Chapter 2 of 25 10 min read
कर्नल साहब ऑनलाइन
कर्नल रणविजय बने जगदीश को सरिता नाम की एक औरत का पहला गर्मजोश जवाब मिलता है, और वो ख़ुशी में घबरा कर रात दो बजे तक फ़ौजी शब्द रटता है। उधर दादी पुष्पा मानव के नाम से इरा नाम की एक तेज़-तर्रार लड़की को रिझाती हैं, जबकि असली मानव बेख़बर मुँह फुलाए घूमता रहता है। गोलू, जो अब घर का चोरी-छिपा आई-टी विभाग बन चुका है, तीनों प्रोफ़ाइलों को टकराने से बचाने की जी-तोड़ कोशिश करता है। पर रात के खाने पर जगदीश का सरिता के लिए भेजा प्यार भरा वॉइस नोट अचानक घर के फ़ैमिली ग्रुप के स्पीकर पर बज उठता है, और हर सिर मुड़ जाता है।
रात के दो बज कर सत्रह मिनट। पूरे चतुर्वेदी घर में सिर्फ़ एक कमरे की बत्ती जल रही थी, और उसके अंदर एक साठ साल का आदमी, रज़ाई के अंदर टॉर्च की तरह फ़ोन ताने, फ़ौज सीख रहा था।
"जय हिंद। हम्म। जय हिंद। नहीं, बहुत सख़्त लगा। जय हिंद... मैडम। हाँ। थोड़ा नरम, थोड़ा फ़ौजी।"
जगदीश चतुर्वेदी, जिन्होंने ज़िंदगी में सबसे ख़तरनाक काम एक बार बिना छाता बरसात में स्कूटर चलाना किया था, इस वक़्त गूगल पर सर्च कर रहे थे, फ़ौज में लोग बहादुरी की बातें कैसे करते हैं।
"ऑपरेशन... मोर्चा... बंकर... वाह। ये अच्छा शब्द है। मोर्चा। कल सरिता जी से बोलूँगा, ज़िंदगी भी एक मोर्चा है, मैडम, और मैंने कभी पीठ नहीं दिखाई।"
सरिता। दोपहर की बात थी। कर्नल रणविजय की प्रोफ़ाइल पर पहला जवाब आया था। एक औरत, अट्ठावन साल की, रिटायर्ड टीचर, विधवा, जिसकी लिखी दो लाइनों ने जगदीश की पंद्रह साल पुरानी बर्फ़ को हल्का सा पिघला दिया था।
"कर्नल साहब, आपकी प्रोफ़ाइल पढ़ कर लगा जैसे किसी ने बरसों बाद तमीज़ से बात की हो। मैं भी अकेली हूँ। डरती हूँ ये कहते हुए, पर सच है।"
जगदीश ने वो लाइन दस बार पढ़ी थी। मैं भी अकेली हूँ। जैसे किसी ने अँधेरे कमरे में एक और साँस लेते इंसान को ढूँढ लिया हो। और तभी से वो जाग रहा था, इस डर में कि जवाब में कुछ ऐसा लिखे जो एक कर्नल जैसा हो, एक डाकिये जैसा नहीं।
"मैडम सरिता, अकेलापन कोई कमज़ोरी नहीं। ये तो बस एक ख़ाली मोर्चा है, जिस पर अब तक कोई सही सिपाही नहीं आया। ...जय हिंद।"
भेज दिया। और फिर वो रज़ाई में ऐसे दुबक गया जैसे उसने कोई बम फेंका हो। दिल धड़क रहा था। पैंसठ की उम्र नहीं, पंद्रह की उम्र वाला दिल। सुबह हुई। और चतुर्वेदी घर की रसोई में एक दूसरी जंग चल रही थी।
"गोलू! ये लड़की, इरा, फिर से लिखी है मानव को। सुन ना क्या लिखा है। पढ़, मेरा चश्मा दूर है।"
