अध्याय 17 / 25 पढ़ने में 11 मिनट
इरा जानती है
शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi
इरा मानव को बता देती है कि उसने कई हफ़्ते पहले ही ताड़ लिया था कि उसके नाम से इश्क़ लड़ाने वाला कोई नौजवान नहीं, बल्कि उसकी दादी पुष्पा थीं, और ग़ुस्सा होने के बजाय उसे वो कोशिश प्यारी लगी और वो असली, बदमिज़ाज मानव पर रीझ गई है, घर का पहला सच्चा रिश्ता। इरा के धकेलने पर मानव घर लौट कर दादी को पकड़ता है, और पुष्पा अपने अकेलेपन का सच खोलते हुए बता देती हैं कि पापा और दीदी भी उसी ऐप पर हैं, फिर काँपती उँगली से अपनी जासूसी कॉपी में एक लाइन दिखाती हैं, ऐप ने 'कर्नल रणविजय' और 'काया' को अट्ठानवे प्रतिशत का मैच बताया है और घर में किसी ने पहले ही 'रुचि है' पर टैप कर दिया है।
मानव उस मेज़ पर जड़ बैठा था। उसने अपना सबसे बड़ा राज़ खोलने की हिम्मत जुटाई थी, और इरा ने उसे बीच में ही रोक कर वो चार शब्द कह दिए थे, जो अब भी हवा में लटके थे। वो गोलू नहीं था। इरा बड़े इत्मीनान से अपने प्याले पर उँगली घुमा रही थी, जैसे शतरंज की एक चाल जीत कर बैठी हो।
"गोलू नहीं था? ...तो फिर कौन था, इरा? ...मेरे उस घर में और कौन बैठा है जो मेरी शक्ल लगा कर, मेरे नाम से, तुमसे... इश्क़ लड़ा रहा था? ...बोलो न, मेरा सिर घूम रहा है।"
"मानव, एक बात बताऊँ? ...जो 'मानव' मुझसे हर रात शायरी करता था, वो कोई नौजवान लड़का था ही नहीं। ...मैंने ये बात हफ़्तों पहले पकड़ ली थी। ...बस तुम्हारे मुँह से सुनना चाहती थी कि तुम कब तक अनजान बने रहते हो।"
"नौजवान नहीं था? ...इरा, वो मैं ही तो होना चाहिए था। मेरी फ़ोटो थी, मेरा नाम था। ...अगर वो लड़का नहीं था, तो क्या था?"
"सुनो। ...वो 'मानव' मुझे रात को नहीं, सुबह पाँच बजे मैसेज करता था। ...वो पूछता था, 'बेटा, खाना खाया?' ...एक बार तो उसने मुझे 'जीती रहो' कह दिया। ...और वो शायरी, राजेश खन्ना के ज़माने की। ...मानव, आजकल का कोई लड़का 'जीती रहो' नहीं कहता। और न ही किसी लड़की को हल्दी वाला दूध पीने की सलाह देता है।"
और हर सुराग़ के साथ मानव के चेहरे का रंग बदलता गया। हल्दी वाला दूध। जीती रहो। सुबह पाँच बजे। वो हर आदत, हर लफ़्ज़, उसे एक ही चेहरे तक ले जा रहा था, उस चेहरे तक जो उसकी पूरी ज़िंदगी उसके नाश्ते की चिंता करता आया था।
"हे राम। ...ये सुबह पाँच बजे... ये हल्दी वाला दूध... ये 'जीती रहो'... ...इरा, ये तो... ये तो दादी हैं। ...मेरी दादी।"
"शाबाश। ...आख़िरकार जासूस साहब को समझ आया। ...हाँ, मानव। तुम्हारी दादी। पुष्पा जी। ...तुम्हारी सत्तर साल की दादी, तुम्हारे नाम से, मुझे रोज़ रात शायरी सुनाती थीं। ...और सच कहूँ, बहुत अच्छी शायरी सुनाती थीं।"
"मैं ज़मीन में गड़ जाऊँ। ...इरा, तुम मेरी नज़रों में देख कर बताओ, मेरी दादी ने तुमसे मेरे नाम पर प्यार भरी बातें कीं, और तुम्हें अच्छी लगीं? ...ये सबसे शर्मनाक बात है जो किसी लड़के के साथ हो सकती है।"
"और यही सबसे प्यारी बात भी थी, मानव। ...जिस पल मुझे समझ आया कि ये एक बूढ़ी औरत है, जो अपने शरमीले पोते के लिए इतनी मेहनत कर रही है, ...मुझे ग़ुस्सा नहीं आया। ...मुझे रोना आ गया। ...जो दादी अपने पोते के लिए आधी रात जाग कर शायरी लिखे, उस पोते को कितना प्यार करती होगी।"
और फिर इरा ने अपना प्याला नीचे रखा, और वो कहा जो मानव ने सपने में भी नहीं सोचा था। क्योंकि इरा उस नक़ली शायर के लिए नहीं रुकी थी। वो किसी और के लिए रुकी थी।
"और मानव, मैंने वो चैट इसलिए नहीं चलने दी कि मुझे वो शायर पसंद था। ...मैं उससे कब की ऊब गई थी। वो बहुत perfect था। ...मैं तो किसी और पर रीझ गई थी। ...इस वाले मानव पर। इस बदमिज़ाज, बेरोज़गार, बत्तख़ के जोक वाले मानव पर, जो हर बार मुझसे मेज़ के लिए झगड़ता है।"
"मुझ पर? ...असली मुझ पर? ...इरा, वो आदमी तो तुमसे रोज़ लड़ता है। ...जिसने तुम्हारी कॉफ़ी पर बत्तख़ का जोक मारा था। ...उस पर?"
