Chapter 7 of 25 12 min read
जब सब टकराए
कैफ़े का जमा हुआ पल टूटता है और चार लोग एक साथ भागते हैं, हर कोई एक अलग सच से। जगदीश कर्नल का नक़ाब सँभाले, मेन्यू को ढाल बना कर अपनी ही बेटी सांवी की नज़र से भाग निकलता है, सरिता अपने बेटे अनिकेत से मुँह छुपा लेती है, और सांवी अनिकेत को अधूरा सच बता कर घबरा कर निकल जाती है। उधर इरा आठ बजे नक़ली मानव के इंतज़ार में आती है और स्टेज पर उसे बदमिज़ाज असली मानव मिल जाता है, और गोलू चार मोर्चों पर एक साथ आग बुझाता है। घर लौट कर सांवी काया बन कर अनिकेत को माफ़ी का मैसेज भेजती है, पर वो ग़लती से बेकरी वाले नंबर से, अपने असली नाम के साथ अनिकेत के पास पहुँच जाता है, और अनिकेत पहली बार 'सांवी' नाम पढ़ कर
कैफ़े ने एक पल और साँस रोकी, फिर वक़्त फिर से चल पड़ा। और उस एक पल में चार लोग एक साथ हिले, हर कोई एक अलग सच से भागता हुआ। जगदीश का हाथ, सरिता के हाथ से बस एक इंच दूर, ऐसे पीछे खिंचा जैसे आग को छू लिया हो। उसकी बेटी। कमरे के उस पार। सांवी। यहाँ। और अगर उसने नज़र उठाई, तो अपने पापा को एक कर्नल की वर्दी में देख लेती, एक ऐसे कर्नल में जो वो कभी था ही नहीं।
"नहीं नहीं नहीं... सांवी यहाँ? इसी कैफ़े में? अगर इसने मुझे देख लिया... कर्नल रणविजय बने हुए... हे भगवान, आज तो डूब गया।"
उसने वो पहले शब्द पकड़े जो उसकी घबराहट को मिले, और उन्हें सरिता के सामने ऐसे रखा जैसे कोई डूबता आदमी तिनका रखता है।
"सरिता जी, माफ़ कीजिए... मुझे अचानक एक ज़रूरी फ़ोन आ गया है। रेजिमेंट का पुराना साथी है। बहुत सालों बाद। मैं बस दो मिनट में लौटा। आप... आप बैठिए, चाय ठंडी मत होने दीजिए।"
सरिता ने पलक झपकाई। अभी एक पल पहले ये कर्नल उसका हाथ थामने बढ़ रहा था, किसी भी सिपाही से ज़्यादा नरम। और अगले ही पल वो खड़ा था, चेहरा घुमाए, जल्दी में।
"कर्नल साहब? ...अभी तो आप कुछ कहने वाले थे। ...ठीक है, जाइए, फ़ोन ज़रूरी होगा। मैं यहीं हूँ। कहीं नहीं जा रही।"
और इस तरह कर्नल रणविजय ने अपनी काल्पनिक ज़िंदगी का सबसे बहादुर पैंतरा चला, पूरी पीछे हटाई। ठुड्डी छाती में दबी, मेन्यू का कार्ड चेहरे के बग़ल में एक ढाल की तरह उठाए, मेज़ों के बीच से मार्च करता हुआ, उस बेटी से दूर जिसने अब तक सिर उठाया ही नहीं था। साठ साल का एक आदमी, पंद्रह बरस बाद पहली बार किसी से प्यार करता हुआ, और उसी प्यार से भागता हुआ, क्योंकि खुल कर प्यार करना उसे अपनी ही औलाद के सामने उसकी आख़िरी बची इज़्ज़त की क़ीमत लग रहा था। वो वॉशरूम के पास रखे एक गमले के पीछे दुबक गया, और वहाँ से अपनी बेटी को कमरे के उस पार झाँकने लगा। एक पल को कर्नल गायब हो गया, और एक फ़िक्रमंद बाप जाग गया, जो ये सोच रहा था कि उसकी बच्ची यहाँ, इस वक़्त, किसके साथ बैठी है।
"ये लड़की यहाँ किसके साथ है? ...और मुझे बताया भी नहीं। ...नहीं जगदीश, अभी बाप मत बन। अभी भगोड़ा बन। बाप बाद में बनेगा, जब ये वर्दी उतरेगी।"
