, मैं पुष्पा चतुर्वेदी हूँ। ...और हाँ, मैंने अपने पोते मानव के नाम से एक झूठी प्रोफ़ाइल चलाई। ...उसे बताए बिना। ..." और फिर, बेशर्मी से, उसने एक शरारती मुस्कान दी। "...और सच बताऊँ? ...मैंने कमाल कर दिया। ...मेरे लिखे मैसेज इतने अच्छे थे कि लड़की मेरे शरमीले, बुद्धू पोते पर फ़िदा हो गई। ...अब बताओ, ये मेरी ग़लती है या मेरा हुनर?"
पूरे हॉल में एक हैरान सी हँसी दौड़ गई। ये वो पकड़ा हुआ मुजरिम नहीं था जिसकी चांचल को उम्मीद थी। ये एक ऐसी दादी थी जो अपने अपराध पर तालियाँ माँग रही थी। और कैमरे के उस पार, फ़ोन देख रहे मोहल्ले वाले भी मुस्कुराने लगे।
"और सुनो, जिस लड़की से मैंने मानव के नाम से बात की, वो इरा, ...वो कोई भोली-भाली नहीं है। ...उसने तो हफ़्तों पहले ही ताड़ लिया था कि उसे शायरी सुनाने वाला कोई नौजवान नहीं, एक बुढ़िया है! ...और फिर भी वो चुप रही। ...क्यों? ...क्योंकि वो जान गई थी कि झूठ के पीछे एक सच्ची चाहत थी। ...तो असली होशियार तो वो निकली, मैं नहीं।"
और अब हॉल उन पर नहीं, उनके साथ हँस रहा था। ये फ़र्क़ छोटा नहीं था। कुछ ही पल पहले ये एक बदनामी का तमाशा था, और अब ये एक बूढ़ी औरत की बहादुरी का जश्न बन रहा था। पर पुष्पा की आवाज़ अचानक नरम पड़ गई, और हँसी थम गई।
"पर एक बात बताऊँ? ...मैंने ये शरारत क्यों की? ..." उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "...क्योंकि मैं एक विधवा हूँ, जो सबके रिश्ते ढूँढते-ढूँढते ख़ुद अकेली रह गई। ...मेरे पास प्यार बाँटने को बहुत था, पर देने को कोई नहीं था। ...तो मैंने अपने पोते के दिल में वो प्यार भरना चाहा, जो मैं अपनी ज़िंदगी में न पा सकी। ...ये शरारत नहीं थी, बेटा। ...ये एक बूढ़ी औरत की तनहाई थी।"
और वो हँसी अब एक गले के गोले में बदल गई। हॉल में बैठे लोग, जो अभी हँस रहे थे, अब चुप हो गए, क्योंकि हर किसी के घर में एक ऐसी दादी थी, या एक ऐसा अकेलापन था। मानव, जो अब तक ग़ुस्से और शर्म के बीच झूल रहा था, धीरे से आगे बढ़ा।
मानव अपनी दादी के पास आया, और सबके सामने, उसने उनका हाथ थाम लिया। उसके साथ इरा भी आ खड़ी हुई। तीनों, एक साथ, उस कैमरे के सामने। और मानव ने पहली बार, बिना किसी नक़ली शायरी के, अपनी असली आवाज़ में कहा, कि हाँ, ये मेरी दादी हैं, और मुझे इन पर शर्म नहीं, गर्व है। इरा ने उसका दूसरा हाथ थाम लिया, ये बताते हुए कि वो नक़ली मानव पर नहीं, इसी असली, अड़ियल मानव पर रीझी है।
और फिर वो आदमी आगे बढ़ा, जो सबसे लंबे समय से छुपा हुआ था। जगदीश। उसने अपनी छाती से वो नक़ली मेडल एक-एक कर के उतारे, और उन्हें अपनी जेब में रख लिया। बिना मेडलों के, बिना वर्दी के रोब के, वो अब बस एक बूढ़ा आदमी था। उसने माइक की तरफ़ हाथ बढ़ाया, और एंकर ने काँपते हाथों से उसे थमा दिया।
"मेरा नाम कर्नल रणविजय नहीं है। ...मैं कभी फ़ौज में नहीं रहा। ...मैं जगदीश चतुर्वेदी हूँ। ...एक रिटायर्ड डाकबाबू। ...चालीस साल मैंने दूसरों की चिट्ठियाँ बाँटीं, दूसरों के प्यार के, दूसरों के इंतज़ार के लिफ़ाफ़े। ...और अपनी ज़िंदगी में, मैं ख़ुद बहुत अकेला हो गया।"