"हाँ, उसी पर। ...जो perfect था वो बोर था, मानव। और perfect लोग हमेशा बोर होते हैं। ...तुम बोर नहीं हो। तुम असली हो। ...तुम्हारे जोक बुरे हैं, तुम्हारा मूड ख़राब रहता है, और फिर भी... मुझे तुम्हारे साथ बैठना अच्छा लगता है। ...अब बताओ, इससे बड़ा compliment क्या होगा।"
और उस मेज़ पर, उस पूरे उलझे हुए घर में, पहली बार दो लोग बिना किसी नक़ाब के एक-दूसरे के सामने बैठे थे। न कोई कर्नल, न कोई काया, न कोई नक़ली शायर। बस एक तेज़-तर्रार लड़की और एक बदमिज़ाज कॉमेडियन, जो एक-दूसरे को उनके असली, बिगड़े हुए रूप में पसंद करते थे। घर का पहला सच्चा रिश्ता।
"इरा... मैं ज़िंदगी में पहली बार बिना कुछ छुपाए किसी के सामने बैठा हूँ। ...और डर के मारे मेरे हाथ काँप रहे हैं। ...पर पता है, ये काँपना अच्छा लग रहा है। ...शायद पहली बार, कोई मुझे नक़ली मानव से बेहतर, असली मानव में पसंद कर रहा है।"
"पर मानव, अब एक ज़रूरी बात। ...जो दादी तुम्हारे नाम पर ये सब कर सकती हैं, ...ज़रा सोचो, उस घर में और क्या-क्या पक रहा होगा। ...तुम्हारा एक झूठ तो पकड़ा गया। पर वो घर तो झूठों का पूरा किचन लगता है। ...जाओ। घर जाओ। और अपनी दादी से पूछो, ये खेल कहाँ तक फैला है।"
"तुम कह रही हो मैं जा कर अपनी सत्तर साल की दादी से पूछताछ करूँ? ...जैसे कोई इंस्पेक्टर? ...इरा, वो औरत मुझे एक चप्पल में ठंडा कर देगी। ...पर हाँ, तुम सही हो। बहुत हो गई ये लुका-छिपी। आज मैं सच जान कर ही रहूँगा।"
"और मानव, एक बात याद रखना। ...तुम्हारा घर झूठ इसलिए नहीं बोलता कि वो बुरे लोग हैं। ...वो झूठ इसलिए बोलते हैं क्योंकि हर एक अंदर से डरा हुआ और अकेला है। ...तो जा कर उन्हें पकड़ना मत, गले लगाना। ...अब जाओ, इससे पहले कि मैं तुमसे एक और झगड़ा शुरू कर दूँ।"
"देखा? ...तुम्हारे अंदर भी वो दादी वाली अक़्ल आ ही गई। ...ठीक है, जाता हूँ। ...और इरा... शुक्रिया। मेरे नक़ली रूप से भी, और असली से भी प्यार करने के लिए।"
और मानव उठा, इरा की तरफ़ एक आख़िरी बार देखा, और घर की तरफ़ चल पड़ा, जेब में एक नया हौसला और सीने में सौ सवाल लिए। जो लड़का बरसों दूसरों की शादियों के दबाव से भागता रहा था, आज वो ख़ुद अपने घर के दिल के भेद खोलने जा रहा था।
चतुर्वेदी घर, रात के ग्यारह बजे। बाक़ी सब सो चुके थे। बस दादी पुष्पा अपने पलंग पर बैठी थीं, चश्मा नाक पर टिकाए, एक पुरानी कॉपी में कुछ लिख रही थीं, और फ़ोन की नीली रोशनी उनके चेहरे पर पड़ रही थी। मानव सीधे उनके कमरे में घुसा और दरवाज़ा बंद कर दिया।