"लिखा है, तुम्हारी बातों में एक अजीब सी शांति है, मानव। ज़्यादातर लड़के दिखावा करते हैं, तुम सुनते हो। ...दादी, ये आप हो। आप सुन रही हो। मानव चाचा तो अभी सो रहे हैं।"
"बिल्कुल। इसीलिए तो लड़की फँसी है। मेरे मानव में वो सब है जो इस ज़माने के लड़कों में नहीं। तमीज़, सब्र, और एक दादी जो टाइप करती है।"
"दादी, ये इरा तेज़ है। इसके सवाल घुमावदार होते हैं। कल इसने पूछा था, मानव का पसंदीदा गाना क्या है, और आपने लिखा, ए मेरे वतन के लोगों।"
"तो? अच्छा गाना है। रुला देता है।"
"दादी, वो अट्ठाईस साल का स्टैंड-अप कॉमेडियन है, अठारह सौ बासठ का शहीद नहीं! इरा को शक हो जाएगा।"
और ठीक उसी पल, असली मानव रसोई में घुसा, बाल बिखरे, आँखें आधी बंद, सीधा उस चाय की तरफ़ जिसके बिना उसका दिन शुरू नहीं होता था।
"दादी, मेरा फ़ोन देखा? कल रात से नहीं मिल रहा। लग रहा है किसी ने चुरा लिया।"
गोलू और पुष्पा एक पल को जम गए। मानव का फ़ोन दादी के आँचल में छुपा था, जिससे वो रात भर एक लड़की को, मानव बन कर, रिझा रही थीं।
"फ़ोन? कैसा फ़ोन? तू भूल गया होगा कहीं। तेरी याददाश्त तो वैसे भी उस स्टेज वाले चुटकुलों जैसी है, आधी अधूरी।"
"रहने दो। मिल जाएगा। वैसे भी मुझे कौन मैसेज करता है। कोई नहीं।"
और वो चाय ले कर चला गया, ये कहे बिना जो उसके अंदर था। कोई नहीं। एक ऐसा लड़का जिसे उसकी अपनी दादी दिन-रात मैसेज दिला रही थी, और जिसे ख़ुद नहीं पता था कि किसी को उसकी बातें अच्छी लग रही हैं।
"मैं इस घर का आई-टी विभाग हूँ। सोलह साल का। बिना तनख़्वाह के। और अब बिना नींद के।"
उस दिन गोलू ने एक फ़ैसला किया। वो इन तीनों प्रोफ़ाइलों को धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर धकेलेगा। ताकि ऐप कभी दादी को पापा से, या पापा को दीदी से न टकराए। एक सोलह साल का लड़का, तीन दिलों का ट्रैफ़िक पुलिस।
"पापा की प्रोफ़ाइल में सेटिंग बदलो, सिर्फ़ पचास से ऊपर की महिलाएँ। दीदी की प्रोफ़ाइल में, कानपुर के बाहर के लोग दिखाओ। ताकि पापा और दीदी कभी आमने-सामने न आएँ।"
बेचारा गोलू। उसे नहीं पता था कि ऐप का एल्गोरिदम एक ज़िद्दी बूढ़े रिश्तेदार जैसा था। जितना दूर धकेलो, उतना पास ले आता है। क्योंकि उसके हिसाब से, एक ही घर, एक ही वाई-फ़ाई, एक ही ख़ून, इससे बड़ा परफेक्ट मैच और क्या हो सकता है। और तभी, तीसरी मंज़िल पर, वो हुआ जिसका गोलू को सबसे ज़्यादा डर था। सांवी, यानी काया, सुबह की चाय के साथ अपना फ़ोन खोल बैठी। और स्क्रीन पर वही चमकीली लाइन थी। आपके लिए एक बेहतरीन रिश्ता।
