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Chapter 3 of 25 10 min read

काया कौन है

शादी डॉट कॉम by Avni Oberoi

कुछ हँसी ऐसी होती हैं जो इंसान भूल जाता है कि वो हँस भी सकता है। सांवी के साथ ऐसा ही हुआ। रात के ग्यारह बजे, कमरे की बत्ती बुझी हुई, और काया के नाम के पीछे छिपी सांवी अपने फ़ोन पर एक अजनबी से बातें कर रही थी, अनिकेत नाम का एक आदमी, जो शब्दों से जादू करता था।

"तो काया जी, एक ईमानदार सवाल। अगर एक बेकरी में सिर्फ़ एक ही चीज़ बच जाए, आख़िरी वाली, तो आप क्या बचाएँगी? केक या समोसा? इस जवाब पर पूरी दोस्ती टिकी है।"

"समोसा, बिल्कुल समोसा। जो इंसान आख़िरी वक़्त में केक चुने ना, उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। केक झूठ बोलता है, समोसा नहीं।"

"समोसा सच्चा होता है। ये मैंने आज तक किसी शायर से नहीं सुना। आप कवि हैं, काया जी, या बस भूखी हैं?"

"दोनों। और आप? आप इतनी अच्छी बातें करते हैं। असल में करते क्या हैं?"

"मैं बच्चों की किताबों के लिए तस्वीरें बनाता हूँ। छोटे-छोटे हाथी, उड़ने वाले छाते, ऐसी दुनिया जो असल में नहीं होती। शायद इसीलिए मैं उसमें रहता हूँ।"

और सांवी को नहीं पता था क्यों, पर उस एक लाइन में, शायद इसीलिए मैं उसमें रहता हूँ, उसे एक और अकेला इंसान दिखा। जो हँसी के पीछे कुछ छुपाए बैठा था, बिल्कुल उसकी तरह।

"जो दुनिया असल में नहीं होती, उसे बनाना कोई आसान काम नहीं, अनिकेत जी। हम में से कुछ लोग तो असल दुनिया में ही किसी तरह टिके हुए हैं।"

"टिके रहना भी एक बहादुरी है, काया जी। हर कोई उड़ नहीं सकता। पर जो टिका रहता है, ना, वही असल में सबको उड़ने देता है।"

"आप हर बात इतनी नरमी से कैसे कह देते हैं? ज़्यादातर लोग या तो तरस खाते हैं या नसीहत देते हैं। आप बस... समझ जाते हैं।"

"शायद इसलिए कि मैंने भी कुछ चीज़ें खोई हैं, काया जी। और खोने वाला इंसान तरस नहीं खाता। वो बस चुप हो कर साथ बैठ जाता है।"

कुछ चीज़ें खोई हैं। सांवी ने और नहीं पूछा। और अनिकेत ने और नहीं बताया। पर उस चुप्पी में दो अकेले लोग एक पल को साथ बैठ गए, बिना एक-दूसरे का दर्द जाने, बस उसे महसूस करते हुए।

"अच्छा, बहुत हो गई गहरी बातें। अब मुझे बताइए, बच्चों की किताब में सबसे मुश्किल क्या बनाना होता है? हाथी या इंसान?"

"इंसान। हाथी तो बस बड़ा बना दो, ख़ुश हो जाता है। इंसान की आँखें बनानी पड़ती हैं, और आँखों में झूठ नहीं चलता, काया जी। बच्चे तुरंत पकड़ लेते हैं।"

बातें रात के दो बजे तक चलीं। और जब उसने फ़ोन रखा, तो सांवी के गाल दुख रहे थे। हँसने से। दो साल बाद। उसने आईने में ख़ुद को देखा और धीरे से कहा।

"संभल जा, सांवी। ये काया की ज़िंदगी है, तेरी नहीं। और काया का कोई अतीत नहीं। पर तेरा है।"

अब यहाँ वो बात है जो सांवी नहीं जानती थी, पर आप और मैं जानते हैं। वो अनिकेत, जिसकी बातों पर वो रात भर हँसी, कोई अजनबी नहीं था। वो हर सुबह उसकी अपनी गली से गुज़रता था। अगली सुबह। सांवी की छोटी सी घरेलू बेकरी, गली के नुक्कड़ पर। और ठीक साढ़े आठ बजे, वही आदमी काउंटर पर आया, जिसका चेहरा उसने कभी ठीक से देखा ही नहीं था।

"वही रोज़ वाली, दीदी। एक कड़क चाय, कम शक्कर। और एक... एक बटर बन। जल्दी है थोड़ी, बच्ची को स्कूल छोड़ना है।"

"हो जाएगा। दो मिनट। बग़ल वाले स्कूल में?"