पर सरिता अब उस भागते कर्नल को देख ही नहीं रही थी। उसकी अपनी नज़र दरवाज़े पर अटक गई थी। क्योंकि वहाँ, अंदर आता हुआ, बिल्कुल साफ़, उसका अपना बेटा खड़ा था।
"अनिकेत... मेरा बेटा... यहाँ? इसी कैफ़े में? ...अगर इसने मुझे उस अजनबी कर्नल के साथ बैठे देख लिया, तो सौ सवाल करेगा। माँ, आप किसके साथ थीं? ...हे राम।"
एक माँ का सबसे पुराना रिफ़्लेक्स, शर्म से भी पुराना। उसने चेहरा दीवार की तरफ़ घुमा लिया, पल्लू थोड़ा ऊपर किया, और उस एक इंसान की नज़रों से ओझल हो गई जिसे उसने ही हमेशा उसे ढूँढ लेना सिखाया था। उसे नहीं पता था, पता हो भी नहीं सकता था, कि उसका बेटा जिस लड़की से मिलने अंदर आया है, वो वही लड़की है जिससे अभी वो नक़ली कर्नल भाग खड़ा हुआ। और वो नक़ली कर्नल उसी लड़की का पिता है। उस कमरे में किसी को भी पूरी तस्वीर नहीं दिख रही थी। सिर्फ़ हमें दिख रही थी। चलिए, साफ़ कह देते हैं, क्योंकि वो चारों नहीं कह सकते। अनिकेत सरिता का बेटा है। सरिता जगदीश पर रीझ रही है। जगदीश सांवी का पिता है। और सांवी अनिकेत पर मर मिटी है। एक परिवार दूसरे परिवार को चाह रहा था, माँ और बेटा, बाप और बेटी, एक ऐसी गाँठ में उलझे कि चारों में से एक को भी वो गाँठ नहीं दिख रही थी, और ये सब एक बैठक-भर बड़े कैफ़े के अंदर। उसी छोटे से कमरे के उस पार, सांवी का सच अभी भी उसके होंठों पर काँप रहा था, आधा कहा हुआ, तभी उसने अनिकेत को उठते देखा, उसकी आँखें उसके पीछे किसी चीज़ पर टिकी हुई थीं।
"काया जी, एक... एक मिनट। वो सामने... मुझे लगा जैसे मेरी माँ बैठी हैं। पर वो यहाँ कैसे... रुकिए, मैं अभी देख कर आता हूँ। आप कहीं मत जाइएगा, प्लीज़।"
और सांवी, जो अभी एक साँस भर दूर थी सब कुछ कह देने से, महसूस किया कि उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई है। वो बँट गया था। पल टूट गया था। और एक घिरा हुआ जानवर खुला दरवाज़ा पहचान ही लेता है।
"अनिकेत जी, मुझे... मुझे भी अभी जाना होगा। अचानक याद आया। माफ़ करना, प्लीज़ बुरा मत मानना। मैं... मैं फ़ोन करती हूँ, पक्का। बस अभी नहीं।"
"काया जी, रुकिए तो! आप जा क्यों रही हैं? मैंने कुछ ग़लत कह दिया? ...अरे, बस दो मिनट। एक साथ चाय भी नहीं ख़त्म हुई।"
"नहीं, आपने कुछ ग़लत नहीं कहा। आपने सब कुछ सही कहा। बस मैं ही ग़लत हूँ, अनिकेत जी। और वो आपको एक दिन समझ आएगा। ...बस आज नहीं।"
पर वो जा चुकी थी, सिर झुकाए, उन्हीं मेज़ों के बीच से बुनती हुई जिनसे एक मिनट पहले उसका पिता मार्च करके निकला था। दो लोग एक ही कमरे से, उल्टी दिशाओं में भागते हुए, और एक बार भी एक-दूसरे को न देखते हुए। और अनिकेत दो ग़ायब होते चेहरों के बीच अकेला खड़ा रह गया। एक माँ, जो दीवार के पास धुएँ में बदल गई थी। और एक औरत, काया, जिसका चेहरा वो क़सम खा कर कह सकता था कि उसने सौ बार देखा है, हर सुबह, अपनी चाय की प्याली उँडेलते हुए। और बाहर, ठंडे शीशे से चिपका, गोलू अपनी पूरी योजना को चार मोर्चों पर एक साथ फटते देख रहा था, और उस सेनापति का हिसाब लगा रहा था जो हर तरफ़ से हार रहा हो। पापा एक मेन्यू को युद्ध