"चलो, देखें तो सही ऐप ने किसे भेजा है... कर्नल रणविजय? रिटायर्ड फ़ौजी? मूँछें? हे भगवान। इसकी उम्र तो मेरे पापा जितनी होगी।"
"ऐप, मैं बत्तीस की हूँ, बासठ की नहीं। ये कर्नल साहब किसी और की क़िस्मत होंगे। ना, शुक्रिया।"
नीचे अपने कमरे में, गोलू ने अपनी स्क्रीन पर देखा कि काया ने वो मैच हटा दिया, और उसने राहत की एक ऐसी साँस ली जैसे किसी ने फाँसी के फंदे से गर्दन निकाल ली हो।
"बच गए। दीदी ने पापा को हटा दिया। पर ऐप फिर भेजेगा। ये कमबख़्त हार नहीं मानता। मुझे पापा की उम्र वाली सेटिंग और सख़्त करनी पड़ेगी।"
पर सच ये था कि सांवी उस मूँछों वाली तस्वीर पर हँसी ज़रूर थी, फिर एक पल को ठहर गई थी। क्योंकि उस बूढ़े कर्नल की प्रोफ़ाइल में एक लाइन लिखी थी, अकेलापन एक ख़ाली मोर्चा है। और सांवी को नहीं पता था क्यों, पर वो लाइन उसके अपने दिल की थी। दोपहर ढली, और दादी पुष्पा फिर मोर्चे पर थीं। इरा का एक नया मैसेज। और इस बार सवाल टेढ़ा था।
"गोलू, इरा पूछ रही है, मानव, तुम्हारा कोई ऐसा जोक सुनाओ जो तुमने ख़ुद लिखा हो। ...अब मैं जोक कहाँ से लाऊँ? मुझे तो सिर्फ़ पड़ोसियों के जोक आते हैं, वो भी सच्चे।"
"दादी, चाचा का असली वाला बोल दो। वो जो वो हमेशा स्टेज पर बोलते हैं। शादी एक ऐसा लड्डू है जिसे खाने वाला भी पछताता है और न खाने वाला भी, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि खाने वाले के पास कम से कम लड्डू का हिसाब होता है।"
"वाह! ये तो सचमुच अच्छा है। भेज दिया। देख, मेरा मानव कितना समझदार है। लड्डू में भी फ़लसफ़ा ढूँढ लेता है।"
और इरा का जवाब पलक झपकते आया। एक हँसी वाला इमोजी, और फिर, तुम पहले आदमी हो जिसने मुझे शादी के मज़ाक में सच्चाई दिखाई। पुष्पा ने वो लाइन पढ़ी, और एक पल को उनकी अपनी आँखें भर आईं। क्योंकि वो लड्डू वाला मज़ाक उनके अपने बेटे का था, जो असल में कभी शादी नहीं कर पाया। दोपहर में जगदीश छत पर टहल रहे थे, फ़ोन कान से लगाए, पर बात कोई नहीं कर रहा था। वो बस सरिता के जवाब का इंतज़ार करते हुए घूम रहे थे, जैसे कोई सिपाही चिट्ठी के इंतज़ार में परेड करता हो। और फिर वो आया। सरिता का जवाब। जगदीश ने फ़ोन ऐसे पकड़ा जैसे वो काँच का हो।
"सही सिपाही। कर्नल साहब, आपने वो शब्द ऐसे लिखा जैसे सचमुच किसी मोर्चे से लिखा हो। मुझे फ़ौजी बातें अच्छी लगती हैं। मेरे पिता भी फ़ौज में थे। ...आज शाम बात करें?"
"शाम को बात? यानी आवाज़ में? फ़ोन पे? हे राम। मुझे तो फ़ौज की एबीसीडी भी नहीं आती। मोर्चा और बंकर से कितनी देर काम चलेगा?"
