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अध्याय 15 / 25 पढ़ने में 11 मिनट

कर्नल का सच

शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi

और चतुर्वेदी घर में एक अजीब सी जमी हुई ख़ामोशी थी। फ़ोन बज कर चुप हो चुके थे। फ़ैमिली ग्रुप में जगदीश का पूरा इक़रार खुला पड़ा था, हर किसी के फ़ोन में, और फिर भी कोई कमरे से नहीं निकला। जैसे उस सच को छूने से हर कोई डर रहा हो।

मानव अपने कमरे में चुप बैठा रहा। गोलू, थका हुआ, पर्दे के पीछे से देखता रहा। और आख़िर में, वो जो उठी, वो सांवी थी। शायद इसलिए कि इस घर में तनहाई का दर्द जितना वो जानती थी, उतना कोई और नहीं जानता था।

उसने वो पूरा संदेश, धीरे-धीरे, एक-एक शब्द पढ़ा। कोई कर्नल नहीं। एक अकेला डाकबाबू। जिसने पूरी उम्र दूसरों की चिट्ठियाँ पहुँचाईं, और अपनी एक भी नहीं लिख पाया। और जैसे-जैसे वो पढ़ती गई, उसका गला भरता गया।

"'मैंने वो कर्नल इसलिए गढ़ा, क्योंकि असली मैं इतना अकेला था कि किसी के सामने आने की हिम्मत नहीं थी'... ...हे भगवान। ...ये तो... ये तो बिल्कुल मेरी बात है। ...ये तो मैंने अपने बारे में लिखा होता, तो ऐसे ही लिखती।"

और वहीं, उस अकेली रात में, सांवी को एक बात समझ आई जो उसे पहले कभी नहीं आई थी। जिस पापा को वो हमेशा एक अकड़े हुए, ख़ामोश, बूढ़े आदमी के रूप में देखती आई थी, वो असल में उसी की तरह था। अकेला। डरा हुआ। और चुपके से, किसी अपने के लिए तरसता हुआ।

"मैं सोचती थी मैं इस घर में सबसे अकेली हूँ। ...पर पापा भी... पापा भी वही झेल रहे थे, बरसों से, बिना किसी को बताए। ...और मैं उन पर हँस नहीं सकती। ...क्योंकि जिस पर मैं हँसूँगी, वो मैं ख़ुद हूँ।"

और सांवी उठी, और उस दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी जिसके पीछे उसके पापा, अब तक, इस भरोसे में बैठे थे कि उनका सच सिर्फ़ एक इंसान तक पहुँचा है। उसने धीरे से खटखटाया, और दरवाज़ा खोला।

जगदीश ने अपनी बेटी का चेहरा देखा, उसकी भीगी आँखें देखीं, उसके हाथ में फ़ोन देखा, और एक ही पल में उसकी वो हल्की, थकी मुस्कान चूर हो गई। उसे समझ आ गया। वो संदेश सरिता तक नहीं पहुँचा था। वो घर के हर कोने तक पहुँच गया था।

"तुमने... तुमने पढ़ा? ...वो संदेश... वो सरिता के लिए था। ...वो कैसे... ग्रुप में? ...हे राम। ...पूरे परिवार ने पढ़ लिया? ...मानव ने भी? ...सबने?"

और जगदीश ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। साठ साल का एक आदमी, अपने बच्चों के सामने नंगा हो कर, उस सबसे बुरे पल का इंतज़ार करने लगा, जिसका उसे डर था। मज़ाक। तरस। वो हँसी जो कहती है, देखो, बूढ़ा आदमी, कर्नल बनने चला था।

"हँस लो, बेटा। ...तुम्हें पूरा हक़ है। ...एक बूढ़ा, रिटायर्ड डाकबाबू, नक़ली मेडल लगा कर, कर्नल बन कर, इस उम्र में इश्क़ लड़ाने चला था। ...इससे बड़ा मज़ाक क्या होगा? ...चलो, अच्छा है, आज घर को हँसने की एक वजह तो मिली।"