"हाँ, अभी नई आई है। पहली बार अकेले जा रही है। मुझसे ज़्यादा वही बहादुर है, सच कहूँ तो।"

"अकेले भेज रहे हैं तो एक चीज़ करिए। बस्ते में एक टॉफ़ी रख दीजिए, छुपा कर। नए स्कूल में डर लगे ना, तो बच्चे को कुछ मीठा चाहिए होता है याद करने को। घर याद आता है फिर।"

अनिकेत रुका। उसने पहली बार उस थकी हुई चाय वाली दीदी को ठीक से देखा। एक ऐसी बात, जो सिर्फ़ वो इंसान कह सकता है जिसने ख़ुद कभी किसी का घर याद किया हो।

"शुक्रिया, दीदी। ये... ये अच्छी बात बताई आपने। किसी माँ जैसी।"

किसी माँ जैसी। सांवी की मुस्कान एक पल को काँपी। उसकी अपनी शादी में यही तो एक ख़्वाहिश अधूरी रह गई थी। पर उसने कुछ नहीं कहा। बस अगला ऑर्डर बनाने लगी। अनिकेत ने पैसे दिए। दोनों की उँगलियाँ एक पल को छुईं, और कुछ नहीं हुआ। कोई बिजली नहीं। कोई पहचान नहीं। क्योंकि दिन के उजाले में वो बस चाय वाली दीदी थी और वो जल्दी में एक बाप। रात को वो एक-दूसरे को काया और अनिकेत कह कर दिल खोल देते थे। दिन में वो एक-दूसरे को दीदी और भैया कह कर पहचानते तक नहीं थे। एक ही शहर, एक ही गली, दो अजनबी जो पहले से एक-दूसरे के थे। अब इस कहानी का दूसरा छोर। एक कैफ़े। और घर का दूसरा अकेला दिल, असली मानव। मानव को एक कोने की मेज़ चाहिए थी, वो जिस पर वो अपने चुटकुले लिखता था। खिड़की वाली। शांत। और आज, वो मेज़ पहले से किसी ने घेर रखी थी। एक लड़की। लैपटॉप, कॉफ़ी, और आत्मविश्वास से भरी।

"एक्सक्यूज़ मी। ये मेरी मेज़ है। मतलब, रोज़ मैं यहीं बैठता हूँ। खिड़की वाली।"

"अच्छा? यहाँ आपका नाम लिखा है कहीं? मुझे तो सिर्फ़ मेन्यू पर कॉफ़ी के दाम लिखे दिख रहे हैं, आपका नाम नहीं।"

"नाम... नाम नहीं लिखा। पर एक अलिखित समझौता होता है। मोहल्ले के कैफ़े का उसूल। पहले आओ, पहले पाओ, और मैं रोज़ पहले आता हूँ।"

"तो आज दूसरे नंबर पर आए हैं। ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसा होता है। हिम्मत रखिए। वो सामने वाली मेज़ भी खिड़की के पास है, बस उसमें से नाली दिखती है। आपके चुटकुलों के लायक ही है, शायद।"

"आपको कैसे पता कि मैं चुटकुले लिखता हूँ? जासूसी कर रही थीं क्या?"

"जासूसी नहीं। आप पिछले बीस मिनट से एक ही लाइन लिख कर काट रहे हैं और हर बार ख़ुद पर हँस कर सिर पीट रहे हैं। या तो कॉमेडियन हैं, या दिमाग़ी हालत ठीक नहीं। मैंने पहला वाला मान लिया, तमीज़ की ख़ातिर।"

मानव का मुँह खुला रह गया। उसे नहीं पता था कि इस लड़की ने उसे चुटकुले लिखते देख लिया था, और उसे नहीं पता था कि ये कौन थी।

"वो... वो लाइन इसीलिए काट रहा था क्योंकि वो अभी तक परफेक्ट नहीं है। कॉमेडी एक कला है, मैडम। इसमें मेहनत लगती है। हर कोई नहीं समझता।"

"बीस मिनट में एक लाइन। इस रफ़्तार से तो आपका पहला जोक रिटायरमेंट के बाद तैयार होगा। लीजिए, मेज़ आपकी। मैं जा रही हूँ। किसी शांत, समझदार इंसान से बात करने, जो कम से कम बात तो पूरी कर पाता है।"

और वो चली गई, ये कहते हुए कि उसे किसी शांत, समझदार इंसान से बात करनी है। मानव को नहीं पता था कि वो शांत, समझदार इंसान भी वही था, बस दादी के हाथों टाइप होता हुआ।

"बदतमीज़ लड़की। कॉफ़ी भी काली पीती होगी, दिल जैसी। और वो नाली वाली मेज़ का ताना, वो मुझे याद रहेगा। भगवान करे दुबारा कभी न टकराए ये।"

"सुन लिया! और हाँ, काली कॉफ़ी सेहत के लिए अच्छी होती है। आपके मूड के लिए भी अच्छी रहती, अगर पीते।"