एक पल को जगदीश ने सोचा, बस, यहीं रोक दो। एक झूठ को कहाँ तक निभाओगे। कर्नल बन कर कब तक चलोगे, जगदीश। पर फिर उसने सरिता की वो लाइन दुबारा पढ़ी, आज शाम बात करें, और उस लाइन में इतनी उम्मीद थी कि झूठ छोड़ने की हिम्मत नहीं हुई।
"पंद्रह साल हो गए किसी ने ये नहीं पूछा कि जगदीश, तुमसे बात करें? पंद्रह साल। एक झूठ की क़ीमत पर सही, कोई तो पूछ रहा है।"
और उसी शाम, जगदीश फिर गूगल पर थे। फ़ौजी लोग फ़ोन पर कैसे बात करते हैं। कर्नल की आवाज़ कैसी होती है। और सबसे ज़रूरी, अपनी बीवी को फ़ौजी क्या कहते हैं।
"सुप्रभात, मेरी बहादुर। रात भर तुम्हारी याद पहरा देती रही। ...नहीं, ज़्यादा हो गया। ...सुप्रभात, मेरी बहादुर। हम्म। अच्छा है। दिल से निकला है।"
जगदीश ने वो वॉइस नोट रिकॉर्ड किया। एक बूढ़े आदमी की काँपती, प्यार भरी आवाज़ में। सुप्रभात, मेरी बहादुर। उसे सरिता को भेजना था। सिर्फ़ सरिता को। पर जगदीश को ठीक से चलाना नहीं आता था ये चीज़ें। उसकी उँगली स्क्रीन पर फिसली। और वो वॉइस नोट, सरिता की चैट में नहीं, बल्कि एक और जगह जा गिरा। चतुर्वेदी परिवार। घर का फ़ैमिली ग्रुप। पर जगदीश को पता नहीं चला। भेजा हुआ देख कर वो मुस्कुरा कर फ़ोन जेब में रख, नीचे खाने पर आ गए, दिल में लड्डू फूट रहे थे। रात का खाना। पूरा परिवार मेज़ पर। पुष्पा दाल परोस रही थीं, सांवी रोटी सेंक रही थी, मानव अपने फ़ोन में स्क्रोल कर रहा था, और गोलू, हमेशा की तरह, हर किसी पर एक आँख रखे बैठा था।
"फ़ैमिली ग्रुप में किसी ने कुछ भेजा है। ऑडियो है। दादी, आपने फिर वो सुप्रभात वाला भजन फ़ॉरवर्ड किया क्या?"
"चला दे, बेटा। स्पीकर पे चला दे। भजन से घर पवित्र रहता है।"
"रुको, चाचा, मत चलाओ। पहले देख लो कि किसने..."
पर मानव का अँगूठा गिर चुका था। और पूरे कमरे में, दाल की ख़ुशबू के बीच, एक बूढ़े आदमी की काँपती, इश्क़ में डूबी आवाज़ गूँज उठी।
"सुप्रभात, मेरी बहादुर। रात भर तुम्हारी याद पहरा देती रही।"
चम्मच हवा में रुक गई। रोटी तवे पर जलने लगी। सांवी की आँखें बड़ी हो गईं। मानव ने अपने ही फ़ोन को ऐसे देखा जैसे उसमें से भूत निकला हो। और जगदीश का चेहरा, दाल से भी ज़्यादा पीला पड़ गया।
"ये... ये तो पापा की आवाज़ है। मेरी बहादुर? पापा, ये किसकी..."
"हाय राम। जगदीश! तूने... तूने किसी को मेरी बहादुर कहा? मेरे रहते? तेरी माँ के रहते?"
"पापा? आप... आपका कोई... मेरा मतलब, किसी से बात होती है? किससे?"
जगदीश की जुबान सूख गई। चेहरे पर वही डर जो एक बच्चे के चेहरे पर होता है जब वो जार में हाथ डाले पकड़ा जाए। पर ये बच्चा साठ साल का था, और जार में इश्क़ था। और उससे पहले कि कोई एक और शब्द बोल पाता, जगदीश चतुर्वेदी अपनी पूरी साठ साल की उम्र भूल कर, मेज़ के पार, दाल के कटोरे के ऊपर से, अपने बेटे के फ़ोन की तरफ़ ऐसे झपटे, जैसे कोई सिपाही आख़िरी बंकर बचा रहा हो। दाल छलकी। कुर्सी पीछे गिरी। और चार जोड़ी आँखें, हैरानी से फटी हुई, उस उड़ते हुए पिता को देख रही थीं, जिसका सबसे गहरा राज़ अभी-अभी, स्पीकर पर, पूरे परिवार के सामने, ज़ोर से बज गया था। मेरी बहादुर। ...और अब सबको जवाब चाहिए था।
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