"पापा, रुकिए। ...मैं हँसने नहीं आई। ...मैं... मैं तो आपसे माफ़ी माँगने आई हूँ। ...मैं आपको हमेशा एक ठंडा, अकड़ा हुआ आदमी समझती रही। मुझे कभी नहीं दिखा कि आप कितने अकेले थे। ...जो आपने लिखा ना, पापा, वो मज़ाक नहीं है। वो... वो सबसे सच्ची बात है जो इस घर में बरसों से किसी ने नहीं कही।"

जगदीश ने चेहरे से हाथ हटाए, और अपनी बेटी को देखा, जो तरस से नहीं, समझ से, उसके पास बैठी थी। और उस पल, बरसों की वो दीवार, जो एक बाप और बेटी के बीच खड़ी रहती है, थोड़ी सी दरक गई।

"उसका नाम सरिता है। ...बहुत अच्छी औरत है, सांवी। हँसती है तो पूरा कमरा रौशन हो जाता है। ...बरसों बाद, उसके साथ बैठ कर, शाम की चाय अकेली नहीं लगी। ...पर मैं डर गया, बेटा। कि अगर उसे मेरा सच पता चला, तो वो चली जाएगी। ...इसलिए मैंने ख़ुद ही, पहले, सब तोड़ देने की कोशिश की।"

"कि सच जान कर वो चली जाएगी। ...इसलिए आपने पहले ख़ुद ही सब तोड़ दिया। ...पापा, ये डर मैं जानती हूँ। ...ये डर मैं बहुत अच्छे से जानती हूँ।"

"तू कैसे जानती है ये डर, बेटा? ...तू तो अभी जवान है। तेरे आगे तो पूरी ज़िंदगी है। ...ये तो बूढ़ों का डर है, सांवी। जब आदमी को लगे कि अब उसमें बचा ही क्या है जिससे किसी को प्यार हो।"

"जवान? ...पापा, तलाक़ के बाद जवानी भी बूढ़ी हो जाती है। ...जब पूरा मोहल्ला आपको 'बेचारी' कह कर देखे, जब हर रिश्ते वाला आपके साथ एक एहसान की तरह पेश आए, तो इंसान को लगने लगता है कि उसमें भी अब कुछ नहीं बचा जिससे कोई सच में प्यार करे। ...ये डर सिर्फ़ उम्र का नहीं होता, पापा। ये अकेलेपन का होता है। और अकेलापन उम्र नहीं देखता।"

और जगदीश, जिसने बरसों से अपनी बेटी के तलाक़ को सिर्फ़ एक 'हादसा' समझा था, जिसके बारे में घर में बात नहीं होती थी, आज पहली बार उस हादसे के पीछे का दर्द सुन रहा था। उसकी अपनी बेटी, उसी की तरह, अंदर ही अंदर, चुपचाप, अकेली थी। और वो, एक बाप हो कर, कभी उसका ये अकेलापन देख ही नहीं पाया।

और वहाँ, उस छोटे से कमरे में, दो लोग, एक बाप और एक बेटी, एक ही डर के दो किनारों पर खड़े थे, दोनों एक ही ऐप पर, दोनों एक ही झूठ के पीछे छुपे, और दोनों को इसका ज़रा भी अंदाज़ा नहीं। और दोनों की ज़बान पर, एक ही पल में, वही सच आ कर काँपने लगा।

"पापा, मैं... मुझे भी आपको एक बात बतानी है। ...मैं भी कभी-कभी... मैं भी बहुत अकेली हो जाती हूँ, और फिर... फिर मैंने भी एक... एक..."

