अध्याय 11 / 25 पढ़ने में 12 मिनट
जाल में जाल
शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi
मानव का जाल दादी पुष्पा को ऐन मैसेज लिखते हुए पकड़ने ही वाला होता है कि गोलू एक बेतुके, बहादुर हाथ से बीच में कूद पड़ता है, दादी को लॉग आउट कर के, और दादी को बचाने के लिए सारा इल्ज़ाम अपने ऊपर ले लेता है, कि नक़ली मानव उसने बनाया था। मानव का सारा शक अब गोलू पर आ टिकता है, और घर का थका हुआ राज़दार एक और भारी बोझ अपने कंधों पर उठा लेता है। उधर सांवी आख़िरकार हिम्मत जुटा कर तय करती है कि वो दो औरतें बन कर और नहीं जिएगी, और गोलू के हौसले के साथ वो काया बन कर अनिकेत से मिल कर पूरा सच कहने निकलती है। और जब वो मिलने की जगह पर पहुँचती है, तो काया का इंतज़ार करता जो आदमी उठ कर खड़ा होता है, वो अनिकेत ह
मानव का वो मैसेज रात के अँधेरे में उड़ चला, कैफ़े से घर की तरफ़, उस अकाउंट की तरफ़ जहाँ उसका जवाब, बिना जाने, पहले से बैठा हुआ था। और उसी पल, चतुर्वेदी घर की ऊपर वाली मंज़िल पर, एक बूढ़ी औरत, पलंग पर बैठी, अपनी नीली नोटबुक खोले, इरा के लिए रात वाला एक प्यारा मैसेज टाइप कर रही थी। ऑनलाइन। जागी हुई। जाल के ठीक बीचोंबीच। और उधर कैफ़े में, इरा की स्क्रीन पर, ठीक वैसा ही हुआ जैसा मानव ने कहा था। मानव के असली अकाउंट का मैसेज आया, और उसी पल, दूसरी चैट में, नक़ली मानव के नाम के नीचे हरा निशान जल उठा। ऑनलाइन। लिख रहा है।
"वो ऑनलाइन है! देखो, इरा, देखो! अभी, इसी वक़्त, कोई मुझ बन कर लिख रहा है! और मैं यहाँ हूँ, कैफ़े में। मतलब वो घर में है। मेरे अपने घर में, अभी! ...मैं जा रहा हूँ। अभी के अभी। आज मैं उसे रंगे हाथ पकड़ूँगा!"
और मानव भाग खड़ा हुआ, कैफ़े की कुर्सी गिराता हुआ, सड़क पर एक ऑटो को हाथ देता हुआ, अपने ही घर की तरफ़, अपने ही नक़ली रूप को पकड़ने। शिकारी आख़िरकार शिकार के इतने पास आ गया था कि साँसों की दूरी रह गई थी। पर उस घर का अपना एक रखवाला था। और उस रखवाले के फ़ोन पर, ठीक उसी पल, एक चेतावनी चमकी, जो गोलू ने ख़ुद कभी सुरक्षा के लिए लगाई थी। मानव चतुर्वेदी अकाउंट, एक साथ दो जगह से इस्तेमाल हो रहा है। गोलू की नींद एक झटके में उड़ गई।
"दो जगह से? मतलब मानव चाचा ने भी लॉग-इन कर लिया, और दादी भी अंदर हैं! अगर मानव चाचा ने अभी लॉगिन हिस्ट्री देखी, तो सीधा घर का पता आ जाएगा! ...दादी! दादी को अभी बाहर निकालना होगा!"
और गोलू, बिना चप्पल, बिना साँस, अपने कमरे से निकल कर सीढ़ियाँ फाँदता, दादी के कमरे की तरफ़ भागा। एक सोलह साल का लड़का, आधी रात, तीन झूठों के इस पूरे महल को गिरने से बचाने के लिए, एक आख़िरी बार दौड़ता हुआ। रास्ते में उसका पैर एक कुर्सी से टकराया, अँगूठा चटका, और एक चीख उसके गले में ही घुट कर रह गई, क्योंकि आवाज़ करना ख़तरे को बुला लेना था। दाँत भींचे, आँख में पानी लिए, वो लँगड़ाता हुआ भी दौड़ता रहा। पूरे घर की क़िस्मत, आधी रात, एक नंगे पाँव, चटके अँगूठे वाले लड़के के भरोसे थी। उसने दादी के कमरे का दरवाज़ा धक्के से खोला। दादी पलंग पर बैठी, चश्मा नाक पर टिकाए, बड़े इत्मीनान से इरा के लिए एक शायरी लिख रही थीं, इस बात से बिल्कुल बेख़बर कि उनका पोता उन्हें फाँसी के तख़्ते से खींच रहा है।
"दादी, फ़ोन दीजिए! अभी! कोई सवाल नहीं, बस दीजिए! मानव चाचा को पता चल गया, वो आ रहे हैं, इसी वक़्त! आप ऑनलाइन हैं और वो देख रहे हैं! लॉग आउट, लॉग आउट, लॉग आउट!"