की ढाल की तरह पकड़े वॉशरूम की तरफ़ तेज़ चल रहे थे। सरिता आंटी दीवार की तरफ़ मुँह किए मूरत बन गई थीं। काया, जो गोलू को अब लगभग यक़ीन था कि उसकी अपनी बुआ है, बग़ल वाले दरवाज़े से भाग रही थी। और स्टेज के पास, एक चौथी आफ़त एक ऑटो से हैंडबैग और गुस्सा लिए उतर रही थी। इरा। ठीक आठ बजे, जैसा 'मानव' ने कहा था। उस दिलकश आदमी से मिलने आई थी जो एक हफ़्ते से उसके फ़ोन पर शायरी लिख रहा था। पर इरा को मिला क्या। कैफ़े के छोटे से स्टेज पर, एक माइक में बुदबुदाता, साढ़े नौ ऊबे हुए लोगों के सामने खड़ा, वो सबसे बदमिज़ाज आदमी जो उसकी ज़िंदगी में मिला था। वही आदमी जो दो बार उसकी मेज़ छीन चुका था। चिड़चिड़ा। असली। मानव। वो पीछे खड़ी रही, बाँहें बाँधे, और उसे एक चुटकुला फिसलते हुए देखा। और उसके दिमाग़ में कोई हिसाब जुड़ने से इनकार कर रहा था। स्टेज पर ये उदास, काँटेदार आदमी, और फ़ोन पर वो गर्म, मज़ाकिया आदमी, एक ही नाम पहने हुए। मानव चतुर्वेदी। दो आदमी। एक नाम। और इरा को वो चीज़ें बर्दाश्त नहीं थीं जिनका हिसाब न जुड़े। गोलू ने, भगवान उसकी थकी हुई आत्मा को सलामत रखे, रात का सबसे बहादुर झूठ चुना। उसने इरा को, मानव बन कर, बस एक लाइन भेजी। आज नहीं आ पाऊँगा, इमरजेंसी है, बहुत माफ़ी। और इरा ने, फ़ोन बजते ही, स्क्रीन से नज़र उठा कर स्टेज पर खड़े उस चिड़चिड़े आदमी को देखा, और उसकी त्योरी और गहरी हो गई। एक ऐसी गहराई में, जो किसी बात को याद रख लेती है, बाद के लिए। इरा को धोखा देना आसान नहीं था। किसी को भी नहीं। और इस पूरे तूफ़ान के बीचोंबीच, एक कोने की मेज़ पर, सरिता अकेली बैठी रही। सामने दो प्यालियाँ, दोनों ठंडी। एक उसकी, एक उस कर्नल की जो 'दो मिनट' कह कर गया था और लौटा नहीं।
"चला गया। ...चलो, यही सही। ऐसे मर्द मैंने पहले भी देखे हैं, जो पास आते-आते डर जाते हैं। ...पर इसकी आँखों में डर नहीं, कुछ और था। जैसे वो मुझसे नहीं, अपने आप से भाग रहा हो।"
और उधर पीछे के दरवाज़े से, गमले की ओट से, अपनी वर्दी में सिमटा एक अकेला आदमी बाहर की अँधेरी गली में निकल गया, ये सोचते हुए कि उसने अपनी बेटी को तो बचा लिया, पर जिस औरत के लिए वो सज-धज कर आया था, उसे एक ठंडी चाय के सामने अकेला छोड़ आया। दोनों बचाव, एक ही साँस में, एक ही हार। बीस मिनट बाद। सांवी एक खड़खड़ाते ऑटो में बैठी थी, शहर की बत्तियाँ खिड़की से लकीरें बनती हुई गुज़र रही थीं, और उसका दिल अभी भी धड़क रहा था। वो भाग आई थी। फिर से। ठीक उस पल जब वो बोलने भर की हिम्मत जुटा चुकी थी।
"कायर हूँ मैं। बस कायर। इतने दिनों बाद कोई अच्छा मिला, और मैं भाग आई। वो क्या सोचेगा? कि काया पागल है। कि काया कुछ छुपा रही है। ...और छुपा तो रही ही हूँ।"
दो साल पहले एक शादी टूटी थी, और उसके साथ ये यक़ीन भी कि वो चुने जाने के लायक़ है। अनिकेत पहला इंसान था जिसने उसे ये बात भुला दी थी। और वो उसे एक कैफ़े में अकेला छोड़ आई थी, दो बार, बिना उसे ये भी जताए। तो उसने वो इकलौता बहादुरी का काम किया जो अब बचा था। उसने माफ़ी माँगने के लिए चैट खोली, एक सच्ची माफ़ी, काया की तरफ़ से अनिकेत के लिए। उँगलियाँ काँप रही थीं। ऑटो हिचकोले खा रहा था। स्क्रीन छोटी थी।