"तू भी? ...तू भी क्या, बेटा? ...बोल ना। आज तेरे पापा ने अपना सबसे बड़ा झूठ तेरे सामने रख दिया है। ...आज तू भी कह दे। जो भी है।"

और सांवी की ज़बान पर वो सच आ कर रुक गया। मैं भी उसी ऐप पर हूँ, पापा। मैं काया हूँ। पर उसने देखा कि उसके पापा अभी-अभी कितने टूट कर बैठे हैं, और उसे लगा, आज नहीं। आज उनका दिन है। और जगदीश ने भी अपना सवाल निगल लिया, ये सोच कर कि शायद बच्ची बस भावुक हो रही है।

"...कुछ नहीं, पापा। ...बस इतना कि आप अकेले नहीं हैं। इस घर में जितना आप सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा लोग वही चीज़ छुपाए बैठे हैं जो आपने आज कह दी। ...आप सबसे बहादुर निकले, पापा। आपने कह दिया।"

दो लोग, जो उस एक पल में, अगर एक-दूसरे को अपना सच कह देते, तो पूरे घर की गुत्थी सुलझ जाती। पर डर ने दोनों के हाथ रोक लिए। और वो एक पल, जिसमें सब खुल सकता था, चुपचाप गुज़र गया। कभी-कभी सबसे बड़े राज़ इसलिए नहीं खुलते कि कोई झूठ बहुत मज़बूत होता है, बल्कि इसलिए कि प्यार में इंसान दूसरे का दिन ख़राब नहीं करना चाहता।

पर उस मुलाक़ात ने जगदीश के अंदर कुछ बदल दिया। उसने अपनी बेटी की आँखों में वो हिम्मत देखी, जो उसे सच कहने पर मिली थी, और उसने तय किया कि वो अपने सच को एक ग़लती से भेजे गए संदेश पर नहीं छोड़ेगा।

"सांवी, एक बात है। ...वो संदेश सरिता को नहीं पहुँचा। वो अब भी नहीं जानती कि मैं कोई कर्नल नहीं। ...और ये बात उसे किसी फ़ोन से, किसी संदेश से पता नहीं चलनी चाहिए। ...ये उसे मेरे मुँह से, मेरी आँखों में देख कर पता चलनी चाहिए। ...मैं जाऊँगा। आज। और उसे सामने से सब बता दूँगा।"

"हाँ पापा। जाइए। ...जो इंसान आपके सच के लायक़ है, उसे वो सच आपके मुँह से मिलना चाहिए, किसी स्क्रीन से नहीं। ...और अगर वो सच जान कर भी रुक जाए, तो समझिए, आपको वो मिल गया जो बहुत कम लोगों को मिलता है। कोई, जो आपको पूरा जानता हो, और फिर भी रहे।"

और वो अजीब मंज़र था। एक बेटी, जो ख़ुद अपना सच कहने से भाग रही थी, अपने पापा को ठीक वही बहादुरी सिखा रही थी जो वो अपने लिए नहीं जुटा पा रही थी। शायद हम दूसरों को हमेशा वही रास्ता दिखा पाते हैं, जिस पर ख़ुद चलने की हिम्मत नहीं होती।

और जगदीश उठा। इस बार उसने कोई पुराना ब्लेज़र नहीं निकाला। कोई नक़ली मेडल नहीं लगाया। बस एक साफ़, सादी क़मीज़ पहनी, और आईने में अपने आप को देखा, एक रिटायर्ड डाकबाबू को, पहली बार बिना किसी कवच के। और फिर, धड़कते दिल से, वो सरिता के घर की तरफ़ निकल पड़ा।

शाम ढल रही थी जब जगदीश सरिता के घर के दरवाज़े पर पहुँचा। उसके हाथ काँप रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे उस पहली मुलाक़ात में काँपे थे। पर इस बार डर झूठ पकड़े जाने का नहीं था। इस बार डर सच कह देने का था। और वो कहीं ज़्यादा गहरा डर था।

उसने एक लंबी साँस ली, अपने पूरे इक़रार को एक बार मन में दोहराया, और दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से क़दमों की आहट आई, और दरवाज़ा खुला। सामने सरिता खड़ी थी, हैरान।

"आप? ...कर्नल साहब? ...यहाँ, मेरे घर? ...आपने तो अचानक सब बंद कर दिया था। फ़ोन उठाना बंद, मिलना बंद। ...मैंने सोचा शायद मुझसे कोई ग़लती हो गई। ...अब अचानक, इस वक़्त?"