और इससे पहले कि दादी कुछ समझतीं, गोलू ने फ़ोन झपटा, अकाउंट लॉग आउट किया, वाई-फ़ाई का राउटर स्विच-बोर्ड से खींच कर बंद किया, और पूरे घर को एक झटके में इंटरनेट के अँधेरे में डुबो दिया। नक़ली मानव, जो अभी एक पल पहले ऑनलाइन, जागा हुआ, लिख रहा था, अचानक ग़ायब हो गया। जैसे कभी था ही नहीं। और ठीक उसी पल, नीचे, घर का दरवाज़ा ज़ोर से खुला। मानव, हाँफता हुआ, पसीने में, आँखों में एक शिकारी की चमक लिए अंदर घुसा। वो सीधे ऊपर की तरफ़ लपका, उस कमरे की तरफ़ जहाँ से अभी-अभी वो हरा निशान जल रहा था।
"कौन है? कौन अभी ऑनलाइन था? मैंने अपनी आँखों से देखा, अभी, इसी वक़्त, कोई मुझ बन कर लिख रहा था! सामने आओ! आज मैं इस नक़ली मानव को देख कर रहूँगा!"
और गोलू, दादी के कमरे के दरवाज़े पर, बाहर निकल आया, पीछे दरवाज़ा खींचते हुए, ताकि दादी और वो नीली नोटबुक ओट में रहें। उसका दिल धड़क रहा था। उसके पास एक ही रास्ता था। और वो रास्ता उसे बहुत महँगा पड़ने वाला था।
"रुको, चाचा। ...ऊपर मत जाओ। ...वो नक़ली मानव... वो मैं था।"
मानव एक झटके में रुक गया। उसका उठा हुआ हाथ हवा में जम गया। वो अपने सोलह साल के भतीजे को घूरता रह गया, जो सीढ़ियों की मद्धम रोशनी में, सिर झुकाए, काँपता हुआ खड़ा था।
"तू? ...गोलू, तू मज़ाक कर रहा है। तू... तूने मेरी फ़ोटो लगा कर, मेरे नाम से, एक लड़की से बात की? एक हफ़्ते तक? ...क्यों? किसलिए?"
"मैं... मुझे कोडिंग सीखनी थी, चाचा। ऐप कैसे काम करते हैं, चैट कैसे चलते हैं। तो मैंने एक टेस्ट प्रोफ़ाइल बनाई, और... और आपकी फ़ोटो लगा दी, बस मज़ाक में। फिर वो इरा आ गई, और मैं डर गया कि सच बताऊँ तो सब बिगड़ जाएगा। ...ग़लती हो गई, चाचा। बहुत बड़ी ग़लती। मैं अभी डिलीट कर देता हूँ।"
"दिखा। अभी, इसी वक़्त, अपने फ़ोन में वो प्रोफ़ाइल खोल कर दिखा। अगर सच में तूने बनाई है, तो वो तेरे फ़ोन में लॉग-इन होगी। दिखा मुझे।"
और यहीं गोलू की सारी रातों की मेहनत काम आई। उस पागल दौड़ के बीच, फ़ोन झपटते ही, उसने अकाउंट दादी के फ़ोन से लॉग आउट कर के अपने फ़ोन में डाल लिया था। तो अब, जब उसने अपना फ़ोन खोला, तो नक़ली मानव सच में उसी के फ़ोन में बैठा था। सबूत अब साफ़-साफ़ उसी की तरफ़ इशारा कर रहा था। बिल्कुल जैसा उसने चाहा था।
"ये देखो, चाचा। मेरे फ़ोन में। मानव चतुर्वेदी। मैंने ही बनाई थी। ...और अब, आपके सामने, मैं इसे डिलीट कर रहा हूँ। हमेशा के लिए। ...लो, ख़त्म। अब कोई नक़ली मानव नहीं।"
और मानव का सारा गुस्सा, सारा शक, सारी वो रातों की तफ़्तीश, सब उस एक झुके हुए सोलह साल के लड़के पर आ कर टिक गई। वो सच जो पूरे घर में बँटा हुआ था, अब अकेले गोलू के कंधों पर आ गिरा। और दरवाज़े के पीछे, ओट में खड़ी एक बूढ़ी औरत ने ये सब सुना, और उसकी आँखें भर आईं।
"गोलू... तुझसे ये उम्मीद नहीं थी। ...पता है तूने क्या किया? एक लड़की ने उस नक़ली मानव से प्यार करना शुरू कर दिया था। असली भावनाएँ, एक नक़ली आदमी के लिए। ...जा। डिलीट कर वो प्रोफ़ाइल। और आज के बाद ये शक्ल मुझे किसी स्क्रीन पर न दिखे। समझा?"
