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अध्याय 12 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

काया और सांवी

शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi

और अनिकेत पूरा मुड़ गया। नदी की काँपती रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी, और सांवी के दो अलग-अलग कमरों में बंद दो दुनियाएँ, एक ही पल में, एक ही चेहरे में ढह गईं। रात वाला अनिकेत, जो शब्दों से जादू करता था। और दिन वाला वो आदमी, जो रोज़ सुबह उसके काउंटर पर कड़क चाय माँगता था। दोनों एक। उसके सामने। मुस्कुराते हुए।

सांवी वहीं जम गई, दरवाज़े और मेज़ के बीच, अपने दो नामों के बीच। उसके गले में गोलू की सिखाई लाइन अटकी हुई थी, मेरा असली नाम सांवी है, पर अब वो लाइन बेमानी हो गई थी, क्योंकि जिस आदमी को वो बताने आई थी, वो उसे पहले से देखता आया था।

"अनिकेत जी... आप... आप यहाँ? ...मतलब आप ही काया का इंतज़ार कर रहे थे? ...पर आप तो... आप तो मेरी दुकान पर..."

"बैठ जाइए, सांवी जी। ...हाँ। सांवी। ये नाम मैं कब से जानता हूँ।"

सांवी की साँस रुक गई। उसने जो नक़ाब महीनों से इतनी मेहनत से सँभाला था, वो कब का उतर चुका था, और उसे ख़बर तक नहीं थी। वो एक कुर्सी का सहारा ले कर, काँपते घुटनों से, बैठ गई।

"कब से? ...आपको कब से पता है कि काया और वो चाय वाली दीदी... एक ही हैं?"

"उस दिन से, जब आपके असली नाम वाला एक मैसेज मेरे पास आ गया था। ग़लती से। सांवी। ...और फिर मैंने जोड़ना शुरू किया। वो हँसी जो काया की थी, वही हँसी मैं आपकी दुकान पर सुनता था। वो 'जली हुई चीज़ों से हमदर्दी' वाली बात। वो अदरक वाली चाय। ...एक-एक कर के सब जुड़ता चला गया।"

और फिर अनिकेत ने वो कहा जिसने सांवी की आँखें भर दीं। उसने ग़ुस्से से नहीं, शिकायत से नहीं, बहुत नरमी से कहा।

"मुझे पता था, सांवी जी। हफ़्तों से। ...पर मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि मैंने आपसे कहा था ना, जिस दिन आप तैयार हों, मैं यहीं मिलूँगा। इसी अदरक वाली चाय के साथ। ...तो मैं बस इंतज़ार करता रहा। कि आप ख़ुद आएँ। अपने आप।"

दो साल से सांवी हर आदमी की आँख में या तो तरस देखती आई थी, या फ़ैसला। और यहाँ, नदी के किनारे, एक आदमी बैठा था जिसे उसका सबसे बड़ा राज़ पहले से पता था, और जो फिर भी भागा नहीं। जो बस इंतज़ार करता रहा। सब्र से। बिना पूछे। बिना तरस खाए।

"आप... आप कैसे इंसान हैं? कोई सच जान कर रुकता नहीं। लोग तो कम जान कर भी भाग जाते हैं। ...और आप, सब जान कर, रोज़ मेरी दुकान पर चाय पीने आते रहे, जैसे कुछ हुआ ही न हो?"

"क्या करता? दूसरी दुकान की चाय अच्छी नहीं है। ...और सच कहूँ तो, मुझे वो दो मिनट अच्छे लगते थे। जब आप बिना देखे, बिना जाने, मुझे एक टॉफ़ी छुपाने की सलाह दे देती थीं। ...उस सलाह में एक ऐसी बात थी जो काया की चैट में भी थी। ...एक ही इंसान की गरमाहट, दो अलग खिड़कियों से।"

और तभी, न जाने कैसे, सांवी हँस पड़ी। एक ऐसी हँसी जो डर और राहत, दोनों से एक साथ फूटी। पूरी बात का पागलपन उस पर एक साथ उतर आया।

"हे भगवान। मैं महीनों से अपने ही ग्राहक से छुप रही थी। रात को फ़ोन पर 'अनिकेत जी' और सुबह काउंटर पर 'भैया, चाय लीजिए'। ...और आप दोनों जगह वही सब्र से मुस्कुराते रहे। ...हम दोनों में से ज़्यादा पागल कौन है, ये तय करना मुश्किल है।"