अब यहाँ मज़े की बात। ये वही इरा थी। वही तेज़-तर्रार लड़की जो हर रात एक मानव नाम के लड़के से चैट पर घंटों बात करती थी, और जिसे लगता था कि वो लड़का दुनिया का सबसे शांत, सबसे समझदार इंसान है। उसे कहाँ पता कि जिस मानव से वो प्यार भरी बातें करती है, उसे उसकी दादी टाइप करती हैं। और जिस मानव से वो अभी-अभी मेज़ पर लड़ी है, वो असली है। एक नाम। दो आदमी। और इरा दोनों से मिल चुकी थी, बिना जाने। उसी शाम, घर में, दादी पुष्पा अपने मोर्चे पर डटी थीं। इरा का मैसेज आया था।

"गोलू, सुन। इरा लिखी है, आज एक बदतमीज़ लड़के से झगड़ा हुआ कैफ़े में। तुम्हारे बिल्कुल उलट। तुम कितने अलग हो, मानव। ...देख, मेरा मानव कितना प्यारा है इसकी नज़र में।"

"दादी। वो बदतमीज़ लड़का। वो... वो मानव चाचा ही होंगे। इरा असली चाचा से लड़ी है और नक़ली चाचा की तारीफ़ कर रही है। ये... ये तो टाइम बम है।"

"होने दे। जब तक बम मेरे हाथ में है, फटेगा नहीं। लिख, इरा, वो बदतमीज़ लड़का ज़रूर अंदर से अकेला होगा। बदतमीज़ी दर्द का चोला है।"

"दादी शायरी कर रही हैं, चाचा के नाम से, उसी लड़की को, जिससे चाचा नफ़रत करते हैं। भगवान, मुझे बस बारहवीं पास करनी है। इतना बोझ मत डालो।"

और अब वापस उस रात की तरफ़, जहाँ सबसे बड़ा तूफ़ान आने वाला था। काया और अनिकेत, कई हफ़्तों की बातों के बाद, पहली बार वीडियो कॉल पर आने को राज़ी हुए।

"ठीक है, अनिकेत जी। पर एक शर्त। हँसना मत। मैं कैमरे पर अजीब लगती हूँ। और मैंने बाल भी नहीं बनाए।"

"मैं भी कहाँ फ़िल्मी हीरो हूँ, काया जी। बस एक थका हुआ आदमी हूँ जो अच्छी बातें करता है। चलिए, तीन... दो... एक।"

कैमरा जगमगाया। स्क्रीन पर पहले धुँधली, फिर साफ़, एक शक्ल उभरी। एक कोमल मुस्कान। थकी हुई आँखें। और सांवी की साँस, जो अभी हँसने को तैयार थी, गले में ही अटक गई।

"ये... ये चेहरा... रुकिए। आप... आप वो... आप तो..."

उसने वो चेहरा पहचान लिया। ये कोई अजनबी अनिकेत नहीं था। ये वही आदमी था। रोज़ सुबह साढ़े आठ बजे। कड़क चाय, कम शक्कर, एक बटर बन। बच्ची को स्कूल छोड़ने वाला। उसकी अपनी गली का चाय वाला।

"ये तो मेरे काउंटर पर आता है। रोज़। इसने मुझे देखा है। सांवी को। अगर इसने काया को पहचान लिया, अगर इसे पता चल गया कि काया और वो चाय वाली दीदी एक ही है..."

और सांवी ने, सोचने का एक पल भी दिए बिना, दोनों हाथों से लैपटॉप की स्क्रीन धड़ाक से बंद कर दी। कमरे में अँधेरा। दिल में तूफ़ान। और उधर, अनिकेत की स्क्रीन पर, कॉल कटने से ठीक एक पल पहले, काया का चेहरा एक फ़्रेम में जम गया था। धुँधला। आधा जाना-पहचाना। जैसे उसने ये चेहरा कहीं देखा हो, पर याद न आ रहा हो।

"काया? हैलो? ...अजीब बात है। ये चेहरा... मैंने कहीं देखा है। पर कहाँ?"

"चाय... बटर बन... रुको। नहीं। नहीं, ये तो... ये तो वो..."

पर याद पूरी होते-होते फिसल गई। जैसे जीभ पर कोई नाम आ कर रुक जाए। अनिकेत ने सिर झटका। बस थकान होगी, उसने ख़ुद से कहा। पर दिल के किसी कोने में एक घंटी बजती रही, धीमी, ज़िद्दी। एक तरफ़ सांवी, अँधेरे में, धड़कते दिल से, बंद लैपटॉप को घूरती हुई। दूसरी तरफ़ अनिकेत, एक जमी हुई तस्वीर को, जिसे उसका दिल पहचानता था पर दिमाग़ नहीं। दो लोग, एक ही सच के दो किनारों पर खड़े, और उनके बीच सिर्फ़ एक बंद स्क्रीन की दूरी।

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