"जी, चाचा। ...माफ़ कर दीजिए।"
और मानव, थका हुआ, ठगा हुआ, अपने कमरे में चला गया। और गोलू वहीं खड़ा रह गया, अँधेरी सीढ़ियों पर, अपने चाचा की नज़रों में गिर कर, एक ऐसे जुर्म का बोझ उठाए जो उसका था ही नहीं। घर का सबसे छोटा इंसान, एक बार फिर, सबसे भारी राज़ अकेले ढो रहा था। और पीछे से, दादी ने धीरे से उसके सिर पर हाथ रखा, बिना कुछ कहे। कुछ शुक्रिया शब्दों से बड़े होते हैं। और उस रात के बाद, एक नई सुबह आई, और उस सुबह एक और तरह की हिम्मत जाग रही थी। बेकरी के पीछे वाले छोटे से कमरे में, सांवी आईने के सामने खड़ी थी, और अपने आप से एक बहुत पुरानी लड़ाई लड़ रही थी। वो थक गई थी। दो औरतें बन कर जीते-जीते थक गई थी। एक काया, जो फ़ोन पर हँसती थी, बहादुर थी, चाही जाती थी। और एक सांवी, जो काउंटर के पीछे छुपती थी, डरती थी, जिस पर लोग तरस खाते थे। और उसे अब एहसास हो गया था कि जिस आदमी को वो चाहती है, अनिकेत, वो दोनों में से किसी एक को नहीं, दोनों को एक साथ चाहिए। और तभी, दरवाज़े पर एक थका हुआ, आँखों के नीचे स्याह हलक़े लिए, सोलह साल का लड़का आ खड़ा हुआ। गोलू, जो कल रात एक झूठ का पूरा पहाड़ अपने कंधों पर उठा चुका था, अब अपनी बुआ के लिए हिम्मत की एक पर्ची ले कर आया था।
"बुआ, मैं जानता हूँ। मैंने ही तो आपकी काया वाली प्रोफ़ाइल बनाई थी। और मैं देख रहा हूँ, आप कब से घुट रही हैं। ...बुआ, एक बात कहूँ? इस घर में सब झूठ के पीछे छुपे हैं। पापा, दादी, आप। और मैं थक गया हूँ सबका राज़ छुपाते-छुपाते। ...कोई तो एक हो, जो सच कह दे। आप कर सकती हैं, बुआ।"
"और अगर वो मुझे ठुकरा दे, गोलू? अगर वो जान जाए कि काया एक तलाक़शुदा औरत है, जो एक नक़ली नाम के पीछे छुपी थी, और मुँह फेर ले? ...तब? मैं फिर से टूट जाऊँगी। इस बार शायद जुड़ न पाऊँ।"
"बुआ, अगर वो सच जान कर मुँह फेर लेता है, तो वो आपके लायक़ था ही नहीं। और अगर वो सच जान कर भी रुक जाता है... तो सोचिए, ज़िंदगी में पहली बार कोई आपको पूरा जानेगा, और फिर भी रहेगा। ...ये मौक़ा छोड़ोगी बुआ? सिर्फ़ डर के मारे?"