"पागल तो आप हैं, सांवी जी। जिस औरत ने पूरी दुनिया को 'केक झूठ बोलता है, समोसा नहीं' समझाया, वो अपने बारे में एक सीधी सच्ची बात कहने से इतना डरती है? ...वो समोसा वाली बात आपकी थी। मुझे उसी रात शक हो गया था कि ये औरत जितना छुपा रही है, उससे कहीं ज़्यादा सच्ची है।"

और फिर, वो अजीब सी बात हुई जो दो लोगों के बीच बरसों में एक बार होती है। नक़ाब उतर गए। नाम सही हो गए। और वो दोनों, नदी के किनारे, बत्तियों की काँपती सुनहरी लकीरों के सामने, बस बैठ गए, पहली बार, बिना किसी झूठ के, बिना किसी काया के, बिना किसी दीदी के। बस सांवी और अनिकेत।

"अच्छा, अब जब सब खुल ही गया है, तो एक ईमानदार सवाल। ...आख़िरी वाला बचा है, केक या समोसा, तो अब भी समोसा ही चुनेंगी? या काया की बहादुरी सिर्फ़ स्क्रीन तक थी?"

"समोसा। हमेशा समोसा। ...पर अनिकेत जी, स्क्रीन पर बहादुर होना आसान था। वहाँ सिर्फ़ काया थी। यहाँ, इस मेज़ पर, पूरी सांवी बैठी है। और सांवी उतनी बहादुर नहीं है।"

और वहीं, उस हँसी के बीच, एक चुप्पी उतर आई। क्योंकि दोनों जानते थे कि कुछ अभी भी बीच में था। एक दरवाज़ा उसका, जिसके पीछे तलाक़ का दाग़ था। और एक दरवाज़ा उसका, जिसके पीछे एक छोटी सी बच्ची और एक गई हुई पत्नी की याद बंद थी।

"अनिकेत जी, मुझे... मुझे आपको एक और बात बतानी है। जो काया ने कभी नहीं बताई। मेरी... मेरी एक शादी... मतलब, मैं पहले... मैं..."

और शब्द उसके होंठों पर आ कर रुक गया। तलाक़। बस चार अक्षर। पर उन चार अक्षरों के पीछे दो साल के ताने थे, रिश्तेदारों की तरस भरी नज़रें थीं, वो हर सुबह जिसमें उसे 'बेचारी' कह कर देखा गया था। और वो शब्द उसकी ज़बान पर आ कर पत्थर बन गया।

"रुकिए। ...सांवी जी, आज नहीं। जो चीज़ इतनी भारी है कि ज़बान पर पत्थर बन जाए, उसे ज़बरदस्ती मत खींचिए। ...आज बस इतना काफ़ी है कि आप यहाँ हैं। पूरी। असली। बाक़ी जो है, वो अपने वक़्त पर, अपने आप कहिएगा। मैं भागने वाला नहीं।"

और सांवी ने राहत की एक लंबी साँस ली। पर उस राहत में उसने ये नहीं देखा कि अनिकेत ने भी, ठीक उसी पल, अपना एक दरवाज़ा और कस के बंद कर लिया। उसकी छोटी बेटी। उसकी बीवी की याद। वो जिसे वो हर किसी से बचा कर रखता था, इस डर से कि कहीं कोई देख कर भाग न जाए।

"मेरी भी एक दुनिया है, सांवी जी। एक ऐसी, जो मैं आसानी से किसी को नहीं दिखाता। जिसमें एक पुराना दर्द है, और एक बहुत नन्ही सी ख़ुशी। ...उसे भी मैं अपने वक़्त पर खोलूँगा। आपसे वादा है। ...आज बस, ये चाय, ये नदी, और हम दोनों। बिना किसी नाम के, बिना किसी बोझ के।"

और वो दोनों वहीं बैठे रहे, देर तक। दो लोग जो सच में जुड़ रहे थे, और फिर भी, दोनों एक-एक दरवाज़ा बंद रखे हुए थे। ये प्यार की सबसे मीठी और सबसे डरावनी हालत है, जब आप किसी के इतने क़रीब आ जाएँ कि बस एक बंद दरवाज़ा रह जाए, और वही एक दरवाज़ा सबसे भारी लगने लगे।