"दादी। ...फ़ोन इधर दो। ...इरा को सब पता चल गया है। ...और अब मुझे भी सब पता है। ...वो 'ऑनलाइन मानव', जो उससे रात-रात भर बातें करता था, वो गोलू नहीं था। ...वो तुम थीं, दादी। ...तुमने मेरे नाम से एक लड़की को फँसा रखा था।"
एक पल को पुष्पा का हाथ रुका। चश्मे के पीछे से उन्होंने पोते को देखा। और फिर, किसी शर्मिंदा मुजरिम की तरह नहीं, बल्कि किसी पकड़ी गई मगर बेशर्म शतरंज की खिलाड़ी की तरह, उन्होंने कॉपी बंद की और सीधे बैठ गईं।
"तो? ...हाँ, मैं थी। ...और अच्छा किया। ...तेरे भरोसे छोड़ती न, तो तू सौ साल का हो कर, इसी पलंग पर, कुँवारा मरता। ...मैंने बस वो किया जो तेरी माँ होती तो करती। ...एक अच्छी लड़की ढूँढी। बाक़ी सब तो तूने ख़ुद बिगाड़ लिया अपनी बदमिज़ाजी से।"
"दादी! तुमने मेरे नाम से शायरी लिखी! ...तुमने एक जवान लड़की से आधी रात इश्क़ की बातें कीं! ...तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आई?"
"शर्म किस बात की? ...और शायरी भी क्या ख़ूब लिखी। ...वो लड़की तुझ पर मरती है न आज? ...वो मेरी शायरी का कमाल है, बेटा, तेरी सूरत का नहीं। ...तूने तो बस बत्तख़ के जोक सुना कर उसे भगाने की पूरी कोशिश की थी।"
"और गोलू? ...उस बेचारे ने मेरे सामने झूठ बोला। मेरी आँखों में देख कर कहा कि वो नक़ली मानव उसी ने बनाया था। ...उसने अपने सिर पर सारा इल्ज़ाम ले लिया... सिर्फ़ तुम्हें बचाने के लिए। ...दादी, तुमने उस सोलह साल के बच्चे को अपने झूठ का पहरेदार बना रखा है।"
और इस बात पर, पहली बार, पुष्पा की आवाज़ थोड़ी नरम हुई। गोलू का नाम सुनते ही, उस बेशर्म खिलाड़ी के पीछे से एक थकी हुई, अकेली बूढ़ी औरत झाँकने लगी।
"वो गोलू बहुत अच्छा बच्चा है। ...उसने मुझे बचाया, ये सच है। ...पर मानव, तू एक बात समझ। ...मैं ये सब शरारत में नहीं करती। ...इस घर में हर किसी के दिल का हिसाब मैं रखती हूँ। किसे क्या चाहिए, किसे कौन जँचेगा, कौन अंदर से कितना अकेला है। ...क्योंकि... मेरे अपने दिल का हिसाब रखने वाला अब इस दुनिया में कोई नहीं बचा।"
और मानव, जो ग़ुस्से में अंदर आया था, चुप हो गया। उसने पहली बार अपनी दादी को एक दादी की तरह नहीं, एक अकेली औरत की तरह देखा, जो सबकी शादियाँ इसलिए जोड़ती फिरती थी क्योंकि अपने हिस्से का साथी वो कब का खो चुकी थी। वो पलंग के किनारे बैठ गया, और चुपचाप अपनी दादी का हाथ थाम लिया।
"चल, अब जब तुझे इतना पता चल ही गया है, ...तो एक और बात भी सुन ले। ...और सुन कर बेहोश मत हो जाना। ...इस घर में उस ऐप पर अकेला तू नहीं है, मानव। ...तू तो सबसे आख़िर में गिना जाएगा।"
"क्या मतलब, दादी? ...और कौन है उस ऐप पर? ...तुम... तुम भी हो क्या?"