पूरा हॉल साँस रोके सुन रहा था। वो कैमरा, जो अभी बदनाम करने चला था, अब एक ऐसी बात रिकॉर्ड कर रहा था जो हर अकेले दिल की थी। जगदीश ने एक गहरी साँस ली, और सरिता की तरफ़ देखा, जो आँखों में आँसू लिए, पहली पंक्ति में खड़ी थी।
"मुझे शरम आती थी कि इस उम्र में मुझे किसी का साथ चाहिए। ...तो मैंने एक कर्नल का नक़ाब पहन लिया। ...पर आज मैं ये नक़ाब उतार रहा हूँ। ...क्योंकि जिस औरत से मुझे प्यार हुआ, वो एक कर्नल से नहीं, इस अकेले जगदीश से प्यार करती है। ...और मुझे अब अपने अकेलेपन से शरम नहीं, अपने प्यार पर गर्व है।"
और हॉल के उस पार, सरिता ने आँसू पोंछे, और सिर हिला कर हाँ कहा, सबके सामने। दो बुज़ुर्ग, जो एक-दूसरे से झूठ बोल कर मिले थे, अब एक-दूसरे के सच के सामने खड़े थे। तालियों की एक हल्की सी लहर उठी, फिर और तेज़ हुई। पर सबसे मुश्किल सच अभी बाक़ी था।
क्योंकि अब बारी सांवी की थी। और उसका सच सबसे भारी था। वो अपनी जगह पर काँप रही थी। दो साल की शर्म, हज़ार तरस भरी नज़रें, वो सब एक पल में उसके सामने आ खड़ा हुआ। पर उसने अपने पापा को देखा, जो अभी-अभी अपना नक़ाब उतार कर खड़ा था, और उसके अंदर कुछ मज़बूत हो गया।
"और मैं सांवी हूँ। ...जगदीश की बेटी। ...और हाँ, चांचल आंटी ने सच कहा। ...मेरा तलाक़ हो चुका है। ..." उसकी आवाज़ काँपी, फिर सँभल गई। "...दो साल से मैं ये शब्द फुसफुसाहटों में सुनती आई हूँ। ...जैसे ये कोई गाली हो। ...जैसे मैं कोई टूटी हुई चीज़ हूँ। ...पर आज, इस पूरे शहर के सामने, मैं इसे ज़ोर से कह रही हूँ।"
"हाँ, मेरी शादी टूटी। ...पर मैं नहीं टूटी। ...जिसने मुझे छोड़ा, वो कमज़ोर था, मैं नहीं। ...मैंने अपने आप को दोबारा खड़ा किया, एक बेकरी खोली, अपने पैरों पर आई। ...और मैं फिर से प्यार करने का हक़ रखती हूँ। ...तलाक़ मेरे माथे का दाग़ नहीं है। ...वो बस एक कहानी का एक अध्याय है, पूरी कहानी नहीं। ...और मेरी कहानी अभी बाक़ी है।"
और इस बार हॉल चुप नहीं रहा। तालियों का एक सैलाब उठा। कहीं कोई औरत खड़ी हो कर ताली बजा रही थी, कहीं कोई लड़की अपनी आँखें पोंछ रही थी। और उस लाइव कैमरे के उस पार, मोहल्ले के फ़ोनों में, टिप्पणियों की एक झड़ी लग गई, पर वो टिप्पणियाँ अब चांचल के हक़ में नहीं थीं।
दूर खड़े गोलू ने चांचल का लाइव अपने फ़ोन पर खोल रखा था, और अब टिप्पणियाँ इतनी तेज़ी से आ रही थीं कि पढ़ना मुश्किल था। 'शाबाश बेटी', 'ये है असली हिम्मत', 'चतुर्वेदी परिवार को सलाम', 'चांचल आंटी ये कैसी जासूसी'। सच बदनाम करने चला था, और सच ने ही परिवार को हीरो बना दिया।
और अब वो पूरा हॉल, वो पूरा लाइव, एक ही तरफ़ मुड़ गया। चांचल की तरफ़। जो अब भी कुर्सी पर खड़ी थी, फ़ोन थामे, पर उसका चेहरा उतर चुका था। जिस तमाशे को वो बदनामी बनाना चाहती थी, वो एक जश्न बन गया था, और उस जश्न में वो अकेली खलनायक बन कर खड़ी थी।