"अनिकेत जी, एक बात सच कहूँ? ...दो साल से मैं बस दिन काट रही थी। जीना बंद कर दिया था। और काया... काया सिर्फ़ इसलिए बनी थी कि मुझे एक बार फिर से हँसना था। ...पर आज, इस मेज़ पर, पहली बार, मुझे काया की ज़रूरत नहीं लग रही। ...सांवी ही काफ़ी लग रही है। ये आपने किया है।"

"तो फिर काया को यहीं छोड़ देते हैं, इसी नदी किनारे। ...मुझे सांवी अच्छी लगती है। थकी हुई, जली हुई, डरी हुई सांवी। ...क्योंकि वो असली है। और मैंने ज़िंदगी में जो थोड़ी सी चीज़ें सीखी हैं, उनमें सबसे बड़ी यही है, कि असली चीज़ें ही याद रह जाती हैं।"

और मेज़ पर, दो हाथ, एक-दूसरे से बस एक इंच दूर, रुके रहे। न वो बढ़ा, न उसने खींचा। बस दोनों वहीं रहे, उस एक इंच की दूरी पर, जो प्यार में सबसे लंबी दूरी होती है। ...आज के लिए इतना ही काफ़ी था।

और उसी शहर के दूसरे कोने में, उसी पुराने कैफ़े में, एक बिल्कुल अलग तरह का प्यार, नोक-झोंक की वर्दी पहने, अपना रास्ता बना रहा था। मानव, स्टेज से उतरा हुआ, और सामने वाली मेज़ पर, वही तेज़-ज़बान लड़की। इरा।

"आज का सेट पिछले हफ़्ते से बेहतर था, मानव। सिर्फ़ छह लोग ऊबे, चार हँसे। तुम्हारे हिसाब से ये तो लगभग सुपरहिट है।"

"चार हँसे, हाँ। और तुम उन चार में थीं। ...मैंने देखा। तुमने हँसी रोकने की बहुत कोशिश की, पर उस बत्तख़ वाले जोक पर तुम फूट पड़ीं। मान लो, इरा। तुम्हें मेरी कॉमेडी पसंद है।"

"बत्तख़ वाला जोक अच्छा था, ये मैं मानती हूँ। पर बाक़ी के लिए तुम्हें अभी बहुत मेहनत करनी है, मिस्टर चतुर्वेदी। ...और हाँ, वो नाली वाली मेज़ का ताना मैं वापस लेती हूँ। तुम नाली के नहीं, कम से कम खिड़की के लायक़ तो हो।"

और दोनों हँस पड़े। पहली बार, बिना किसी तेज़ धार के। मानव को ख़ुद पर हैरानी हुई, कि जिस लड़की से वो पहली मुलाक़ात में नफ़रत करने की क़सम खा चुका था, उसी के साथ बैठ कर आज उसे सबसे हल्का लग रहा था।

"अच्छा इरा, एक बात पूछूँ? ...वो जो नक़ली मानव तुमसे बात करता था, चैट पर, शायरी वाला... वो सब झूठ था। कोई और था। मुझे अब भी शर्म आती है कि किसी ने मेरे नाम से तुम्हें बेवक़ूफ़ बनाया। ...तुम्हें बुरा नहीं लगा?"

"बुरा? ...पता नहीं। शुरू में लगा था। ...पर फिर मैंने सोचा, जिसने भी वो लिखा, उसने बहुत प्यार से लिखा था। इतने प्यार से कि झूठ भी सच्चा लगे। ...मुझे लगता है, उस नक़ली मानव के पीछे कोई ऐसा था जो सच में चाहता था कि तुम्हें कोई मिल जाए। ...और शायद वो ग़लत नहीं था।"

और इरा ने ये कहते हुए मानव की आँखों में एक पल ज़्यादा देखा, जैसे वो कुछ और जानती हो, कुछ ऐसा जो उसने अभी कहा नहीं। पर मानव, अपनी ही शर्म में उलझा, वो नज़र पढ़ नहीं पाया। उसने बस राहत की साँस ली।