"अनिकेत, आज कैफ़े से अचानक भाग जाने की माफ़ी। मैं डर गई थी। तुमसे नहीं, अपने आप से। तुम अच्छे हो। बहुत अच्छे। और शायद इसीलिए मैं डरती हूँ, कि कहीं इतनी अच्छी चीज़ मेरे लायक़ न हो। ...काया।"
उसने वो शब्द छोटे से बॉक्स में लिखे, और भेजो दबाया, और फटी हुई सीट पर सिर टिका कर वो साँस छोड़ी जो उसे लगा जैसे दो साल से रोक रखी थी। पर एक हिलते ऑटो में, छोटी स्क्रीन पर, काँपते हाथ की एक बात होती है। उसके फ़ोन में दो अनिकेत थे। एक परफेक्ट रिश्ता की चैट में, जहाँ वो काया थी। और एक बेकरी का सेव किया हुआ नंबर, महीनों पुराना, 'अनिकेत, चाय, रोज़ सुबह', वो नियमित ग्राहक जो एक सुबह भी नहीं चूकता था। और वो मैसेज, वो नरम, नंगा, सच्चा मैसेज, काया की चैट में नहीं गया। वो बेकरी की चैट में गया। सांवी के अपने नंबर से। एक ऐसे नाम के साथ जो अनिकेत को कभी दिया ही नहीं गया था। अनिकेत, घर लौट कर, अभी भी उस अजीब शाम को उलट-पुलट कर रहा था, तभी उसका फ़ोन बजा। उसने नीचे देखा। बेकरी के नंबर से एक मैसेज। उसी औरत से जो हर सुबह उसकी चाय उँडेलती थी और 'और कुछ?' से ज़्यादा कभी कुछ नहीं कहती थी।
"बेकरी वाली दीदी का मैसेज? इस वक़्त? ...कैफ़े से भाग जाने की माफ़ी? ...पर वो तो कैफ़े में थीं ही नहीं। वहाँ तो काया थी।"
उसने एक ऐसे कैफ़े से भाग जाने की माफ़ी पढ़ी जिससे उसने एक घंटा पहले काया नाम की एक औरत को भागते देखा था। उसने 'डर' शब्द पढ़ा। उसने 'अच्छे' शब्द पढ़ा। और सबसे नीचे, एक छोटा सा नाम, जो काया नहीं था।
"...सांवी।"
अनिकेत बहुत देर तक हिला नहीं। बेकरी वाली दीदी। सुबह की चाय। कैफ़े की मेज़ के उस पार वो जाना-पहचाना चेहरा। काया। सांवी। दो नाम जिन्हें उसके दिमाग़ ने दो अलग कमरों में रखा था, और अब उन दोनों के बीच का एक दरवाज़ा धीरे से खुल गया था।
"सांवी... तुम... तुम ही काया हो? वो चाय वाली मुस्कान... और ये फ़ोन वाली हँसी... एक ही हैं?"
और तभी बग़ल के कमरे से एक हल्की सी नींद भरी आवाज़ आई, एक बच्ची की, और अनिकेत की नज़र एक पल को उस बंद दरवाज़े पर टिक गई, जिसके पीछे उसकी अपनी सबसे बड़ी सच्चाई सो रही थी। एक छोटी सी बच्ची, जिसका ज़िक्र उसने काया से आज तक नहीं किया था।
"मैं भी तो एक नाम छुपाए बैठा हूँ, सांवी। मेरा भी एक कमरा है, जो मैं किसी को नहीं दिखाता। ...तो शायद मैं तुम्हें दोष कैसे दूँ।"
उसने जवाब नहीं भेजा। उसने बस फ़ोन थामे रखा, और वो नाम एक बार फिर अपने कमरे के सन्नाटे में कहा, एक ऐसा नाम जो उसे कभी मिलना ही नहीं था। और कहीं दूर, कानपुर के उस पार, एक औरत जो समझ रही थी कि उसने आख़िरकार सही शब्द सही आदमी को भेज दिए हैं, उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उसने अभी-अभी सबसे सच्चे शब्द सबसे ख़तरनाक चैट में भेज दिए हैं।
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