"सरिता जी, मुझसे नहीं, ग़लती मुझसे हुई। ...आपसे नहीं। ...मैं डर गया था, इसलिए भाग गया। पर भाग कर मैंने आपको भी दुख दिया, और ख़ुद को भी। ...और एक बूढ़ा आदमी जब भागता है ना, तो उसके पास इतना वक़्त नहीं होता कि दुबारा वापस आने में देर लगाए।"

"ये तो अच्छी बात कही आपने। ...चलिए, अंदर आइए। बाहर क्यों खड़े हैं? ...ठंड है, और मैंने अभी-अभी चाय भी बनाई है। ...जो भी कहना है, चाय के साथ कहिए। बरसों बाद तो हम दोनों ने साथ चाय पीना सीखा है।"

"नहीं, सरिता जी। ...अंदर आने से पहले, मुझे ये बात यहीं, दरवाज़े पर, कह देनी है। ...क्योंकि अगर मैं अंदर आ गया, आपकी चाय पी ली, आपकी हँसी देख ली, तो शायद मेरी हिम्मत फिर टूट जाए। ...सरिता जी, मैं दरअसल कोई कर्नल..."

और ठीक उसी पल, जब वो शब्द, कर्नल नहीं, उसके होंठों से निकलने ही वाला था, अंदर से एक जवान, गर्मजोश आवाज़ आई, जिसने जगदीश के पूरे वजूद को एक झटके में जमा दिया।

"माँ? ...दरवाज़े पर कौन है? ...खाना लग गया है, ठंडा हो रहा है। ...अंदर बुला लो ना, जो भी है।"

माँ। वो एक शब्द जगदीश के कानों में किसी घंटी की तरह गूँजा। और उसके पीछे, सरिता के कंधे के पार, एक नौजवान चलता हुआ दरवाज़े की तरफ़ आया। और जैसे ही उसका चेहरा रोशनी में आया, जगदीश का दिल एक पल को धड़कना भूल गया।

क्योंकि वो चेहरा जगदीश का जाना-पहचाना था। वो नौजवान, जो हर सुबह उनकी अपनी गली से गुज़रता था। जो रोज़ सांवी की बेकरी के काउंटर पर चाय पीता था। वही आदमी, जिसके पीछे, पिछले कुछ महीनों में, जगदीश ने अपनी बेटी की आँखों को चुपके-चुपके भटकते देखा था। अनिकेत।

"ये... ये तो... ये तो वही लड़का है। हमारी गली का। ...जो सांवी की दुकान पर... ...और ये आपको 'माँ' कह रहा है? ...सरिता जी, ये... ये आपका बेटा है?"

और उस एक पल में, जगदीश के सामने पूरा जाल खिंच गया, वो जाल जो अब तक किसी को पूरा नहीं दिखा था। जिस औरत से उसे इस उम्र में प्यार हुआ था, वो उसी लड़के की माँ थी, जिसके पीछे उसकी अपनी बेटी का दिल भटक रहा था। दो अकेले बूढ़े, दो अकेले जवान, और एक ही परिवार का जाल, जो अब उसकी आँखों के सामने कस रहा था।

"जी? ...आप ठीक हैं? ...आप माँ को जानते हैं क्या? ...और आप... रुकिए, आपका चेहरा भी कुछ जाना-पहचाना सा है। ...आप हमारी गली के आस-पास ही रहते हैं ना?"

और जगदीश वहीं, उस दरवाज़े पर, जड़ हो कर खड़ा रह गया। उसका पूरा इक़रार, कोई कर्नल नहीं, एक अकेला डाकबाबू, उसके होंठों पर आ कर पत्थर हो गया। एक तरफ़ वो औरत, जिसे वो अपना सच बताने आया था। और दूसरी तरफ़ उसका बेटा, जो अनजाने में, उसकी बेटी की ज़िंदगी में सबसे गहराई तक उतर चुका था। ...और अब जगदीश को समझ नहीं आ रहा था कि इस उलझे हुए जाल में, वो अपना कौन सा सच, पहले, किससे कहे।

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