"मैं तो तेरी बन कर हूँ। ...पर तेरे पापा। ...और तेरी दीदी। ...दोनों, अपने-अपने नक़ली नाम से, उसी परफेक्ट रिश्ता पर बैठे हैं, बेटा। ...एक ही छत के नीचे, एक ही वाई-फ़ाई पर, तीन पीढ़ियाँ चोरी-चोरी प्यार ढूँढ रही हैं। ...और चौथा, गोलू, सबका राज़ ढो रहा है।"
"पापा?! ...वो जगदीश चतुर्वेदी, जिन्हें टीवी का रिमोट नहीं चलता, जो व्हाट्सएप पर 'गुड मॉर्निंग' का फूल भेजते हैं, वो एक मैट्रिमोनियल ऐप पर हैं? ...और दीदी भी? ...दादी, तुम मज़ाक कर रही हो।"
"मज़ाक? ...तेरे पापा वहाँ 'कर्नल रणविजय, रिटायर्ड' हैं। पूरी वर्दी, नक़ली मेडल, फ़ौजी बातें। ...और तेरी दीदी 'काया' है, एक आज़ाद, हँसती-खिलखिलाती लड़की, जो असल में उसके अंदर कहीं दबी पड़ी है। ...और मैं, बेटा, इस घर के हर रिश्ते पर बाज़ की तरह नज़र रखती हूँ।"
और ये कह कर, पुष्पा ने वही पुरानी कॉपी उठाई जिसमें वो कुछ लिख रही थीं। मानव ने पहली बार ग़ौर से देखा, तो वो कोई साधारण कॉपी नहीं थी। वो एक पूरा हिसाब था। नाम, नक़ली नाम, तारीख़ें, और आगे कुछ नंबर।
"दादी, ये क्या है? ...ये तो पूरा जासूसी रजिस्टर है। ...'काया, अनिकेत, चौरासी प्रतिशत'... 'कर्नल, सरिता, नवासी प्रतिशत'... ...तुमने सबके मैच लिख रखे हैं? ...तुम इस घर की CBI हो।"
"रखने पड़ते हैं, बेटा। ...ताकि कोई ग़लत जोड़ी न बन जाए। मैं हर रात इनके match चेक करती हूँ, ताकि कोई अपनों में न उलझ जाए। ...पर मानव... कल रात, एक चीज़ ऐसी दिखी कि मेरी नींद उड़ गई। ...इसीलिए मैं इतनी रात तक जाग रही थी।"
और पुष्पा की उँगली, जो अब तक भरोसे से पन्ने पर चल रही थी, एक लाइन पर आ कर रुक गई। और रुकते ही काँपने लगी। मानव ने देखा कि उसकी दादी का चेहरा राख जैसा पड़ गया है।
"ये देख। ...पिछले हफ़्ते की तारीख़। ...'कर्नल रणविजय' और 'काया'। ...अट्ठानवे प्रतिशत। ...ऐप ने इस पूरे शहर में इन दोनों को सबसे perfect जोड़ी बताया है। ...अट्ठानवे प्रतिशत, मानव।"
"तो? ...अट्ठानवे प्रतिशत तो अच्छी बात है। दो अजनबियों की perfect... ...रुको। ...'कर्नल' तो पापा हैं। ...और 'काया'... काया तो दीदी है। ...दादी। ...ऐप ने पापा को... दीदी के साथ... सबसे perfect जोड़ी बताया है?!"
"और अभी पूरी बात सुन। ...इस लाइन के आगे देख। ...इस मैच पर किसी ने 'रुचि है' का बटन दबा दिया है। ...कल रात। ...इस घर में किसी ने, अनजाने में, अपने ही ख़ून को 'हाँ' कह दिया है। ...और मानव, कसम से, मुझे नहीं पता किसने दबाया। तेरे पापा ने, या तेरी दीदी ने।"
और मानव वहीं जम गया, उस काँपती उँगली और उस एक लाइन को देखता हुआ। अट्ठानवे प्रतिशत। कर्नल और काया। पिता और बेटी। और उस मैच पर दबा हुआ एक 'हाँ', किसी मासूम दिल की एक भूल, जो अब ऐप की उस दुनिया में ज़िंदा घूम रही थी। घर के दो सबसे प्यारे लोग, एक ऐसे रिश्ते के कगार पर खड़े थे, जिसका नाम सोच कर भी रूह काँप जाए। और उसे मिटाने के लिए अब सिर्फ़ एक रात बची थी।
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