"मैं... मैंने तो बस... मोहल्ले को सच बताना चाहा था। ..." उसकी आवाज़ अब धीमी थी। "...मुझे नहीं पता था कि... कि ये सच इतना... सुंदर होगा। ...मैंने सोचा था लोग हँसेंगे। ...पर लोग तो... रो रहे हैं।"
"क्योंकि हर किसी के घर में एक ऐसी ही कहानी छुपी है, चांचल। ...बस कहने की हिम्मत नहीं होती। ..." पुष्पा ने उसके फ़ोन पर हाथ रखा, और धीरे से उसे नीचे किया। "...तू अकेली नहीं है जो तनहा है। ...उस कैमरे के पीछे छुपने के बजाय, कभी सामने आ कर हमारे साथ बैठ। ...तुझे भी एक परिवार मिल जाएगा।"
और चांचल की आँखों में, पहली बार, पानी आ गया। उसने चुपचाप फ़ोन नीचे किया, और लाइव बंद कर दिया। जो तमाशा दिखाने वो आई थी, वो एक आईना बन गया था, और उस आईने में उसे अपनी ही तनहाई दिख गई थी। मोहल्ले की जासूस आज ख़ुद पकड़ी गई थी, अपने ही अकेलेपन के हाथों।
और वहाँ, उस चमकते मंच पर, एक पूरा परिवार खड़ा था, बिना किसी नक़ाब के। एक बूढ़ा डाकबाबू, उसकी तलाक़शुदा बेटी, एक शरारती दादी, एक अड़ियल पोता और उसकी होशियार महबूबा। सबके राज़ खुल चुके थे, और अजीब बात ये थी कि खुलने के बाद वो हल्के हो गए थे, जैसे बरसों का बोझ एक साथ उतर गया हो।
तालियाँ अब चरम पर थीं। हॉल खड़ा हो कर उन्हें दाद दे रहा था। सांवी की आँखों में राहत के आँसू थे। उसे लगा, बस, आज सब कुछ खुल गया। अब इस परिवार में कोई राज़ नहीं बचा। अब बस ख़ुशी बाक़ी है। पर वो एक इंसान को भूल गई थी, जो अब तक चुप खड़ा था।
क्योंकि उस पूरे तूफ़ान में, एक इंसान ने अब तक एक शब्द नहीं कहा था। अनिकेत। वो एक कोने में खड़ा, सबको अपने-अपने सच कहते देख रहा था। और उसके चेहरे पर वो राहत नहीं थी जो बाक़ी सबके चेहरे पर थी। उसके चेहरे पर एक और बोझ था, एक ऐसा सच जो अभी बाहर आने के लिए तड़प रहा था।
और धीरे-धीरे, उन तालियों के बीच, अनिकेत आगे बढ़ा। उसने एंकर से माइक लिया। पूरा हॉल एक पल को चुप हुआ, ये सोच कर कि शायद वो भी इस ख़ुशी में कुछ कहेगा। सांवी ने उसकी तरफ़ देखा, उसका दिल अभी भी उस 'परी' वाले ज़ख़्म से दुख रहा था। अनिकेत की नज़र सीधे उस पर टिकी।
"आज जब इस परिवार ने अपना हर सच कह दिया है, ...तो मुझे लगता है, अब मेरी बारी है। ..." उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर रुकी नहीं। "...सांवी, ...आज जब सब सच बोल रहे हैं, ...तो एक बात मैंने भी तुमसे कभी नहीं बताई। ...एक बात, जो मैं इतने महीनों से छुपाता आया हूँ। ...और आज, इसी मंच पर, मैं वो तुम्हें बताना चाहता हूँ।"
और पूरा हॉल, वो पूरा शहर जो अब भी देख रहा था, एक साँस में थम गया। सांवी की साँस अटक गई। क्योंकि जो नक़ाब अभी तक नहीं उतरा था, वो अनिकेत का था। और अब वो, सबके सामने, उस मंच पर, अपना सबसे गहरा राज़ खोलने वाला था, वो राज़ जो एक छोटी बच्ची और एक गुज़री हुई पत्नी के इर्द-गिर्द बुना था। सांवी वहीं खड़ी रह गई, ये जानते हुए कि अगला एक वाक्य उसकी पूरी ज़िंदगी बदल देगा।
Comments
No comments yet. Be the first to share your thoughts.