और सांवी ने अपने भतीजे को देखा, जो रात भर का जागा हुआ, सबके झूठ का बोझ उठाए, फिर भी उसे सच की तरफ़ धकेल रहा था। और उसकी आँखों में एक चीज़ जाग उठी, जो दो साल से सोई हुई थी। हिम्मत।
"ठीक है। ...ठीक है, गोलू। आज। आज मैं अनिकेत को सब बता दूँगी। काया, सांवी, तलाक़, सब। एक ही बार में, एक ही साँस में। और फिर जो होगा, देखा जाएगा। ...बस तू मेरे लिए एक जगह तय कर दे। कोई शांत जगह।"
"अच्छा, सुन, मैं एक बार बोल कर देखती हूँ। ...अनिकेत जी, मेरा नाम काया नहीं है। मैं... मैं दरअसल वो बेकरी वाली... नहीं, ऐसे नहीं। ...अनिकेत, मैं तलाक़शुदा हूँ और मैंने तुमसे झूठ बोला और... हे भगवान, गोलू, ये तो और उलझ गया।"
"बुआ, इतना मत सोचो। इतनी सफ़ाई मत दो। ...बस उसकी आँखों में देखना, और कहना, 'मेरा असली नाम सांवी है, और मुझे तुमसे सच छुपाते हुए थक गई हूँ'। बस। बाक़ी सब उसे ख़ुद समझ आ जाएगा। सच में सफ़ाई नहीं होती, बुआ। सच में बस सच होता है।"
"मेरा असली नाम सांवी है, और मैं तुमसे सच छुपाते हुए थक गई हूँ। ...हाँ। ...हाँ, ये सही लगा। ...तू सोलह का है, गोलू, पर बात सत्तर साल के इंसान जैसी करता है।"
और गोलू ने, अपने फ़ोन से, काया बन कर, अनिकेत को एक आख़िरी मैसेज भेजा। इस बार सही चैट में। इस बार सही आदमी को। शाम को, नदी किनारे वाले उस पुराने रेस्तराँ में, जहाँ बत्तियाँ पानी पर काँपती हैं। काया तुमसे मिलना चाहती है। और इस बार कुछ कहना चाहती है, जो बहुत दिनों से रुका हुआ है। और शाम आई। नदी किनारे, बत्तियाँ पानी पर सोने की लकीरें बना रही थीं। सांवी दरवाज़े पर रुकी, एक पल को। उसके सीने में दिल किसी ढोल की तरह बज रहा था। हाथ में एक छोटा सा पर्स, और उसके अंदर, दो साल से रुका हुआ एक पूरा सच।
"बस सांवी। आज नहीं भागना। आज नहीं। अंदर जा, और कह दे। काया मैं हूँ। और सांवी भी मैं हूँ। ...बस एक बार, अपने आप को पूरा दिखा दे।"
और उसने गहरी साँस ली, और अंदर क़दम रखा। रेस्तराँ की नरम रोशनी में उसकी नज़रें उस मेज़ को ढूँढने लगीं जो काया के लिए रखी थी, नदी के ठीक सामने वाली। हर क़दम भारी था, जैसे वो दो साल की चुप्पी को अपने साथ घसीट कर ला रही हो। उसने मन में गोलू की सिखाई लाइन दोहराई, एक बार, दो बार। मेरा असली नाम सांवी है। इतना ही कहना है। बस इतना सा सच, और फिर वो पहली बार अपनी पूरी तरह किसी के सामने खड़ी होगी, बिना किसी नक़ाब के। और वहाँ, उस कोने की मेज़ पर, नदी की काँपती रोशनी के सामने, उसे देख कर एक आदमी उठ खड़ा हुआ। काया का इंतज़ार करता हुआ। और सांवी की साँस रुक गई। क्योंकि वो आदमी अजनबी नहीं था। वो कंधे जाने-पहचाने थे। वो खड़े होने का तरीक़ा जाना-पहचाना था। वो अनिकेत था। उसकी गली का चाय वाला। उसकी बेकरी का रोज़ का ग्राहक। और उसका काया वाला मैच। उसकी दोनों दुनियाएँ, जिन्हें उसने महीनों दो अलग कमरों में बंद रखा था, अब एक ही इंसान बन कर, नदी की काँपती रोशनी में, उसके सामने खड़ी थीं। और उस एक पल में सांवी समझ गई कि आज भागने की कोई जगह नहीं बची। काया और सांवी, दोनों को आज एक साथ, इसी आदमी के सामने, सच बोलना होगा। और अनिकेत अभी पूरी तरह मुड़ा भी नहीं था। बस आधा घूमा हुआ, उसकी परछाईं पानी की रोशनी में काँपती हुई, एक ऐसे नाम का इंतज़ार करता हुआ जो अब झूठ नहीं रह सकता था। सांवी वहीं ठहर गई, दरवाज़े और मेज़ के बीच, अपने दो नामों के बीच, अपने पूरे सच के एक क़दम पहले। ...और अनिकेत मुड़ने लगा।
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