"पता है इरा, सामने वाला मानव, जो तुम्हारे लायक़ शायरी नहीं लिख सकता, वो कम से कम असली है। ...और वो कह रहा है कि आज की चाय, फिर से, उसकी तरफ़ से। बेरोज़गार है, पर चाय पिलाने की औक़ात अभी बची है।"

"ठीक है, असली मानव। तुम्हारी चाय मंज़ूर। ...और सुनो, मुझे वो शायरी वाला मानव नहीं चाहिए। मुझे वो चाहिए जो बत्तख़ के जोक पर ख़ुद सबसे ज़्यादा हँसता है। ...वो ज़्यादा सच्चा लगता है। बस ये बात उसे किसी को मत बताना, वरना उसका सारा बदमिज़ाज रौब ख़त्म हो जाएगा।"

और मानव मुस्कुरा दिया, अपनी काली कॉफ़ी में देखते हुए, ये छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कि उसके कान लाल हो गए थे। दो तेज़ ज़बानें, धीरे-धीरे, एक-दूसरे के लिए नरम पड़ रही थीं। घर के तीन अकेले दिलों में से एक और, चुपके से, थोड़ा कम अकेला हो रहा था।

पर उसी शाम, चतुर्वेदी घर से कुछ ही गलियों दूर, मोहल्ले के उस चबूतरे पर, जहाँ हर शाम आंटियों की अदालत लगती थी, एक तूफ़ान अपनी पहली हवा भेज रहा था। और उस तूफ़ान का नाम था, चांचल।

चांचल आंटी, गले में दूरबीन, हाथ में फ़ोन, और चेहरे पर उस शिकारी की चमक जो किसी दूसरे के राज़ की गंध पा जाए। वो पूरे हफ़्ते उसी 'परफेक्ट रिश्ता' ऐप को खंगालती रही थी, इस बहाने कि मोहल्ले के लड़कों के लिए रिश्ते ढूँढ रही है। पर आज उसके हाथ जो लगा था, वो रिश्ता नहीं, एक बारूद था।

"अरे सब इधर आओ! जल्दी! ...शांति देवी, कमला जी, फ़ोन छोड़ो और इधर देखो। ...आज चांचल ने वो पकड़ा है, जो पूरे मोहल्ले की नींद उड़ा देगा। ...ये देखो, मैंने ऐप से छाप कर निकाला है। एक पर्ची पर, काले अक्षरों में।"

और चांचल ने वो पर्ची हवा में लहराई, जैसे कोई जीत का झंडा हो। उस पर, ऐप से छपी हुई, एक प्रोफ़ाइल थी। ऊपर एक तस्वीर, नीचे मोटे अक्षरों में एक नाम, एक उम्र, और एक शब्द जो कानपुर की हर गली में एक औरत को नंगा कर देता है।

"नाम, काया। उम्र, बत्तीस। और ये देखो, यहाँ साफ़ लिखा है, तलाक़शुदा। ...अब ज़रा इस तस्वीर को ध्यान से देखो। ये आँखें, ये ठोड़ी का तिल, ये हँसी। ...अरे मुझे तो साफ़ दिख रहा है। ये काया-वाया कोई नहीं है। ये तो हूबहू चतुर्वेदी वाली सांवी है! वही तलाक़शुदा लड़की, जो बेकरी चलाती है!"

और चबूतरे पर बैठी हर आंटी की गर्दन उस पर्ची की तरफ़ झुक गई। किसी ने चश्मा ठीक किया, किसी ने पर्ची और पास खींची, और फिर, एक-एक कर के, फ़ोन बाहर निकलने लगे। तस्वीरें खिंचने लगीं। उस एक पर्ची की, उस एक चेहरे की, उस एक शब्द की।

और उसी पल, चांचल आंटी की उँगली उसके व्हाट्सएप के उस ब्रॉडकास्ट बटन पर आ कर रुक गई, जो मोहल्ले के सौ फ़ोन तक एक साथ पहुँचता था। एक तरफ़ नदी किनारे सांवी, पहली बार बिना नक़ाब के, थोड़ी उम्मीद के साथ घर लौट रही थी। और दूसरी तरफ़, उसका सबसे गहरा राज़, एक पर्ची पर छपा, सौ फ़ोन की कगार पर खड़ा था। ...चांचल ने मुस्कुरा कर उँगली नीचे दबाई।

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